कृषि क़ानूनों को वापस लेने के एलान पर क्या बोले जोगिदर सिंह उगराहां

जोगिंदर सिंह उगराहां
    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार सुबह तीनों विवादित कृषि क़ानूनों को वापस लेने का फ़ैसला कर लिया है.

पिछले एक साल से दिल्ली की सीमाओं से लेकर देश के अलग - अलग हिस्सों में किसान इन कानूनों का विरोध कर रहे थे.

देश के तमाम किसान संगठन संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले इन क़ानूनों का विरोध कर रहे थे.

इन संगठनों में पंजाब के किसान नेता जोगिंदर सिंह उगराहां का किसान संगठन भारतीय किसान यूनियन (उगराहां) भी शामिल था.

बीबीसी ने किसान नेता जोगिंदर सिंह उगराहां से बात करके सरकार के इस फ़ैसले पर उनकी और उनके साथियों की प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की है.

सवाल- प्रधानमंत्री जी ने कहा है कि वो तीनों क़ानून वापस ले रहे हैं, क्या आप इससे ख़ुश हैं?

जवाब- कौन नहीं ख़ुश होगा जिसकी बात मानी जाये जितनी मानी जाए उसके ऊपर जितना ख़ुश होना चाहिए उतने ही होंगे, ज़्यादा नहीं, लेकिन एक बात तो है कि उन लोगों ने बात मान ली, इस पर ख़ुश होने वाली बात तो है ही ख़ुश तो होंगे ही.

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सवाल- संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि आंदोलन में लगभग छह सौ लोगों की मौत हुई है, बहुत से किसानों के कारोबार पर असर पड़ा है, लोगों को अपना घर छोड़ कर यहाँ रहना पड़ा है, मुझे याद है कि आप लोग 26 नवंबर को आये थे, दो तीन दिन बाद एक साल होने वाला है, सरकार को ये निर्णय लेने में इतना लंबा समय लगा, क्या आप ये कहेंगे कि सरकार देर आई दुरुस्त आई?

जवाब- ये तो हमने पहले ही कह दिया कि देर आई दुरुस्त आई ये भी पता था कि ये लड़ाई लंबी चलेगी, क्योंकि लड़ाई बड़ी है, मोदी के पीछे बैठी बड़ी ताक़तों से लड़ाई है, उनके हित की लड़ाई है, मोदी जी जिसके कहने पर ये काम कर रहे हैं वो बहुत ताक़तवर है. उसकी आज्ञा के बिना फ़ैसला नहीं हो सकता है हमें यही लगता था और ऐसा ही हुआ है.

सवाल- अब आपकी जो सबसे बड़ी मांग थी तीन कृषि क़ानूनों की, वो क़ानून वापस ले लिए गए हैं, प्रधानमंत्री ने इसकी घोषणा की है, ये आंदोलन के लिए एक पड़ाव है या कह सकते हैं कि अब कुछ दिन बाद आंदोलन समाप्त हो जाएगा और लोग ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर चले जाएंगे. क्या किसानों के मुद्दे का समाधान है ये?

जवाब- देखिये ये एक बड़ी प्राप्ति है, लेकिन जो मांगे रह गई हैं उनके ऊपर चर्चा होगी कि कितनी मांगे रह गई कितनी मांगे मानी गई. रही बात बदलाव करने की तो वो तो संयुक्त मोर्चे की मीटिंग में ही होगा, कि क्या करना है और क्या नहीं करना है. इसलिए किसी एक ऑर्गनइजेशन का इसके बारे में कहना मुश्किल है, कि हम ये करने वाले हैं या वो करने वाले हैं. इस बात की ख़ुशी है कि सरकार ने तीनों क़ानून रद्द कर दिए हैं. ये अच्छी बात है बड़ी बात हुई है. और जो दूसरी बातें रह जाती हैं उनके लिए संघर्ष करेंगे, कैसे करेंगे कहां करेंगे कब तक करेंगे, वो देखा जाएगा.

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सवाल- पंजाब में चुनाव हैं यूपी में चुनाव हैं आप अबसे पहले तक बीजेपी का विरोध करते रहे थे, लेकिन शायद अब आपके लिए वो विरोध का रास्ता तो बंद हो जायेगा?

जवाब- सर ऐसे कैसे विरोध का रास्ता बंद हो जायेगा.

सवाल- सरकार ने आपकी बात मान ली है.

जवाब- मांग के ऊपर जो हमारा संघर्ष था वो नहीं होगा. उसमे हम कुछ तब्दीली कर लेंगे. हम ये कैसे कह सकते हैं कि आज केंद्र में बैठी ये सरकार दूध से धुली हुई हो गई, एयरपोर्ट बेचें हैं बंदरगाहें बेच दी हैं, कोयले की खान बेच दी है, रेलगाड़ियां बेच दी, सारे पब्लिक सेक्टर सेल पर लगाए हुए हैं. ये तो हम बोलेंगे कि बीजेपी सरकार जो नीतियां लेकर आ रही है वह उन नीतियों से पीछे हटे. इस लिए वो जो एक समस्या के ऊपर हमारा संघर्ष था उसपर हम कहेंगे ठीक है इसके बारे में हम सोचेंगे, इसका मतलब ये तो नहीं है कि हमारा संघर्ष खत्म हो गया. इन तीन क़ानूनों को वापस लेने से क्या हमारे घर में कोई खज़ाना भर गया है, जिससे हमारी आर्थिक स्थिति ठीक हो गई हो. आत्महत्याएं वैसे ही हो रही हैं, क़र्ज़ में डूबे हुए हैं, किसानों को कोई प्रॉफिट नहीं बच्चों के पास रोज़गार नहीं है, ये मांगे अभी भी हैं हमारी.

सवाल- तो क्या ये माना जाए कि किसी न किसी तरह नए सवालों के साथ आपके संगठन आंदोलन करते रहेंगे?

जवाब- जी सर ये बात ठीक है जब तक इन्साफ नहीं मिलता जब तक हमारे कारोबार में मुनाफा नहीं होता, जब तक हमरे घर की ज़रूरते हमारी आमदनी से पूरी नहीं होती, तब तक ये संघर्ष चलता रहेगा. चाहे सरकार बीजेपी की हो या किसी और की, संघर्ष पहले भी चलता रहा है आगे भी चलता रहेगा.

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सवाल- आने वाले चुनावों के मद्देनज़र सरकार के इस फ़ैसले को आप कैसे देखते हैं.

जवाब- देखिये सरकार अच्छे फ़ैसले करेगी तो उसका फायदा तो सरकार को ही ज़्यादा मिलता है. सरकार जा कर बोलेगी कि आपने आंदोलन किया हमने क़ानून वापस ले लिये, हमने आपकी बात मान ली. इसका फायदा तो उनको मिलेगा, हमें इसका क्या फायदा मिलेगा, हम तो इन क़ानूनों के लिए लड़ रहे थे, हमारी जो दूसरी बातें हैं वो तो वैसे ही हैं. हम उनके लिए आंदोलन करेंगे. इनका रास्ता खुल गया है जो बीजेपी का अभी तक घर से निकलना मुश्किल हो गया था वो रास्ता खुल गया उन्हें जाने का मौक़ा मिल गया है. उनके पास बोलने के लिए कंटेंट आ गया है.

सवाल- अब तक आपके आंदोलन की सबसे बड़ी बात ये रही कि तमाम मतभेदों और अलग चीज़ों के बावजूद किसान संगठन लगभग एकजुट रहे. बीच-बीच में कई बार ऐसा हुआ कि आपके मतभेद हुए, लेकिन अंत तक आप लोग साथ नज़र आये. अब सरकार के इन तीनों कृषि क़ानूनों को वापस लेने के बाद, क्या संयुक्त किसान मोर्चा बरक़रार रहेगा? जो जत्थेबंदी है उनकी एकजुकता बरक़रार रहेगी, या आपको लगता है कि अलग-अलग रास्ते भी लिए जा सकते हैं?

जवाब- देखिये जैसे हम यहाँ पंजाब से उठ कर आये थे, इकट्ठे एक दम एकजुट हो कर, ऐसे ही एक साथ इधर से जाने का फ़ैसला करेंगे सब एक साथ ही रहेंगे और आगे के लिए हमारी हिन्दुस्तान पत्र की ऑर्गनाजेशन्स एक साथ आंदोलन करें ये हमारी इच्छा है ऐसा हम सोच कर आये हैं कि हम ऐसा करेंगे और करते रहेंगे.और इस बात का प्रयास भी करेंगे कि हम आगे एक साथ संयुक्त किसान मोर्चा बना के लड़ाई लड़ते रहें.

सवाल- आज आपका ये सबसे बड़ा दिन है आज आप क्या करेंगे दिन भर?

जवाब- आज हम खाना पेट भर कर खा लेंगे और क्या करेंगे

सवाल- ख़ुशी है आपको मतलब अंदर से दिल से ख़ुशी है?

जवाब- इतनी ज़्यादा तो ख़ुशी नहीं है लेकिन फिर भी आज खाना कुछ सकून के साथ खा लेंगे. पहले चिंता होती थी, कि आज क्या करना है, कल क्या करना है और जब किसी को कुछ मिलता है तो उसके अंदर ख़ुशी तो होती है.

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