जब विलासराव की सरकार बचाने के लिए होटल में ठहरे विधायक धोती पहन स्वीमिंग पूल में उतरे

विलासराव देशमुख

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    • Author, नामदेव काटकर
    • पदनाम, बीबीसी मराठी

शिवसेना से बग़ावत करने वाले एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना विधायकों ने पहले सूरत के ली मेरिडियन और फिर गुवाहाटी के रैडिसन ब्लू होटल में शरण ली.

बुधवार को आए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के पहले इन विधायकों की योजना गुवाहाटी से गोवा जाने की थी, जहां ये ताज कन्वेंशन सेंटर में ठहरते. उसके बाद 30 जून की सुबह ये बाग़ी विधायक फ्लोर टेस्ट में हिस्सा लेने के लिए मुंबई पहुंचते.

वैसे सूरत हो या गुवाहाटी या फिर गोवा, अलीशान होटल में इन विधायकों का रुकना महाराष्ट्र या देश की राजनीति में कोई नई बात नहीं है. लेकिन रिजॉर्ट या होटल पॉलिटिक्स की ऐसी कहानियां अक्सर दिलचस्प होती हैं.

महाराष्ट्र में ऐसा ही एक मामला 2002 में विलासराव देशमुख की सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव के दौरान देखने को मिला था. तत्कालीन विपक्ष के नेता नारायण राणे ने तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख की सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव दाख़िल किया था. नरायण राणे आज बीजेपी में हैं, पर उस समय शिवसेना में थे.

विलासराव मामूली बहुमत के साथ सरकार चला रहे थे. इसलिए सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पारित होने के बाद कांग्रेस-एनसीपी ने अपने-अपने विधायकों को साथ रखने के लिए हर संभव प्रयास शुरू किया था.

कांग्रेस अपने विधायकों को कर्नाटक के बेंगलुरु ले गयी. वहां उन्हें फ़िल्म अभिनेता संजय ख़ान के रेस्ट हाउस में रखा गया था. तब कांग्रेस में रहे और अब पुने जिलें से इंदापुर के भाजपा नेता हर्षवर्धन पाटिल ने अपनी आत्मकथा 'विधानगाथा' में इस वाक़ये से जुड़ी दिलचस्प कहानियों को बताया है.

इन कहानियों के मुताबिक किसी विधायक ने होटल में बिल को लेकर बहस की तो कोई धोती पहनकर स्वीमिंग पूल में उतर पड़े थे.

विलासराव देशमुख

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विलासराव की सरकार पर आया ख़तरा

2002 में, रायगढ़ में ज़िला परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव से विलासराव की सरकार पर असर पड़ा था. क्योंकि इस चुनाव में शिवसेना की अपेक्षा कारेकर ने ज़िला परिषद अध्यक्ष का पद जीत लिया था.

शिवसेना की अपेक्षा कारेकर ने PWP के नेता जयंत पाटिल की पत्नी सुप्रिया पटेल को हराया था. जयंत पाटिल ने इस हार को लेकर सुनील तटकरे की भूमिका पर सवाल उठाए थे. तब जयंत पाटिल के किसन मजदूर पार्टी (PWP) के पांच विधायक थे और उन्होंने विलासराव की सरकार का समर्थन किया था.

जयंत पाटिल ने यह आरोप लगाया कि सुनील तटकरे ने सरकार को समर्थन देने के दौरान हुए समझौते को तोड़ा है और इसके चलते सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की चेतावनी दी.

इस चेतावनी के बाद सुनील तटकरे ने मार्च 2002 में मंत्रालय से इस्तीफ़ा दे दिया. हालांकि इस्तीफ़ा देते हुए उन्होंने जयंत पाटिल पर धमकाने का आरोप लगाया था.

हालांकि इसके बाद फिर से जून 2002 में सुनील तटकरे को मंत्रिमंडल में वापस शामिल किया गया और इसके चलते पहले से ही नाराज चल रहे जयंत पाटिल के किसन मजदूर पार्टी ने विलासराव देशमुख की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया. जयंत पाटिल को CPM और कुछ छोटें पार्टींयों के विधायकों का समर्थन भी मिला, जिसके चलते सरकार अल्पमत में आ गयी थी.

विलासराव देशमुख, विधान भवन

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इमेज कैप्शन, हर्षवर्धन पाटिल की किताब 'विधानगाथा' की लॉन्चिंग के दौरान राज्य के नेता

अक्टूबर 1999 में विलासराव देशमुख के नेतृत्व एक तरह से गठबंधन सरकार बनी थी. गठबंधन में कांग्रेस (75 सीटें) और एनसीपी (58 सीटें) दो सबसे बड़ी पार्टियां थीं, लेकिन उनकी सीटें 145 सीटों के बहुमत तक नहीं पहुंच रही थीं लिहाजा पांच सीटों वाली किसान मजदूर पार्टी, दो सीटों वाली समाजवादी पार्टी, दो सीटों वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, दो सीटों वाली जेडीएस, एक सीट वाली आरपीआई और तीन सीटों वाली बहुजन महासंघ का समर्थन हासिल हुआ.

यानी गठबंधन में कांग्रेस और एनसीपी के अलावा छह छोटे-छोटे दल शामिल हुए. इसके बाद भी विलासराव देशमुख की सरकार को महज 148 विधायकों का समर्थन हासिल था.

जयंत पाटिल के समर्थन वापस लेने पर नारायण राणे ने विलासराव सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया. इसलिए तत्कालीन राज्यपाल पी. सी. अलेक्ज़ेंडर ने विलासराव को दस दिनों में बहुमत साबित करने का आदेश दिया.

अब इन 10 दिनों में निर्दलीय और छोटे दलों के विधायकों को अपने पक्ष में करने और अपने-अपने विधायकों को साथ रखने की ज़ोर आजमाइश शुरू हुई.

कांग्रेस ने अपने विधायकों को सीधे बैंगलुरु भेजा. वहां कांग्रेस विधायकों को फ़िल्म अभिनेता संजय ख़ान के रेस्ट हाउस में रखा गया था. वहां होटल में विधायकों के साथ क्या क्या कुछ हुआ इसके बारे में वर्तमान भाजपा नेता और तत्कालीन निर्दलीय विधायक हर्षवर्धन पाटिल ने अपनी आत्मकथा 'विधानगाथा' में बताया है.

विलासराव देशमुख, छगन भुजबळ

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'होटल के बिल का भुगतान कौन करेगा?'

कांग्रेस के सभी विधायकों को महाराष्ट्र के बाहर बेंगलुरू में संजय ख़ान के विश्राम गृह में रखा गया था ताकि कांग्रेस विधायक अलग न हों. हर्षवर्धन पाटिल, दिलीपराव देशमुख और कृपाशंकर सिंह को कांग्रेस के सभी विधायकों की देखभाल का ज़िम्मा सौंपा गया था.

एक-एक विधायक को संभालना बहुत मुश्किल काम था, पहले दिन ही विधायकों के बीच मारपीट शुरू हो गई.

पाटिल ने लिखा है, "संजय ख़ान के गेस्ट हाउस में कमरों की कमी के कारण प्रत्येक विधायक को अलग कमरे उपलब्ध कराना संभव नहीं था. इसलिए मैं दो या तीन विधायकों को एक कमरे में ठहराने का विकल्प दिया. लेकिन विधायक बहस करने लगे, 'मैं इस विधायक को अपने कमरे में नहीं चाहता, मैं उसे चाहता हूं.'

विधायकों के आवास का मामला सुलझने के बाद सबसे अहम सवाल यह आया कि गेस्ट हाउस के मैनेजर ने पूछा, ''इस सबका बिल कौन भरेगा?''

यह सवाल इसलिए अहम था क्योंकि रोज़ाना का का बिल तीन लाख रुपए था. इतना ज़्य़ादा बिल होने के चलते हर्षवर्धन पाटिल ने प्रबंधक से पूछा, "तुम इतना बिल लेते हो, इसमें क्या सुविधा है?"

तब प्रबंधक ने कहा, "हम सभी सुविधाएं प्रदान करते हैं. मिनरल वाटर वग़ैरह."

अब सुविधाओं को कम करना, विधायकों को नाराज़ करना, संकटों को न्योता देना था. विधायक नाराज होंगे तो वोट इसके ख़िलाफ़ होगा, इसलिए हर्षवर्धन पाटिल ने मैनेजर से गुपचुप तरीके से कहा, ''सुविधाओं को कम करो, मिनरल वाटर नहीं चाहिए.''

हर्षवर्धन पाटिल के सुझाव ने होटल का बिल कम कर दिया.

छगन भुजबल, नारायण राणे और विलासराव देशमुख

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धोती पहनकर स्वीमिंग पूल में उतरे विधायक

अगले दिन एक नया सवाल खड़ा हुआ. नाश्ता करने के बाद सभी विधायक स्वीमिंग पूल में उतरे. मधुकर चव्हाण और आनंदराव देवकाते जैसे वरिष्ठ नेता धोती पहनते थे. ये लोग धोती पहनकर स्वीमिंग पूल में उतरे. इन लोगों ने स्विमिंग पूल की छतरियों पर अपने कपड़े सुखाए.

तब तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को पता चल गया था कि कांग्रेस विधायक बेंगलुरू के एक गेस्ट हाउस में ठहरे हुए हैं. धोती और स्वीमिंग पूल में उतरे विधायकों उनका सीधा प्रसारण 'आजतक' न्यूज़ चैनल पर हुआ था.

समाचार चैनलों पर ख़बरें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी देखती थीं. उन्होंने सीधे विलासराव को फोन किया और पूछा, "क्या चल रहा है? क्या आपने इसे टीवी पर देखा है? पूरा देश देख रहा है!"

तब विलासराव ने हर्षवर्धन पाटिल को बुलाया, जो कांग्रेस विधायकों की ज़िम्मेदारी संभाल रहे थे. विलासराव नाराज़ नहीं थे. लेकिन विलासराव ने थोड़े गुस्से में कहा, "हर्षवर्धन, तुम वहां वास्तव में क्या कर रहे हो? बस टीवी देखो और तुम्हें पता चल जाएगा!"

विलासराव के फोन कॉल के बाद हर्षवर्धन पाटिल दौड़े और टीवी ऑन कर न्यूज़ देखने लगे. वहाँ से वह पुनः स्वीमिंग पूल की ओर दौड़े और छतरियों पर से धोती उतारीं.

हालांकि, विधायकों को स्वीमिंग पूल में जाने से रोकना उन्हें नाराज़ करना हो सकता था तो हर्षवर्धन पाटिल ने स्विमिंग पूल में पानी बंद करा दिया.

इस बीच, कांग्रेस की तरह एनसीपी विधायकों को भी इंदौर में ठहराया गया और इसकी ज़िम्मेदारी तत्कालीन उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल को सौंपी गई थी. नारायण राणे ने शिवसेना विधायकों को मातोश्री स्पोर्ट्स क्लब में ठहराया था.

विलासराव देशमुख

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और गिर गई विलासराव की सरकार...

दरअसल, सियासी ड्रामा अभी ख़त्म नहीं हुआ था. क्योंकि एनसीपी के 58 विधायकों में से सात विधायक पार्टी से अलग हो कर मत दिया. इसके चलते ये सातों विधायक दल बदल क़ानून के विवाद में फंस गए.

समर्थन वापस लेने वाले विधायकों को अयोग्य ठहराने के लिए एनसीपी ने तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष अरुण गुजराती के पास एक आवेदन दिया. इसके बाद अरुण गुजराती ने इन विधायकों को नोटिस जारी किया और अविश्वास प्रस्ताव के दिन, उन्होंने सभी सात विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया.

नतीजतन, विधानसभा में विधायकों की संख्या 288 से घटकर 281 हो गई. इसमें किसान मज़दूर पार्टी के पांच विधायकों ने तटस्थ रहने का फ़ैसला किया. इसलिए, विधानसभा की ताक़त 276 हो गई. और तब बहुमत का आंकड़ा 138 था.

जब अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान हुआ तो विलासराव देशमुख के नेतृत्व वाले डेमोक्रेटिक फ्रंट के समर्थन में 143 विधायक थे जबकि शिवसेना-भाजपा गठबंधन के समर्थन में 133 विधायक थे. इसलिए विलासराव देशमुख की सरकार को जीवनदान मिल गया.

उस समय विधान भवन के बाहर नारायण राणे के कार्यकर्ता बड़ी संख्या में जमा हो गए थे. पुलिस के लिए स्थिति को संभालना मुश्किल था. उस वक्त मुंबई के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर एम. एन. सिंह ने हालात पर नियंत्रण किया.

विलासराव ने विश्वास मत जीत लिया. हालांकि, हर्षवर्धन पाटिल, जो अब भाजपा में हैं, कहते हैं, ''चूंकि कांग्रेस के पास 1999 और 2004 के बीच मामूली बहुमत थी, इसलिए सरकार ने विकास के बजाय बहुमत बनाए रखने पर ध्यान दिया. हालांकि, 2004 में कांग्रेस-एनसीपी को बहुमत मिला था.''

(इस आलेख के लिए विधानगाथा- हर्षवर्धन पाटिल, द कजिन्स ठाकरे- धवल कुलकर्णी और ए क्लोज शेव इन महाराष्ट्र- फ्रंटलाइन आर्टिकल्स (2002) से संदर्भ लिए गए हैं.)

वीडियो कैप्शन, महाराष्ट्र में जारी सियासी संकट पर असदुद्दीन ओवैसी ने तंज़ कसा है.

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