महाराष्ट्र में बीजेपी की रणनीति और शिव सेना में बग़ावत की कहानी

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    • Author, दीपक मंडल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

महाराष्ट्र में राजनीतिक संकट गहरा गया है. शिव सेना के विधायक और उद्धव ठाकरे सरकार में मंत्री एकनाथ शिंदे के पार्टी के दर्जनों विधायकों के साथ महाराष्ट्र छोड़ने के बाद महाराष्ट्र में बीजेपी और महाविकास अघाड़ी सरकार के बीच रस्साकशी और तेज हो गई है.

मंगलवार की सुबह शिंदे के सूरत में होने की ख़बर आई थी. लेकिन बुधवार तड़के वह विधायकों के साथ बीजेपी शासित राज्य असम के गुवाहाटी में पहुँच गए.

महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी और कांग्रेस की गठबंधन सरकार का भविष्य अब ख़तरे में दिख रहा है. लोगों के बीच ये बहस तेज़ हो गई है कि क्या महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की सरकार के दिन अब गिनती के रह गए हैं?

कहा जा रहा है कि ढाई साल पहले सत्ता का निवाला मुँह से छिनने के बाद महाविकास अघाड़ी सरकार को गिराने की बीजेपी की कोशिश अब चरम पर पहुंच गई है.

पिछले ढाई साल के दौरान देवेंद्र फडणवीस उद्धव ठाकरे पर लगातार हमले करते रहे हैं. कभी भ्रष्टाचार के आरोप, कभी कोविड के कुप्रबंधन और कभी 'सांप्रदायिक ध्रुवीकरण' को हवा देकर वे उद्धव का संकट बढ़ाते रहे.

बीजेपी की रणनीति

2019 के चुनाव में बीजेपी और शिव सेना साथ चुनाव लड़े थे और बहुमत हासिल किया था. बीजेपी का कहना है कि गठबंधन इस शर्त पर हुआ था कि देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा.

लेकिन शिव सेना का कहना था कि दोनों पार्टियों के बराबर मंत्री बनाए जाएंगे और मुख्यंमत्री पद का बँटवारा भी ढाई-ढाई साल के लिए होगा. बीजेपी इससे मुकर गई. लिहाजा उसने एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिल कर सरकार बना ली.

तब से देवेंद्र फडणवीस बोल रहे हैं कि उनके साथ धोखा हुआ है.

एक इंटरव्यू में उन्होंने यहां तक कहा कि उन्हें लगता ही नहीं है कि वे मुख्यंमत्री नहीं रहे. तब से उन्होंने सत्ता में वापसी की कई कोशिश की है. इनमें से एक कोशिश एनसीपी के अजित पवार के एक गुट के साथ सरकार बनाने की थी.

लेकिन ये सरकार दो-ढाई दिन तक ही चल पाई. इसके बाद भी उन्होंने कुछ और प्रयास किए.

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इमेज कैप्शन, फडणवीस महाराष्ट्र बीजेपी प्रमुख चंद्रकांत पाटिल के साथ

उन्होंने ये कहना शुरू किया कि बीजेपी को महाविकास अघाड़ी सरकार को गिराने की कोशिश करने की कोई ज़रूरत नहीं है. ये सरकार अपने अंतर्विरोधों से ख़ुद गिर जाएगी.

लेकिन पार्टी के कुछ विधायकों को लेकर शिवसेना के एकनाथ शिंदे के साथ होने के मामले से संकेत मिल रहे हैं कि बीजेपी उद्धव ठाकरे सरकार के ख़ुद-ब-ख़ुद गिरने का इंतज़ार नहीं कर रही है.

ठाकरे सरकार के ख़िलाफ़ बेहद आक्रामक रुख़

बीबीसी मराठी सेवा के संपादक आशीष दीक्षित कहते हैं, ''इसमें बीजेपी की भूमिका हो सकती है क्योंकि शिंदे विधायकों को लेकर गुजरात गए हैं, जहाँ बीजेपी की सरकार है. वहाँ के बीजेपी के नेता इस मामले पर बोल रहे हैं. इन विधायकों को वहां गुजरात पुलिस का समर्थन मिल रहा. ये सारी चीज़ें बताती हैं निश्चित तौर पर इसमें बीजेपी की भूमिका है.''

दीक्षित कहते हैं, ''लोगों को यह दिखाने की कोशिश हो रही है कि यह शिव सेना के अंदर उद्धव ठाकरे के ख़िलाफ़ नाराज़गी का नतीजा है. पार्टी के अंदर अंतर्विरोध बढ़ रहा है. साफ़ है कि बीजेपी काफ़ी सेफ गेम खेल रही है. दरअसल, उद्धव ठाकरे सरकार को अस्थिर करने की बीजेपी की तैयारी काफ़ी दिनों से चल रही है. वरना एक साथ शिवसेना जैसी कैडर आधारित पार्टी के इतने विधायकों को इकट्ठा करना आसान काम नहीं है. ऐसा लगता है कि बीजेपी इस रणनीति पर काफ़ी दिनों से काम कर रही थी. ''

विश्लेषकों का कहना है कि बीजेपी ने पिछले दो-ढाई साल के दौरान महाराष्ट्र में अपना ऑपरेशन बहुत ही सोची-समझी रणनीति के तहत चलाया. उन्होने यहाँ कर्नाटक, मध्य प्रदेश या राजस्थान जैसा 'ऑपरेशन लोटस' चलाने की कोशिश नहीं की क्योंकि यहाँ तीन-तीन पार्टियों से विधायकों को तोड़ना मुश्किल काम था.

महाराष्ट्र में 30-35 विधायकों को तोड़ना मुश्किल है क्योंकि यहाँ तीन-तीन पार्टियां सरकार में शामिल हैं. बीजेपी अगर ये रणनीति अपनाती तो वह सत्ता के लिए बेचैन दिखती. बीजेपी को अपनी छवि की चिंता थी इसलिए उसने ये रणनीति छोड़ दी.

उसने दूसरी रणनीति अपनाई और वह थी आक्रामकता के साथ सरकार की कमियों का उजागर करना है. चाहे कोविड को काबू करने में उद्धव सरकार की कथित नाकामी का मामला हो या फिर गैस सिलिंडर का सवाल या फिर रैलियों के ज़रिये सरकार को घेरना,असेंबली के बाहर और भीतर बीजेपी बेहद आक्रामक रही.

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ईडी,सीबीआई और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट का डर

विश्लेषकों के मुताबिक़ इस दौरान दूसरी रणनीति के मुताबिक़ ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स या नारकोटिक्स डिपार्टमेंट जैसी एजेंसियों के दौरान एनसीपी और शिव सेना के नेताओं के ख़िलाफ़ छापे की कार्रवाई चलती रही.

हर हफ़्ते किसी न किसी नेता के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो रही थी. दो मंत्रियों को ईडी की कार्रवाई के बाद जेल जाना पड़ा. एक अनिल देशमुख और दूसरे नवाब मलिक.

इससे शिव सेना के विधायकों में डर बैठने की बात कही जा रही है. उन्हें लगा कि अगला नंबर उनका हो सकता है. एक विधायक प्रताप सरनाईक ने उद्धव ठाकरे को चिट्ठी लिख कर ईडी सीबीआई बचाने और बीजेपी के साथ हाथ मिला लेने की गुहार लगाई थी.

नवाब मलिक

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बेहद सधी रणनीति

बीजेपी की इस रणनीति पर वरिष्ठ पत्रकार हेमंत देसाई ने बीबीसी से कहा, ''बीजेपी बड़ी सावधानी से चाल चल रही है. अजित पवार गुट के साथ बनी सरकार के दो दिनों में गिर जाने से उसकी जो किरकिरी हुई थी, वैसी स्थिति वो दोबारा नहीं चाहती थी. ''

''फ़िलहाल शिंदे के पास 30 विधायकों के होने की बात कही जा रही है. लेकिन इसमें दम नहीं लगता. बीजेपी की ये रणनीति रही है कि वह सरकार गिराने वाली पार्टी की तरह न दिखे. लेकिन वह उद्धव ठाकरे सरकार को कमज़ोर करने की रणनीति पर लगातार काम कर रही है. ''

देसाई आगे कहते हैं, ''बीजेपी यह दिखाना चाहती है कि ये शिव सेना की अंदरूनी लड़ाई है. इसमें उसका कोई हाथ नहीं है. महाराष्ट्र में बीजेपी के प्रमुख चंद्रकांत पाटिल ने कहा कि एकनाथ शिंदे न जो क़दम उठाया है, उसमें हमारी कोई भूमिका नहीं है. लेकिन ये मानी हुई बात है कि बीजेपी अंदर ही अंदर अपना काम कर रही थी. ''

देसाई के मुताबिक़, ''पिछले कुछ दिनों से फडणवीस ये कहते आ रहे हैं कि गठबंधन के अंदर बीजेपी और शिव सेना के विधायक संतुष्ट नहीं हैं. एकनाथ का अपना गुट है और उद्धव ठाकरे से उनका टकराव भी रहा है. कुछ अरसा पहले उन्होंने ठाकरे के ख़िलाफ़ शक्ति प्रदर्शन भी किया था. लेकिन बीजेपी शिंदे की नाराज़गी को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाहती है. बीजेपी नेता नारायण राणे ने ट्ववीट कर शिंदे का स्वागत किया है.''

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राज्यपाल के ज़रिये भी लगाया ज़ोर

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एनसीपी के अजित पवार गुट के साथ बनाई गई सरकार के दो दिनों में गिरने के बाद फडणवीस ने उद्धव ठाकरे सरकार के ख़िलाफ़ घेरेबंदी शुरू कर दी थी. उनका मक़सद था सीधे हमला न करके सरकार को धीरे-धीरे बदनाम किया जाए.

कोविड के दौरान जब उद्धव ठाकरे लोगों से संवाद कर रहे थे उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी थी. इससे बीजेपी और सतर्क हो गई और उसने उद्धव ठाकरे सरकार को भ्रष्ट और नाकारा साबित करने के लिए ज़ोरदार अभियान चलाए.

वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार अदिति फडणीस कहती हैं, ''महाराष्ट्र में बीजेपी किसी भी तरह उद्धव ठाकरे सरकार को गिराना चाहती थी. वो चाहती थी उसकी कोशिशों से नहीं तो कम से कम राष्ट्रपति शासन लगा कर सरकार बर्खास्त कर दिया जाए. इसके लिए राज्यपाल को भी इस्तेमाल किया गया. जब उद्धव ठाकरे को एमएलसी चुनाव जीत कर सदन में आना था तो राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने एमएलसी चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखने में काफ़ी देर लगाई. ''

''आख़िरकार उद्धव ठाकरे को पीएम से मिलना पड़ा. इसके बाद राज्यपाल ने एमएलसी चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग को चिट्टठी लिखी और राज्य का राजनीतिक संकट टला.''

अदिति फडणीस का भी कहना है कि बीजेपी एक-डेढ़ साल के दौरान लगातार अंदर ही अंदर उद्धव ठाकरे की सरकार गिराने की कोशिश करती रही है लेकिन एकनाथ शिंदे मामले से ऐसा लगता है कि अब वह सरकार गिराने के अपने एजेंडे को खुल कर रफ्तार देने में लग गई है.

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अचानक नहीं ठहर कर हमला

आशीष दीक्षित कहते हैं कि कोविड के दौरान लोगों से संवाद और उनसे लगातार संपर्क में रहने के वजह से जब उद्धव ठाकरे की छवि लोगों के बीच निखरने लगी थी तो बीजेपी को लगा कि उसका दांव उल्टा पड़ रहा है. उद्धव की छवि अच्छी होने से बीजेपी की छवि ख़राब न होने लगे. लिहाजा सरकार को बदनाम करने का अभियान शुरू हो गया.

वह कहते हैं, ''इतना करने के बाद भी बीजेपी ये दिखाने की कोशिश कर रही है कि उसने कुछ नहीं किया है. ये शिव सेना और एनसीपी और उसके सहयोगी दलों के टकराव का नतीजा है. आरएसएस के एक बड़े नेता ने मुझसे बातचीत में 'बफर' शब्द का इस्तेमाल किया. उन्होंने कहा कि हम बफर जाने देंगे. कुछ भी जल्दबाजी में नहीं होगा. कुछ दिनों के बाद हम सरकार बनाने की दावेदारी ठोकेंगे. लोगों को ऐसा लगना चाहिए कि उद्धव ठाकरे अपने अंतर्विरोधों से गिरी है. बीजेपी की यह रणनीति अब साफ़ दिख रही है. ''

इस तरह से बन सकती है बीजेपी की सरकार

महाराष्ट्र विधानसभा में 288 सीटें हैं. शिव सेना विधायक रमेश लटके के निधन की वजह से एक सीट ख़ाली है.

शिव सेना के 55, एनसीपी के 53, कांग्रेस के 44 और बीजेपी के 106 के विधायक हैं. बहुजन विकास अघाड़ी के तीन और समाजवादी पार्टी, एआईएमआईएम और प्रहर जनशक्ति के दो-दो विधायक हैं.

एमएनएस, सीपीएम, पीडब्ल्यूपी, स्वाभिमानी पार्टी, राष्ट्रीय समाज प्रकाश जनसूर्या शक्ति पार्टी, क्रांतिकारी शेतकारी पार्टी के एक-एक विधायक हैं. तेरह निर्दलीय विधायक हैं.

बीजेपी के 106 विधायक हैं और पार्टी को बहुमत के लिए 144 विधायकों की ज़रूरत है. अगर एकनाथ शिंदे 37 विधायकों का समर्थन जुटा लेते हैं तो बीजेपी उनकी मदद से सरकार बना सकती है. यह संख्या शिव सेना के विधायकों की संख्या 55 का दो तिहाई है.

ऐसी स्थिति में वह दल विरोधी क़ानून से बच जाएंगे और उनके गुट को मान्यता मिल जाएगी. ऐसी स्थिति में वह बीजेपी के साथ मिल कर सरकार बना सकते हैं.

इससे कम विधायक उनके पास हुए तो वे सारे अयोग्य क़रार दिए जाएंगे. अब सवाल ये है कि शिंदे के पास 37 विधायकों का समर्थन है या नहीं. इस बारे में फ़िलहाल कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिल रही है.

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2019 में क्या हुआ था?

2019 में बीजेपी और शिव सेना ने मिल कर चुनाव लड़ा था. लेकिन मुख्यमंत्री किसका होगा इस सवाल पर दोनों दलों के रास्ते अलग-अलग हो गए.

शिव सेना एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिल कर सरकार बनाने के लिए बातचीत करने लगी.

उद्धव ठाकरे को सीएम बनाने पर सहमति थी. लेकिन बातचीत लंबी खिंच गई और महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लग गया.

इस बीच, एनसीपी प्रमुख शरद पवार के भतीजे अजित पवार अपने साथ पार्टी कुछ विधायकों को साथ लेकर तड़के ही राजभवन पहुँच गए.

23 नवंबर की सुबह देवेंद्र फडणवीस को आनन-फानन में सीएम पद की शपथ दिला दी गई अजित पवार उप मुख्यमंत्री बन गए.

लेकिन शरद पवार इस पारिवारिक झगड़े में भारी पड़े और अजित पवार के साथ गए विधायक एनसीपी में लौट आए.

इसके बाद 26 नवंबर को फडणवीस ने विश्वास मत का सामना किए बगैर इस्तीफ़ा दे दिया.

शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी के गठबंधन वाली महाविकास अघाड़ी की सरकार बनी और उद्धव ठाकरे का सीएम बनने का सपना सच हुआ.

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