ममता बनर्जी के सत्ता गंवाने की ये रहीं 5 बड़ी वजहें

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- Author, शुभज्योति घोष
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी पहली बार राज्य में सत्ता में आने जा रही है और उसे दो-तिहाई से ज़्यादा बहुमत मिला है. बीजेपी ने जहां 206 सीटें जीत ली हैं, वहीं टीएमसी 80 पर ही जीत दर्ज कर सकी है.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद अपनी भवानीपुर सीट से बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी से 15 हज़ार से अधिक वोटों से हार गईं. उससे पहले मतगणना के दौरान ही उन्होंने बीजेपी पर 'वोट लूट' का आरोप लगाया.
उन्होंने पत्रकारों से कहा, "बीजेपी ने 100 से ज्यादा सीटों की लूट की है. बीजेपी की जीत अनैतिक है. इलेक्शन कमीशन ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के साथ मिलकर जो किया है वो पूरी तरह अनैतिक है."
उन्होंने जोर-जबरदस्ती से एसआईआर करने के आरोप लगाए और कहा, "उन्होंने अत्याचार किया. काउंटिंग एजेंटों को गिरफ़्तार किया. हम वापसी करेंगे.''
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लेकिन पंद्रह साल तक लगातार सत्ता में रहने के बाद, तृणमूल कांग्रेस की इस चुनावी हार की वजह क्या हो सकती है, इसे लेकर काफ़ी चर्चा है.
अब तक सामने आए नतीजों और रुझानों के आधार पर इस हार के पीछे पांच प्रमुख कारण माने जा रहे हैं.
1. महिला सुरक्षा का सवाल

इसमें बहुत कम शक है कि पश्चिम बंगाल में महिला मतदाताओं का बड़ा हिस्सा लंबे समय से ममता बनर्जी की पार्टी का समर्थन करता रहा है.
स्कूली लड़कियों को साइकिल बांटने की योजना समेत लक्ष्मीर भंडार, कन्याश्री और सबुज साथी जैसी योजनाओं ने महिलाओं के बीच तृणमूल सरकार को काफ़ी लोकप्रिय बनाया था.
लेकिन इस बार यह समर्थन आधार टूटता हुआ दिखाई दे रहा है. इसकी एक बड़ी वजह महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर पार्टी की कथित नाकामी हो सकती है.
दो साल पहले हुआ आरजी कर आंदोलन इस चुनाव को प्रभावित करता दिखा. इसका बड़ा उदाहरण पानीहाटी है, जिसे पारंपरिक तौर पर तृणमूल का गढ़ माना जाता रहा है.
वहां आरजी कर मामले में महिला की मां बीजेपी के टिकट पर चुनावी मैदान में थीं और उन्होंने 28,836 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की.
पश्चिम बंगाल कवर कर रहे बीबीसी संवाददाताओं से भी कुछ महिलाओं की बातों सुरक्षा जैसे मुद्दे आए.
चुनाव प्रचार जब चल रहा था तो एक महिला ने टीएमसी सरकार के फिर से आने के सवाल पर कहा था, "क्या अब हम सुरक्षित भी रह पाएंगे? यही डर है. मैं अपने इन भाइयों की बात से सहमत हूं, मेरे पास अलग से कहने के लिए कुछ नहीं है. महिलाओं की अब कोई इज़्ज़त नहीं बचेगी. बिल्कुल भी नहीं. वे हमें तोड़कर रख देंगे. नहीं तो हमें यह क्यों सोचना पड़ता कि अभया की मां को जीत के बाद ही न्याय मिलेगा? क्या राज्य की हालत अब ऐसी हो गई है? क्या आप सोच सकते हैं कि वे हमारे साथ क्या करेंगे?"
डेढ़ हफ़्ते पहले कोलकाता में महिलाओं की सुरक्षा पर बीबीसी संवाददाता इशाद्रिता ने महिलाओं से बात की थी.
कोलकाता में एक महिला के तौर पर सुरक्षित महसूस करने के सवाल पर एक महिला ने कहा, "आरजी कर घटना के बाद मैं अपने साथ कुछ सुरक्षा उपाय लेकर चलती हूं."
एक अन्य युवती ने कहा, "कुछ जगहें अनसेफ़ महसूस होती हैं और रात के 9 -10 बजे के बाद तो असुरक्षित महसूस होता है."
2. एसआईआर फ़ैक्टर

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मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर प्रक्रिया के दौरान 90 लाख से ज़्यादा नाम हटाए गए और अब यह काफ़ी साफ़ हो गया है कि इसका सबसे ज़्यादा नुकसान टीएमसी को हुआ है.
यह सही है कि कई वैध मतदाताओं के नाम भी सूची से हटे, लेकिन इस बात पर भी कम शक है कि बड़ी संख्या में फर्जी या मृत मतदाताओं के नाम हटाए गए.
बीजेपी लगातार यह दावा करती रही थी कि ऐसी गड़बड़ियों का फ़ायदा टीएमसी को सालों से चुनावों में मिलता रहा और अब यह बढ़त कम हो जाएगी.
मौजूदा रुझान बताते हैं कि इस दावे में काफ़ी सच्चाई है.
कोलकाता में प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान पढ़ाने वाले ज़ैड मैनहुड ने कहा, "टीएमसी ने भ्रष्टाचार और सिंडिकेट संस्कृति को हमारी ज़िंदगी का आम हिस्सा बना दिया. हमें यह देखना होगा कि कौन-कौन से कारण टीएमसी के खिलाफ़ गए."
"लेकिन मैं यह ज़रूर कहूंगा कि बीजेपी ने दिखा दिया कि 30 प्रतिशत आबादी को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखकर भी वह जीत सकती है. पश्चिम बंगाल की राजनीति पर इसका कितना बड़ा असर पड़ेगा, यह अभी देखना बाकी है."
राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने भी इस चुनावी उलटफेर के लिए एसआईआर को बड़ी वजह बताया.
चुनावी नतीजों की तस्वीर साफ़ होने के बाद बीबीसी से उन्होंने कहा, "बीजेपी की सीटें भले अधिक दिखाई दे रही हैं लेकिन वोटों में सिर्फ़ तीन प्रतिशत का अंतर है."
"अगर 4.3 प्रतिशत लोगों को वोट डालने दिया जाता, जिसमें हम जानते हैं कि ज़्यादातर मुसलमान थे और जो मुसलमान नहीं थे उनमें भी बहुत से टीएमसी के वोटर थे, तो क्या यही परिणाम होता. ज़ाहिर है वो नहीं होता."
3. प्रशासनिक विफलता

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भ्रष्टाचार, कुप्रशासन, रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कथित तौर पर कट-मनी के आरोप, सिंडिकेट संस्कृति का बढ़ना और टीएमसी के पंद्रह साल के शासन में प्रशासनिक विफलताओं के आरोप, शायद पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में पहले कभी इतने बड़े स्तर पर नहीं लगे थे.
फिर भी 2016 और यहां तक कि 2021 में भी पार्टी ने बंगाली पहचान, महिलाओं के लिए कल्याणकारी योजनाओं और धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दों के सहारे इन आलोचनाओं को पीछे छोड़ दिया था.
इस बार ममता बनर्जी ने एसआईआर प्रक्रिया से लोगों को हुई परेशानियों को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की और हर संभव तरीके से इसका राजनीतिक फ़ायदा उठाने का प्रयास किया.
लेकिन अब यह साफ़ हो गया है कि यह कोशिश भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं के आरोपों के सामने टिक नहीं सकी.
4. हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण

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राजनीतिक विश्लेषक लंबे समय से कहते रहे हैं कि ममता बनर्जी की लगातार चुनावी सफलता की एक बड़ी वजह राज्य के मुस्लिम समुदाय का लगभग एकजुट समर्थन रहा है.
पश्चिम बंगाल की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत है और ऐतिहासिक तौर पर उनके 85 से 90 प्रतिशत वोट टीएमसी को मिलते रहे हैं. लेकिन इस बार हिंदू वोटों का एक उलटा ध्रुवीकरण दिखाई दे रहा है, जिसका फ़ायदा बीजेपी को मिला है.
इसका असर मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल ज़िलों में बीजेपी की बढ़त से भी दिखाई देता है.
मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोपों के जवाब में ममता बनर्जी ने हाल के दिनों में सरकारी खर्च पर कई हिंदू मंदिरों का निर्माण या रखरखाव भी कराया था.
इसे हिंदुत्व के अपेक्षाकृत नरम रूप को दिखाने की कोशिश माना गया. हालांकि, यह रणनीति असरदार साबित होती नहीं दिखी और बड़ी संख्या में हिंदू मतदाता बीजेपी के ज़्यादा आक्रामक वैचारिक रुख़ की तरफ़ जाते दिखाई दिए.
कोलकाता में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सुकांतो सरकार का कहना है, "इस बार हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण अधिक देखा गया."
उन्होंने कहा, "हिंदू वोटों की एकजुटता पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाक़ों में बहुत अधिक देखी गई. यहां तक कि टीएमसी के वोटर भी बीजेपी की ओर गए. बीजेपी की जीत में ये प्रमुख कारणों में से एक रहा."
शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराने के बाद पहली टिप्पणी में कहा, "ये हिंदुत्व की जीत है. ये जीत बंगाल की जीत है. ये जीत नरेंद्र मोदी जी की जीत है."
उन्होंने कहा, "सीपीएम के सभी मज़बूत समर्थकों ने मुझे वोट दिया. भवानीपुर में सीपीएम के 13 हज़ार वोट थे और उनमें से कम से कम 10 हज़ार वोट मुझे ट्रांसफ़र हुए. मैं वहां के सीपीएम मतदाताओं का भी आभार जताता हूं. सभी बंगाली हिंदुओं ने खुलकर मुझे वोट दिया. उनके साथ गुजराती, जैन, मारवाड़ी, पूर्वांचली और सिख समुदाय ने भी खुलकर मुझे वोट दिया."
5. केंद्रीय बलों की अभूतपूर्व तैनाती

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कुछ विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में परंपरागत तौर पर चुनावों के दौरान सत्ताधारी पार्टी को कुछ फ़ायदे मिलते रहे हैं.
लेकिन इस बार तृणमूल कांग्रेस को ऐसे फ़ायदे लगभग नहीं मिले. चुनाव कार्यक्रम घोषित होते ही चुनाव आयोग ने राज्य प्रशासन पर कड़ा नियंत्रण कर लिया और बड़े पैमाने पर ज़िलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को बदला गया.
इसके अलावा मतदान शुरू होने से पहले ही राज्यभर में दो लाख 40 हज़ार से ज़्यादा केंद्रीय सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई, जो अभूतपूर्व मानी जा रही है.
कई विश्लेषकों का मानना है कि इतने बड़े सुरक्षा इंतज़ाम की वजह से चुनाव काफ़ी शांतिपूर्ण रहा और मतदाता बिना डर और दबाव के मतदान कर सके.
पिछले डेढ़ महीने के दौरान टीएमसी लगातार निर्वाचन आयोग और केंद्रीय बलों की भूमिका पर सवाल उठाती रही.
अब पीछे मुड़कर देखने पर इन शिकायतों की वजह शायद और साफ़ समझ में आती है.
दूसरे शब्दों में कहें तो इस चुनाव में निर्वाचन आयोग और केंद्रीय बलों की भूमिका तृणमूल कांग्रेस के ख़िलाफ़ जाती दिखाई दी.
ममता बनर्जी ने 29 अप्रैल को आरोप लगाया था कि 'केंद्र की ताक़तें और पूरी सरकारी मशीनरी (टीएमसी को हराने में) लगी हुई है.'
कोलकाता से निकलने वाले अख़बार टेलीग्राफ़ की एक ख़बर के अनुसार, "26 अप्रैल को ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि कोलकाता एयरपोर्ट जाते हुए केंद्रीय बलों ने उनकी कार चेक करने की कोशिश की."
टीएमसी के नेता अभिषेक बनर्जी ने केंद्रीय बलों पर राज्य में 'दहशत फैलाने' के आरोप लगाए थे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
































