गणतंत्र दिवस के ट्रैक्टर परेड में आख़िर कितनी हिंसा हुई?

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
गणतंत्र दिवस पर प्रदर्शनकारी किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान राजधानी के कुछ हिस्सों में हुई हिंसा को लेकर ख़ासी चर्चा है.
दिल्ली के आईटीओ, लाल क़िला और नांगलोई जैसी जगहों पर रिपोर्टरों ने तोड़-फोड़, लाठी चार्ज और आँसू गैस के गोले छोड़े जाने के दृश्य देखे, कहीं किसानों ने तो कहीं पुलिस ने लाठियाँ चलाईं.
किसान आंदोलन से जुड़े ज्यादातर किसान पहले से तय रूट पर ट्रैक्टर मार्च कर रहे थे लेकिन बड़ी संख्या में, ख़ास तौर पर नौजवान बैरिकेड तोड़कर दिल्ली में घुस आए थे और उनके एक समूह ने लाल क़िले के ऊपर धार्मिक झंडा फहराया जिसे लेकर भारी विवाद छिड़ गया.
प्रदर्शनकारी किसानों के सबसे बड़े मंच संयुक्त किसान मोर्चा ने बयान जारी करके इस अराजकता पर अफ़सोस ज़ाहिर किया और कहा कि इस तरह की हरकतों से आंदोलन को नुकसान पहुँचता है और वे इसकी निंदा करते हैं. संयुक्त किसान मोर्चा में तकरीबन 40 किसान संगठन शामिल हैं.
इस पूरे हंगामे में आईटीओ चौराहे के पास एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई, शुरुआत में परिजनों ने कहा था कि उसकी मौत गोली लगने से हुई है, पुलिस का कहना है कि ट्रैक्टर उलटने से युवक के सिर में चोट लगी थी जिससे उसकी मौत हो गई.
लाल किले पर झंडा फहराने, तोड़-फोड़ और भारी अराजकता का अंदाज़ा तो टीवी-वीडियो देखने वालों को हुआ होगा लेकिन सवाल ये है कि जिस हिंसा की बात की जा रही है वो कितनी थी?
पुलिस का पक्ष

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दिल्ली पुलिस के स्पेशल कमिश्नर दीपेन्द्र पाठक ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि अभी तक 26 जनवरी को हुई हिंसक घटनाओं के सिलसिले में 25 से भी ज़्यादा एफ़आईआर दर्ज की गई हैं जिनमे से नौ की जांच का ज़िम्मा 'क्राइम ब्रांच'और स्पेशल सेल को सौंपा गया है. बाक़ी की जांच सम्बंधित थाने करेंगे.
दीपेन्द्र पाठक के नेतृत्व में ही पुलिस अधिकारियों की किसान संगठनों के साथ ट्रैक्टर परेड को लेकर बातचीत चल रही थी. वार्ता के कई दौर के बाद दिल्ली पुलिस ने आख़िरकार किसान संगठनों को ट्रैक्टर परेड निकालने की अनुमति दी मगर उसके लिए अलग रूट तय किए गए.
उन्होंने कहा, "26 जनवरी को जो कुछ दिल्ली की सड़कों पर हुआ वो किसान संगठनों की वादा खिलाफ़ी थी. जब रूट निर्धारित किया जा रहा था तब भी पुलिस की आलोचना की जा रही कि ट्रैक्टर परेड को बाहरी रिंग रोड पर निकालने के अनुमति क्यों नहीं दी गयी? अनुमति नहीं देने के बावजूद किसान राजपथ तक सरकारी कार्यक्रम के दौरान पहुँच ही गए थे."
गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में हुई हिंसा में पुलिस और परेड में शामिल लोगों को भी चोटें आईं. पाठक का कहना है कि हिंसा में कुल 394 पुलिसकर्मियों को चोटें आईं जिनमें से लगभग दर्जन भर पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए हैं.
इन घायल पुलिसकर्मियों को महर्षि वाल्मीकि अस्पताल, बाबू जगजीवन राम अस्पताल, आचार्य भिक्षु अस्पताल और ईएसआई अस्पताल में भर्ती कराया गया था.
किसानों का पक्ष

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वहीं संयुक्त किसान मोर्चा के नेता और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के संगठन सचिव अवीक साहा ने बीबीसी से बात करते हुए दावा किया कि दिल्ली के अलग-अलग स्थानों पर पुलिस के लाठी चार्ज में चार से पाँच सौ किसान घायल हुए हैं.
दिल्ली पुलिस के स्पेशल कमिश्नर दीपेन्द्र पाठक का कहना था कि पुलिस ने हर संभव प्रयास किया कि ट्रैक्टर परेड में शामिल हो रहे किसानों से टकराव की स्थिति पैदा न हो.
वे कहते हैं, "इसीलिए परेड की अनुमति दी गई थी कि टकराव न हो और शांतिपूर्ण तरीके से सब कुछ संपन्न हो जाए. तय हुआ कि राजपथ पर सरकारी कार्यक्रम के ख़त्म होने के बाद, यानी 11.30 बजे तय किए गए रूटों पर किसान अपनी परेड निकालेंगे. किसान संगठनों के 3000 स्वयंसेवक अपने अपने रूटों पर परेड को संभालेंगे. ये भी तय हुआ कि कोई भी किसान नेता किसी भी तरह का भड़काऊ भाषण नहीं देगा. लेकिन सवेरे नौ बजे ही लगभग सभी स्थानों पर किसानों ने बैरिकेड तोड़ने शुरू कर दिए. देखते-देखते दिल्ली की सड़कों पर अराजकता फैल गई."

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संयुक्त किसान मोर्चा ने इस पूरे मामले को साज़िश करार दिया है, उन्होंने कई लोगों के नाम लेकर आरोप लगाए हैं कि उन्होंने जान-बूझकर अराजकता फैलाई इनमें ख़ास तौर पर दीप सिद्धू का नाम लिया जा रहा है और किसान मोर्चा के नेताओं ने उन्हें 'सरकार का एजेंट' करार दिया है. संयुक्त किसान मोर्चा का दावा है कि यह छोटा सा समूह था जबकि बाकी सारे किसान अनुशासित थे और उन्होंने तय रूट पर ही ट्रैक्टर रैली की.
जिस एफ़आईआर में 37 किसान संगठनों के नेताओं को 26 जनवरी की घटना के लिए नामज़द किया गया है, वो दिल्ली के समयपुर बादली थाने में दर्ज की गई है.
इस एफ़आईआर में शिकायतकर्ता अधिकारी सहायक अवर निरीक्षक सुरेन्द्र कुमार ने ये भी कहा है कि हिंसा के दौरान एक पुलिसकर्मी का सरकारी रिवॉल्वर और दो टियर गैस लॉंचर भीड़ में शामिल लोगों ने छीन लिए.
एफ़आईआर में ढेर सारे नाम
दिल्ली पुलिस का कहना है कि ट्रैक्टर परेड में शामिल होने वाले सभी किसान संगठनों के नेताओं को नोटिस भेजे जा रहे हैं. ये सभी संगठन संयुक्त किसान मोर्चा का हिस्सा हैं जिसने ट्रैक्टर परेड निकालने का ऐलान किया था.
पुलिस का कहना है कि वैसे तो मोर्चा में 40 संगठन शामिल हैं लेकिन नोटिस सिर्फ़ 20 नेताओं को भेजा गया है जो काफ़ी सक्रिय थे.
हालांकि 26 जनवरी के घटनाक्रम को लेकर कुल 37 किसान नेताओं के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया गया है. इनमें किसानों के लगभग सभी प्रमुख नेताओं के अलावा नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटेकर भी शामिल हैं.
किसान संगठनों का कहना है कि जो कुछ पुलिस ने किया है या कर रही है वो केंद्र सरकार की आंदोलनों को कुचलने की नीति का एक 'बेहतरीन नमूना' है.
अवीक साहा का कहना था, "किसान नेता सभी मौजूद हैं. कोई भी नेता कहीं भागा या भूमिगत नहीं हुआ है. मेरा भी फ़ोन खुला हुआ है और मैं सबसे बात भी कर रहा हूँ. पुलिस ने 'लुक आउट' नोटिस निकाला है. इसका क्या तुक है जब हम में से कोई भूमिगत नहीं है?"
26 जनवरी के टकराव के बाद संयुक्त किसान मोर्चा ने आंदोलन जारी रखने की घोषणा की है यानी भविष्य में टकराव की आशंका अभी खत्म नहीं हुई है.
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