राकेश टिकैत के बढ़ते समर्थन ने क्या योगी सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
"जो लोग भी पिछले दो दिन में अपने गाँव वापस गए हैं और अपनी ट्रैक्टर को वहाँ खड़ा किया है, गाँव की महिलाओं ने उनके सामने चूड़ियाँ फेंक दी हैं. घर के मर्दों को कह रहीं हैं, चूड़ियाँ पहन लो, यहाँ बैठे हो, तुम्हारा नेता वहाँ बैठा है, तुम्हें वहाँ उनके पास होना चाहिए था."
28-29 जनवरी की दरमियानी रात को तकरीबन 1.30 बजे, गाज़ीपुर बॉर्डर पर भारतीय किसान यूनियन से जुड़े एक किसान ने अपने नेता राकेश टिकैत के समर्थन में ये बात कही. गुरुवार सुबह ही किसी ज़रूरी काम की वजह से वो अपने गाँव पहुँचा था. लेकिन मोबाइल पर राकेश टिकैत का वायरल वीडियो देख दोबारा से ग़ाज़ीपुर धरने पर लौट आया.
28 जनवरी की सुबह लग रहा था मानो धीरे-धीरे ग़ाज़ीपुर पर घरना स्थल ख़ाली होने वाला है. लेकिन राकेश टिकैत की एक भावुक वीडियो अपील ने मानो पूरी बाज़ी पलट दी हो. देर रात तक ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर दोबारा से किसानों का आना एक बार फिर शुरू हो गया और 29 तारीख़ सुबह से दोबारा 26 जनवरी वाली भीड़ देखने को मिली.
इसे भी पढ़ें:राकेश टिकैत: जिनके आंसुओं ने किसान आंदोलन में चिंगारी का काम किया ऐसा लग रहा है मानों दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर चल रहा किसान आंदोलन का केंद्र अब धीरे-धीरे सिंघु बॉर्डर और टिकरी बॉर्डर से शिफ़्ट होकर ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर केंद्रित हो गया हो.
मुज़फ़्फ़रनगर में आज हुई पंचायत की तस्वीरें भी राकेश टिकैत और किसान आंदोलन के बढ़ते समर्थन की ओर इशारा करती हैं.
रही सही कसर उत्तर प्रदेश में सक्रिय राजनीतिक पार्टियों ने पूरी कर दी.

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राजनीतिक पार्टियों का किसान आंदोलन को मिलता समर्थन
राष्ट्रीय लोकदल के नेता जयंत चौधरी 29 तारीख़ को सुबह ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पहुँचे. वहाँ पहुँच कर उन्होंने कहा, "मैं एक नागरिक के रूप में यहाँ पहुँचा हूँ. जिस वर्ग के लिए चौधरी चरण सिंह ने अपने जीवन में संघर्ष किया, आज वो वर्ग संकट में है. हमारी पार्टी किसानों की पार्टी रही है."
ग़ौर करने वाली बात है कि 26 जनवरी के पहले यही किसान नेता कांग्रेस के बड़े नेता को आंदोलन में शामिल नहीं होने दे रहे थे.
बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने संसद के बजट सत्र में राष्ट्रपति के संबोधन का बहिष्कार का फ़ैसला किया.
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आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने ट्वीट कर बताया कि राकेश टिकैत के अनुरोध पर दिल्ली सरकार की तरफ़ किसानों के लिए पानी और दूसरी ज़रूरी सुविधाओं का इंतजाम करवा दिया गया है.
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याद रहे कि आम आदमी पार्टी ने जिन छह राज्यों में चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया है, उनमें उत्तर प्रदेश भी है.
तो फिर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव कैसे पीछे रहते. उन्होंने भी राकेश टिकैत से फ़ोन पर बातचीत की और किसानों के साथ खड़े हैं.
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प्रियंका गांधी ने गुरुवार को ही किसानों के समर्थन में देर रात दो ट्वीट किए और बीजेपी पर निशाना साधा.
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उत्तर प्रदेश की राजनीतिक पार्टियों की किसान आंदोलन के मद्देनज़र सक्रियता का एक कारण 2022 की शुरुआत में होने वाला विधानसभा चुनाव भी बताया जा रहा है. राकेश टिकैत जाट किसान नेता माने जाते हैं. ख़ास तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऐसे जाट किसानों की संख्या ज़्यादा है और जीत हार में तय करने में अहम भूमिका भी.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट किसके साथ
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (CSDS) में प्रोफेसर संजय कुमार कहते हैं, "पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 44 विधानसभा सीटें हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को उत्तर प्रदेश में 41 फ़ीसदी वोट मिला था, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में औसत से ज़्यादा 43-44 फ़ीसदी वोट बीजेपी को मिला. 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी को 50 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट मिला था, पश्चिम उत्तर प्रदेश के इलाक़े में बीजेपी को 52 फ़ीसदी वोट मिला था. यही हाल 2014 के लोकसभा चुनाव में था. पूरे उत्तर प्रदेश में जहाँ बीजेपी को 42 फ़ीसदी वोट था, वही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 50 फ़ीसदी था.
मतलब साफ़ है कि उत्तर प्रदेश के दूसरे इलाक़े की तुलना में बीजेपी को पश्चिम उत्तर प्रदेश में ज़्यादा वोट मिलते रहे हैं.

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बीजेपी को कितना फ़ायदा, कितना नुक़सान
पश्चिमी उत्तर प्रदेश को 'जाट बेल्ट' कहा जाता है. इन जगहों 'जाट बाहुल्य' इलाका है, जहाँ जाट किस तरह वोट करते हैं, वो बहुत मायने रखता है.
राकेश टिकैट बड़े जाट किसान नेता माने जाते हैं. दो बार वो चुनाव भी लड़ चुके हैं. एक बार विधानसभा और एक बार लोकसभा. और दोनों बार उन्हें हार मिली है.
ruralvoice.in के संपादक हरवीर सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आते हैं. वे लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया, "2013 के मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद बीजेपी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों का बड़ा समर्थन मिला. इस वजह से बीजेपी इस इलाक़े में मज़बूत हुई और उनके सांसद चुन कर आए. अजीत सिंह जैसे नेता चुनाव हार गए और संजीव बालयान भारी वोटों से चुनाव जीते और मंत्री बने. उस वक़्त राकेश टिकैत ने भी अमरोहा से चुनाव लड़ा था और चुनाव हार गए थे. राजनीतिक तौर पर देखें, तो राकेश टिकैत चुनाव कभी नहीं जीते."

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2018 के अक्तूबर में भारतीय किसान यूनियन ने दिल्ली मार्च किया था. उसके बाद इन पर आरोप लगा कि इन्होंने सरकार के साथ समझौता किया, जिसके बाद इनकी साख कम हुई थी.
इस बार, किसान आंदोलन की शुरुआत में राकेश टिकैत की नेतृत्व वाली भारतीय किसान यूनियन संयुक्त मोर्चा का हिस्सा नहीं थी. लेकिन बाद में वे उसका हिस्सा बने. पहले कम किसान इनके साथ आए. फिर धीरे-धीरे इनका कुनबा बड़ा होता गया.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों में धीरे-धीरे ग़़ुस्सा भर रहा था. वहाँ गन्ने की खेती ज़्यादा होती है. गन्ने की सही क़ीमतें नहीं मिल रही थी. बिजली के दाम लगातार बढ़ रहे हैं.
"इस वजह से पिछले कुछ महीनों में राकेश टिकैत का समर्थन बढ़ा और बीजेपी का घटा. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट किसान बीजेपी से बहुत नाराज़ है. आगरा से लेकर बदायूं से लेकर पीलीभीत के इलाक़े वाले भी."

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश और गन्ने की खेती
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान ज़्यादातर गन्ने की खेती करते हैं.
दरअसल जब नए कृषि क़ानून का विरोध शुरू हुआ, तो इसका नेतृत्व पंजाब और हरियाणा के किसानों के हाथ में रहा. केंद्र सरकार भी इसी सोच से इत्तेफ़ाक रखती दिखी.
जब अकाली दल ने एनडीए से अलग होने की बात की, तो बीजेपी को ज़्यादा चिंता नहीं हुई. पंजाब में बीजेपी के पास खोने को ज़्यादा कुछ नहीं है. पंजाब में बीजेपी हमेशा छोटे भाई के रोल में अकाली दल को बड़ा भाई मान कर ही चुनाव मैदान में उतरी. इसलिए एक नेरेटिव ये तैयार हुआ कि गेंहू और चावल की खेती करने वाले किसान ही नए क़ानूनों का विरोध कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के गन्ना किसान शुरुआत में इस बात से नाराज़ भी थे.
धीरे-धीरे ये विरोध देश के दूसरे हिस्सों में पहुँचा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी फैला. फिर पिछले साल दिसंबर में केंद्र सरकार ने दिसंबर में गन्ना किसानों के लिए 3500 करोड़ रुपए के राहत पैकेज का एलान किया.

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लेकिन हरवीर सिंह कहते हैं, "गन्ना के राहत पैकेज के बावजूद गन्ना किसान पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नाराज़ हैं. केंद्र सरकार ने अपना होम वर्क ठीक से नहीं किया है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रोज़ी-रोटी गन्ने के इर्द-गिर्द घुमती है. तीन साल से गन्ने के क़ीमतों में बढ़ोतरी नहीं देखी गई है. इस सीजन में भी अभी तक दामों की घोषणा नहीं हुई है. ये सीज़न अक्तूबर में शुरू हो चुका है. अभी जो किसान अपना गन्ना बेच रहे हैं, उनकी पर्ची पर दाम की जगह शून्य ही लिखा जा रहा है. राज्य सरकार की तरफ़ से दाम के एलान का इंतज़ार हो रहा है. कुछ मिल मालिकों ने पिछले साल के दाम पर ही किसानों को पैसे देना शुरू कर दिया है."
"इसलिए राकेश टिकैत का समर्थन बढ़ा है. गन्ना किसानों ने ख़ुद को कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग वाले बिल से जोड़ कर देखना शुरू किया. उन्हें अहसास हुआ कि इस नए क़ानून में उनको और नुक़सान होगा. रही बात 3500 करोड़ के राहत पैकेज की, तो चीनी के निर्यात को लेकर था, जिसका सीधा फ़ायदा मिल मालिकों को होगा. किसानों के हाथ में कितना आएगा, कब आएगा, इसकी गारंटी नहीं है."
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अभी दूर है
वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरॉन कहती हैं, "उत्तर प्रदेश में किसान बड़ी संख्या में हैं. जाट किसानों की संख्या भी पश्चिम उत्तर प्रदेश में काफ़ी है. 20-22 विधानसभा सीटों पर उनका वोट निर्णायक होता है. ऐसे में विपक्ष बहुत मुमकिन है कि किसानों के इस ग़ुस्से को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करेंगे. लेकिन 2022 का चुनाव अभी बहुत दूर है. इस बीच में सरकार किसानों के हित में कई क़दम उठा सकती है, मुद्दे ख़त्म हो सकते हैं. राकेश टिकैत की भावनात्मक अपील से बहुत थोड़ा धक्का लग सकता है. लेकिन उत्तर प्रदेश के जितने चुनाव मैंने कवर किए है, वो चुनाव साल भर पुराने मुद्दे पर नहीं लड़े गए. उसी वक़्त जो मुद्दा गरम होता है उसी पर लड़ा जाता है.
2022 तक अगर राम मंदिर का निर्माण भी एक मुद्दा हो सकता है. घर घर जाकर, राम मंदिर के नाम पर जो चंदा इक्कठा किया जा रहा है, जाहिर है वो भी एक बड़ी भूमिका निभाएगा, आने वाले विधानसभा चुनाव में. आज की तारीख में ये कहना कि विपक्ष को किसान आंदोलन से फ़ायदा होगा और सत्ता पक्ष को नुक़सान ये ग़लत होगा."
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह कहते हैं कि राकेश टिकैत का बहुत बड़ा समर्थन नहीं है. वो दो चुनाव लड़ चुके हैं और दोनों बार हार का सामना करना पड़ा है. दूसरी बात सरकार किसानों का विरोध तो कर नहीं रही है. भाजपा भी बातचीत से समाधान ढूंढने की बात हमेशा से कह रही है.
वो ये भी कहते हैं कि पूरी लड़ाई इस बात कि है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में जाटों का नेता कौन? अजीत सिंह ये कभी नहीं चाहेंगे कि राकेश टिकैत जाटों के नेता बन जाए. जयंत चौधरी भले ही वहाँ पहुँचे हो, लेकिन वो फ़िलहाल दिखावे की राजनीति है. दिखावे के लिए तो नरेश टिकैत भी पहुँच सकते हैं. गुरुवार को राकेश टिकैत के भाई नरेश टिकैत ने उनके समर्थन में ट्वीट भी किया. लेकिन इससे ये समझने की भूल ना करें कि दोनों भाई साथ हैं.
प्रदीप सिंह राकेश टिकैत की भावनात्मक अपील को गिरफ़्तारी के डर से जोड़ते हैं. वो कहते हैं, "राकेश टिकैत को डर था कि कहीं पुलिस उन्हें गिरफ़्तार ना कर ले. राकेश टिकैत को पहले लग रहा था धरना ख़त्म होने के बाद वो घर जा पाएँगे. फिर पता चला एफ़आईआर हो चुकी है, इसलिए गिरफ़्तार होंगे."
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राकेश टिकैत बनाम नरेश टिकैत
लेकिन हरवीर सिंह प्रदीप सिंह की बात से इत्तेफाक नहीं रखते.
उनके मुताबिक़ राकेश टिकैत और नरेश टिकैट के बीच घर में कोई मतभेद नहीं हैं.
नरेश टिकैत ने गुरुवार दोपहर के आसपास एक छोटी पंचायत करके बयान दिया था कि अगर गाज़ीपुर बॉर्डर पर किसानों के पानी और दूसरी सुविधाएँ नहीं हैं, तो फिर वो वापस आ जाएँ. उसके बाद राकेश टिकैत का भावुक बयान सामने आया कि वे अपने लोगों को यहाँ ऐसी हालात में छोड़ कर नहीं जाएँगे.
हरवीर सिंह कहते हैं कि दोनों बयानों को आपस में जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए. दोनों के बयानों में बहुत समय का अंतर है और परिस्थितियों का भी. दूसरा बयान पुलिस की बढ़ती मौजूदगी के बाद राकेश टिकैत ने दिया था. उसके बाद नरेश टिकैत ने राकेश टिकैत का समर्थन ही किया.
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