कृषि क़ानून पर केंद्र सरकार को ही मानना पड़ेगा, किसान नहीं मानेंगे: सत्यपाल मलिक

अमित शाह के साथ स्तयपाल मलिक

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

नए कृषि क़ानूनों पर देश के किसान पिछले साल से आंदोलन चला रहे हैं. इस साल जनवरी के बाद से किसान नेताओं और केंद्र सरकार के बीच आंदोलन ख़त्म करने को लेकर बातचीत भी नहीं हुई है.

मामला कोर्ट भी पहुँचा, कमेटी भी बनी, कमेटी ने रिपोर्ट भी सौंपी है, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात.

किसान सड़कों पर हैं और केंद्र सरकार का कहना है कि वो किसान से बातचीत के लिए तैयार हैं.

ऐसे में एक बयान मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक की तरफ़ से आया है.

किसान आंदोलन

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किसान आंदोलन का हल

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "केंद्र सरकार को एमएसपी पर क़ानून बना देना चाहिए. उसमें सरकार का कोई नुक़सान भी नहीं है. प्रधानमंत्री का रुख़ पूरे मसले पर सकारात्मक ही रहा है. उन्होंने संसद में भी कहा है एमएसपी था, है और रहेगा. बिना एमएसपी पर क़ानून के ये आंदोलन ख़त्म नहीं होगा."

ये पहला मौक़ा नहीं है, जब राज्यपाल रहते सत्यपाल मलिक ने ऐसा बयान दिया हो. इसी साल मार्च के महीने में भी उन्होंने किसानों के हक़ की बात की थी और छह महीने बाद दोबारा किसानों के लिए एमएसपी क़ानून की बात की.

मार्च से लेकर कर अब तक नए कृषि क़ानून पर ना तो किसान टस से मस हुए और ना ही केंद्र सरकार, ऐसे में आंदोलन कैसे ख़त्म होगा?

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बीबीसी के इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "मेरे हिसाब से केंद्र सरकार मान जाएगी. एक समझदारी विकसित करनी होगी. केंद्र सरकार को ही इसमें मानना होगा. क्योंकि किसान तो बर्बाद हो जाएगा, अगर ये (एमएसपी) नहीं होगा."

जाट परिवार से आने वाले सत्यपाल मलिक का ताल्लुक़ उत्तर प्रदेश और हरियाणा दोनों से है.

अगले साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होना है. बीजेपी के भीतर कई नेता दबी ज़ुबान से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट बेल्ट में किसान आंदोलन की वजह से नुक़सान की बात कह रहे हैं.

लेकिन संवैधानिक पद पर बैठे हुए सत्यपाल मलिक ने किसानों के पक्ष में खुल कर बात रखी. हालाँकि इस आंदोलन से बीजेपी को उत्तर प्रदेश में कितना नुक़सान होगा, इस सवाल का जवाब उन्होंने नहीं दिया.

योगी आदित्यनाथ के साथ बेबी रानी मौर्य

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उत्तर प्रदेश चुनाव में हिंदू-मुसलमान

उन्होंने इतना ज़रूर कहा, "उत्तर प्रदेश के चुनाव में लोगों को लगता है 'हिंदू-मुसलमान' हो जाएगा और किसान आंदोलन 'मुद्दा' नहीं रहेगा. चुनाव को एक तरफ़ छोड़ दें, जब तक ये मुद्दा रहेगा, किसानों का आंदोलन रहेगा, तब तक देश में राजनीति अस्थिर और असहज रहेगी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कहीं भी बीजेपी का मंत्री, सांसद, विधायक किसी गाँव में नहीं जा सकता. मैं सब जगह जाता हूँ. मैं इनके काम आ सकता हूँ, अगर ये (केंद्र) इस बात को समझते हों."

जब उनसे पूछा कि इतनी बेबाकी से केंद्र सरकार को असहज करने वाला बयान कैसे दे देते हैं, क्या उन्हें कुर्सी से प्यार नहीं है? इस पर उनका जवाब था, "केंद्र सरकार को अलग ये लगेगा कि मेरे बोलने से कोई नुक़सान होगा, हल्का सा भी इशारा होगा तो मैं पद छोड़ दूँगा. ये बात किसान के हक़ की है, मैं उनके बीच में पैदा हुआ हूँ, मैं कभी भी अपने 'क्लास इंटरेस्ट' (जहाँ से आता हूँ) से समझौता नहीं करता हूँ, मैं पद एक मिनट में छोड़ दूँगा."

किसानों के मुद्दे पर मेघालय के राज्यपाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से, गृह मंत्री अमित शाह से मुलाक़ात भी की है. उनको लगता है कि कृषि मंत्री इस मामले में कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं.

बीबीसी को दिए साक्षात्कार में उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उन्होंने जमकर तारीफ़ की. क़ानून व्यवस्था पर उनके द्वारा किए गए काम को उन्होंने सराहा भी.

जब बीबीसी ने उनसे पूछा कि अगले चुनाव में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी चुनाव मैदान में उतरेगी तो क्या 2017 का प्रदर्शन दोहरा पाएगी? इस पर जवाब देते हुए वो थोड़ा रुके और फिर बोले, "अभी तो सुन रहे हैं कोई और उम्मीदवार मैदान में आ गया है. वो बेबी रानी मौर्य जी जो जाटव हुईं. अभी कुछ पता नहीं क्या होगा. मैं उस पर ज़्यादा कुछ नहीं बोलूँगा."

बीजेपी ने आने वाले चुनाव को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश के दलित मतदाताओं को अपनी ओर खींचने के लिए बेबी रानी मौर्य को मैदान में उतारा है. इससे पहले वो उत्तराखंड की गवर्नर रह चुकीं है.

उत्तर प्रदेश में दलित मतदाताओं की संख्या लगभग 19 फ़ीसदी है, जिनमें से जाटव समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 50 फ़ीसदी है. अब बीजेपी उनके 'जाटव' पहचान को उभार कर उस वोट बैंक में सेंधमारी करना चाहती है.

सत्यपाल मलिक ने इशारों इशारों में उन्होंने योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पर सवाल खड़े ज़रूर किए, लेकिन ये भी जोड़ा कि जनता का सपोर्ट योगी आदित्यनाथ के साथ है.

जम्मू-कश्मीर मुठभेड़

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'जम्मू-कश्मीर मुठभेड़- पाकिस्तान प्रायोजित'

किसान आंदोलन और उत्तर प्रदेश चुनाव के अलावा उन्होंने जम्मू कश्मीर पर भी अपनी बात रखी.

जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती राजौरी और पूँछ ज़िलों के बीच घने जंगलों में 11 अक्तूबर से भारतीय सेना और चरमपंथियों के बीच मुठभेड़ जारी है.

इस मुठभेड़ को उन्होंने 'पाकिस्तान प्रायोजित' करार दिया और कहा कि मुठभेड़ में शामिल चरमपंथी 'प्रोफ़ेशनल' लोग हैं.

उन्होंने बताया कि जिस इलाके में मुठभेड़ चल रही है, वहाँ घने जंगल हैं और पहाड़ी इलाक़ा है. आजकल वहाँ धुंध भी ज़्यादा होती है. आर्मी ऐसा भी नहीं कर सकती कि अपने लोगों को ही मरवा दे. बड़ी सावधानी से ऑपरेशन को अंजाम देना होगा. जल्द ही मुठभेड़ ख़त्म हो जाएगी. जल्द ही अच्छी ख़बर मिलेगी.

अपने कार्यकाल के दौरान 'शांत रहे कश्मीर' पर बोलते हुए उन्होंने कहा, "370 हटाने में भी एक गोली नहीं चलानी पड़ी."

मनोज सिन्हा के उपराज्यपाल बनते ही जम्मू-कश्मीर क्या बदल गया? वो मनोज सिन्हा को क्या नसीहत देना चाहेंगे? इस पर उन्होंने कहा, मनोज सिन्हा सक्षम है. बस एक ही सलाह है कि वो 'आउटरीच' बढ़ाएँ. लोगों से संपर्क साधे. अफ़सर लोगों से मिलें, जनता के बीच जाएँ. मेरे समय में तो पत्थरबाज़ी तक बंद हो गई थी.

जम्मू कश्मीर को जब तक राज्य का दर्ज़ा प्राप्त था, तब वो वहाँ के राज्यपाल थे. उनके रहते ही जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया था.

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