कृषि क़ानून की वापसी पर लखीमपुर खीरी के किसानों ने क्या कहा - ग्राउंड रिपोर्ट

- Author, अनंत झणाणे
- पदनाम, लखीमपुर खीरी से, बीबीसी हिंदी के लिए
लखीमपुर की अनाज मंडी में बड़े-बड़े धान के ढेर लगे हुए हैं. धान के फसल कट चुकी है और अब किसान अपनी फसल बेचने के लिए मंडियों का रुख़ कर रहे हैं.
शुक्रवार को प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी के कृषि क़ानून वापस लेने वाले ऐलान के बाद हम लखीमपुर की मंडी समिति पहुंचे और यह जानने की कोशिश की कि क्या देश विदेश में सुर्ख़ियों में छाया हुआ यह मुद्दा वाक़ई में उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए एहमियत रखता है या नहीं.
किसानों को ढूंढते हुए हम मंडी के उस हिस्से में पहुँचते जहाँ पर धान की बोली लग रही थी. यहाँ पर मौजूद सभी किसान प्राइवेट मिल वालों को अपना धान बेच रहे थे.
धान की एमएसपी 1940 रुपये प्रति क्विंटल तय हुई है. लेकिन यहाँ बोली 1300 रुपये प्रति क्विंटल से शुरू हो रही थी.
नहीं जानते हैं कृषि क़ानून के बारे में, बस धान बिक जाए
हमारे सामने बालक राम नाम के किसान की फसल की बोली लगी और उसका दाम 1400 रुपये प्रति क्विंटल तय हुआ, जो सरकारी दाम से 540 रुपये कम था. यानी कि नुकसान का सौदा.
यह नुकसान का सौदा करने के लिए बालक राम को 88 किलोमीटर दूर पड़ोस के बहराइच ज़िले से आना पड़ा.
उनके मुताबिक़, "हम बहराइच में नहीं बेच पा रहे हैं इसलिए लखीमपुर लेकर आए हैं."

45 बीघा खेती वाले बालक राम से कृषि क़ानूनों के बारे में पूछे जाने पर वह कहते हैं कि उन्हें कृषि कानूनों के बारे में और उससे जुड़े किसान आंदोलन के बारे में जानकारी नहीं है.
बालक राम कहते हैं, "हमें कृषि क़ानून के बारे में जानकारी नहीं है. हम बस खेती करते हैं, उसके अलावा कुछ नहीं जानते हैं. पिताजी स्टेट फार्म में नौकरी करते थे, उसी से रिटायरमेंट हुआ है, घर आए हैं और ज़मीन खरीदी. आज सिर्फ 35 क्विंटल धान बेंचे हैं."
बालक राम के मुताबिक़, यह सौदा भले ही मजबूरी और नुकसान का हो लेकिन अगर नकद पैसे मिलकर धन बिक रहा है तो बेचना ही सही है.
बालक राम कहते हैं, "हमें जो रेट मिल रहा है उससे हम संतुष्ट हैं. हमें दस के जगह आठ मिल जाए लेकिन हम संतुष्ट हैं. यह नहीं कि हमें 10 रुपया मिले लेकिन 10 महीने बाद मिले. कम से कम खेती आगे चलती रहेगी."
लेकिन लखीमपुर की मंडी में हमे कई सारे ऐसे किसान मिले जो कृषि कानूनों को वापस लेने वाले फैसले के बारे में जानते हैं.

प्रमोद कुमार वर्मा लखीमपुर के बड़े किसान हैं और वह भी अपनी धान की फसल बेचने के लिए मंडी में आये हैं.
लखीमपुर में हुई हिंसा की घटना और उसमे मारे जाने वाले लोगों की घटना पर वह कहते हैं, "कानून वापस लेने का फ़ैसला सही है. किसानों की माँगें जायज़ थीं. लखीमपुर में हुई घटना का दबाव भी रहा. आगामी चुनाव हैं, उसका दबाव है तभी इन्होंने कानून वापस ले लिए है. यह तो इनकी मजबूरी थी, अगर वापस नहीं लेते तो यह लोग जाते."
"हम बड़े किसान हैं लेकिन हमें अपना धान बेचने में बहुत ज़्यादा मुश्किल हो रही है. एक दाना नहीं बिक पा रहा रहा है, ना गेहूं का ना धान. हम तो सरकारी कांटे पर ले जाते हैं. लेकिन वहाँ जब कोई ख़रीद ही नहीं रहा है तो किसको दे दें. प्राइवेट में मजबूरी है, चाहे 1000 में बिके या 1100 में बिके. कुछ जगह तो 600-600 रुपये में धान बिक रहा है."
लखीमपुर के आठों विधायक भाजपा के हैं.
प्रमोद वर्मा कहते हैं कि यह देर आये दुरुस्त आये वाली स्थिति नहीं है. देर वाकई में हो गयी है और वह कहते हैं, "इसका सरकार पर बिलकुल राजनीतिक असर पड़ेगा. क़ानून कहता है कि 14 दिन में पेमेंट होना चाहिए. फ़ैक्ट्री बंद पड़े हैं. क्या वे 14 दिन में पेमेंट करवाने वाला क़ानून फ़ॉलो कर पाए आज तक? बस मजबूरी है."
सिखों के अलावा दूसरे किसानों का क्या है कहना?

लखीमपुर की मंडी में अपना धान बेचने के लिए बहराइच के बड़े काश्तकार संजय सिंह भी आए हुए थे. वह 80 किलोमीटर दूर मेहपुरवा से 150 क्विंटल धान लेकर प्राइवेट मंडी में बेचने आये हैं.
संजय सिंह का कहना है कि उनका मंडी में रजिस्ट्रेशन है लेकिन मेहपुरवा में तो हमारे यहाँ काँटा ही नहीं चालू हो पाता है.
कृषि कानून वापसी के बारे में संजय सिंह की राय है कि क़ानून आज से साल भर पहले ही वापस हो जाना चाहिए था.
वह कहते हैं, "यह आज से साल भर पहले होना चाहिए था. उन्होंने पिछले दरवाजे से क़ानून लाकर किसानों पर थोप दिए, यह जायज़ नहीं है. सीधी बात है हम हों या आप, कोई भी हो, या जितने नेता वहाँ पर बैठकर यह क़ानून लाए हों, वो दस दिन खेतों के काम करके देख लें, आटे दाल का भाव पता चल जाएगा."
लेकिन सवाल उठता है की अगर किसानों की सरकार के प्रति नाराज़गी है तो फिर आम किसान उस नाराज़गी को खुले आम और बड़े पैमाने पर ज़ाहिर क्यों नहीं कर रहे हैं?
संजय सिंह कहते हैं कि यह सारा खेल सरकार के नेरेटिव का है.
सस्ते में धान बेचने पर किसान मजबूर

अक्टूबर में बे-मौसम बारिश और बाढ़ ने कई किसानों की फसलों को तबाह कर दिया है. लखीमपुर के तिकुनिया में भी बारिश फसल की बर्बादी हुई है.
जसविंदर के पास खुद की पांच एकड़ ज़मीन है और ठेके पर उन्होंने अलग से चार एकड़ ज़मीन पर भी खेती की. तिकुनिया के सरकारी कांटे पर ख़राब गुणवत्ता के कारण जसविंदर सिंह की फसल नहीं बिक पायी तो उन्हें सत्तर किलोमीटर दूर लखीमपुर शहर की ओपन निजी मंडी में अपने फसल बेचने आना पड़ा.
लागत के हिसाब से उन्हें हर क्विंटल पर 700 रुपये का नुकसान होगा. यानी 100 क्विंटल पर सत्तर हज़ार रुपये का नुक़सान.
जसविंदर सिंह के पास इस नुकसान झेलने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है और वह कहते हैं कि वे हमारा धान ख़राब होने के कारण नहीं ले रहे हैं. सरकारी ख़रीद हो रही है, लेकिन अच्छे धान की सरकारी खरीद हो रही है.
धान की ख़राब फसल के बावजूद जसविंदर सिंह को इस बात की ख़ुशी है कि कृषि कानून वापस ले लिए गए हैं.
उनका कहना है कि यह एक अच्छा कदम है. अब उम्मीद है की आगे एमएसपी क़ानून बनेगी तो फिर उसमें हमको भी फायदा होगा. पंजाब में एमएसपी है तो वहां की किसानों को दाम तो पूरे मिलते हैं.
क्या हो रही है सरकारी केंद्रों पर कम ख़रीद ?

लखीमपुर मंडी के निजी हिस्से से और उसके खरीद फरोख्त के मुद्दों के बाद जब मंडी के सरकारी धान खरीद के हिस्से में पहुंचे तो वहां किसानों की तादाद निजी मंडी की तुलना में काफी कम थी.
दरसअल किसी भी किसान को सरकारी कांटे पर अपना धान बेचने के लिए रजिस्ट्रेशन करवाना पड़ता है और फिर अगर उसकी फसल अच्छी गुणवत्ता वाली पायी जाती है तभी सरकार धान खरीदती है.
कृष्ण कुमार पाठक लखीमपुर मंडी समिति के मार्केटिंग इंस्पेक्टर हैं. उनके मुताबिक़, लखीमपुर की मंडी को इस साल 40000 क्विंटल के धान खरीद का लक्ष्य मिला है. ज़िले में कुल तीन खरीद केंद्र हैं और तीनों को मिला कर यह टारगेट 70000 क्विंटल का है.
योगी सरकार ने ऐलान किया है कि 100 क्विंटल से कम उत्पादन वाले किसानों को सत्यापन यानी अपना वेरीफिकेशन नहीं करवाना पड़ेगा.

सत्यापन की प्रक्रिया समझाते हुए कृष्ण कुमार पाठक कहते हैं,"सरकार ने छूट दी है कि 100 क्विंटल से अधिक धान सत्यापन के बाद ही खरीदा जायेगा. मतलब छोटे किसान आसानी से अपना माल सरकारी कांटे पर बेच सकेंगे. लेकिन अभी सत्यापन का आदेश काग़ज़ पर नहीं आया है. सत्यापन में यह देखा जाता है की किसी किसान ने अपने रकबे के हिसाब से कितना धान बोया है. क्योंकि लखीमपुर में फसल गन्ने की भी है और धान की भी, तो जब किसान अपना सरकारी पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन भी करता है तो उसका सत्यापन एसडीएम और लेखपाल करते हैं."
लेकिन इसके बावजूद कृष्ण कुमार पाठक कहते हैं कि काफी किसान आ रहे हैं और जो प्रक्रिया का पालन करने वाले किसान है वो अपना सत्यापन करा रहे हैं. यह अच्छी पॉलिसी है, और इसमें बिचौलिया वर्ग पर लगाम लगी है. अगर फसल मानक में है तो किसान डायरेक्ट आ रहा है.
(साथ में लखीमपुर खीरी से प्रशांत पांडेय)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)


















