नीतीश कुमार का राबड़ी देवी के यहाँ इफ़्तार पर जाना, क्या महज़ फोटो-ऑप था?

नीतीश कुमार तेजस्वी यादव

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

नीतीश कुमार पिछले कुछ दिनों से मुख्यमंत्री के लिए आवंटित 1 अणे मार्ग वाले अपने सरकारी बंगले में नहीं रह रहे हैं. वहां रेनोवेशन का काम चल रहा है.

फिलहाल उनका आवास 7 सर्कुलर रोड है, जो राबड़ी देवी के 10 सर्कुलर रोड वाले बंगले के ज़्यादा पास है.

पिछले पाँच सालों में ये पहला मौका था जब नीतीश कुमार इफ़्तार पार्टी में शरीक होने के लिए राबड़ी देवी के घर गए हो.

नीतीश कुमार का 7 सर्कुलर रोड बंगला राबड़ी देवी के 10 सर्कुलर रोड वाले बंगले के ठीक सामने है. दोनों के बीच महज़ एक रोड का फासला है.

इस वजह से नीतीश कुमार ने उनके यहाँ इफ़्तार पार्टी पर पैदल ही जाना मुनासिब समझा होगा.

बिहार की राजनीति में इस पैदल यात्रा और इफ़्तार पार्टी की तस्वीरों ने काफ़ी सुर्खियां भी बटोरी.

कुछ जानकार इसे महज़ शिष्टाचार भेंट भी करार दे रहे हैं. ऐसा कहने वाले जीतन राम मांझी की 2019 की इफ़्तार पार्टी का हवाला दे रहे हैं, जब जीतन राम मांझी विपक्ष में थे और इफ़्तार पार्टी के लिए नीतीश कुमार को न्योता दिया था. नीतीश कुमार उस इफ़्तार पार्टी में भी शामिल हुए थे.

लेकिन कहीं कहीं इस इफ़्तार पार्टी को बिहार की राजनीति की आने वाली तस्वीरों से जोड़ कर भी देखा जा रहा है. ऐसा कहने वाले नीतीश कुमार की टाइमिंग को लेकर सवाल खड़ें कर रहे हैं. अगले दिन गृह मंत्री अमित शाह बिहार दौरे पर थे, उससे ठीक एक दिन पहले तेजस्वी, तेज प्रताप और राबड़ी देवी के साथ फोटो खिंचवा कर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बीजेपी को संदेश देने की कोशिश कर रहे थे.

हालांकि तेजस्वी यादव ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में इन अटकलों पर जवाब दिया है.

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नीतीश कुमार और मोदी

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बीजेपी-जेडीयू गठबंधन में इस बार कितने असहज हैं नीतीश

साल 2020 में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद से नीतीश कुमार कई बार ऐसे संदेश बीजेपी तक पहुँचा चुके हैं.

इसी साल मार्च में नीतीश कुमार बिहार विधानसभा में स्पीकर पर नाराज़ हो गए थे और उन्हें संविधान के हिसाब से चलने की नसीहत तक दे दी थी. स्पीकर बीजेपी के थे.

पिछले साल जुलाई में उत्तर प्रदेश के प्रस्तावित जनसंख्या क़ानून के विरोध में नीतीश कुमार ने खुल कर बयान दिया, फिर जातिगत जनगणना पर भी बीजेपी से इतर लाइन ली.

ओम प्रकाश चौटाला से पिछले साल अगस्त में मुलाक़ात की, तब तीसरे मोर्चे में जाने की अटकलें तेज़ हो गई. पेगासस जासूसी मामले में उन्होंने जाँच की भी माँग की जिसके बाद उनपर गठबंधन राजधर्म के पालन नहीं करने का आरोप लगा.

प्रभात ख़बर पटना संस्करण के संपादक अजय कुमार कहते हैं, "नीतीश कुमार सालों से बिहार के मुख्यमंत्री हैं. कई गठबंधन के साथ उन्होंने सरकार चलाई, लेकिन वो इस गठबंधन में जितने असहज लग रहे हैं, उतने असहज पहले कभी नहीं दिखे. पहले के गठबंधन में उनका बयान ही आख़िरी माना जाता था, जेडीयू की लाइन ही कमोबेश बीजेपी की लाइन हुआ करती थी. लेकिन इस (वर्तमान) गठबंधन में बीजेपी और जेडीयू के सुर कई मौके पर अलग दिखे."

नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव

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हाल ही में वीआईपी नेता मुकेश सहनी को कैबिनेट से निकालने के फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए अजय कुमार कहते हैं, "लिखित में बीजेपी ने नीतीश कुमार को मुकेश सहनी को निकालने की बात कही, जिसके बाद नीतीश कुमार ने ये फैसला लिया. ये एक तरह का संदेश था नीतीश तो निकालना नहीं चाहते थे, लेकिन गठबंधन की वजह से ऐसा करना पड़ा."

माना जाता है कि मुकेश साहनी की पार्टी वीआईपी, बिहार में एनडीए गठबंधन का हिस्सा बीजेपी के कहने पर ही बनी.

साल 2020 के विधानसभा चुनाव में वीआईपी को चार सीटों पर सफलता मिली. लेकिन ख़ुद मुकेश सहनी चुनाव हार गए थे. फिर भी उन्हें मंत्री बीजेपी के कहने पर बनाया गया.

लेकिन उत्तर प्रदेश चुनाव में उन्होंने बीजेपी के आगाह करने के बाद भी अपने उम्मीदवार उतारे. उनके तीन विधायक पाला बदलते हुए हाल ही में बीजेपी में शामिल हो गए.

जानकारों की मानें तो गठबंधन में शामिल कराने से लेकर निकालने तक में नीतीश की कोई भूमिका नहीं थी. लेकिन बोचहां सीट पर हार में मुकेश सहनी के गठबंधन से जाने का असर साफ़ दिखा.

अगर बीजेपी इस सीट को जीत जाती तो बीजेपी मुकेश सहनी को कैबिनेट से निकालने के फैसले को सही ठहरा सकती थी.

नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव

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बोचहां सीट पर उपचुनाव में बीजेपी की हार

बिहार के बोचहां सीट पर वीआईपी पार्टी के विधायक के निधन के बाद बोचहां सीट पर उपचुनाव हुआ.

बीजेपी ने वहाँ अपना उम्मीदवार बेबी कुमारी को बनाया, जो पहले उस सीट से निर्दलीय जीत चुकी थी. बीजेपी के उम्मीदवार को 36 हजार वोटों के अंतर से आरजेडी के उम्मीदवार ने शिकस्त दी.

आरजेडी ने इस सीट से मुसाफिर पासवान के बेटे को उम्मीदवार बनाया था, जिनके निधन के बाद वो सीट खाली हुई थी.

बीजेपी इस हार से काफ़ी परेशान है.

बीजेपी राज्यसभा सांसद सुशील मोदी ने इस हार के लिए समीक्षा की माँग की और लिखा, "एनडीए के मज़बूत जनाधार अति पिछड़ा वर्ग और सवर्ण समाज के एक वर्ग का वोट खिसक जाना अप्रत्याशित था."

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बोचहां में अति पिछड़ा वर्ग और सवर्ण समाज का वोट एनडीए को नहीं मिलने के बारे में नीतीश कुमार से जब सवाल पूछा गया तो उन्होंने केवल इतना कहा कि वही ना इसका कारण बताएं.

यानी हार का ठीकरा दोनों एक दूसरे पर फोड़ रहे हैं.

अजय कुमार कहते हैं, "मुकेश सहनी के कैबिनेट से निकाले जाने और बोचहां में हार के बीच अगर नीतीश कुमार राबड़ी देवी के यहाँ इफ़्तार पर जाते हैं तो इसके राजनीतिक मायने निकालना स्वाभाविक है. केवल नीतीश कुमार का राबड़ी देवी के यहाँ जाना और फोटो खींचवाने को एक घटना के तौर पर देखें तो बात सामान्य सी है. लेकिन 2020 के बाद से गठबंधन में जो कुछ चल रहा है, उसे बैकग्राउंड में रख कर इस फोटो-ऑप को देखें, तो पाँच साल बाद राबड़ी देवी के आवास पर जाना थोड़ा असामान्य ज़रूर था.

मैं इस पर टिप्पणी नहीं करूंगा की उनका जाना महज़ फोटो ऑप है या नहीं."

वीडियो कैप्शन, 'गठबंधन तो पहले ही टूट जाना चाहिए था'

राजनीतिक गुणा-भाग

इस मुलाक़ात के राजनीतिक मायने निकलने वाले अंक गणित का हवाला भी दे रहे हैं.

बिहार विधानसभा में जेडीयू के पास इस समय 45 विधायक हैं और आरजेडी के पास 76. दोनों मिला कर सरकार बनाने के करीब आसानी से पहुँच सकते हैं. अतीत में एक बार ये प्रयोग दोनों कर चुके हैं.

इस थ्योरी को हवा चिराग पासवान के बयान से मिली, जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के रेनोवेशन के नाम पर घर बदलने के निहितार्थ निकाले.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ चिराग पासवान ने पत्रकारों से कहा, "नीतीश कुमार का सरकारी आवास बदलना, वैसा नहीं है जैसा दिख रहा है. हम सभी ने अपने घरों में कभी ना कभी काम कराया हैं. लेकिन मरम्मत कराने के नाम पर सभी सामान, गाय-भैंस लेकर शिफ्ट करते लोगों को आख़िरी बार आपने कब देखा था."

उन्होंने आगे कहा, "एक नेता का दूसरे नेता के घर चल के जाने के अपने मायने हैं. मुझे याद है एक बार सोनिया जी, हमारे घर चल कर आई थी. बाद में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी, जिसमें मेरे पिता भी शामिल थे."

नीतीश कुमार और अमित शाह

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गिरिराज के बयान और अमित शाह का बिहार दौरा

बिहार में पीटीआई के वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण इसमें एक पुराना तथ्य याद दिलाते हैं.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "नीतीश कुमार किसी भी इफ़्तार पार्टी में आमंत्रित होते हैं तो जाते तो हैं. 2019 में जीतन राम मांझी विपक्ष में थे. लेकिन नीतीश के बुलाने पर वो उनके इफ़्तार में गए थे."

हालांकि नचिकेता भी मानते हैं कि नीतीश के पैदल जाने की वजह से पत्रकारों को फोटो-ऑप का मौका भी मिला और इस वजह से इसके राजनीतिक मायने ज़्यादा निकाले गए.

नचिकेता आगे कहते हैं, "रामनवमी के समय देश के कई बीजेपी शासित राज्यों में सांप्रदायिक हिंसा हुई. कई जगह बुलडोजर चले. नीतीश जिस तरह की राजनीति करते हैं, उसमें माना जाता है कि ये बातें उन्हें नागवार तो गुज़री होगी.

बिहार के सांसद गिरिराज सिंह का पिछले दिनों इस मौके पर आग में घी डालने वाले कई बयान आए. उन्होंने सीएए एनआरसी का समर्थन किया जिसके खिलाफ़ नीतीश कुमार की पार्टी का स्टैंड घोषित है.

राबड़ी देवी के इफ़्तार पार्टी के अगले ही दिन अमित शाह बिहार आने वाले थे. हो सकता था कि अमित शाह अपने दौरे पर कुछ ऐसा बोलते जो नीतीश कुमार को असहज बना देता. उनके आने के पहले ही नीतीश कुमार ने राबड़ी देवी के घर जा कर एक संदेश दिया, जिसमें वो काफ़ी हद तक सफल भी रहे. अमित शाह का दौरा उस लिहाज़ से शांत ही रहा. ये तो तात्कालिक संदेश था. एक दीर्घकालीक संदेश भी है. अगर ये गठबंधन बहुत ज़्यादा दमघोटू लगा तो हमारे पास विकल्प भी है."

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