Paytm पेटीएम की डरावनी कहानी शेयर बाज़ार के बारे में क्या सिखाती है?

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    • Author, आलोक जोशी
    • पदनाम, वित्तीय मामलों के जानकार

पेटीएम के शेयर यानी पेटीएम चलानेवाली कंपनी वन नाइन्टी सेवन कम्युनिकेशंस लिमिटेड के शेयर पहले ही दिन जैसे धड़ाम से गिरे, वो कोई अनहोनी नहीं थी.

कंपनी के कामकाज़, कंपनी के मुनाफ़े और घाटे, कंपनी जिस कारोबार में है, उसमें लगातार बढ़ते मुक़ाबले के साथ कंपनी के अनिश्चित भविष्य की आशंकाएं देखते हुए तमाम जानकार यह चेतावनी दे चुके थे कि पेटीएम में पैसा लगाना शायद ठीक नहीं होगा.

शेयर बाज़ार की रवायत है कि ख़ासकर बड़ी कंपनियों के बारे में आसानी से कोई बुरा नहीं बोलना चाहता है. इसलिए किसी ने सीधे-सीधे यह तो नहीं कहा कि इसमें पैसा मत लगाइए, लेकिन पर्याप्त संकेत दे दिए थे कि अगर आप यहाँ पैसा न लगाएं तो ठीक रहेगा.

आइपीओ से पहले आने वाली रिपोर्टों में इसे अवॉयड या स्किप की रेटिंग कहा जाता है.

कुछ लोग इन्वेस्ट फोर लॉन्ग टर्म भी कहते हैं. हालांकि ऐसा कहने वाले यह भी बता देते हैं कंपनी का कारोबार बहुत अच्छा है इसलिए लंबे समय की सलाह दे रहे हैं या फिर इसलिए क्योंकि कंपनी हाल फ़िलहाल तो बहुत अच्छा नहीं कर रही, इसलिए हो सकता है कि आप काफ़ी लंबे समय तक यह शेयर रखें तो फ़ायदा हो जाए. अब यह भी कोई बताने की बात नहीं है.

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मुनाफ़ा कमाने का इंतज़ार करें या?

असली सवाल यह है कि देश का सबसे बड़ा आइपीओ लाकर पेटीएम ने बाज़ार से 18 हज़ार तीन सौ करोड़ रुपए की बड़ी रक़म उठा ली. लिस्टिंग के दिन ही कंपनी का मार्केट कैप क़रीब 39 हज़ार करोड़ रुपए गिर गया.

जिन लोगों ने 2150 रुपए में शेयर ख़रीदा उन्हें पहले ही दिन कम से कम नौ पर्सेंट और ज़्यादा से ज़्यादा साढ़े सत्ताइस पर्सेंट का घाटा हो चुका था.

उसके बाद भी गिरावट का सिलसिला थमेगा या नहीं कहना मुश्किल है क्योंकि एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज ने पेटीएम का सही भाव 1200 रुपए बताकर इसे अंडरपरफॉर्म की रेटिंग देनेवाली रिपोर्ट जारी की है. यह रिपोर्ट लिस्टिंग के दिन बाज़ार खुलने से पहले ही आ चुकी थी.

और अब तो सोमवार को बाज़ार खुलने के बाद ही पता चलेगा कि जिन निवेशकों ने अब तक शेयर नही बेचे हैं या जो पहले दिन बेच नहीं पाए वो आगे क्या करेंगे. क्योंकि अब तमाम जानकार कह रहे हैं कि जो घाटा हो रहा है, उसे खाकर भी पेटीएम के शेयर से निकल जाना बेहतर रहेगा.

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क्यों असफल हुए विशेषज्ञ?

लेकिन बात सिर्फ़ पेटीएम की नहीं है. बात उन लोगों की है, जिन्होंने तमाम जानकारों की सलाह और चेतावनियों को नज़रअंदाज़ कर पेटीएम के आइपीओ में अर्जियां लगाईं. वे क्या सोच रहे थे? उन्हें कोई फ़िक्र क्यों नहीं थी? अपने पैसे से अर्जियां लगानेवाले छोटे बड़े निवेशकों को तो छोड़ दें.

10 म्युचुअल फंड हैं, जिनके मैनेजरों ने इस इशू में एंकर इन्वेस्टर के तौर पर अपने फंड का पैसा लगाया है. वो तो पूरी तरह पढ़े-लिखे और इस कारोबार को अच्छी तरह समझने वाले लोग हैं. उन पर तो ज़िम्मेदारी है कि अपने निवेशकों के पैसे सुरक्षित तरीक़े से आगे बढ़ाने की. फिर उन्हें क्या हो गया था?

इसका जवाब अंग्रेजी के चार अक्षरों में है. FOMO यानी फियर ऑफ मिसिंग आउट. कुछ ही दिन पहले ज़ोमैटो का आइपीओ आया था. वो कंपनी भी कुछ नहीं कमाती है. बल्कि भारी घाटे में चल रही है. भविष्य में कब कमाएगी पता नहीं. लेकिन शेयर लिस्ट हुए तो 53 पर्सेंट ऊपर. इसी तरह अभी नाइका का आइपीओ आया. यह कंपनी घाटे में नहीं है. हाल ही में मुनाफ़े में आ चुकी है.

लेकिन वहाँ भी जो मुनाफ़ा है, उसके मुक़ाबले शेयर की क़ीमत फ़िलहाल तो काफ़ी ऊंची दिख रही है. फिर भी जिन लोगों ने पैसा लगाया, पहले ही दिन वो क़रीब क़रीब डबल हो गया. ऐसे अनेक आइपीओ आ चुके हैं, जिन्होंने निवेशकों को काफ़ी फ़ायदा दिखा दिया है. इनमें से ज़्यादातर में भारी मात्रा में पैसा लगा और बहुत कम लोगों को ही शेयर मिले.

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गु़स्सा और हताशा

अब जिन लोगों ने एक के बाद एक कई जगह अर्जी लगाई और कुछ नहीं मिला, वो अपने आसपास के लोगों को देखकर एक तरह से ग़ुस्से में या हताशा में हर इशू में अर्जी लगा रहे हैं कि कहीं कुछ तो मिलेगा.

इसी चक्कर में लोग फिर हर आइपीओ में अप्लाइ करते हैं और कई बार हाथ जला लेते हैं. 2021 में बहुत बड़ी संख्या में आइपीओ आए हैं. क़रीब 50 कंपनियों की लिस्टिंग हुई है, जिनमें कुल मिलाकर औसतन 31 पर्सेंट की कमाई हुई है. लिस्टिंग के दिन का आँकड़ा है यह.

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर आइपीओ में कमाई ही हुई. पेटीएम सबसे भयानक कहानी है, क्योंकि यहाँ पहले ही दिन शेयर इशू प्राइस से 27.5 पर्सेंट नीचे जाकर बंद हुआ, लेकिन इससे पहले भी कुछ कंपनियों में लिस्टिंग के दिन ख़ासा नुक़सान दिख चुका था.

इनमें कल्याण जूलर्स और विंडलास बायोटेक जैसी कंपनियां हैं, जो 10 पर्सेंट से ज़्यादा गिरीं और सूर्योदय, कारट्रेड, नुवोको विस्टाज और एसआइएस एंटरप्राइजेस जैसी कंपनियां हैं, जो लिस्टिंग के दिन ही पाँच से 10 पर्सेंट तक गिरीं.

हालांकि ख़राब लिस्टिंग का अर्थ यह क़तई नहीं है कि कंपनी का कारोबार अच्छा नहीं है. इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब कंपनी का आइपीओ पूरा नहीं भरा या लिस्टिंग के दिन शेयर नीचे रहा लेकिन बाद में उसने जमकर कमाई करवाई.

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कमाई करवाने वाले आईपीओ

आइपीओ में हल्के रिस्पॉंस के सबसे बड़े उदाहरण इन्फ़ोसिस, एचडीएफ़सी और मारुति जैसे शेयर हैं. इन सभी का इशू पूरा भरने में भारी मुश्किल हुई और बाद में इन सबने निवेशकों को जमकर कमाई करवाई.

जो लोग शेयर बाज़ार में कमाई के क़िस्से सुनाते हैं वो अक्सर उन कंपनियों की बातें करते हैं, जिन पर शुरू में किसी ने ध्यान नहीं दिया और जब तक नज़र पड़ी तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

ऐसी कंपनियां आम तौर पर वो होती हैं, जो कुछ नए किस्म का कारोबार कर रही होती हैं. आप उनके प्रोडक्ट या उनकी सेवा का इस्तेमाल भी कर रहे होते हैं लेकिन इशू के समय अर्जी लगाने से कतरा जाते हैं. बाद में समझ में आता है कि कितनी बड़ी कमाई का मौक़ा सामने था और आपने गँवा दिया.

अब यह कोई नई बात तो रह नहीं गई है, ऐसी तमाम कहानियां हैं और इन्हीं की वजह से लोग डरने भी लगे हैं कि कहीं ऐसा न हो कि बहुत बड़ी कमाई का कोई मौक़ा हाथ से निकल जाए. पेटीएम में यही हुआ.

अपने कारोबार की दिग्गज कंपनी है. ज़्यादातर लोग, जिन्होंने इसमें अर्जी लगाई वो दिन में दो चार बार पेटीएम करते ही होंगे. तो देखने से लगता है कि कंपनी अच्छा कारोबार कर रही है, इसमें पैसा लगाने में क्या हर्ज है.

लेकिन यह बहुत कम लोगों ने देखा कि कंपनी जितना कारोबार कर रही है, उसमें से बहुत कम पैसा उसके पास आमदनी के तौर पर आता है और उसमें से भी बड़ा हिस्सा बैंकों को चला जाता है.

और यह तो आमदनी है. खर्चे निकालकर कंपनी काफ़ी घाटे में चल रही है. बहुत से लोग यह सब जानने के बाद भी इस डर में अर्जी लगा बैठे कि अगर इशू के बाद शेयर तेज़ी से चल पड़ा तो फिर मौक़ा चूक जाएंगे, इसी को कहते हैं FOMO यानी चूक जाने का डर.

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बाज़ार की बुलंदी भी है ख़तरनाक समय

जिस वक़्त बाज़ार बुलंदी पर होता है उसी वक़्त इसी डर का फ़ायदा उठाने के लिए भी बहुत सी कंपनियां बाज़ार में आ जाती हैं. उनके मर्चेंट बैंकर और लीड मैनेजर कंपनी के सुनहरे भविष्य के सपने दिखाते हैं और ऊंचे भाव पर शेयर बेचने में कामयाब हो जाते हैं.

लेकिन बाद में जब भाव नहीं मिलते या घाटा होता है तो उनमें पैसा लगानेवाले लोग न सिर्फ़ घाटा उठाते हैं बल्कि इनमें से ज़्यादातर लोग फिर बाज़ार छोड़कर भाग जाते हैं और क़सम भी खा लेते हैं कि फिर कभी शेयरों में पैसा नहीं लगाएंगे. पिछले एक साल में बाज़ार में दो करोड़ से ज़्यादा नए निवेशक आए हैं.

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सबसे ज़्यादा डर इसी बात का है कि यह लोग अगर एक आध बार दूध से जल गए तो फिर छाछ पीने से भी परहेज करेंगे.

अब सेबी कह रहा है कि वो इस बात पर ज़ोर देगा कि आइपीओ के विज्ञापनों में जोखिम का ज़िक्र प्रमुखता से हो, यानी कारोबार में क्या-क्या ख़तरा हो सकता है यह बात साफ़ शब्दों और बड़े अक्षरों में बताई जाए.

लेकिन यहाँ यह भी साफ़ करना ज़रूरी है कि आइपीओ ही शेयरों में पैसा लगाने का सुनहरा मौक़ा नहीं होता. बल्कि कुछ बड़े जानकार तो ज़ोर देकर कहते हैं कि अगर आप बाज़ार में अच्छे शेयर लेकर लंबे समय तक टिकना चाहते हैं तो आपको आइपीओ से दूर ही रहना चाहिए. खुले बाज़ार से अच्छे शेयर ख़रीदकर आप कहीं बेहतर कमाई कर सकते हैं.

निवेश के सिद्धांतों को छोड़ भी दें तब भी आइपीओ में अर्जी लगानेवालों को इतनी मेहनत तो करनी ही चाहिए कि वो हर कंपनी के बारे में बुनियादी जानकारी जुटा लें और यह हिसाब ज़रूर लगा लें कि कंपनी जिस भाव पर अपने शेयर जारी कर रही है उतना पैसा वापस आने में ही कितने साल लग सकते हैं और कंपनी किस तेज़ी से मुनाफ़ा कमाकर या कारोबार बढ़ाकर यह इंतज़ार कम कर सकती है.

अगर आप इतना भी नहीं कर सकते तो फिर शेयर बाज़ार को दोष देना सही नहीं होगा.

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