देवेंद्र फडणवीस: वो मुख्यमंत्री जो उप-मुख्यमंत्री बन गया..

एकनाथ शिंदे के साथ देवेंद्र फडणवीस

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"वाक़या इसी साल 20-21 जून की आधी रात का है.

पूरा विश्व जब योग दिवस मनाने की तैयारियों में लगा हुआ था, उस दिन योग दिवस के ही एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए भारत के गृह मंत्री अमित शाह और महाराष्ट्र विधानसभा के नेता विपक्ष देवेंद्र फडणवीस को महाराष्ट्र के नासिक शहर में सुबह मौजूद रहना था.

नासिक की स्थानीय विधायक ने कार्यक्रम की सभी तैयारियां भी पूरी कर ली थीं. देवेंद्र फडणवीस के घर 20-21 जून की रात को देर तक राज्यसभा और एमएलसी चुनाव में बीजेपी की जीत का जश्न चला. महाराष्ट्र बीजेपी के तमाम बड़े नेता वहाँ मौजूद थे.

फडणवीस ने खाना खाने के बाद देर रात ही नासिक निकलने की बात बीजेपी के नेताओं से कही.

21 जून को सुबह सुबह जब एकनाथ शिंदे के बगावत की ख़बर आई और पता चला कि बाग़ी विधायकों के साथ वो सूरत पहुँच गए हैं, तो देर रात देवेंद्र फडणवीस के घर मौजूद बीजेपी नेताओं में से एक ने उन्हें फोन कर इस बात की जानकारी दी और कहा आप नासिक से तुरंत निकलिए.

दूसरी तरफ़ से फ़ोन पर जवाब आया मैं दिल्ली में हूँ और मुझे सब पता है."

नागपुर के वरिष्ठ पत्रकार श्रीपाद अपराजित ने बीबीसी से बातचीत में इस पूरे घटनाक्रम का ज़िक्र देवेंद्र फडणवीस की राजनीतिक परिपक्वता और समझदारी के उदाहरण देने के लिए किया.

हालांकि बीजेपी ने इस बात को कभी स्वीकार नहीं किया कि शिवसेना में बगावत के पीछे बीजेपी का हाथ है, लेकिन ये बात अब साफ़ हो गई है कि महाराष्ट्र में नई सरकार को बीजेपी समर्थन दे रही है.

एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री का पद संभालेंगे. जिस तरह से प्रेस कॉन्फ्रेंस में देवेंद्र फडणवीस ने उनके नाम की घोषणा की, ये समझना मुश्किल नहीं था कि नई सरकार के कर्ता धर्ता कौन होंगे.

थोड़ी ही देर बाद ये सूचना भी आ गई कि फडणवीस उप मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं.

देवेंद्र फडणवीस के नागपुर से लेकर पहले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और फिर उप मुख्यमंत्री बनने तक का सफ़र श्रीपाद अपराजित ने क़रीब से देखा है.

बतौर नेता देवेंद्र फडणवीस की खूबी और खामी के बारे में पूछने पर श्रीपाद अपराजित कहते हैं, "राजनीति में उनका बढ़ता वज़न हो या असल ज़िंदगी में शरीर का बढ़ता वज़न - सबके पीछे एक ही बात है - वो है उनकी 'पाचन शक्ति'. वो कईयों के राज़दार हैं लेकिन हर राज़ को कब तक और कहां तक पचाए रखना है, ये उनको आता है. यही उनकी खूबी भी है और यही उनकी खामी भी.

इस वजह से 20-21 जून की रात वो घर से नासिक के लिए निकले लेकिन दिल्ली पहुँच गए और कानों कानों किसी को ख़बर तक नहीं हुई. बीजेपी में कई नेता इस वजह से उनसे नाराज़ भी हो जाते हैं.

10 जून को राज्यसभा, 20 जून को एमएलसी चुनाव और 30 जून को बीजेपी समर्थित नई सरकार का गठन - ये जो फॉर्मूला तय हुआ था, महाराष्ट्र बीजेपी में भी इसकी भनक किसी को नहीं लग पाई. ऐसा श्रीपाद अपराजित का दावा है.

देवेंद्र फडणवीस, आदित्य ठाकरे और उद्धव ठाकरे के साथ

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नागपुर के मेयर से मुख्यमंत्री और फिर उप-मुख्यमंत्री तक का सफ़र

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  • देवेंद्र फडणवीस का जन्म नागपुर के ब्राह्णण परिवार में हुआ.
  • उन्होंने नागपुर से लॉ की डिग्री हासिल करने के बाद बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई की. बर्लिन से प्रोजेक्ट मैनेजमेंट का कोर्स भी किया.
  • 90 के दशक में राजनीति में प्रवेश करने वाले फडणवीस का परिवार पहले से ही राजनीति में था.
  • नागपुर म्युनिसिपल कारपोरेशन में दो बार कॉरपोरेटर चुने गए. (1992-1997 और 1997- 2001)
  • उनके पिता जनसंघ के नेता थे और उनकी चाची शोभा फडणवीस बीजेपी-शिवसेना की पहली सरकार में मंत्री थीं.
  • 1997 में वे नागपुर के मेयर थे.
  • पहली बार 1999 में राज्य विधानसभा के लिए चुने गए.
  • फिर 2005 में देवेंद्र फडणवीस की शादी अमृता फडणवीस से हुई. दोनों की एक बेटी है जो मुंबई में पढ़ रही है. अमृता एक प्राइवेट बैंक में नौकरी करती हैं और पूर्व सीएम की पत्नी के अलावा अपनी अलग पहचान रखना पंसद करतीं हैं.
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रह रह कर अमृता फडणवीस के ट्वीट्स देवेंद्र फडणवीस के लिए मुश्किलें भी पैदा करते हैं.

हाल में जारी महाराष्ट्र संकट के बीच अमृता फडणवीस ने एक ट्वीट किया था 'एक था कपटी राजा' जिसके बाद उन्हें वो हटाना पड़ा.

महाराष्ट्र की महाविकास अघाड़ी सरकार में मंत्री रहे नवाब मलिक ने पिछले साल देवेंद्र फडणवीस के ड्रग कारोबारियों से घनिष्ठ रिश्ते की बात कही थी और कुछ फोटो ट्वीट किए थे, जिसमें से एक फोटो अमृता फडणवीस की भी थी.

हालांकि, देवेंद्र फडणवीस ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों से इनकार किया था.

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संगठन में काम करने का अनुभव

दिलचस्प यह है कि मुख्यमंत्री बनने से पहले उनका प्रशासनिक अनुभव मेयर के पद तक ही सीमित था. इससे पहले वे कभी किसी मंत्री के पद पर भी नहीं रहे.

संगठन में काम की शुरुआत उन्होंने 1989 में वॉर्ड कन्वीनर के पद से की और महाराष्ट्र बीजेपी के अध्यक्ष पद पर 2013 में पहुँचे.

जब देवेंद्र फडणवीस ने नागपुर से अपनी राजनीतिक पारी शुरू की, तब पूरे विदर्भ और नागपुर में अकेले बीजेपी नेता नितिन गडकरी ही थे. फडणवीस ने गडकरी के मार्गदर्शन में ही अपना राजनीतिक सफ़र शुरू किया.

बाद में, जैसे जैसे बीजेपी के अंदरूनी समीकरण बदलने लगे वैसे वैसे फडणवीस ने गडकरी से खुद को दूर कर लिया और पार्टी में उनके विरोधी माने जाने वाले गोपीनाथ मुंडे का हाथ थाम लिया. इस नजदीकी की बदौलत फडणवीस राज्य में पार्टी के प्रमुख के पद तक पहुंचने में कामयाब हुए.

पार्टी ने उन्हें हाल में केरल का प्रभारी बनाया है. इसके साथ ही बिहार, गोवा और केरल के चुनाव में उन्हें अहम ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी.

देवेंद्र फडणवीस

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पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी

महाराष्ट्र बीजेपी का अध्यक्ष बनना और फिर उनके नेतृत्व में जीत हासिल करना - बहुत बड़ा कारण था कि 2014 में उन्हें महाराष्ट्र के सीएम की कुर्सी मिली.

संघ की विचारधारा में ढले फडणवीस में आरएसएस बहुत विश्वास रखता है.

इसके अलावा लोकसभा चुनाव 2014 में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी की केंद्र में सरकार बनी जिसमें माना जाता है कि गडकरी बहुत स्वीकार्य नहीं थे.

साथ ही बीजेपी एक नए राजनीतिक प्रयोग के तहत अल्पसंख्यक वर्ग से मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश कर रही थी ना कि बहुसंख्यक वर्ग से. जैसे हरियाणा में गैर जाट मनोहर लाल खट्टर, झारखंड में गैर आदिवासी रघुवर दास.

महाराष्ट्र में गैर मराठा देवेंद्र फडणवीस इस खांचे में फिट बैठे.

महाराष्ट्र में बीजेपी समर्थित नई सरकार

महाराष्ट्र के ताज़ा घटनाक्रम के बीच, बीजेपी का दोबारा से सत्ता में दखल बढ़ने वाला है.

इस बार मुख्यमंत्री का चेहरा शिवसेना से बगावत करने वाले एकनाथ शिंदे होंगे, ऐसा ख़ुद देवेंद्र फडणवीस ने कहा है.

फडणवीस चाहते तो मुख्यमंत्री बन सकते थे, वो पहले भी मुख्यमंत्री रह चुके थे लेकिन वो उपमुख्यमंत्री पद पर क्यों राज़ी हो गए ? इसके पीछे क्या वजह हो सकती है?

इस बारे में महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार विजय चोरमोरे कहते हैं, " फिलहाल एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बना कर, देवेंद्र फडणवीस शिवसेना को और कमज़ोर करना चाहते हैं. एकनाथ शिंदे जब मुख्यमंत्री बनेंगे तो बाक़ी जो कार्यकर्ता अभी उद्धव ठाकरे के साथ हैं, उनका भी मन डोल सकता है."

वो आगे कहते हैं, "2019 में इसी मुख्यमंत्री पद के लिए उद्धव ठाकरे से उनकी बात नहीं बनी थी. आज वही मुख्यमंत्री पद बीजेपी ने शिवसेना की झोली में डाल दिया. हो सकता है लोकसभा चुनाव तक बीजेपी सारी संभावनाएं खुली रखना चाहती है."

उनकी राजनीति को क़रीब से देखने वाले समर खडस कहते हैं, " महाराष्ट्र की सत्ता में बीजेपी की वापसी का श्रेय देवेंद्र फडणवीस को नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है. अगर कोई इस नई सरकार का क्रेडिट देवेंद्र फडणवीस को देता है तो फिर मध्यप्रदेश में, असम में, गोवा में, अरुणाचल में हर जगह के सीएम को क्रेडिट देना होगा."

समर खडस के इस बयान को बल जेपी नड्डा के इस ट्वीट से मिलता है, जिसमें उन्होंने उन्हें उप- मुख्यमंत्री बनाने की बात कही है.

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महाराष्ट्र में फडणवीस से पहले बीजेपी के किसी नेता ने पाँच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया था.

नागपुर के मेयर की कुर्सी से मुख्यमंत्री पद तक पहुँचने में उन्हें 22 साल लगे.

दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने का उनका रास्ता लगभग 2019 में साफ़ ही था कि शिवसेना ने मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी ठोक कर अड़ंगा लगा दिया.

एनसीपी नेता अजित पवार के साथ आनन फानन में उन्होंने दो दिन वाली सरकार तो बनाई, लेकिन उस सरकार के गिरने के बाद उनकी बहुत किरकिरी हुई.

देवेंद्र फडणवीस ने उस वक़्त तो अपमान का घूंट पी लिया था.

बीबीसी मराठी सेवा के संपादक आशीष दीक्षित कहते हैं, "2019 में उद्धव ठाकरे का बीजेपी को छोड़ कर कांग्रेस एनसीपी के साथ सरकार बनाना और उस वजह से देवेंद्र फडणवीस का मुख्यमंत्री नहीं बन पाना, इस बात का उन्हें व्यक्तिगत तौर पर बहुत दुख हुआ.

जाने से पहले उन्होंने विधानसभा में एक कविता सुनाई थी, 'मी पुन्हा येईन'. हिंदी में कहें तो 'मैं वापस आऊंगा.' साफ़ था कि वो ये ख़ुद के लिए कह रहे थे, भाजपा के लिए नहीं.

यही नारा उन्होंने अपने पूरे चुनाव प्रचार में इस्तेमाल भी किया था. इससे पता चलता है कि उनका 2019 का चुनाव प्रचार भी कितना पर्सनलाइज्ड था.

और शायद इसी वजह से 2019 में दूसरी बार मुख्यमंत्री ना बन पाने को वो दो दिन तक स्वीकार ही नहीं कर पाए. ऐसा उन्होंने ख़ुद एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था. पहले शिवसेना ने उन्हें धोखा दिया था, अब उन्होंने शिवसेना को धोखा दिया, इस तरह से एक चक्र पूरा हुआ."

2019 में जो हुआ, वो दोबारा ना हो इस वजह से इस बार उन्होंने फूंक-फूंक कर कदम रखा है.

दूध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर पीता है - ये कहावत आज उन पर फिट बैठती है.

ढाई साल बाद भले ही देवेंद्र फडणवीस का दोबारा सीएम बनने सपना ना पूरा हो पाया हो, लेकिन वो उप मुख्यमंत्री बनने और उद्धव ठाकरे को सत्ता से बाहर करने में कामयब ज़रूर रहे.

इसकी खुशी महाराष्ट्र बीजेपी को भी है.

बुधवार को उद्धव ठाकरे ने जैसे ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़े की घोषणा की, तुरंत महाराष्ट्र बीजेपी ने ट्वीट किया, " मी पुन्हा येईन, नव महाराष्ट्राच्या निर्मितीसाठी "

सोशल मीडिया पर देवेंद्र फडणवीस की पढ़ी गई वो लाइनें भी खूब शेयर की जा रही हैं, जिसमें वो कहते सुनाई देते हैं

"मेरा पानी उतरता देख, मेरे किनारे पर घर मत बसा लेना"

"मैं समंदर हूँ, लौट कर वापस आऊंगा"

एकनाथ खडसे, देवेंद्र फडणवीस और पंकजा मुंडे

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विरोधियों के साथ रिश्ते

महाराष्ट्र बीजेपी में वैसे तो इस समय कोई ऐसा नेता नहीं जिससे देवेंद्र फडणवीस को चुनौती मिले. लेकिन 2014 या उससे पहले ऐसा नहीं था.

एकनाथ खडसे, पंकजा मुंडे, विनोद तावड़े और चंद्रकांत पाटील सरीखे नेताओं को फडणवीस का मुख्य प्रतिद्वंद्वी माना जाता था.

उस वक़्त महाराष्ट्र बीजेपी में दो गुट हुआ करते है - गोपीनाथ मुंडे और नितिन गडकरी गुट.

उन्होंने ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर वाली नीति अपनाई थी.

इसका उन्हें फ़ायदा भी मिला.

हालांकि महाराष्ट्र के राजनीति के कुछ जानकार मानते हैं कि वो गोपीनाथ मुंडे के ज़्यादा करीब थे और नितिन गडकरी के विरोधी हैं.

विनोद तावड़े महाराष्ट्र में बड़े मराठा नेता थे, मुख्यमंत्री पद पर इस नाते वो दावेदारी ठोक रहे थे, एकनाथ खडसे वरिष्ठ होने की वजह से मुख्यमंत्री बनने का सपना संजोए थे, पंकजा मुंडे, गोपीनाथ मुंडे की वारिस होने की वजह से महत्वाकांक्षी थी.

फडणवीस वैसे तो पंकजा को बहन मानते हैं, लेकिन एक भाई का रोल उन्होंने गोपीनाथ मुंडे की ग़ैर हाज़िरी में नहीं निभाया, ये आरोप भी देवेंद्र फडणवीस पर लगते हैं.

आशीष दीक्षित कहते हैं, "अपने प्रतिद्वंदियों को पिछले 7-8 सालों में उन्होंने राजनीतिक तौर पर एक एक कर कमज़ोर कर दिया है. कोई आज पार्टी में नहीं है, तो कोई केंद्र की राजनीति में चला गया, तो कोई हार गया और ऐसा करते हुए देवेंद्र फडणवीस अपना रास्ता बनाते गए."

देवेंद्र फडणवीस की ख़ासियत के बारे में आशीष कहते हैं, " उनके बीजेपी के अलावा दूसरे विपक्षी पार्टी के नेताओं के साथ भी अच्छे संबंध हैं. यही कारण है कि अजित पवार के साथ भी वो मुख्यमंत्री पद की शपथ ले पाए.

महाराष्ट्र की राजनीति में ये महारत वैसे शरद पवार को ही अब तक हासिल है - ऐसा माना जाता है.

मास अपील की कमी

हालांकि उनमें बाला साहब ठाकरे या शरद पवार की तरह अपने दम पर, अपने भाषणों के दम पर भीड़ जुटाने की क्षमता नहीं है. ये बात देवेंद्र फडणवीस अपने बारे में भली भांति जानते भी हैं.

इस वजह से उनके विरोधी मानते हैं कि फडणवीस ने कभी किसी मास लीडर को अपने सामने फलने फूलने नहीं दिया.

देवेंद्र फडणवीस की दूसरी कमज़ोरी के बारे में बात करते हुए आशीष दीक्षित कहते हैं, "उनके आसपास उनकी पार्टी के मज़बूत नेता नहीं हैं. उनकी कोटरी में ज़्यादातर वो नेता हैं जो दूसरी पार्टियों से इम्पोर्ट किए गए हैं. पार्टी के सीनियर लीडर को वो ठीक से मैनेज नहीं कर पाएं है. जिस वजह से उन्हें बाहर के लोगों की ज़रूरत पड़ी."

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