किसान आंदोलन का एक साल पूरा, क्या खोया-क्या पाया

किसान आंदोलन

इमेज स्रोत, Hindustan Times

    • Author, अरविंद छाबड़ा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अब से ठीक एक साल पहले जब दिल्ली की सीमाओं पर किसानों की भीड़ जुटनी शुरू हुई थी तो सर्दियों का मौसम बस शुरू भर हुआ था. अधिकांश लोगों को ये उम्मीद नहीं थी कि किसान इतने लंबे समय तक अपने घर परिवार और खेतों को छोड़कर दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहेंगे.

लेकिन तमाम प्रदेशों से आए किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहकर भयानक सर्दी से लेकर गर्मी और भयंकर प्रदूषण का सामना किया.

यही नहीं, जब दुनिया भर में कोविड - 19 महामारी अपना कहर बरपा रही थी, सोशल डिस्टेंसिंग यानी सामाजिक दूरी बरतने के नियम का पालन किया जा रहा था तब भी किसानों का हुजूम दिल्ली की सीमाओं पर डटा रहा.

जब-जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें महामारी से डर नहीं लगता तो उन्होंने कहा कि "हम इन क़ानूनों की वजह से वैसे भी मरने जा रहे हैं. ये ज़्यादा ख़तरनाक हैं."

इस दौरान दिल्ली की सीमाओं पर सैकड़ों किसान बिना मास्क लगाए कोविड-19 प्रोटोकॉल का उल्लंघन करते दिखे.

किसान आंदोलन, बच्चे

इमेज स्रोत, Hindustan Times

जब महिलाएं-बच्चे शामिल हुए

कुछ समय बाद, किसानों के परिवारों से महिलाएं और बच्चे भी सिंघू, टिकरी और गाज़ीपुर बॉर्डर पर जारी विरोध प्रदर्शन में शामिल होते दिखाई दिए.

इसके साथ ही धीरे-धीरे ट्रैक्टर-ट्रॉलियों ने इन किसानों के घरों की शक्ल लेना शुरू कर दिया. कई जगहों पर तो कच्चे-पक्के मकान भी दिखाई दिए.

लेकिन इस दौरान सामान्य रूप से व्यस्त रहने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर गाड़ियों का आवागमन रुका रहा जिससे एक लंबे समय तक दिल्ली में घुसने वाले रास्तों पर जाम देखा गया.

विरोध प्रदर्शन के दौरान किसान नेताओं ने जहां एक ओर लोगों को ये समझाया कि इन क़ानूनों का उन पर क्या असर पड़ेगा, वहीं उन्होंने ये भी सुनिश्चित किया कि लोगों को खाने-पीने समेत मूलभूत सुविधाओं की कमी न हो.

इसके साथ ही स्थानीय लोगों ने अपने स्तर पर हरसंभव मदद की.

सिंघू बॉर्डर पर मौजूद पंजाब के एक किसान जगमोहन सिंह बताते हैं, "जब कोई विरोध प्रदर्शन की जगह पर पहुंचता था तो अपने गांव से गेहूं, चावल, सब्जियां और दूसरी खाने-पीने की चीजें ले आता था. इसकी वजह से चीज़ें हमेशा पर्याप्त रहीं."

यही नहीं, कई बार इन तीनों ठिकानों पर मेडिकल सहायता देने के लिए कैंप लगते भी नज़र आए.

ये भी पढ़ें -

किसान आंदोलन, मेडिकल कैंप

इमेज स्रोत, Hindustan Times

अंतरराष्ट्रीय समर्थन

इस किसान आंदोलन को भारत ही नहीं अंतरराष्ट्रीय हस्तियों की ओर से भी समर्थन मिला.

इनमें सिंगर-अभिनेत्री रिहाना, क्लाइमेट एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग और अमेरिकी उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस की भतीजी माया हैरिस शामिल हैं.

इस मुद्दे से जुड़ी एक न्यूज़ रिपोर्ट शेयर करते हुए रिहाना ने ट्वीट किया, "हम इस बारे में बात क्यों नहीं कर रहे हैं."

छोड़िए X पोस्ट, 1
X सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट X समाप्त, 1

वहीं, ग्रेटा थनबर्ग ने लिखा, "मैं अभी भी किसानों के साथ खड़ी हूं और उनके शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का समर्थन करती हूं. कितनी भी नफ़रत, धमकियां और मानवाधिकारों का उल्लंघन इसे नहीं बदल सकता."

छोड़िए X पोस्ट, 2
X सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट X समाप्त, 2

ब्रिटेन में लेबर पार्टी, लिबरल डेमोक्रेट और स्कॉटिश नेशनल पार्टी के सांसदों ने किसानों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी.

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो और कंज़रवेटिव विपक्ष के नेता एरिन ओ' टूले ने भी इन विरोध प्रदर्शन पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर चिंता जताई थी.

भारत ने इन बयानों की निंदा करते हुए इसे अपना आंतरिक मामला बताया था.

ये विरोध प्रदर्शन काफ़ी हद तक शांतिपूर्ण रहा जिसकी वजह से इसकी मिसाल भी दी गयी. लेकिन कभी - कभी ऐसे मौके भी आए जब लगा कि आंदोलन बिखरने की ओर बढ़ रहा है.

ये भी पढ़ें -

लालकिला

इमेज स्रोत, Pallava Bagla/Corbis via Getty Images

जब लालकिले में घुसे 'किसान'

दिसंबर के महीने में समाचार एजेंसी पीटीआई की एक तस्वीर वायरल हुई जिसमें एक अर्धसैनिक बल का जवान एक वृद्ध सिख व्यक्ति पर लाठी चलाता हुआ दिखा.

इस एक तस्वीर की वजह से केंद्र सरकार को विपक्ष की ओर से भारी आलोचना का सामना करना पड़ा.

वीडियो कैप्शन, किसान आंदोलन: एक तस्वीर ने कर दिया मशहूर

इसके बाद 26 जनवरी को जब किसान दिल्ली में घुसे तो ये विरोध प्रदर्शन हिंसक हो उठा. और ऐसा लगा कि अब ये विरोध प्रदर्शन ख़त्म हो सकता है.

हालांकि, ज़्यादातर किसानों ने पुलिस द्वारा दिए गए रूट का पालन किया. लेकिन कुछ किसान दिल्ली के दिल यानी लालकिला क्षेत्र की ओर बढ़ गए जिससे किसानों और पुलिस के बीच झड़प देखने को मिली.

इसके लगभग दस महीनों बाद उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी ज़िले में विरोध प्रदर्शन के दौरान कुल आठ लोगों की मौत हो गयी.

इनमें से चार लोग किसान थे जो कि विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. एक व्यक्ति पत्रकार था जो कि इस विरोध प्रदर्शन को कवर कर रहा था. और इन पांचों लोगों की मौत गाड़ी से कुचले जाने से हुई. कथित रूप से एक कार एक केंद्रीय मंत्री की बताई जाती है.

सुप्रीम कोर्ट ने इसी घटना पर टिप्पणी करते हुए इसे कई ज़िंदगियों की दुखद क्षति करार दिया था.

इसके कुछ दिन बाद बहादुरगढ़ में कथित रूप से एक ट्रक द्वारा कुचले जाने की वजह से तीन अन्य प्रदर्शनकारियों की मौत हो गयी और दो अन्य को चोटें आईं जब वे ऑटो का इंतज़ार कर रहे थे.

ये भी पढ़ें -

पीएम मोदी

इमेज स्रोत, BJP

प्रधानमंत्री का ऐलान

इस सबके साथ जब विरोध प्रदर्शन जारी था. और सरकार एवं किसान संगठनों के बीच बात बनती नहीं दिख रही थी. तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 नवंबर को ये ऐलान किया कि वह इन तीनों क़ानूनों को वापस लेने जा रहे है.

यूनियन कैबिनेट ने बीती 24 नवंबर को ये तय कर दिया है कि इस क़ानून को संसद के शीतकालीन सत्र में वापस लिया जाएगा.

किसान संगठन आज 26 नवंबर को अपने आंदोलन का एक साल पूरा होने के मौके पर जश्न मना रहे हैं. हालांकि, इसे वे आधी जीत करार दे रहे हैं.

इसके साथ ही किसान 700 प्रदर्शनकारियों की मौत को भी याद कर रहे हैं जिन्होंने इस आंदोलन को यहां तक पहुंचाने की प्रक्रिया में भारी कीमत चुकाई है.

पंजाब सरकार ने इनमें से 350 किसानों के परिवार वालों को नौकरियां देने के लिए पत्र भेज दिए हैं. और चालीस संगठनों की बॉडी संयुक्त किसान मोर्चा ने सरकार के कानून वापस लेने वाले फ़ैसले का स्वागत किया है, लेकिन कहा है कि वे इन कानून के वापस होने तक इंतज़ार करेंगें.

इस बिल को संसद के शीतकालीन सत्र में लेकर आया जाएगा जिससे इन क़ानूनों को रद्द किया जा सके.

कई पक्ष सरकार के इस फ़ैसले को विरोध कर रहे किसानों की एक बड़ी जीत के रूप में देखते हैं.

ये भी पढ़ें -

महिलाएं

इमेज स्रोत, NARINDER NANU

ये आंदोलन क्या सिखाता है?

राजनीतिक विश्लेषक डॉ प्रमोद कुमार मानते हैं, "इस आंदोलन ने हमें सिखाया है कि आपको कोई भी कानून बिना संवाद और विचार-विमर्श के पारित नहीं करना चाहिए. और इस आंदोलन ने बताया कि कारपोरेट करण जनहित में नहीं हैं, विशेषत: जब ये खाद्य सामग्री से जुड़ा हो. क्योंकि किसानों की जीविका इस पर टिकी हुई है."

कुमार कहते हैं कि इस आंदोलन ने हमें ये भी सिखाया है कि इस तरह के आंदोलनों के समाधान अदालतों से नहीं निकल सकते.

वे कहते हैं, "इस आंदोलन की ओर से लगातार जोर दिया गया कि ये मुद्दा सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुलझ नहीं सकता. अगर कोई समाधान है तो उसे राजनीति में तलाशा जाना चाहिए. मुझे लगता है कि उन्होंने एक बड़ा मुद्दा उठाया है."

किसानों और सरकार के बीच हुई 11 बैठकों में से हर बैठक में किसान नेता इस बात पर अड़े रहे कि वे इन तीनों क़ानूनों को हटाए जाने से कम पर राज़ी नहीं होंगे.

सुप्रीम कोर्ट की ओर से इशारा मिलने पर केंद्र सरकार ने इन क़ानूनों को डेढ़ साल के लिए होल्ड पर डालने की पेशकश की लेकिन किसान संगठन इसके लिए राज़ी नहीं हुए.

कुछ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सरकार ने ये फ़ैसला कई प्रदेशों में विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए लिया है.

डॉ. प्रमोद कुमार मानते हैं, "आने वाले महीनों में पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में चुनाव होने वाले हैं. अगर सरकार चुनावों को ध्यान में रखते हुए ये कदम उठा रही है तब मुझे लगता है कि इस फ़ैसले को इसके गुण-दोष को ध्यान में रखते हुए नहीं लिया गया है."

किसानों का कहना है कि वे अपनी मांगें पूरी होने के बाद घर लौटना चाहते हैं. अब जब एक ओर किसान संसद में इन कानूनों के रद्द होने का इंतज़ार कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर किसान संगठनों ने एमएसपी के लिए लीगल गारंटी देने की मांग भी उठा दी है.

लेकिन, इस विरोध प्रदर्शन के एक साल पूरा होने के बाद इतना स्पष्ट हो गया है कि अगर किसान संगठनों ने अपना विरोध प्रदर्शन आगे जारी रखने का मन बना लिया तो कोई इस बात पर शक नहीं करेगा कि वे अगले एक साल या उससे भी ज़्यादा समय तक अपना विरोध प्रदर्शन जारी रख पाएंगे.

ये भी पढ़ें -

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)