राष्ट्रपति उम्मीदवार आदिवासी, उपराष्ट्रपति उम्मीदवार ओबीसी: क्या मोदी-शाह बीजेपी का 'चाल, चरित्र और चेहरा' बदल रहे हैं?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में प्रधानमंत्री ओबीसी हैं, राष्ट्रपति पद का उनका उम्मीदवार आदिवासी है और अब एनडीए ने उपराष्ट्रपति पद के लिए भी ओबीसी को ही उम्मीदवार बनाया है.
भारत की कैबिनेट में पिछले साल हुए विस्तार के बाद वर्तमान में 27 ओबीसी, 12 एससी और 11 महिलाएँ मंत्री हैं.
देश के शीर्ष नेतृत्व का ये जातिगत विश्लेषण बीजेपी ख़ुद ही सामने रखती आई है.
बीजेपी को दशकों से कवर करने वाले पत्रकार मानते हैं कि बीजेपी हमेशा से ऐसी नहीं थी.
वाजपेयी और आडवाणी के समय बीजेपी 'अपर क्लास' और 'अपर कास्ट' पार्टी मानी जाती थी.
मोदी-शाह के ज़माने में बीजेपी अपने उस नक़ाब को उतार कर जानबूझकर ओबीसी, दलित और आदिवासी पार्टी का टैग पहनने पर आमादा दिख रही है.
इससे दो अहम सवाल उठते हैं - अगर ओबीसी-दलितों को पार्टी में इतनी तवज्जो और जगह मिल रही है तो अगड़ों का क्या होगा? क्या इससे बीजेपी से जुड़े सवर्ण नाराज़ नहीं होंगे?
बीजेपी को पार्टी और सरकार का चेहरा बदलने की कोशिश से क्या फ़ायदा होगा?

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चेहरा बदलने की बीजेपी की कोशिश
'सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज' (सीएसडीएस) के प्रोफ़ेसर और राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार कहते हैं, "ब्राह्मण बनिया जैसे अगड़ों की पार्टी बन कर बीजेपी 24-28 फ़ीसदी वोट शेयर वाली पार्टी बन सकती है, वाजपेयी के समय उन्हें इतना ही वोट शेयर मिला. अगर बीजेपी को पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनानी है और भारतीय राजनीति उनका जो दबदबा आज है, वो आगे बनाए रखना है तो उसके लिए दलितों, ओबीसी और पसमांदा मुसलमानों के बीच पैठ बनानी होगी. इसके पीछे की वजह साफ़ है और वो है इनकी संख्या."
हाल ही में तेलंगाना में सम्पन्न हुई बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में बीजेपी ने आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े तक पहुँचने पर खास जोर दिया. कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व का जोर भी पसमांदा मुसलमानों पर है, जो मुसलमानों में पिछड़े माने जाते हैं.
भारत में जातिगत जनगणना सालों से नहीं हुई है. लेकिन अनुमान के मुताबिक़ 45 से 48 फ़ीसदी ओबीसी आबादी है, दलित और आदिवासी आबादी लगभग 22.5 फ़ीसदी और पसमांदा मुसलमानों की आबादी लगभग 8.5 फ़ीसदी है, वहीं सवर्णों की आबादी लगभग 15-18 फ़ीसदी है.
सीएसडीएस के आंकड़ों के मुताबिक अटल-आडवाणी युग में (1999-2004) बीजेपी के पास कुल 28 फ़ीसदी वोट शेयर हुआ करता था.
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में ये वोट बेस 31 फ़ीसदी हुआ और साल 2019 के लोकसभा चुनाव में ये और बढ़कर 37 फ़ीसदी पहुँच गया है.
संजय कुमार के मुताबिक़ प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में बीजेपी के विस्तार के इन्हीं आँकड़ों में ओबीसी-दलित कार्ड की राजनीति छिपी है.
यही वजह है कि कैबिनेट विस्तार से लेकर राष्ट्रपति उम्मीदवार और उपराष्ट्रपति उम्मीदवार सब जगह ओबीसी दलितों का ज़िक्र पार्टी करती नज़र आती है.
संजय कुमार कहते हैं, "बीजेपी को मालूम है कि एक बार बीजेपी दलितों, ओबीसी वाली पार्टी के तौर पर स्थापित हो जाएगी, तो अगले दस साल में भले ही रफ़्तार दूसरी हो जाए, तो फ़र्क नहीं पड़ेगा."

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जातिगत पहचान की राजनीति
यहां एक और बात ग़ौर करने वाली है.
चाहे उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जगदीप धनखड़ हो या राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू, दोनों अपनी अपनी जातियों के मुद्दों को मुखर नेतृत्व देने के लिए नहीं जाने जाते हैं.
फिर ऐसे नेता अगर शीर्ष पदों तक पहुँचते हैं, मंत्री या राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति बनते हैं तो उस वर्ग विशेष का वोट बैंक कैसे तैयार होता है?
इस सवाल के जवाब में गुजरात यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर गौरांग जानी कहते हैं, "अगर किसी जाति से जुड़े बड़े नेता का नाम बड़े पद के लिए आगे किया जाएगा, तो चुनौती पार्टी के सामने ज़्यादा बढ़ेगी. इस वजह से सत्ता में या शीर्ष पदों पर उनका प्रतिनिधित्व सांकेतिक ही है."
"पिछले कुछ सालों में इस सांकेतिक प्रतिनिधित्व में तेज़ी देखने को मिली है. ये दिखावे का सबका साथ और सबका विकास है. इसलिए बार-बार बोलकर ये बताने की ज़रूरत पड़ती है कि हमारे कैबिनेट में इतने ओबीसी और दलित हैं. देश का प्रधानमंत्री ओबीसी है. राष्ट्रपति पहली बार आदिवासी महिला बनने जा रही है. उप-राष्ट्रपति भी ओबीसी है."

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जातिगत राजनीति पर बीजेपी क्यों लौटी?
यही वजह है कि चाहे राज्यसभा के टिकट बंटवारे की बात हो या फिर राज्य विधानसभा चुनाव से पहले छोटे दलों से गठबंधन की बात - बीजेपी जातिगत समीकरणों का ख़ास ख्याल रखती है.
जानकार मानते हैं कि राष्ट्रपति पद के लिए द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी का एलान आने वाले दिनों में गुजरात समेत उन राज्यों के विधानसभा चुनावों को देख कर किया गया हैं, जहाँ आदिवासी आबादी अच्छी खासी है.
उसी तरह से जानकार उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जगदीप धनखड़ के नाम को अगले साल होने वाले राजस्थान और हरियाणा विधानसभा चुनाव से जोड़ कर देख रहे हैं, जहाँ जाटों की आबादी अच्छी ख़ासी है.
धनखड़ राजस्थान के झुंझुनू से आते हैं और यहाँ जाट ओबीसी के दायरे में आते हैं.
गौरांग जानी आगे कहते हैं, "अपर कास्ट की राजनीति राष्ट्रीय स्तर पर ठीक है, लेकिन अगर आप अलग-अलग राज्यों में पैठ बनानी है तो 'जाति' ही ज़मीनी हक़ीकत है."
"पिछले कुछ सालों में हिंदुत्व के साथ-साथ लोग अपनी जातिगत पहचान को लेकर दोबारा से जागरूक होते नज़र आ रहे हैं. भारत में कितनी सारी जातियों के अपने समूह हैं, वेबसाइट है और सालाना सम्मेलन होते हैं. इसलिए हिंदू आईडेंटिटी के साथ साथ पारंपरिक जातिगत पहचान से भी लोग जुड़े रहे. हिंदुत्व की राजनीति से जो हासिल करना था, बीजेपी ने उससे बहुत कुछ हासिल कर लिया. लेकिन जब हिंदुत्व का छाता सिर से हटेगा तो हिंदू जातियों में बंटे नज़र आते हैं. ओबीसी, दलित और आदिवासी - कई राज्यों में वोट के हिसाब से निर्णायक हो जाते हैं."

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अगड़ों पर असर
वैसे मोदी- शाह के कैबिनेट में राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी जैसे सवर्ण चेहरे भी हैं, जो अगड़ी जातियों से ताल्लुक रखते हैं. बीजेपी अध्यक्ष ख़ुद ब्राह्मण हैं. आज भी मंत्रिमंडल में अगर 27 ओबीसी हैं तो 30 के लगभग अपर कास्ट मंत्री हैं.
विजय त्रिवेदी दशकों से बीजेपी कवर करते हैं. उन्होंने बीजेपी से जुड़ी चार किताबें लिखी है.
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "एक समय बीजेपी संसदीय दल में अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, नितिन गडकरी जैसे सब ब्राह्मण नेता हुआ करते थे. उससे बीजेपी की इमेज अपर कास्ट पार्टी की बनी. नरेंद्र मोदी देश के पहले ओबीसी प्रधानमंत्री बने. उनके आने के बाद अमित शाह यूपी के इंचार्ज बने. सोशल इंजीनियरिंग पर उन्होंने खूब काम किया. उसका नतीजा 2014 और 2017 में साफ़ दिखा. नरेंद्र मोदी के आने के बाद बीजेपी की रणनीति में बड़ा बदलाव हुआ."
"ये बात भी सही है कि बीजेपी के सवर्णों में इस बात की नाराज़गी भी है. इसका एक दूसरा पक्ष भी है. अब भारत की राजनीति में सवर्णों की उतनी वोट वैल्यू नहीं रहती है. 45-48 फ़ीसदी ओबीसी, 22 फ़ीसदी के आसपास दलित आदिवासी हैं. अपर कास्ट अपने आप में अलग वोट बैंक नहीं है. उसमें ब्राह्मण अलग वोट करते हैं, बनिया अलग वोट करते हैं. जब आपकी लीडरशीप ओबीसी हो गई है तो उसका भी फ़र्क पड़ता है."

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लेकिन ऐसा नहीं है कि बीजेपी में सवर्ण हाशिए पर चले गए हैं. विजय त्रिवेदी बीजेपी में सवर्णों की स्थिति को एक उदाहरण के साथ समझाते हैं.
"पहले चार बेडरूम के फ़्लैट में आप अकेले रहते थे. एक कमरे में सोते थे लेकिन राज चारों कमरे पर करते थे. फिर उस कमरे में दो और लोग रहने आ गए. भले ही आज उसी एक कमरे में सोते हैं, उसमें कोई कमी नहीं आई लेकिन बाक़ी के तीन कमरों में से दो कमरे उन नए लोगों को दे दिया गया, तो आपका अधिकार बाक़ी के कमरों पर कम हो गया."
"यही बात सवर्णों पर भी लागू होती है. बीजेपी में राजनीतिक पावर कम नहीं हुई है और ना ही उनकी राजनीतिक हैसियत. पूरे कैबिनेट में लगभग 30 सवर्ण मंत्री हैं तो मंत्रिमंडल में उनकी हिस्सेदारी लगभग 40 फ़ीसदी हुई, लेकिन सवर्ण आबादी 15-20 फ़ीसदी ही है. पहले यही 15-20 फ़ीसदी 80 फ़ीसदी तक मंत्रिमंडल पर कब़्जा कर बैठे थे. बीजेपी का चेहरा इस तरीके से बदल रहा है."
वोटबैंक की राजनीति के इतिहास को भारत में मंडल के पहले और मंडल के बाद में विभाजित किया जा सकता है. मंडल के पहले ओबीसी, दलित आदिवासी सब कांग्रेस के साथ दिखाई देते थे. लेकिन मंडल कमीशन के बाद ये वोट बैंक क्षेत्रीय पार्टियों में बंट गया.
संजय कुमार कहते हैं अगड़ों के लिए फिलहाल कोई विकल्प नहीं है. कांग्रेस के पास वो जा नहीं सकते और क्षेत्रीय पार्टियां ज्यादातर जातियों के आधार पर ही बनी है. इस वजह से बीजेपी का कोर वोट उनके पास ही है और दलित, आदिवासी ओबीसी उसमें एड-ऑन हो रहे हैं. इन तबकों में उन्होंने अलग से पैठ बना ली है, लेकिन उसे संगठित करना अभी बाक़ी है.
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