उद्धव ठाकरे का नेतृत्व क्यों है सवालों के घेरे में?

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास अघाड़ी सरकार संकट में है. शिवसेना के बाग़ी नेता एकनाथ शिंदे का दावा है कि उनके पास 46 विधायकों का समर्थन है. इसमें से 40 शिवसेना के हैं और छह निर्दलीय हैं.
शिवसेना के इतिहास के इस सबसे बड़े घमासान में एक तरफ़ जहां महाविकास अघाड़ी के भविष्य पर प्रश्न चिह्न लग गया है, वहीं दूसरी ओर शिवसेना के नेतृत्व पर भी सवाल उठ रहे हैं.
ऐसा कैसे हो गया कि मुख्यमंत्री और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की नाक के नीचे मंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायकों ने विद्रोह कर दिया और उन्हें इसकी ख़बर ही नहीं लगी? वो भी तब जब मुंबई में जानकार बताते हैं कि राज्य में ये बात आम थी कि एकनाथ शिंदे नाख़ुश चल रहे हैं.
मुंबई के एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक़, ख़ुफ़िया विभाग का काम होता है असंतुष्टों पर निगाह रखना और नेतृत्व को आगाह करना.
ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि एकनाथ शिंदे के इस हद तक के बाग़ी इरादों के बारे में कैसे उद्धव ठाकरे को ज़रा सी भी भनक नहीं लगी? वहीं बड़ी संख्या में विधायकों ने क्यों एकनाथ शिंदे पर भरोसा किया, न कि उद्धव ठाकरे पर?

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वरिष्ठ पत्रकार संतोष प्रधान इसे पूरे घटनाक्रम को उद्धव ठाकरे की नाकामी बताते हैं.
प्रधान के मुताबिक़, उद्धव ठाकरे को इस बात का अंदाज़ा लग गया था कि ऐसा कुछ चल रहा है और दिसंबर में उन्होंने एकनाथ शिंदे को बुलाकर पूछा भी था, लेकिन शिंदे ने उनसे कहा था कि ऐसा कुछ नहीं है.
हमने एकनाथ शिंदे से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन अभी तक उनसे बात नहीं हो पाई है.
'बाल ठाकरे ऐंड द राइज़ ऑफ़ शिवसेना' के लेखक वैभव पुरंदरे इस बारे में कहते हैं, "इस घटना से पार्टी की लीडरशिप पर सवाल उठते हैं. जिस तरह पार्टी काम कर रही है, जिन मुद्दों को पार्टी ने उठाया, जिन पार्टियों के साथ शिवसेना ने गठबंधन किए. क्या शिवसेना ने गठबंधन पर विधायकों को विश्वास में लिया? क्या शिवसेना को ठाकरे परिवार के नेतृत्व में सिर्फ़ कुछ लोग चला रहे थे? ये सभी सवाल उठाए जा रहे हैं."
वैभव पुरंदरे के मुताबिक़, ठाकरे परिवार के नेतृत्व में पार्टी लीडरशिप किस तरह से कार्यकर्ताओं से कटी हुई है, ये जगजाहिर था, लेकिन वो आश्चर्यचकित हैं कि स्थिति को ठीक करने के लिए कुछ भी नहीं किया गया.
वो कहते हैं, "पार्टी के भीतर ये भावना थी कि चीज़ें अपने आप ख़ुद ठीक हो जाएंगी और पार्टी में कोई समस्या नहीं है. या तो ये पार्टी पूरी तरह डिनायल में थी या फिर उसमें इससे निपटने की क्षमता नहीं थी. पार्टी नेतृत्व घटनाक्रम को बहुत आसानी से ले रही थी. उन्हें लग रहा था कि सरकार ढाई साल तक बच गई है, और बाक़ी का वक़्त भी ऐसे ही निकल जाएगा."
वैभव पुरंदरे इस बात से भी आश्चर्यचकित हैं कि एकनाथ शिंदे के साथ विधायकों ने ऐसे वक़्त बग़ावत की जब पार्टी सत्ता में है.
वो कहते हैं, "जब 1991 में छगन भुजबल ने शिवसेना छोड़ी, तब पार्टी सत्ता में नहीं थी. जब साल 2005 में नारायण राणे निकले तब भी पार्टी सत्ता में नहीं थी. जब राज ठाकरे ने साल 2005 में पार्टी छोड़कर 2006 में एमएनएस का निर्माण किया, तब भी पार्टी सत्ता में नहीं थी, लेकिन अभी जब शिवसेना सत्ता में है और विधायक सत्ता का सुख ले रहे हैं, तब इतने सारे लोगों ने पार्टी के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी है. एकनाथ शिंदे के साथ बग़ावत करने वालों में तीन मंत्री भी हैं."

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शिवसेना प्रवक्ता अरविंद सावंत, उद्धव ठाकरे पर उठाए गए सवालों को खारिज़ करते हैं.
उनका दावा है कि एकनाथ शिंदे और विधायकों का फ़ैसला सत्ता के लालच और प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी और सीबीआई जैसे एजेंसियों की कथित धमकियों का नतीज़ा था.
वो कहते हैं, "ये तो पीठ में छुरा भोंकने वाली बात है."
अरविंद सावंत ने शिवसेना विधायक नितिन देशमुख का हवाला देकर दावा किया कि उन्हें धमकाया, डराया और मारा गया और वो वापस लौट आए हैं.
इसके अलावा, एक अन्य शिवसेना विधायक कैलास पाटिल ने आरोप लगाया है कि एकनाथ शिंदे के लोगों ने कथित तौर पर उन्हें धोखा देकर कार में गुजरात ले जाने की कोशिश की.
एकनाथ शिंदे के इस इशारे पर कि उन्हें शिवसेना के बहुमत का समर्थन है, नेशनल हेराल्ड अख़बार की सलाहकार संपादक सुजाता आनंदन कहती हैं कि शिवसेना ठाकरे परिवार के बग़ैर कुछ भी नहीं है.

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उद्धव ठाकरे के फ़ैसलों पर सवाल?
शिवेसना नेतृत्व से एकनाथ शिंदे की नाराज़गी की कई वजहें बताई जा रही हैं.
जानकारों की मानें तो एकनाथ शिंदे ख़ुद को पार्टी में 'साइडलाइन' महसूस कर रहे थे. वो ख़ुद मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन उद्धव ठाकरे ने अपने बेटे आदित्य ठाकरे को आगे बढ़ाया.
वरिष्ठ पत्रकार संतोष प्रधान के मुताबिक़, आम कार्यकर्ताओं और विधायकों से उद्धव ठाकरे की दूरी, उद्धव ठाकरे की अनुपलब्धता, बातचीत की कमी आदि चीज़ें आज के हालात के लिए ज़िम्मेदार हैं.
वो कहते हैं, "इन वजहों से सभी विधायक एकनाथ शिंदे के पास जाते थे. कोई फ़ाइनेंस का काम है तो एकनाथ शिंदे अजीत पवार को फ़ोन करते थे कि ये काम करो. इसलिए विद्रोह करने वाले इतने सारे विधायकों ने एकनाथ शिंदे पर विश्वास जताया."
पिछले विधानसभा चुनाव के बाद, शिवसेना का भाजपा का हाथ छोड़कर कांग्रेस और एनसीपी का हाथ थामने के पार्टी के फ़ैसले को भी आज के हालात के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है.

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संतोष प्रधान कहते हैं, "शिवसेना का डीएनए हिंदुत्व का है. कांग्रेस से गठजोड़ करके उद्धव ठाकरे प्रो-हिंदुत्व भूमिका नहीं ले रहे थे. शिवसैनिकों के लिए हिंदुत्व प्रमुख है. भाजपा हिंदुत्व को लेकर शिवसेना पर हमले कर रही थी. इसलिए पार्टी संकट में है."
लेखक वैभव पुरंदरे के मुताबिक़, जिस तरह से शिवसेना ने जम्मू और कश्मीर से धारा 370 हटाने का विरोध किया, 'कश्मीर फ़ाइल्स' फ़िल्म पर हमले किए, इससे पार्टी समर्थक ख़ुश नहीं थे.
उनके मुताबिक़, शिवसेना का प्रधानमंत्री मोदी पर हमले करना, उन्हें बाहर का बताना, ये कहना कि वो महाराष्ट्र को नियंत्रण में लेना चाहते हैं, पार्टी को भारी पड़ा.
पुरंदरे के अनुसार, मोदी को विलेन की तरह पेश करने जैसी बातों ने शिवसेना को नुक़सान पहुंचाया है, ख़ासकर तब जब चाहे 2014 हो या 2019, हर शिवसेना विधायक, सांसद या उम्मीदवार चाहता था कि नरेंद्र मोदी उनके लिए उनके चुनाव क्षेत्र में रैली करें.
नेशनल हेराल्ड अख़बार की सलाहकार संपादक सुजाता आनंदन उद्धव ठाकरे के नेतृत्व पर उठते सवालों को ग़लत बताती हैं.
वो कहती हैं कि जहां बाल ठाकरे के लिए भी अपने प्रसिद्धि के शिखर पर भी चुनाव जीतना चुनौतीपूर्ण था, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना ने नई ऊचाइयां छुई हैं.
वो कहती हैं, "आप उद्धव ठाकरे का रिकार्ड देखिए. 2014 में चुनाव के 15 दिन पहले भाजपा ने ये सोचकर नाता तोड़ा था कि उद्धव ठाकरे कुछ नहीं कर पाएंगे और पार्टी ढह जाएगी, लेकिन हुआ क्या? उद्धव ठाकरे कांग्रेस और एनसीपी के आगे निकल गए. 63 सीटें और बीजेपी की 122 सीटें आई थीं. यानी 15 दिन में वो भाजपा की आधी शक्ति लेकर आए थे. उस वक़्त जब भाजपा के पास पैसा और सब कुछ था और उद्धव ठाकरे के पास कुछ नहीं था."
सुजाता आनंदन कहती हैं, "उद्धव ठाकरे जो चुनाव जीत पाए, वो न बाल ठाकरे जीत पाए, न वो राज ठाकरे जीत पा रहे हैं."
कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिलाने के फ़ैसले पर सुजाता कहती हैं कि उद्धव ठाकरे न कभी ज़्यादा मुस्लिम विरोधी रहे, न ही उत्तर-भारतीय विरोधी.
वो कहती हैं, "उन्होंने हिंदुत्व की अपनी जो नीति बदली, वो इसलिए बदली क्योंकि वो उस पर विश्वास करते थे. उनका कार्यकर्ता हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता नहीं है. उनका कार्यकर्ता मराठी मानुष वाला कार्यकर्ता है. बाल ठाकरे उसी दिशा में जाते थे, जिस दिशा में उनको जीत दिखती थी."

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बेटे को आगे बढ़ाने की कोशिश?
उद्धव ठाकरे पर ये भी आरोप लगे हैं कि मौजूदा हालात की एक और वजह यह भी है कि वो अपने बेटे को आगे बढ़ाना चाहते हैं.
सुजाता आनंदन के मुताबिक़, जब महाविकास अघाड़ी की सरकार आई, "तब शरद पवार ने साफ़-साफ़ उद्धव और संजय राउत से कहा था कि आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री नहीं बना सकते हैं. क्योंकि उन्हें कोई एक्सपीरियंस नहीं है. कांग्रेस एनसीपी और शिवेसना के नेता के अलावा नौकरशाह और प्रशासन के लोग भी नहीं मान पाएंगे."
कुछ दिन पहले ख़त्म हुए राज्यसभा चुनाव में शिवसेना उम्मीदवार संजय पवार की हार को उद्धव ठाकरे के लिए झटके के तौर पर देखा गया था.
महाराष्ट्र में आए 6 राज्यसभा के नतीज़ों में से महाविकास अघाड़ी के तीन और भाजपा के तीन प्रत्याशियों की जीत हुई थी. छठी सीट के लिए महाविकास अघाड़ी को झटका लगा था जब भाजपा के धनंजय महादिक ने शिवसेना के संजय पवार को हरा दिया.
सुजाता आनंदन पूछती हैं कि पार्टी ने राज्यसभा चुनाव में हार के बाद आदित्य ठाकरे को क्यों विधान परिषद चुनाव का इंचार्ज बना दिया.
वो कहती हैं, "राज्यसभा में हार के बाद उद्धव ठाकरे को अलर्ट होना जा चाहिए था. विधान परिषद चुनाव की ज़िम्मेदारी एकनाथ शिंदे को देनी चाहिए थी. आदित्य ठाकरे की बात कौन मानेगा?"
वैभव पुरंदरे के मुताबिक़, ऐसे वक़्त जब सत्ता में होने के बावजूद शिवसेना का एक बड़ा हिस्सा आपसे अलग हो रहा है, ऐसे में पार्टी नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती फिर से अपनी विश्वसनीयता को स्थापित करना होगी.
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