द्रौपदी मुर्मू के सामने विपक्ष की एकता कैसे बिखरती गई

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ओम प्रकाश राजभर ने शुक्रवार को एलान किया है कि वो राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे.
उत्तर प्रदेश विधानसभा में ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के 6 विधायक हैं.
विधानसभा चुनाव में उन्होंने अखिलेश यादव के साथ गठबंधन किया था. वैसे अखिलेश यादव इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा का समर्थन कर रहे हैं पर अपने चुनावी गठबंधन के साथियों को वो राष्ट्रपति चुनाव में एकजुट नहीं रख पाए.
यहाँ ये भी ग़ौरतलब है कि अखिलेश के लिए उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार करने भी ममता बनर्जी गई थीं.
राजभर से पहले झारखंड मुक्ति मोर्चा ने भी द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी के समर्थन का एलान किया है. ग़ौरतलब है कि झारखंड में जेएमएम कांग्रेस के साथ सरकार चला रही है.
महाराष्ट्र में भी शिव सेना के उद्धव ठाकरे गुट ने द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी के समर्थन का एलान कर दिया है. वहाँ उद्धव ठाकरे पिछले महीने तक कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिल कर सरकार चला रहे थे.
इस तरह एक एक कर विपक्ष के कुनबे से राष्ट्रपति पद के उनके संयुक्त उम्मीदवार यशवंत सिन्हा के लिए बुरी ख़बरें आ रही हैं.
इससे पहले ममता बनर्जी ने द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी को लेकर कहा था, ''अगर हमें बीजेपी की उम्मीदवार के बारे में पहले सुझाव मिला होता, तो इस पर सर्वदलीय बैठक में चर्चा कर सकते थे. बीजेपी ने हमसे संपर्क किया था, लेकिन उम्मीदवार के बारे में नहीं बताया था.''
यहाँ ये भी अहम है कि ममता बनर्जी ने ही विपक्ष के उम्मीदवार के तौर पर यशवंत सिन्हा का नाम सुझाया था. यशवंत सिन्हा उनकी पार्टी के ही सदस्य थे और इस्तीफ़ा देकर राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए नामांकन भरा.
ख़बरों के मुताबिक़, यशवंत सिन्हा को पश्चिम बंगाल में प्रचार करने से भी ममता बनर्जी ने मना किया है. उन्होंने यशवंत सिन्हा को भरोसा दिलाया है कि टीएमसी के सभी वोट उन्हें ही मिलेंगे.

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आक्रामक भाजपा
वैसे एनडीए की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू की जीत पहले से पक्की मानी जा रही थी, लेकिन विपक्ष एकजुट होकर अपने ही उम्मीदवार के लिए वोट नहीं जुटा पाएगा, ऐसा यशवंत सिन्हा की उम्मीदवारी की घोषणा के वक़्त नहीं लग रहा था.
तो क्या ये ममता बनर्जी की हार और मोदी-शाह की रणनीति की जीत है? द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी बिख़रते विपक्ष के अलावा भी क्या कुछ और इशारा कर रही है?
इस सवाल के जवाब में नीरजा चौधरी कहती हैं, "द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना कर एनडीए ने बड़ा दांव खेला है. जब विपक्ष ने यशवंत सिन्हा के नाम की घोषणा की थी, तो लग रहा था कि 55-60 फीसदी तक एनडीए उम्मीदवार को वोट मिल सकते हैं. लेकिन अब तो लग रहा है कि मामला एकतरफ़ा ही हो रहा है. लेकिन ये सब सिर्फ़ इस चलते नहीं हो रहा, क्योंकि उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू हैं. इसके पीछे और भी कई वजहें है."
उनके मुताबिक़, एक तरफ़ विपक्ष बिखरा हुआ है, तो दूसरी तरफ़ भाजपा भी उतनी ही आक्रामक है और इन सबके बीच द्रौपदी मुर्मू के नाम के साथ 'जनजातीय पहचान' को एक वोट बैंक की तरह भुनाने की कोशिश भी है.
वो कहती हैं, "एक तरफ़ राष्ट्रपति पद के चुनाव में विपक्ष के पास साझा रणनीति की कमी दिखी. विपक्ष खुद को एकजुट नहीं रख पाया. तो दूसरी तरफ़ भाजपा ने काफ़ी आक्रामक तरीक़े से अपने उम्मीदवार के लिए कैंपेन किया. यहाँ ये देखना ज़रूरी है कि हेमंत सोरेन का मुर्मू को समर्थन केवल इस बात के लिए है कि मुर्मू आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखती हैं या इसके पीछे की वजह कुछ और है?"
नीरजा यहां प्रधानमंत्री के हाल के झारखंड दौरे का ज़िक्र करते हुए कहती हैं कि पीएम मोदी ने अपने दौरे और भाषण में हेमंत सोरेन पर कोई तल्ख़ टिप्पणी नहीं की.
महाराष्ट्र का ज़िक्र करते हुए वो कहती हैं, "जिस तरह से भाजपा ने शिव सेना में दो फाड़ कर दिया और एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया जबकि वो उप-मुख्यमंत्री के लिए भी तैयार थे. उद्धव ठाकरे गुट के शिव सेना नेताओं को भी इस बात के लिए विवश कर दिया कि मुर्मू को ही समर्थन दिया जाए. उसके बाद भी महाराष्ट्र में कैंपेन के दौरान उद्धव गुट के विधायकों को द्रौपदी मुर्मू से मिलने के लिए नहीं बुलाया." ये सब भाजपा की आक्रामक रणनीति को दिखाता है.

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आदिवासी वोट बैंक
पहचान की राजनीति पर नीरजा कहती हैं, "भारत के इतिहास में पहली बार कोई आदिवासी महिला देश के सबसे बड़े पद यानी राष्ट्रपति बनेंगी. ये कोई छोटी बात नहीं है. इससे सांकेतिक ही सही, भारत की आदिवासी आबादी में एक संदेश जाएगा.''
भारत में 8.5 फ़ीसदी आदिवासी जनसंख्या है, जो कुछ सात-आठ उत्तरी और पश्चिमी राज्यों (जैसे मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा) में ज़्यादा है. पूर्वोत्तर के आदिवासियों को छोड़ दिया जाए तो भी भाजपा के लिए ये सभी राज्य अहम हैं.
वो कहती हैं, ''दो बार से केंद्र में भाजपा सत्ता में है. ऐसे में सत्ता विरोधी लहर होना स्वाभाविक है. इसके लिए भाजपा नए वोट बैंक की तलाश में है. द्रौपदी मुर्मू के बहाने आदिवासी जनसंख्या में अपना वोट बैंक बनाने की भाजपा की एक कोशिश है, जिसमें वो कामयाब भी होंगे, ऐसा लग रहा है. हालांकि ये भी सच है कि आरएसएस भी इस दिशा में सालों से इस पर काम कर ही रहा था.''
द्रौपदी मुर्मू का संथाल आदिवासी होने की वजह से ही ममता बनर्जी भी खुलकर उनका विरोध नहीं कर पा रहीं.
'पहचान की राजनीति पर' पर वरिष्ठ पत्रकार महुआ चटर्जी कहती हैं, "ममता बनर्जी ने द्रौपदी मुर्मू के समर्थन में जो बात कही, उसे पश्चिम बंगाल की राजनीति के संदर्भ में समझने की ज़रूरत है. पश्चिम बंगाल के 70 फ़ीसदी आदिवासी संथाल हैं. इस वजह से उन्हें पश्चिम बंगाल के अपने आदिवासी वोट बैंक को ये बात समझाना पड़ेगा कि वो क्यों मुर्मू का समर्थन नहीं कर रही हैं."

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विपक्ष को एकजुट करने के ममता के प्रयास
देश के 15वें राष्ट्रपति के लिए 18 जुलाई को मतदान होगा और 21 जुलाई को नए राष्ट्रपति की घोषणा की जाएगी.
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष की एकजुटता दिखाने का इसे एक अहम अवसर माना जा रहा था.
जैसे ही राष्ट्रपति चुनाव की तारीख़ों का एलान हुआ, इससे पहले कांग्रेस की तरफ से विपक्ष को एकजुट करने की कोई कोशिश की जाती, उससे पहले ममता बनर्जी ने इस मामले में पहले पहल कर दी.
उन्होंने विपक्षी पार्टियों को एकजुट करने की पहल की. कांग्रेस को भी इसमें निमंत्रण भेजा, कांग्रेस शामिल भी हुई. लेकिन शुरुआत में राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए शरद पवार, फारूख़ अब्दुल्ला और गोपाल कृष्ण गांधी के मना करने के बाद, विपक्ष में दरार दिखने लगी थी.
बाद में ममता बनर्जी ने ही यशवंत सिन्हा का नाम आगे किया, जिसे विपक्ष के नेताओं ने स्वीकार भी किया. इस वजह से एक तरफ़ से यशवंत सिन्हा की उम्मीदवारी ममता बनर्जी की देन भी कहा जा रहा है.

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लेकिन एक-एक कर विपक्ष के नेता कुनबे से निकल कर अपनी अलग राह पकड़ रहे हैं- तो क्या ममता बनर्जी की नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल खड़े होते हैं?
वरिष्ठ पत्रकार महुआ चटर्जी कहती हैं, ''राष्ट्रपति चुनाव में बिखरा विपक्ष ममता बनर्जी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े नहीं करता. ये सवाल केवल सत्ताधारी पार्टी का बनाया हुआ एक नैरेटिव है.''
इसके पीछे वो अपने तर्क भी देती हैं.
पहला- ममता एक क्षेत्रीय पार्टी की नेता हैं. उन्होंने एक मुद्दे पर विपक्ष को एकजुट करने की मुहिम की शुरुआत करने की कोशिश भर की थी, वो विपक्ष की नेता नहीं हैं.
दूसरा- विपक्ष राष्ट्रपति उम्मीदवार के चयन में थोड़ा कमज़ोर रहा. उम्मीदवार के नाम की घोषणा पहले करना भी रणनीति के लिहाज से सही नहीं रहा.
तीसरा- भारत में सत्ता पक्ष का उम्मीदवार ही हमेशा राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतता है. वीवी गिरी का राष्ट्रपति चुना जाना बस एक अपवाद है.
चौथा- जो विपक्षी पार्टियां यशवंत सिन्हा का समर्थन नहीं कर रही, वो राजनीतिक कारणों से ऐसा नहीं कर रही हैं. महाराष्ट्र में जो कुछ हुआ, उसमें ममता बनर्जी क्या कोई नेता भी विपक्ष को एकजुट नहीं कर पाएगा.
महुआ यहां 2012 के राष्ट्रपति चुनाव का उदाहरण देती हैं.
ममता बनर्जी उस समय कांग्रेस से झगड़ कर अलग हो चुकी थीं. उन्होंने अलग होते समय कहा था कि वो कांग्रेस के उम्मीदवार का समर्थन नहीं करेंगी. लेकिन जब कांग्रेस ने प्रणब मुखर्जी की उम्मीदवारी की घोषणा की तो उनके पश्चिम बंगाल से ताल्लुक रखने की वजह से ममता बनर्जी ने प्रणब मुखर्जी को समर्थन दिया.
उस समय बंगाली पहचान की बात थी, इस बार आदिवासी पहचान की बात है. आज की तारीख़ में 'पहचान की राजनीति' ज़्यादा हावी है.
इसके अलावा महुआ चटर्जी ये भी कहती हैं कि राष्ट्रपति चुनाव ही विपक्ष की एकजुटता दिखाने का इकलौता मौक़ा नहीं है. संसद का सत्र भी शुरू हो रहा है. असंसदीय शब्दों की नई सूची पर हंगामे में भी विपक्षी पार्टियां एकजुट दिखी थीं. उपराष्ट्रपति चुनाव की भी सुगबुगाहट शुरू हो गई है.

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उपराष्ट्रपति चुनाव पर असर
जब यशवंत सिन्हा ने राष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष का उम्मीदवार होना स्वीकार किया, तब भी उनको मालूम था कि वो ये चुनाव जीतने वाले नहीं हैं. विपक्ष ने अपना उम्मीदवार इसलिए खड़ा किया, क्योंकि वो एनडीए के उम्मीदवार को वॉकओवर नहीं देना चाहते थे.
लेकिन जिस तरह से बीच में एक-एक कर विपक्षी नेता साथ छोड़ रहे हैं, क्या उपराष्ट्रपति पद के चुनाव पर भी उसका असर पड़ेगा?
नीरजा कहती हैं, "जैसे यशवंत सिन्हा को बीच मझधार में छोड़ने का काम उद्धव ठाकरे ने भी किया, हेमंत सोरेन ने भी किया और एक तरह से ममता ने भी किया. आगे चल कर विपक्ष का कोई कद्दावर नेता अपने आप को इस परिस्थिति में नहीं डालेगा. अगर विपक्ष एकजुट होकर एक संयुक्त उम्मीदवार देने की क्षमता नहीं रखता, हार-जीत की बात तो दूर- तो सोचिए उपराष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष एक नाम कैसे तय कर पाएगा? विपक्ष का उत्साह ज़रूर कम होगा."
हालांकि, महुआ चटर्जी कहती हैं कि विपक्ष की रणनीति उपराष्ट्रपति चुनाव में थोड़ा अलग रहेगी. जैसे राष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष ने अपना उम्मीदवार पहले घोषित किया और सरकार ने बाद में, इस बार उपराष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष अपना उम्मीदवार एनडीए के बाद घोषित कर सकती है.
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