निरहुआः भोजपुरी फ़िल्मों के स्टार से आज़मगढ़ के 'हीरो' तक

दिनेश लाल यादव 'निरहुआ'

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    • Author, कुमार हर्ष
    • पदनाम, आज़मगढ़ से, बीबीसी हिन्दी के लिए

उत्तर प्रदेश की आज़मगढ़ लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में भोजपुरी फ़िल्मों के कलाकार और बीजेपी उम्मीदवार दिनेश लाल यादव उर्फ़ निरहुआ ने समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव को हरा दिया है.

आज़मगढ़ लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजों को बीजेपी की जीत से ज़्यादा समाजवादी पार्टी की हार को अहम माना जा रहा है.

समाजवादी पार्टी का गढ़ मानी जानें वाली इस सीट पर बीजेपी की जीत की अहमियत इतनी है कि पीएम मोदी ने अपने ट्वीट में इसका ख़ासतौर पर ज़िक्र किया. इन दोनों सीटों पर प्रचार के लिए योगी आदित्यनाथ खुद मैदान में उतरे और मंत्रियों को भी प्रचार में लगाया.

वर्ष 2019 में जब बीजेपी ने निरहुआ को आज़मगढ़ से लोकसभा उम्मीदवार बनाया था तब खुद उन्हें सपने में भी ख्याल नहीं आया होगा कि बाद में वो उसी लोकसभा सीट से चुनाव जीतेंगे.

रविवार को मिली जीत के साथ निरहुआ के बारे में भी लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है. वर्ष 2019 में जब बीजेपी ने निरहुआ को आज़मगढ़ से लोकसभा उम्मीदवार बनाया था तब बीबीसी ने उनके जीवन पर ये लेख लिखा था. एक बार फिर पढ़ें -

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आज करीब तीन साल पहले 27 मार्च 2019 को निरहुआ ने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली थी. दो अप्रैल को सरकार ने उन्हें वाई-श्रेणी की सुरक्षा देने का ऐलान किया और 3 अप्रैल को पार्टी ने उन्हें समाजवादी क़िला कहे जाने वाले आज़मगढ़ लोकसभा सीट से उम्मीदवार घोषित कर दिया था.

उसी दिन उन्होंने साफ़ किया कि अखिलेश यादव भाई जैसे हैं लेकिन सिर्फ़ यादव होने के चलते उन्हें समर्थन देना मेरी फ़ितरत नहीं. और ये भी कि वे 'अखिलेश भक्त' नहीं 'देश भक्त' हैं.

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नाटकीय बदलावों से भरी ज़िन्दगी

पश्चिम बंगाल के चौबीस परगना और कोलकाता से होकर गाजीपुर के एक ठेठ गाँव में वापसी और फिर मायानगरी मुम्बई से होते हुए दुनिया के ढेरों मुल्कों में स्टेज शो के बाद राजनीति?

उनकी ज़िन्दगी में ऐसे नाटकीय बदलाव अक्सर आते रहे हैं.

आप उनसे उनका जन्मदिन पूछें तो वे अपने दो जन्मदिन बताते हैं- पहला 1981 का - जो दिनेश लाल यादव पुत्र कुमार यादव का जन्मदिन है और दूसरा 22 मार्च 2003 का जब उनके एक लोकप्रिय अल्बम 'निरहुआ सटल रहे' ने कामयाबी के ऐसे झंडे गाड़े कि 'निरहुआ' उनका दूसरा और कहीं ज़्यादा लोकप्रिय नाम हो गया.

मूलतः उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर ज़िले की जखनिया तहसील के टडवां गाँव के बाशिंदे दिनेश लाल का बचपन कोलकाता में बीता जहाँ उनके पिता कुमार यादव नौकरी करते थे.

बड़े भाई विजयलाल यादव और चचेरे भाई प्यारेलाल यादव बिरहा गायकी के बड़े नाम हुआ करते थे लिहाजा घर में गायकी को लेकर अच्छा माहौल था. प्यारेलाल की सिफ़ारिश से उन्हें काम मिलना शुरू हुआ. कभी ढोलक तो कभी हारमोनियम बजाने और कभी-कभी कोरस में गाने का भी.

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2002 में चंदा कैसेट कंपनी ने उनका एक अल्बम 'रंगीली होली आ गयी' निकाला, जो खूब बिका. इस सफलता के बाद मशहूर टी सिरीज़ से 2003 में उनका अल्बम 'निरहुआ सटल रहे' आया जिसने बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले.

'दुलहिन रहे बीमार, निरहुआ सटल रहे...' जैसी लाइनों वाला ये गाना दरअसल युवा पीढ़ी पर कटाक्ष करता था जो माँ-बाप की बजाय बीवी पर ज़्यादा ध्यान देते थे. मगर उनकी अलग-अनोखी आवाज़ और ज़बरदस्त संगीत ने इसे चौराहे-चौराहे तक लोकप्रिय कर दिया और उस साल शादियों में बैंड वालों ने भी इसकी धुन बजाना शुरू कर दिया.

2005 में फैज़ाबाद के रहने वाले निर्माता संजय श्रीवास्तव ने 'हमका ऐसा वैसा ना समझा' फ़िल्म के लिए साइन किया हालांकि उसी बीच निर्माता सुधाकर पाण्डेय ने उन्हें अपनी फ़िल्म 'चलत मुसाफिर मोह लियो रे' में मौका दिया.

यह फ़िल्म हिट साबित हुई और इसके बाद 'हो गइल बा प्यार ओढ़निया वाली से' ने बॉक्स ऑफ़िस पर रिकॉर्ड कमाई की. उनकी फ़िल्म 'निरहुआ रिक्शावाला' पहली भोजपुरी फ़िल्म थी जो ओवरसीज यानी ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, ऑकलैंड और फिजी में भी रिलीज़ हुई.

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यह फ़िल्म गोल्डन जुबली साबित हुई और वे भोजपुरी फ़िल्मों के सुपर स्टार बन गए. कुछ अरसे पहले एक लम्बी गुफ़्तुगू में उन्होंने माना था कि किस्मत उन पर खासी मेहरबान रही है और "मुझे ऐसी-ऐसी चीज़ें मिलीं जो मैं कभी सोच भी नहीं सकता था."

वर्ष 2000 में जब उन्होंने गायकी शुरू की तो सपने में भी नहीं सोचा था कि केवल 7 साल के भीतर ऐसा भी आएगा जब वे ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैण्ड, फिजी और ऑकलैंड में 20 हज़ार की भीड़ के बीच स्टेज शो करेंगे जहाँ विदेशी लड़कियां उनके प्रोग्राम की टिकट अपनी बाँहों पर स्टाम्प की तरह चिपका कर चीखेंगी.

वे भोजपुरी ही नहीं हिंदी फ़िल्मों के इतिहास में भी पहले ऐसे नायक हैं जिनके नाम से आधे दर्ज़न ज़्यादा फ़िल्में बनीं और चलीं मसलन- निरहुआ रिक्शावाला, निरहुआ चलल ससुराल, निरहुआ नंबर वन, निरहुआ के प्रेम रोग भईल, निरहुआ मेल आदि.

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फ़िल्मबाज़ी से आई फ़िल्मों की समझ

फ़िल्में दरअसल उनकी ज़िन्दगी में बचपन में ही पैठ गयीं थीं. बकौल निरहुआ "24 परगना के बेलघरिया इलाक़े में जहाँ हम लोग रहते थे वहां से 3 किलोमीटर दूर वीडियो पर फ़िल्में दिखाई जाती थीं. मैं रात को अपने बिस्तर पर दो तकिये सजाकर उस पर चादर डाल कर फ़िल्में देखने निकल जाता था और भोर में 5 बजे आकर वापस बिस्तर पर सो जाता था."

शायद इसी 'फ़िल्मबाज़ी' ने उनमें फ़िल्मों की गहरी समझ पैदा की है. अपने प्रोजेक्ट्स डिजाइन करते समय बाज़ार और मांग का खासा ध्यान रखते हैं. चाहे वो स्टंट्स का मामला हो या किसिंग सीन का- भोजपुरी फ़िल्मों में वे अग्रणी प्रयोगकर्ता साबित हुए हैं. फ़िल्म 'नरसंहार' के लिए उन्होंने अपना सर मुंडा लिया क्योंकि फ़िल्म के नायक के पूरे परिवार की हत्या कर दी जाती है. वे चाहते थे कि वे खुद उस पीड़ित की तरह दिखें.

अन्य भोजपुरी कलाकारों से अलग अपनी मेहनत और समयबद्धता के चलते वे दक्षिण भारतीय निर्माताओं में भी लोकप्रिय हैं. 2007 में जी सुब्बाराव ने उन्हें 'कईसे कहीं तोहरा से प्यार हो गईल' में लिया था और उनकी इतनी तारीफ़ हुई कि बाद में बीओ सुब्बारेड्डी ने खिलाड़ी नंबर-1 और मशहूर निर्माता डी रामानायडू ने शिव और दी टाइगर में उन्हें बतौर हीरो साइन किया.

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नया करते रहने के शौक़ीन

हालांकि,उनका नाम अपनी को स्टार पाखी हेगड़े के साथ खूब जुड़ा पर कम ही लोगों को पता है कि वे दो बेटों आदित्य और अमित के पिता हैं. उनकी पत्नी मंशा लाइमलाइट से दूर रहना पसंद करती हैं.

परिवार के लिए बेहद समर्पित निरहुआ ने अपनी कामयाबी के बाद छोटे भाई प्रवेशलाल यादव को इंडस्ट्री में ज़माने के लिए कई फ़िल्में बनाईं जिसमें वे खुद भी थे. उन्हें सबसे पहले काम दिलाने वाले चचेरे भाई प्यारेलाल यादव 'कवि जी' अब निरहुआ इन्टरटेनमेंट की फ़िल्मों के लिए गाने भी लिखते हैं.

ओशो और स्वेट मार्डन को पढ़ने के शौक़ीन निरहुआ क्रिकेट खेलने के लिए कहीं भी जगह तलाश सकते हैं. 2010 में उन्होंने टी-10 गली क्रिकेट प्रतियोगिता का आयोजन भी किया था जिसमें पूर्वांचल की 16 टीमों ने शिरकत की थी.

2012 में अचानक वे मशहूर टीवी शो 'बिग बॉस' के छठे सीजन में नज़र आये हालांकि वहां उनका प्रवास हफ़्ते भर ही रहा. पचास से ज़्यादा फ़िल्में कर चुके और फिलहाल 6 फ़िल्मों में काम कर रहे निरहुआ को नयी-नयी ज़मीनें तोड़ने में बहुत मज़ा आता है.

जब मैंने इसकी वजह पूछी तो उनका जवाब बड़े ही दार्शनिक अंदाज़ से भरा हुआ था. "देखिये हमारे भोजपुरी में एक कहावत है- जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना. हर चीज़ का एक समय है. आज है कल नहीं रहेगा. क्या हर्ज़ है अगर आज हम दूसरे कामों में भी हाथ आजमा लें?

शायद इसीलिए वो राजनीति के मैदान में भी नज़र आए.

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बन गए सांसद

पिछले बार हार का सामना करने के बाद इस बार आज़मगढ़ सीट पर दिनेश लाल यादव निरहुआ ने सपा उम्मीदवार और अखिलेश यादव के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव को 8,679 वोटों से हरा दिया है.

सपा के मुस्लिम-यादव समीकरण को देखते हुए आज़मगढ़ में सपा की पकड़ मजबूत मानी जा रही थी. ये सीट सपा का गढ़ रही है लेकिन कम ही अंतर से सही पर निरहुआ ने बाज़ी मार ली.

यह संयोग है कि एक वक़्त भोजपुरी सिल्वर स्क्रीन की त्रिमूर्ति कहे जाने वाले मनोज तिवारी, रवि किशन और निरहुआ तीनों राजनीति में हैं और सांसद बन चुके हैं. मनोज तिवारी ने सपा से राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी. वो पहला चुनाव हारे और फिर बीजेपी में आ गए.

रवि किशन ने जौनपुर से कांग्रेस के टिकट पर दांव आजमाया था. नाकामी के बाद वे भी बीजेपी में आ गए. निरहुआ सीधे बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा.

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