देवेंद्र फडणवीस से पहले महाराष्ट्र के वे मुख्यमंत्री जो बाद में बने मंत्री

- Author, हर्षल अकुडे
- पदनाम, बीबीसी मराठी
उद्धव ठाकरे के इस्तीफ़े के बाद हर किसी को उम्मीद थी कि विपक्ष के नेता देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के तौर पर वापसी करेंगे, लेकिन ख़ुद उन्हें (फडणवीस को) घोषणा करनी पड़ी कि एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बनेंगे.
फडणवीस ने ये भी घोषणा की थी कि वे सरकार में शामिल नहीं होंगे लेकिन सियासी पैंतरेबाज़ी का खेल ऐसा हुआ कि उन्हें (फडणवीस को) उपमुख्यमंत्री बनना पड़ा.
वैसे आम धारणा तो यह है कि कोई एक बार जब मुख्यमंत्री बन जाता है तो किसी दूसरे मुख्यमंत्री के अधीन काम नहीं करता, क्योंकि यह एक तरह से डिमोशन होने जैसा है.
लेकिन ऐसा केवल देवेंद्र फडणवीस के साथ ही नहीं हुआ है.
अकेले महाराष्ट्र में उनसे पहले चार नेताओं को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा था. कौन-कौन हैं ये नेता, जानिए...

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1. शंकरराव चव्हाण
शंकरराव चव्हाण महाराष्ट्र में एक अनुभवी राजनेता के रूप में जाने जाते थे. शंकरराव चव्हाण महाराष्ट्र की स्थापना से पहले राजनीति में सक्रिय थे. उन्होंने पहली बार 1957 में नांदेड़ के धर्माबाद से मुंबई प्रांतीय विधानसभा का चुनाव जीता था. महाराष्ट्र राज्य बनने के बाद भी उन्होंने 1962, 1967 और 1972 के चुनाव जीते.
राज्य में 1975 में शंकरराव चव्हाण के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी. लेकिन आपातकाल के बाद 1977 में वसंतदादा पाटिल को मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया. इस बीच, इस सरकार में एक विद्रोह छिड़ गया और शरद पवार के नेतृत्व में कांग्रेस विरोधी सरकार का गठन किया गया.
1978 में बनी शरद पवार सरकार की कैबिनेट में शुरुआत में मुख्यमंत्री सहित केवल छह मंत्री थे. इनमें उत्तमराव पाटिल, सुंदरराव सोलंकी, अर्जुनराव कस्तूरे, निहाल अहमद और गणपतराव देशमुख शामिल हैं.
बाद में, 2 अगस्त 1978 को पवार ने 28 नए सदस्यों के साथ मंत्रिमंडल का विस्तार किया. सुंदरराव सोलंकी को उपमुख्यमंत्री बनाया गया.
शंकरराव चव्हाण, सुशील कुमार शिंदे, गोविंदराव आदिक, दत्ता मेघे, सदानंद वर्दे और भाई वैद्य जैसे नेता भी उस समय पवार की सरकार में मंत्री थे.
बाद में, शंकरराव चव्हाण ने अपने समाजवादी कांग्रेस फोरम का फिर से कांग्रेस में विलय कर दिया. इसके बाद 1986-88 के दौरान शंकरराव चव्हाण को फिर से मुख्यमंत्री का पद मिला. बाद में 1988-89 में राजीव गांधी की कैबिनेट में वे वित्त मंत्री रहे और 1991-96 में उन्हें पीवी नरसिम्हा राव की कैबिनेट में गृह मंत्री के रूप में काम करने का भी मौका मिला.

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2. शिवाजीराव पाटिल-नीलंगेकर
शिवाजीराव पाटिल-नीलंगेकर स्वतंत्रता के पहले से सक्रिय नेता रहे हैं. उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लिया. सरकार ने उन्हें एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में सम्मानित किया था.
बाद में, स्वतंत्रता के बाद, शिवाजीराव पाटिल-नीलंगेकर को कांग्रेस के गांधी परिवार के प्रति निष्ठा रखने वाले राजनेता के रूप में जाना जाने लगा.
1962 में, वे पहली बार निलंगा विधानसभा क्षेत्र में विधायक के रूप में चुने गए थे. उसके बाद उन्होंने राज्य मंत्रिमंडल में विभिन्न ज़िम्मेदारियां निभाईं.
कांग्रेस ने 3 जून 1985 से 6 मार्च 1986 तक उन्हें राज्य का मुख्यमंत्री बनाया. लेकिन महज 9 महीने में ही शंकरराव चव्हाण की मुख्यमंत्री के तौर पर वापसी हो गयी.
शिवाजीराव पाटिल ने 1990-91 में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया. लेकिन फिर उनकी राजनीति में उतार-चढ़ाव आने लगा. 1995 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. 1999 में उन्होंने फिर जीत हासिल की.
2002 में सुशील कुमार शिंदे के नेतृत्व में सरकार बनी. इस सरकार में शिवाजीराव पाटिल नीलंगेकर को राजस्व मंत्री के पद की ज़िम्मेदारी दी गई थी.
लेकिन राजस्व मंत्री होने के बावजूद शिवाजीराव पाटिल 2004 के अगले विधानसभा चुनाव में हार गए. पाटिल को अपने ही पोते संभाजी पाटिल-नीलंगेकर से हार का सामना करना पड़ा.
2009 में संभाजी पाटिल ने भी अपने दादा को हराया था. इसके बाद शिवाजीराव पाटिल राजनीति से हट गए. शिवाजीराव का 5 अगस्त, 2020 को निधन हो गया.

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3. नारायण राणे
1995 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना-भाजपा निर्दलीय उम्मीदवारों की मदद से सत्ता में आई थी. शिवसेना ने गठबंधन सरकार में अपना मुख्यमंत्री बनाया क्योंकि उसके पास सबसे अधिक सदस्य थे. बालासाहेब ठाकरे ने मनोहर जोशी को मुख्यमंत्री नियुक्त किया.
मनोहर जोशी के नेतृत्व में शिवसेना-भाजपा सरकार ने साढ़े तीन साल तक अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन इसके बाद मनोहर जोशी एक गंभीर आरोप में फंस गए.
उन पर आरोप स्पष्ट भी हो गया था कि मुख्यमंत्री के तौर उन्होंने पुणे में एक स्कूल के लिए आरक्षित भूमि के उपयोग संबंधी नियमों को बदलकर अपने दामाद गिरीश व्यास को सौंप दिया था. जहां उन्होंने दस मंजिला इमारत बनाई.
मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया जहां सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया था कि जोशी जैसे उच्च शिक्षित मुख्यमंत्री के लिए सिर्फ़ स्कूल की आरक्षित ज़मीन का दूसरे कामों में इस्तेमाल का मंजूरी देना ग़लत है.
इस मामले में मुश्किलें बढ़ने के बाद मनोहर जोशी ने बाल ठाकरे के निर्देश पर इस्तीफ़ा दे दिया और उनकी जगह नारायण राणे को मुख्यमंत्री बनाया गया.
आज नरेंद्र मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री नारायण राणे कभी शिवसेना के तेज़ तर्रार नेता थे. शिवसेना में एक शाखा प्रमुख, नगरसेवक, तीन साल के लिए बेस्ट कमेटी के अध्यक्ष, मंत्री पद से लेकर वे मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे थे.
वे 1 फ़रवरी 1999 से 17 अक्टूबर 1999 यानी लगभग नौ महीने तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे.
भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना ने समय सीमा से पहले महाराष्ट्र विधानसभा को भंग कर चुनाव कराने का फ़ैसला किया, लेकिन शिवसेना-भाजपा गठबंधन को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा.
वह विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे. इस दौरान बालासाहेब ठाकरे ने उद्धव ठाकरे को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया.
उधर, राणे की उद्धव ठाकरे से तकरार बढ़ती ही जा रही थी. आखिर 2005 में नारायण राणे शिवसेना छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए.
उन्होंने मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख की सरकार में राजस्व मंत्री और अशोक चव्हाण और पृथ्वीराज चव्हाण के मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री के रूप में कार्य किया.
बाद में वे भाजपा में शामिल हो गए जहां 2021 में उन्हें केंद्र सरकार में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय की ज़िम्मेदारी दी गई.

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4. अशोक चव्हाण
साल 2008 में मुंबई पर हुए आतंकी हमले के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख उस इलाके के दौरे पर गए जहां हमला हुआ था.
तब उनके साथ दो आम नागरिक लोग भी थे. ये दोनों बॉलीवुड से जुड़े थे. एक थे उनके बेटे और अभिनेता रितेश देशमुख और दूसरे फ़िल्म निर्देशक राम गोपाल वर्मा. जब यह ख़बर सामने आई तो हंगामा मच गया.
आतंकी हमले के बाद विलासराव देशमुख को अपना पद गंवाना पड़ा था. उसकी दूसरी तमाम वजहें थीं, लेकिन हमले की जगह पर बेटे को लेकर जाना तात्कालिक वजह बन गया.
विलासराव देशमुख के बाद कांग्रेस ने अशोक चव्हाण को मुख्यमंत्री बनाया. अशोक चव्हाण के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी 2009 का विधानसभा चुनाव लड़ी और सत्ता में वापसी की. अशोक चव्हाण फिर मुख्यमंत्री बने.
हालांकि इसके तुरंत बाद कथित आदर्श सोसाइटी घोटाला 2010 में सामने आया और अशोक चव्हाण मुश्किल में पड़ गए. उस समय आरोप लगाया गया था कि मुंबई के प्रसिद्ध कोलाबा इलाके में सेना के लिए आरक्षित एक भूखंड पर आवासीय भवन बनाने की अनुमति दी गई थी.
पता चला कि इमारत में अशोक चव्हाण की सास भगवती शर्मा और ससुर मदनलाल शर्मा के दो फ्लैट थे. अशोक चव्हाण पर आरोप था कि आदर्श सोसाइटी में तीन बेनामी फ्लैट सोसाइटी की फ़ाइलों को क्लियर करने के बदले में लिए गए.
इस मामले की व्यापक मीडिया कवरेज के कारण अशोक चव्हाण को इस्तीफा देना पड़ा. बाद में अशोक चव्हाण पर मुक़दमा चलाने से इनकार करते हुए 2017 में कोर्ट ने उन्हें राहत दी.
नवंबर 2019 में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महाविकास अघाड़ी के सत्ता में आने के बाद अशोक चव्हाण उसमें लोक निर्माण मंत्री के रूप में शामिल हुए.
दिलचस्प यह है कि अशोक चव्हाण, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण के बेटे हैं और इन दोनों पिता-पुत्र की जोड़ी को मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य में मंत्री पद संभालना पड़ा.

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5. देवेंद्र फडणवीस
राज्य की कमान संभालने के बाद मंत्री पद संभालने वाले देवेंद्र फडणवीस राज्य के पांचवें राजनेता हैं. चूंकि संवैधानिक तौर पर मुख्यमंत्री का कोई पद नहीं होता है, उनका दर्जा मंत्री का ही होता है.
हालांकि यह ज़रूर है कि देवेंद्र फडणवीस को बेहद नाटकीय अंदाज़ में उपमुख्यमंत्री बनना पड़ा है. एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना की बग़ावत के बाद यह तय हो गया था कि उद्धव ठाकरे की सरकार गिर जाएगी और देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा की सरकार आएगी.
उद्धव ठाकरे के इस्तीफे के बाद बीजेपी ने भी रैली की. लेकिन उस समय केंद्रीय पार्टी नेतृत्व ने एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त करने का आदेश दिया. एकनाथ शिंदे के मुंबई पहुंचने के बाद उनके नाम की घोषणा खुद फडणवीस ने राजभवन में की थी. उन्होंने यह भी कहा कि वे सरकार को बाहर से समर्थन देंगे.
फडणवीस की घोषणा के तुरंत बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने मीडिया में बयान दिया कि उन्होंने फडणवीस से उपमुख्यमंत्री बनने का अनुरोध किया है.
शुरुआत में राजभवन में केवल शिंदे के शपथ ग्रहण समारोह की तैयारी ही चल रही थी. लेकिन बाद में वरिष्ठ नेताओं के आदेश पर फडणवीस ने उपमुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली.
राज्य में भाजपा के 106 विधायक हैं, जबकि पार्टी को सात निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी हासिल है. एकनाथ शिंदे गुट में 12 निर्दलीय विधायकों के अलावा शिवसेना के 39 विधायकों का समर्थन है.
यानी भाजपा की ताक़त शिंदे गुट से तीन गुना ज़्यादा है. ऐसे में यह सवाल बना हुआ है कि भाजपा ने मुख्यमंत्री पद का दावा क्यों छोड़ा?
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केंद्रीय नेतृत्व ने देवेंद्र फडणवीस के पर कतरने के लिए यह खेल खेला है क्योंकि उनका दबदबा लगातार बढ़ रहा था.
वहीं कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि शिवसेना को सबक सिखाने और उसे तोड़ने के लिए भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने यह दांव खेला है.
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