कंगना और शिव सेना के आईने से बहुत अलग है मुंबई का इतिहास

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    • Author, ओंकार करंबेलकर
    • पदनाम, बीबीसी मराठी

ये बात है साल 1930 की. 90 साल पहले नौसेना के अधिकारी केआरयू टोड कोलाबा में समुद्र तट की सैर कर रहे थे, तब उन्हें एक पत्थर मिला.

उन्होंने उस पत्थर को यूं ही उठाया था लेकिन उसे हाथ में लेते ही उन्हें लग गया कि ये कोई सामान्य पत्थर नहीं है. इसके बाद उस पत्थर से ही मुंबई की ऐतिहासिक टाइमलाइन का पता चला.

इस समय फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत और शिव सेना के सांसद संजय राउत एक दूसरे की तीखी आलोचना कर रहे हैं.

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद शुरू हुए विवाद में लगातार यह सवाल उभर रहा है कि 'मुंबई किनकी है?'

पाषाणकालीन युग में मुंबई

आज के मुंबई में अमीर से अमीर लोग भी कुछ मीटर ज़मीन नहीं ख़रीद सकते लेकिन यह जानना दिलचस्प है कि मुंबई का इतिहास पाषाणकालीन युग में एक दूसरे से दूर फैले प्रायद्वीप से शुरू होता है.

मुंबई में सबसे पहले इंसान कब पहुंचे, इसे जानने के लिए 25 लाख साल पीछे जाना होगा.

इसे दर्शाने वाले साक्ष्य मौजूद हैं. नरेश फर्नांडीस की किताब 'सिटी एड्रिप्ट' में इसकी जानकारी दी गई है.

जब 1930 में ब्रिटिश नौसेना अधिकारी केआरयू टोड कोलाबा में समुद्रतट की सैर कर रहे थे, तब उन्हें एक पत्थर मिला था.

उन्होंने जब उसे सावधानी से देखा तो उन्हें एहसास हुआ कि ये कोई सामान्य पत्थर नहीं है. वह पत्थर दरअसल पाषाणकालीन युग के इंसानों का हथियार था.

इस पत्थर के मिलने से नौसेना अधिकारी काफी आकर्षित हुए और उसके बाद उन्होंने कोलाबा के समुद्री तट पर खोजबीन शुरू कर दी.

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अपनी खोजबीन के दौरान उन्हें ऐसे ही 55 पत्थर मिले. इनमें से कुछ मध्य पाषाणकाल में इंसान हथियार की तरह इस्तेमाल करते थे और कुछ जीवाश्म थे.

अपनी इस खोजबीन पर टोड ने 1932 में रिसर्च पेपर प्रकाशित कराया जिसका शीर्षक था 'बंबई का प्रागऐतिहासिक इंसान'.

इसके बाद 1939 में उन्होंने एक अन्य रिसर्च पेपर रॉयल आर्केलॉजिकल इंस्टीट्यूट से प्रकाशित कराया, 'बंबई का पुरापाषाणयुगीन उद्योग'.

1920 में 'बैक बे रिक्लेमेशन स्कीम' के तहत समुद्री तटों को मलबे से भरकर दक्षिण मुंबई बनाया गया.

इसके लिए कांदिवली की पहाड़ियों से मिट्टी और पत्थर लाए गए. जयराज सलगांवकर ने मुंबई सिटी गजट में इस बात की संभावना जताई है कि मुंबई के मछुआरों का पाषाणकालीन युग के लोगों से कोई संबंध हो सकता है.

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इमेज कैप्शन, मुंबा देवी का मंदिर

सलगांवकर के मुताबिक़ ये मछुआरे मुंबई में आर्य-पूर्व दौर वाले गुजरात से आए थे. वे अपने साथ मुंबा देवी को लेकर आए जो मुंबई की पहली देवी मानी गईं.

बीते 70-80 सालों से मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने, मुंबई को केंद्र शासित प्रदेश बनाने और गुजराती नेताओं द्वारा मुंबई को गुजरात में मिलाने की मांग की जाती रही है.

इस पृष्ठभूमि में जब हम मुंबई का इतिहास पढ़ते हैं तो लगता है कि मौजूदा समय में क्या समय का पहिया उलट चुका है?

लोग आते रहे, कारवां बनता गया

मुंबई के आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक विकास के कई चरण रहे हैं. शहर पर कई शासकों का राज रहा है.

इसे मौटे तौर पर इन चरणों में बांटा जा सकता है- हिंदू काल, मुस्लिम काल, पुर्तगाली काल, ब्रिटिश काल और स्वतंत्रता के बाद का दौर.

मौर्य वंश के शासक 250 ईसापूर्व उत्तरी कोंकण पहुंचे थे. इसके बाद मुंबई दूसरे शासक वंशों के संपर्क में आता रहा.

मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज में प्राचीन भारतीय संस्कृति विभाग की प्रमुख डॉ. अनिता कोठारे बताती हैं कि मौर्य के बाद उत्तरी कोंकण पर कई शासकों का राज रहा.

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उन्होंने कहा, "कोंकण पर शासन करने वाले मौर्यों को कोंकण का मौर्य भी कहा जाता है. मौर्य वंश के बाद सतवाहन वंश के अग्निमित्र नागपुर पहुंचे. कालीदास ने अपने महाकाव्य में इसका ज़िक्र किया है. सतवाहन वंश के बाद क्षत्रप वंश के लोग यहां आए और उसके बाद कारोबार करने वाले आते गए."

"मुंबई के आसपास के इलाकों में कल्याण, ठाणे और नालासोपारा जैसे बंदरगाह हैं, इसलिए शहर में व्यापारियों की आवाजाही लगातार बढ़ती गई.

इसके बाद राष्ट्रकूट, यादव और शिलहार वंश का भी शहर पर राज रहा. इसके बाद अरब आए.

इसका मतलब मुंबई के आसपास का इलाक़ा व्यापारिक गतिविधियों के चलते पहले से ही कास्मोपॉलिटन था."

मुस्लिमों और पुर्तगालियों का दौर

मुंबई कब सीधे तौर पर मुस्लिम शासकों के अधीन रहा, इसको लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है. लेकिन तेरहवीं से पंद्रहवीं शताब्दी के बीच, राजा बिम्ब ने माहिम द्वीप पर शासन किया और गुजरात के सुल्तान का मुंबई पर शासन रहा.

गुजरात के सुल्तान ने 1534 में मुंबई को पुर्तगालियों को सौंप दिया.

पुर्तगाली पहले दीव, वसई और मुंबई जैसे इलाक़ों में स्थापित हुए और उसके बाद उन्होंने अन्य इलाकों में कारोबार बढ़ाना शुरू किया.

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इमेज कैप्शन, मुंबई का अठाहरवीं शताब्दी का नक्शा

पुर्तगाली शासक उस दौर में धान की खेती और दूसरे कारोबार करने वालों से टैक्स वसूलते थे.

उन्होंने एक तरह से नौसेना का अच्छा बेसकैंप तैयार कर लिया था, तब मुंबई के प्रति ब्रिटिशों में चाहत दिखी.

1612 में सावली में हुए युद्ध के बाद ब्रिटिश मुंबई पहुंचे. उन्होंने मुंबई की अहमियत को समझ लिया था.

वे नौसेना का बेसकैंप स्थापित करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने मुंबई को पुर्तगालियों से हासिल करने की कोशिशें शुरू कीं.

आखिरकार 23 जून, 1661 को इंग्लैंड के महाराजा चार्ल्स द्वितीय और पुर्तगाली की राजकुमारी कैथरीन का विवाह हुआ. पुर्तगाली शासकों ने ब्रिटिश शासकों को शादी में तोहफ़े के तौर पर मुंबई भेंट दी.

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इमेज कैप्शन, अठाहरवीं शताब्दी का ब्रिटिश शिप मॉडल

ब्रिटिश शासन

ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुंबई पर शासन शुरू किया तो उसने इलाके के कारोबार और द्वीपों को एक तरह से व्यवस्थित करना शुरू किया.

1685 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना कारोबार सूरत से मुंबई ले जाने का फ़ैसला किया.

1715 में चार्ल्स बून मुंबई आए और उन्होंने शहर के चारों तरफ क़िले बनवाए. सुरक्षा के लिए उन्होंने तोपों की भी व्यवस्था की.

उन्होंने पुर्तगालियों के साथ सभी संबंधों को तोड़ लिया और उनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली.

उन्होंने पुर्तगाली पादरियों को भी शहर छोड़ने का आदेश दिया. इसके बाद मुंबई का विकास तेज़ी से होने लगा. यहां से मुंबई के एक व्यापारिक केंद्र से शहर के तौर पर विकसित होने की शुरुआत हुई.

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इमेज कैप्शन, वसई का किला

मराठों का डर

ब्रिटिश शासन के दौरान सभी लेन-देन मुंबई में किले के भीतर होते थे.

उन्होंने पूरे इलाक़े की किलेबंदी कर रखी थी, हर कोने पर उन्होंने सुरक्षा का इंतज़ाम किया हुआ था.

लेकिन इसके बाद भी वे सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे थे. इसकी वजह वसई में चल रहा मराठा अभियान था.

मराठाओं ने पुर्तगालियों को हराकर वसई पर नियंत्रण कर लिया था. इस बात ने ब्रिटिशों की चिंता बढ़ा दी थी.

जब उन्हें एहसास हुआ कि मराठा मुंबई की सीमा तक पहुंच गए हैं तो उन्होंने मुंबई की सुरक्षा व्यवस्था मुस्तैद करने पर विचार शुरू किया. वसई पर अधिकार के बाद मराठा बांद्रा और कुर्ला की तरफ़ बढ़ रहे थे.

इसे देखते हुए ईस्ट इंडिया कंपनी ने कैप्टन जेम्स इनकिबर्ड को चिमाजी अप्पा से मिलने वसई भेजा. इनकिबर्ड चिमाजी अप्पा की 15 शर्तों के साथ मुंबई वापस लौटे.

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इमेज कैप्शन, मुंबई फ़ोर्ट के अब यही कुछ हिस्से बचे हैं

इसका ज़िक्र गोविंद सखाराम सरदेसाई ने मराठा रियासत के तीसरे खंड में किया है.

इसके बाद कैप्टन गोर्डन सतारा में जाकर छत्रपति शाहू महाराज से मिले. इनकिबर्ड भी पुणे में बाजीराव प्रथम से मिले.

लेकिन ब्रिटिशों के मन में डर बना रहा. इसके बाद उन्होंने मुंबई किले के चारों तरफ़ खाई खुदवानी शुरू की. उस वक़्त के सभी कारोबारियों ने इस काम के लिए पैसे दिए.

तीस हज़ार रूपये जुटाए गए थे. लेकिन खाई खुदवाने का पूरा ख़र्च करीब ढाई लाख रुपये आया था. यह एक तरह से पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप का पहला उदाहरण माना जा सकता है.

एआर कुलकर्णी ने अपनी किताब कंपनी सरकार में बताया है कि 1755 में ब्रिटिशों ने सुवर्ण दुर्ग पर कब्ज़ा जमाया और इसके बाद 1761 में मराठाओं को पानीपत के पहले युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था.

इससे ईस्ट इंडिया कंपनी को फायदा पहुंचा था.

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इमेज कैप्शन, उन्नीसवीं शताब्दी में एशियाटिक लाइब्रेरी से पहले टाउनहॉल हुआ करता था जहां ब्रिटिश महारानी की घोषणाएं होती थी.

19वीं शताब्दी की मुंबई

मुंबई और ब्रिटिशों के संबंध को लेकर 19वीं शताब्दी सबसे अहम साबित हुई. 1803 में वसई संधि पर हस्ताक्षर हुए. इस समझौते के बाद ही मराठा शासन के अंत की शुरुआत हुई और अंत में 1818 में मराठा शासन का दौर खत्म हो गया.

इसके बाद मुंबई आने वाले प्रत्येक गवर्नर ने मुंबई को न्यायपालिका, राजस्व व्यवस्था और शिक्षा व्यवस्था का केंद्र बनाया. वे समय के साथ उसमें बदलाव करते रहे. टाउन हाल, मिंट, म्यूज़ियम जैसी इमारतों का निर्माण हुआ.

1853 से रेलवे की शुरुआत हुई. 1857 में स्वतंत्रता संग्राम के पहले युद्ध की गूंज मुंबई में भी सुनी गई लेकिन ब्रिटिश शासकों ने तेज़ी से विद्रोही गतिविधियों पर काबू पा लिया.

ब्रिटिश महारानी की घोषणाओं को टाउनहाल की सीढ़ियों पर पढ़ा गया, जहां अब एशियाटिक लाइब्रेरी है. 1857 में ही मुंबई यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई.

मुंबई को आकार देने में सबसे अहम योगदान हेनरी बार्टेल फरेरे का है, जो 1862 में वहां तैनात हुए. उन्होंने मुंबई की कई इमारतों के निर्माण की शुरुआत की.

उनके दौर में ही मुंबई नगरनिगम की शुरुआत हुई. इस दौरान शहर में उद्योग धंधों का विकास हुआ और आबादी भी बढ़ने लगी.

19वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में नई इमारतें और अस्पतालों का निर्माण हुआ. इस दौर में ही व्यापारिक, सामाजिक और आर्थिक तौर पर मुंबई शिखर पर पहुंच गई थी.

दादाभाई नौरोजी

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इमेज कैप्शन, दादाभाई नौरोजी

स्वतंत्रता से पहले का समय

मुंबई शहर पूरे मुंबई प्रांत का मुख्यालय था. मुंबई की आबादी 20वीं शताब्दी की शुरुआत से बढ़ने लगी थी और इसके साथ ही मुंबई में स्वतंत्रता आंदोलन भी परवान चढ़ा.

कांग्रेस के गठन के बाद मुंबई एक तरह से स्वतंत्रता आंदोलन का भी गढ़ बना. लोकमान्य तिलक और दादाभाई नौरोजी जैसी शख्सियतें इसके पीछे प्रेरणा का काम कर रही थीं.

इससे पहले दूरदर्शी सोच वाले फिरोजशाह मेहता ने मुंबई में शिक्षा, स्वास्थ्य और जल निकासी की व्यवस्था को बेहतर बनाने में योगदान दिया था.

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सुधारों के साथ मुंबई ने स्वतंत्रता की ओर कदम बढ़ाए थे.

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इमेज कैप्शन, 1965 की मुंबई

स्वतंत्रता मिलने के बाद की तस्वीर

भारत को 1947 में स्वतंत्रता मिली जबकि ब्रिटिश 325 साल पहले भारत आए थे.

राज्य पुनर्गठन आयोग के निर्देशों के मुताबिक़ 1956 में मुंबई राज्य के निर्माण का फ़ैसला लिया गया. इसमें कच्छ और सौराष्ट्र के इलाकों को भी शामिल करने का प्रस्ताव था.

इसके अलावा मध्य प्रदेश के नागपुर डिविज़न और हैदराबाद के मराठवाड़ा क्षेत्र को भी शामिल किया गया. मराठी बोलने वाले जहां संयुक्त महाराष्ट्र के गठन की मांग कर रहे थे वहीं गुजराती बोलने वाले महा गुजरात की मांग कर रहे थे.

दोनों तरफ के लोगों ने अपनी मांगों को लेकर आंदोलन भी शुरू कर दिया. आख़िर में एक मई, 1960 को अलग राज्य के तौर पर महाराष्ट्र का गठन हुआ. गुजराती बोलने वालों को गुजरात और मराठी बोलने वालों को महाराष्ट्र मिला.

मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी बनी. स्वतंत्रता के बाद भी कारोबारी लेन-देन मुंबई से ही होते रहे.

अलग-अलग पार्टियों की सरकार यहां रही है. शताब्दियों से विभिन्न जाति एवं धर्म के लोग यहां रहते आए हैं.

हिंदू, मुस्लिम, पारसी, सिख, यहूदी, जैन और बौद्ध धर्म के लोगों का मुंबई के विकास में अहम योगदान रहा है.

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