किसान आंदोलन: टिकैत का ओवैसी पर वार, चुनाव के नाम पर संयुक्त किसान मोर्चा में दरार?

राकेश टिकैत और योगेन्द्र यादव

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इमेज कैप्शन, किसान आंदोलन के एक वर्ष पूरा होने पर चर्चा करते राकेश टिकैत और योगेन्द्र यादव
    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

किसान नेताओं के दो बयान पिछले 24 घंटे में बेहद चर्चित रहे हैं. चर्चा की एक वजह किसान आंदोलन का एक साल पूरा होना है. और दूसरी वजह बयान में कही गई बातें हैं.

इनमें से एक बयान भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत का है, जो गुरुवार को हैदराबाद में थे. वहाँ उन्होंने एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी का नाम लिए बिना उन पर हमला बोला.

उन्होंने कहा, "एक आपके यहाँ का बेलग़ाम नथ वाला सांड, खुला छोड़ दिया है, जो बीजेपी की मदद करता घूम रहा है. उसको यहीं बांध कर रखो, वो देश में सबसे ज़्यादा बीजेपी की मदद करता है. उसको यहाँ से बाहर मत जाने दो. वो बोलता कुछ और है और उसका मक़सद कुछ और है. उसकी जाँच कर लेना. उसको बांध कर यहीं रखो, उसको हैदराबाद और तेलंगाना से बाहर मत जाने दो."

अब तक चुनावी राजनीति से दूरी ही किसान आंदोलन की शक्ति मानी जाती रही है.

हालांकि, बीजेपी के ख़िलाफ़ किसान नेता हर चुनाव में हमलावर रहे हैं, लेकिन अब तक दूसरी पार्टियों के लिए खुल कर विरोध या समर्थन करने की उनकी रणनीति नहीं रही है. ख़ास तौर पर तब जब वो एनडीए गठबंधन का हिस्सा ना हों.

इस वजह से राकेश टिकैत का ये बयान सोशल मीडिया पर काफ़ी वायरल हो रहा है.

गुरनाम सिंह चढूनी

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इमेज कैप्शन, गुरनाम सिंह चढूनी

दूसरा बयान

दूसरा बयान किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी का है. वो हरियाणा भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) के प्रमुख हैं.

अंबाला में समाचार एजेंसी एएनआई को दिए बयान में उन्होंने कहा, "हम 'मिशन पंजाब' चला रहे हैं. जो वोट देते हैं उन्हीं को शासन करना चाहिए, ना कि उनको जिनके पास पैसा है. वोट देने वाले शासन करेंगे तो क़ानून वोटर के पक्ष में बनेंगे. अगर पैसे वाले शासन करेंगे तो क़ानून पैसे वालों के पक्ष में बनेंगे."

उन्होंने आगे कहा, " मैं पंजाब चुनाव लड़ नहीं रहा हूँ. लेकिन ऐसे लोगों को जमा कर रहा हूँ जो चुनाव लड़ेंगे और गवर्नेंस का एक मॉडल पेश करेंगे. हम चुनाव के लिए अपनी पार्टी बनाएंगे. अगर हमारी पार्टी पंजाब में सत्ता में आती है तो 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले सभी लोग हमारी तरफ़ देखेंगे."

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हालांकि चढूनी इससे पहले भी चुनावी राजनीति में उतरने की अपनी मंशा जाहिर कर चुके हैं. जिसके लिए उन्हें संयुक्त किसान मोर्चा ने निलंबित भी किया था.

टिकैत और चढूनी के बयान पर चर्चा क्यों?

लेकिन इस बार उनके बयान की टाइमिंग भी ग़जब है.

किसान आंदोलन के आज एक साल पूरे हो गए हैं. इस मौके पर आज दिल्ली के अलग-अलग बॉर्डर पर किसान जुटे हैं.

इन दोनों बयानों की वजह से चर्चा चल रही है कि कृषि क़ानून की वापसी के बाद संयुक्त किसान मोर्चा का आगे का स्वरूप क्या होगा?

क्या मोर्चा अब चुनावी राजनीति में उतरने की तैयारी में है? या फिर उनमें इस मुद्दे पर एक राय नहीं है.

आंदोलन को लेकर उनकी आगे की रणनीति क्या होगी, इस पर संयुक्त किसान मोर्चा की शनिवार को बैठक भी होने वाली है.

आंदोलन में शामिल किसान मोर्चा आगे चुनावी राजनीति में उतरेगा या पहले की ही तरह दूरी बनाए रखेगा, इस पर शनिवार की बैठक में फैसला हो सकता है.

लेकिन आने वाले दिनों में किसान आंदोलन के किसी भी स्वरूप पर चर्चा करने से पहले आंदोलन के पिछले एक साल के इतिहास और निकट भविष्य में होने वाले राज्यों के महत्वपूर्ण चुनावों से जोड़ कर देखना और समझना होगा. ख़ास तौर पर - यूपी और पंजाब के चुनावों के हिसाब से.

राकेश टिकैत

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कैसा रहा आंदोलन का एक साल

पिछले एक साल में किसान आंदोलन के नेताओं ने राजनीतिक दलों के नेताओं से हमेशा एक दूरी बनाए रखी.

कांग्रेस के लुधियाना से सांसद रवनीत सिंह बिट्टू जब सिंघु बार्डर पहुंचे थे, तो उनके लिए 'गो बैक' के नारे तक लगे.

दूसरी तरफ़ अकाली दल के नेता सुखबीर बादल, लोकदल नेता जयंत चौधरी, सांसद दीपेंद्र हुड्डा जब ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर पहुँचे, तब राकेश टिकैत उनसे प्यार से मिले.

अलग-अलग चुनाव में किसान नेताओं ने जगह-जगह महापंचायत की और बीजेपी को वोट ना देने की अपील भी की.

संयुक्त किसान मोर्चा का दावा है कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार में किसान आंदोलन का भी हाथ था. उनके वहाँ जा कर बीजेपी के विरोध में चुनाव प्रचार से उसे नुक़सान हुआ.

किसान नेताओं का दावा ये भी है कि उत्तर प्रदेश चुनाव में हार की डर से कृषि क़ानून वापस लिए गए हैं.

आखिरकार आंदोलन की जीत हुई. केंद्र सरकार ने कृषि क़ानून की वापसी का फैसला लिया. अब बात न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी क़ानून को लेकर अटकी है.

किसान आंदोलन

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पंजाब की राजनीति और किसान

माना जाता है कि पंजाब और हरियाणा में ज़्यादातर उन फसलों की खेती होती है जो जिनपर एमएसपी मिलती है.

इस आंदोलन को पंजाब हरियाणा का आंदोलन कहने के पीछे यही एक बड़ी वजह भी थी.

तो क्या नए कृषि क़ानून की वापसी और एमएसपी पर क़ानून बनवा कर किसान, चुनावी राजनीति में उतर सकेंगे और सफल हो सकते हैं?

पंजाब के इंस्टीट्यूट ऑफ़ डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन के निदेशक डॉ. प्रमोद कुमार इस सवाल के जवाब में दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल का उदाहरण देते हैं.

वो कहते हैं, " राजनीति अलग बात है और चुनावी राजनीति अलग बात है. युद्ध तो चर्चिल भी जीते थे, लेकिन उसके तुरंत बाद चुनाव हार गए थे.

"किसान आंदोलन राजनीतिक तो था, उनकी अपनी विचारधारा थी. वो किसानी को बाज़ार के हवाले नहीं करना चाहते थे. लेकिन किसान आंदोलन चुनावी राजनीति से अब तक अलग था.

"अब किसान मोर्चा के पास विकल्प है. अगर इस मोर्चे का कोई गुट अपने आप चुनावी राजनीति में जाना चाहता है तो उन्हें सभी वर्गों और मुद्दों (युवा, महिलाएं, लेबर, स्टूडेंट, उद्योग, ड्रग्स, रोज़गार) के लिए एक एजेंडे के साथ आना होगा. पंजाब की चुनावी राजनीति सिर्फ़ किसानों के मुद्दे पर नहीं की जा सकती है."

अपनी बात के पीछे कारण गिनाते हुए डॉ. प्रमोद कुमार आगे कहते हैं, "पंजाब की राजनीति दूसरे राज्यों से काफ़ी अलग है. यहाँ 'एक्सक्लूसिव' राजनीति नहीं की जा सकती, यहाँ 'इंक्लूसिव' राजनीति ही चल सकती है. यहाँ राजनीतिक दल किसान, व्यापारी, दलित, गांव और शहरी जनता को साथ लेकर नहीं चलेंगे तो चुनाव नहीं जीत सकते. यहाँ जाति और धर्म की राजनीति उस तरह से हावी नहीं है."

किसान आंदोलन

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसान

पंजाब के उलट, उत्तर प्रदेश की राजनीति में तमाम चीज़ों के साथ 'जाति' फैक्टर भी एक बड़ा मुद्दा होता है.

आंदोलन का असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा है, जहाँ जाट किसानों की तादाद अधिक बताई जाती है.

लेकिन इस इलाके में दूसरे जाति धर्म वाले किसानों की संख्या भी कम नहीं है.

राजनीतिक विश्लेषकों की राय इस पर बंटी है कि किसान आंदोलन का असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाहर भी उतना है या नहीं.

इसके पीछे एक वजह ये भी है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाहर छोटे जोत वाले किसानों की संख्या ज़्यादा है, जो रोज़ के खाने पीने की जद्दोजहद में इतने फँसे हैं कि चाह कर भी आंदोलन में शामिल नहीं हो सकते.

लखीमपुर खीरी की घटना के बाद उत्तर प्रदेश के दूसरे किसानों में आंदोलन को असर पड़ना शुरू ही हुआ था कि कृषि क़ानून वापस ले लिए गए.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार अनिल चौधरी कहते हैं, " किसान आंदोलन अब तक ग़ैर- राजनीतिक था. 'ग़ैर राजनीतिक' होने का मतलब मैं ये मानता हूँ कि अलग अलग मोर्चे से जुड़े किसान नेताओं को एक मंच पर लाना. किसान में तो हर जाति, धर्म और राजनीतिक दल के लोग होते हैं.

"अगर किसान नेता अपने मंच से किसी पार्टी या गठबंधन के विरोध की बात करते हैं, तो ये राजनीति नहीं है, क्योंकि तब आपने उनकों बाकी के विकल्पों में से एक को चुनने की छूट दी है. लेकिन अगर किसी पार्टी विशेष को वोट देने के लिए कहें तो आंदोलन राजनीतिक हो जाएगा. "

राकेश टिकैत के बयान पर उन्होंने सीधे तो कुछ नहीं कहा, लेकिन ये ज़रूर जोड़ा कि जब तक आंदोलन ख़त्म नहीं हो जाता संयुक्त मोर्चा 'चुनावी राजनीति' में नहीं जाएगा. अगर उससे पहले चुनावी राजनीति में वो उतरे तो उनके लिए आत्मघाती होगा.

वीडियो कैप्शन, योगेंद्र यादव को किसानों ने क्यों हटाया?

राजनीति से बैर नहीं

संयुक्त किसान मोर्चा में 30 से ज़्यादा किसान संगठनों का समूह है.

फिलहाल किसान मोर्चा में शामिल पंजाब का भारतीय किसान यूनियन (उगराहां) गुट नहीं चाहता कि किसान मोर्चे को चुनावी राजनीति में उतरना चाहिए. पंजाब में उगराहां गुट किसानों का सबसे बड़ा मोर्चा माना जाता है.

वहीं हरियाणा का चढूनी गुट चाहता है कि किसान आने वाले पंजाब चुनाव में एक विकल्प के तौर पर उतरे.

और कुछ किसान नेता ऐसे हैं जो 'वोट की चोट' के साथ दबाव की राजनीति के पक्षधर है.

यहाँ एक और बात ध्यान देने वाली है. संयुक्त किसान मोर्चा के कई सदस्यों का संबंध पूर्व में अलग अलग राजनीतिक पार्टियों से रहा है.

जैसे योगेन्द्र यादव पहले आम आदमी पार्टी के साथ रह चुके हैं, राकेश टिकैत भी इससे पहले दो बार अलग-अलग दलों के समर्थन से चुनाव लड़ चुके हैं. एक बार कांग्रेस के समर्थन से और एक बार राष्ट्रीय लोकदल से लड़ चुके हैं. मध्य प्रदेश के नेता शिव कुमार कक्काजी आरएसएस से जुड़े भारतीय किसान संघ के साथ रह चुके हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के स्थानीय पत्रकार हरवीर सिंह कहते हैं, "इस बार के उत्तर प्रदेश में ज़िला पंचायत चुनाव में बीजेपी नेता संजीव बालियान के भाई को विपक्ष के उम्मीदवार के तौर पर भारतीय किसान यूनियन का समर्थन प्राप्त था. उनकी उम्मीदवारी की घोषणा ख़ुद राकेश टिकैत के भाई नरेश टिकैत ने की थी. लेकिन वो चुनाव हार गए. बीकेयू के बिजनौर के सदस्य की पत्नी भी ज़िला पंचायत चुनाव में जीती थी. उनको भी यूनियन का समर्थन प्राप्त था."

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