बीजेपी का पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए क्या है 'गेमप्लान'?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
2017 के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सोमवार को एक बार फिर कैराना पहुँचे.
पिछले पाँच साल में कैराना के उनके दो दौरे बेहद चर्चा में रहे हैं.
पहला दौरा 2017 का था, जब मुख्यमंत्री बनने के बाद वो वहाँ गए थे.
और इस बार दोबारा मुख्यमंत्री बनने की हसरत लिए वहाँ पहुँचे हैं.
इससे पहले कैराना का ज़िक्र कभी भारत के शास्त्रीय संगीत के केंद्र बिंदु के तौर पर हुआ करता था, तो कभी व्यापारिक केंद्र के तौर पर.
ऐसा ख़ुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का मानना है.
लेकिन 2017 के चुनाव में यहाँ से हिंदुओं के कथित पलायन का मुद्दा, प्रदेश स्तर पर चुनावी मुद्दा बना.
2022 के विधानसभा चुनाव से पहले उसी 'पलायन' के मुद्दे का 'जिन्न' दोबारा से बोतल से बाहर निकला.

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कैराना की याद
वहाँ एक सभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, "मुज़फ़्फ़रनगर का दंगा हो या कैराना का पलायन, यह हमारे लिए राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि प्रदेश और देश की आन, बान और शान पर आने वाली आंच का मुद्दा रहा है."
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"जब हम सत्ता में नहीं थे, तब भी कहते थे कि इस तरह की कायराना हरकत को हम स्वीकार नहीं करेंगे. और सत्ता में आए तो अपराध और अपराधियों के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस की नीति के तहत कार्य प्रारंभ हुआ. कभी कैराना कस्बे में व्यापारी और कारोबारी को पलायन करने को मजबूर करने वाले को अपराधी विगत चार वर्षों में ख़ुद पलायन करने को मजबूर हो गए."
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शामली ज़िले में पड़ने वाला कैराना , पश्चिमी उत्तर प्रदेश का इलाक़ा है.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश इन दिनों किसान आंदोलन की वजह से भी सुर्ख़ियो में है. जिस वजह से कुछ जानकार मान रहे हैं कि बीजेपी को आने वाले चुनाव में किसानों की वजह से सीटों का नुक़सान हो सकता है.
लेकिन रविवार को हुई बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जिस तरह से नए कृषि क़ानून को लेकर मोदी सरकार ने ख़ुद की पीठ थपथपाई है, उसे देख कर लग रहा है कि बीजेपी आश्वस्त है कि किसान आंदोलन की वजह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उन्हें चुनाव में नुक़सान नहीं हो रहा है.
सोमवार को जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कैराना पहुँचे और 'पलायन' की बात दोहराई, उससे तस्वीर और साफ़ हो गई.
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पलायन का मुद्दा
जानकार दोनों बातों को जोड़ कर देख रहे हैं.
यानी किसान अगर नए कृषि क़ानून का मुद्दा लेकर आगे आएँगे, तो बीजेपी के पास पलायन, हिंदू-मुसलमान जैसे मुद्दे हैं.
वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरॉन कहती हैं, "चुनाव से पहले पिछले सारे ऐसे मुद्दे याद आना स्वाभाविक है. चुनाव के दौरान दो तरह की बातें होती हैं. जनता भी राजनीतिक पार्टियों को एप्रोच करती है, क्योंकि चुनाव से पहले पार्टियाँ उनकी बात सुनती भी है और मानती भी हैं. राजनीतिक पार्टियाँ भी मुद्दों को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करती हैं."
उत्तर प्रदेश प्रशासन का दावा है कि कैराना से पूर्व में पलायन करने वाले कुछ परिवार वापस आ रहे हैं. ऐसे कुछ परिवारों से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार को मुलाक़ात की, जिसका वीडियो भी उन्होंने सोशल मीडिया पर शेयर किया.
सबसे पहले कैराना से हिंदुओं के पलायन का मुद्दा बीजेपी सांसद हुकुम सिंह ने उठाया था. तब उन्होंने 300 से ज़्यादा परिवारों के पलायन की लिस्ट भी जारी की थी.
बाद में जब मामले ने तूल पकड़ा, तो हुकुम सिंह अपनी ही बात से पलट गए थे. उन्होंने खु़द उसे 'हिंदुओं का पलायन नहीं' बल्कि 'अपराध के डर से' लोगों का पलायन बताया. पलायन करने वाले लोगों की संख्या को लेकर भी काफ़ी सवाल जवाब हुए.
'पलायन मुद्दे' का फ़ायदा बीजेपी को उसके बाद के दोनों चुनाव में हुआ. इस बात की गवाही आँकड़े देते हैं.
सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज (CSDS) के आँकड़ों के मुताबिक़, 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को उत्तर प्रदेश में 41 फ़ीसदी वोट मिले थे, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में औसत से ज़्यादा 43-44 फ़ीसदी वोट मिले. 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी को 50 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट मिले थे, पश्चिम उत्तर प्रदेश के इलाक़े में बीजेपी को 52 फ़ीसदी वोट मिले थे.

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लेकिन इस बार बीजेपी 'किसानों की नाराज़गी' को 'पलायन' और 'हिंदू-मुसलमान' जैसे मुद्दों से कितना साध पाएगी, इस पर सुनीता एरॉन कुछ वक़्त और इंतज़ार करने की बात कहती हैं.
इस सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, "पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वोटरों की थाह लेना इस वक़्त बहुत मुश्किल है. चाहे पलायन की बात हो या फिर 2013 के मुज़फ़्फ़नगर के दंगे जिसकी वजह से हिंदू-मुसलमान में एक दरार आई, वो ज़ख़्म अब भी हरे हैं. किसान आंदोलन की वजह से वो थोड़ी धुंधली ज़रूर नज़र आ रही है. लेकिन चुनाव में किस तरह से वोटिंग होगी. ये कहना मुश्किल है."
" मुस्लिम उम्मीदवारों को कितना सपोर्ट मिलेगा, हिंदुओं का उनके प्रति क्या रुख़ रहेगा- कुछ बातें इस पर निर्भर करेंगी."
"इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 70 फ़ीसद़ी जनता किसानी करती है. और उनकी भी जाति होती है. अब ये किसान, किसान के तौर पर वोट करेंगे या फिर हिंदू-मुसलमान के तौर पर, या फिर जाति के आधार पर, किसी पार्टी की जीत और हार इस पर भी तय होगी."
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पश्चिमी उत्तर प्रदेश एक प्रयोगशाला है, सभी राजनीतिक पार्टियाँ वहाँ नए-नए प्रयोग करती हैं. ऐसा कांशीराम कहा करते थे.
बीजेपी का इस बार का प्रयोग कितना सफल होता है, ये चुनाव बाद ही पता चलेगा.

हिंदू-मुसलमान में 'एकता' या 'मतभेद'
लेकिन ऐसा भी नहीं कि बीजेपी के इस 'गेमप्लान' का अंदाज़ा विपक्षी नेताओं को नहीं है.
29 जनवरी 2021 को मुज़फ़्फ़रनगर के जीआईसी मैदान में आठ साल बाद एक बहुत बड़ी महापंचायत का आयोजन हुआ था.
उस आयोजन में एक तस्वीर, जिसने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा था, वो थी मंच पर महेंद्र सिंह टिकैत के क़रीबी रहे ग़ुलाम मोहम्मद जौला की मौजूदगी.
ये वहीं ग़ुलाम मोहम्मद जौला थे, जो मुज़फ़्फ़रनगर के दंगों के बाद इतने आहत हुए थे कि उन्होंने ख़ुद को भारतीय किसान यूनियन से अलग कर लिया और एक नया संगठन - भारतीय किसान मज़दूर मंच बना डाला.
उन दंगों के आठ साल बाद, उस इलाक़े में दोबारा से लौटती 'जाट-मुस्लिम एकता' की ये एक नई तस्वीर थी.
उस दिन मंच पर भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत मौजूद थे.
किसान नेता चौधरी अजित सिंह के पुत्र जयंत चौधरी ने मंच पर आते ही ग़ुलाम मोहम्मद जौला के पैर छूए और नरेश टिकैत ग़ुलाम मोहम्मद जौला के गले लगे.
महापंचायत को संबोधित करते हुए जौला ने वहाँ मौजूद किसान और जाट नेताओं से कहा, "जाटों ने दो ग़लतियाँ कर डालीं. एक चौधरी अजित सिंह को हराया और दूसरा मुसलमानों पर हमला किया."
ग़ुलाम मोहम्मद जौला के इस बयान के बावजूद पूरी महापंचायत में सन्नाटा छाया रहा. किसी ने उनकी इस बात का कोई विरोध नहीं किया.
कुछ जानकार किसान नेताओं की इस कोशिश को चुनाव से पहले 'हिंदू-मुसलमान' नहीं होने देने की एक कोशिश के तौर पर देखते हैं.

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किसान आंदोलन की काट
लेकिन वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह को इस तस्वीर में बहुत दम नहीं दिखता. वो कहते हैं जोला, किसानों के मंच पर ज़रूर दिखे, लेकिन किसानों ने उस बात को बहुत पसंद नहीं किया.
वो इसके पीछे तर्क भी देते हैं.
बीबीसी से बातचीत में प्रदीप सिंह कहते हैं, "किसान आंदोलन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कोई मुद्दा नहीं है. हाँ, इसकी वजह से राष्ट्रीय लोक दल के नेता जयंत चौधरी को कुछ वोट ज़रूर मिल जाएँगे. लेकिन उससे ज़्यादा बीजेपी को फ़ायदा होगा."
किसान आंदोलन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में क्यों मुद्दा नहीं है और बीजेपी को इससे कैसे फ़ायदा होगा - इस बात को वो आगे विस्तार से समझाते हैं.
उनके विश्लेषण के मुताबिक़, "किसान आंदोलन एमएसपी के लिए कर रहे हैं, जो गेहूँ और धान की खेती करने वालों के लिए अहम मुद्दा है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश देश का गन्ना बेल्ट कहा जाता है. वहाँ के किसान गन्ने की सही क़ीमत नहीं मिलने की वजह से ख़फा है. उन्हें एमएसपी से कोई मतलब नहीं है."
"जयंत चौधरी को जाटों का वोट ज़रूर मिलेगा ताकि उनके परिवार का राजनीतिक भविष्य ख़त्म न हो जाए. लेकिन जाटों के अलावा पाल, सैनी, गुर्जर जैसे अति पिछड़ी जातियाँ बीजेपी के खेमे में आ जाएँगी. ऐसा इसलिए है क्योंकि ये लोग छोटी जोत वाले किसान है. जबकि 'जाट किसान' बड़ी जोत वाले किसान होता है. किसान आंदोलन में 'छोटी जोत' वाले किसान 'बड़ी जोत' वाले जाट किसानों से नाराज़ हैं."

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण
प्रदीप सिंह आगे कहते हैं, " पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मायावती की बहुजन समाज पार्टी नंबर दो पर होती तो समीकरण कुछ और होते. इस इलाक़े में मुसलमान वोट एक बड़ा फ़ैक्टर है. अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी का वोट बैंक यादव- मुसलमान वोट है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यादव के मुक़ाबले दलित ज़्यादा है. 2013 के दंगे के बाद 'जाट-मुस्लिम' एकता की बात अब बेमानी है. 2017 और 2019 में उनके बीच की दूरी साफ़ दिखी."
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमान 32 फ़ीसदी और दलित तकरीबन 18 फ़ीसदी हैं. यहाँ जाट 12 फ़ीसदी और ओबीसी 30 फ़ीसदी हैं.
यहाँ एक बात जो याद रखने वाली है कि जयंत चौधरी और समाजवादी पार्टी के चुनाव पूर्व गठबंधन की चर्चा भी है. अगर इस गठबंध की घोषणा हो जाती है, तो पश्चिम उत्तर प्रदेश में समीकरण बदल सकते हैं.
कैराना जाकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जो कहा, उसे इस विश्लेषण को जोड़ कर देखें तो जवाब मिल जाता है कि क्यों उन्होंने दोबारा से हिंदुओं के उस डर को उभारने की कोशिश की.
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