सम्राट अशोक की तुलना औरंगजे़ब से की, बीजेपी से जुड़े लेखक पर बिहार में छिड़ा सियासी संग्राम

- Author, विष्णु नारायण
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
'सम्राट अशोक' पर भारतीय जनता पार्टी से जुड़े एक लेखक दया प्रकाश सिन्हा के बयान के बाद बिहार की राजनीति में विवाद खड़ा हो गया है.
दया प्रकाश सिन्हा को साल 2021 में 'सम्राट अशोक' नाटक के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.
इस बयान में सिन्हा ने सम्राट अशोक की तुलना मुगल बादशाह औरंगजेब से की है, जिसके बाद उनका जगह-जगह विरोध हो रहा है.
बिहार में एनडीए गठबंधन के तहत सरकार चला रहे जेडीयू नेतृत्व ने भी उन्हें आड़े हाथों लिया है.
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने तो यहां तक कह डाला कि दया प्रकाश सिन्हा 'पद्म श्री' सम्मान के लायक नहीं.
वहीं, जेडीयू नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने प्रेस से बातचीत में दया प्रकाश सिन्हा से 'पद्म श्री' सम्मान वापस लेने की मांग की है.

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इस पूरे संदर्भ पर जेडीयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने बीबीसी से कहा, "नीतीश कुमार देश के पहले राजनेता हैं जिन्होंने सम्राट अशोक के नाम पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की. सम्राट अशोक की जयंती मनाते हैं."
"सम्राट अशोक के व्यक्तित्व और कृतित्व को नई पीढ़ी के सामने रखने के लिए प्रयासरत हैं, और जब भाजपा से सम्बद्ध कोई व्यक्ति इस तरह की ओछी बातें कहता है तो केंद्र सरकार वह प्रतिष्ठित पुरस्कार वापस ले जो कि उन्हें सम्राट अशोक पर काम के लिए मिला है. भाजपा की प्रदेश इकाई से भी उनकी अपेक्षा है कि वह उनकी इस मांग का समर्थन करेगी."
बीजेपी से जुड़ने से पहले दया प्रकाश सिन्हा एक आईएएस अधिकारी थे. वे भाजपा में फिलहाल राष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय संचालक हैं.

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क्या कहा इंटरव्यू में
दया प्रकाश सिन्हा के अशोक और औरंगज़ेब की जिस तुलना पर विवाद खड़ा हो रहा है, वह बात उन्होंने एक अख़बार को इंटरव्यू देने के दौरान कही थी.
अख़बार नवभारत टाइम्स को दिए इस इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि पठन-पाठन और सम्राट अशोक पर नाटक लिखने के दौरान उन्होंने अशोक के किरदार पर खासा रिसर्च किया और पाया कि अशोक और औरंगजेब के चरित्र में खासी समानताएँ हैं.
उन्होंने कहा कि दोनों ही शासकों ने अपनी शुरुआती जिंदगी में कई पाप किए, फिर उन्हें छिपाने के लिए अतिधार्मिकता का सहारा लिया, ताकि उनके पाप पर किसी का ध्यान न जाए. दोनों ने अपने भाई की हत्या की और अपने पिताओं को जेल में डाल दिया. अशोक ने अपनी पत्नी को जला दिया था, क्योंकि उसने एक बौद्ध भिक्षु का अपमान किया था.
दया प्रकाश सिन्हा ने उस इंटरव्यू के दौरान अपनी बात को विस्तार देते हुए तिब्बती लेखक तारानाथ के हवाले से यह भी कहा कि अशोक के चेहरे पर कई दाग थे और वे बदसूरत दिखा करते. इसके अलावा वे अपने शुरुआती दिनों में कामुक हुआ करते थे. बौद्ध साहित्य में तो अशोक को कामाशोक और चंडाशोक भी कहा गया है.

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इतिहासकार की राय
अशोक की तुलना औरंगज़ेब से करने के संदर्भ पर इतिहासकार सुभाष चंद्र कुशवाहा ने बीबीसी से कहा, "औरंगजेब क्या है? औरंगजेब कोई अलग है क्या बाकी शासकों से? हर शासक अपनी सत्ता को संचालित करने के लिए बर्बरता करता है. सत्ता का एक वर्ग चरित्र होता है, जिसमें पिता भी फंसता है और बेटा भी.सामंती सत्ता के वर्ग चरित्र से अशोक वंचित नहीं रह सकता.''
वह आगे कहते हैं, '' सिन्हा साहब के इस बयान पर खलबली नहीं मचती है, खलबली उनकी मानसिकता पर मचती है, बौद्ध धर्म के पैरोकारों को आप एक हाशिए पर डालना चाहते हैं. मैं यह नहीं कह रहा हूं कि अशोक ने कोई ग़लत काम नहीं किया , वह शासक था ऐसा हो सकता है. आप औरंगजेब से अशोक की तुलना इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आप औरंगजेब की हिंदू विरोधी छवि गढ़ चुके हैं और आप अशोक को वहां इसलिए खड़ा कर रहे हैं क्योंकि आपको हिंदू धर्म को अच्छा सिद्ध करना है.''

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बिहार में सियासी विरोध
इंटरव्यू के दौरान दया प्रकाश सिन्हा की टिप्पणियों के बाद बिहार में सियासी बखेड़ा खड़ा हो गया है. कई जगहों पर उनका पुतला भी फूंका गया है.
सूबे की मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि ऐसे लोगों पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए.
उन्होंने कहा,"उन पर एफआईआर की जानी चाहिए. चूंकि वे भाजपा के नेता हैं और उन्हें सम्मानित भी किया गया तो वह सम्मान लौटाया जाए, लेकिन इस मामले में भाजपा के साथ जद (यू) को भी बख्शना उचित नहीं होगा. जद (यू) का नेतृत्व सिर्फ बयानबाजी करके नहीं बच सकता.
हालांकि बिहार में भाजपा के प्रवक्ता निखिल आनंद बीबीसी के साथ बातचीत में इस पूरी तुलना की कवायद को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हैं.
वे कहते हैं,"दया प्रकाश सिन्हा की खास मानसिकता से उत्प्रेरित घटिया साहित्यिक हरकत ने भारतीय सामाजिक समूह की मान्यताओं को आहत किया है. साहित्य की आड़ में इतिहास की कब्र खोदना निंदनीय है."
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