भारतीय अर्थव्यवस्था में जब डिमांड की रफ़्तार थमी, तब कैसे घूमेगा इकोनॉमी का पहिया

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- Author, निधि राय
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
कोरोना संक्रमण ने भारत समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को उल्टा लटका दिया है. वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ जिन उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर कोरोना संक्रमण की सबसे बुरी मार पड़ी है, उनमें भारत दूसरे नंबर पर है. वहीं, ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स का मानना है कोरोना का सबसे ज़्यादा असर जिस अर्थव्यवस्था पर हुआ है, वह भारत ही है.
बहरहाल, बहस इस बात पर नहीं है कि कोरोना संक्रमण से जिन अर्थव्यवस्थाओं पर मार पड़ी है, उनमें भारत पहले नंबर पर है या दूसरे नंबर पर लेकिन यह सवाल मौज़ूं है कि हमारी अर्थव्यवस्था की यह बुरी दशा आखिर हुई कैसे? कैसे इकोनॉमी इस रसातल में पहुंच गई?
इसका संक्षिप्त जवाब तो यह हो सकता है कि पहले कोरोना संक्रमण और फिर इसकी वजह से लगाए गए सबसे लंबे और कड़े लॉकडाउन और फिर इसके बाद घबराहट में आर्थिक गतिविधियों को रोक देने की वजह से इकोनॉमी का यह हश्र हुआ.

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लेकिन क्या इस आर्थिक दुर्दशा की एक मात्र वजह कोविड-19 ही है?
जवाब है, नहीं.
भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार कोरोना संक्रमण के फैलने से पहले ही धीमी होने लगी थी. वित्त वर्ष 2019-20 का सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी (GDP) गिर कर 4.2 फीसदी पर पहुंच गया था. यह पिछले 11 साल का सबसे निचला स्तर था.
मार्च 2018 में जीडीपी ग्रोथ रेट 8.2 फीसदी था लेकिन मार्च 2020 में यह घटकर 3.1 फीसदी तक पहुंच गया. लगातार आठ तिमाहियों तक जीडीपी में गिरावट आती रही.
देश में 2017-18 के दौरान बेरोज़गारी दर 6.1 फीसदी पर पहुंच गई. बेरोज़गारी दर पिछले 45 साल में सबसे ज़्यादा थी.
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, कोलकाता में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर पार्थ राय ने बीबीसी से कहा, "यह सही है कि भारतीय अर्थव्यवस्था कोरोना संक्रमण के तीन साल पहले से धीमेपन का शिकार हो चली थी. जीएसटी जैसे लंबी अवधि में सुधार की संभावनाओं वाले आर्थिक फ़ैसले और नए दिवालिया कानून से भी अर्थव्यवस्था को कुछ शुरुआती नुक़सान हुआ होगा. इसके साथ ही कोरोना संक्रमण के पहले के ख़राब ग्लोबल आर्थिक हालातों ने स्थिति और ख़राब की. इन सबके बीच कोरोना संक्रमण के फैलने और इससे बचने के लिए लगाए गए लॉकडाउन ने मांग और आपूर्ति दोनों को हिला कर रख दिया. इससे खपत के मोर्चे पर तबाही मच गई."
हालात इतने ख़राब कैसे हुए?

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विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार की ओर से अचानक किए गए नीतिगत बदलावों की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था की यह दशा हुई. पहले सरकार ने 2016 में नोटबंदी की और फिर 2017 में गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स (GST) लागू कर दिया.
इसके बाद रियल एस्टेट से जुड़े रेरा (रियल एस्टेट रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) क़ानून समेत कई नीतिगत बदलाव एक के बाद एक किए गए. रेरा क़ानून रियल एस्टेट जैसे सेक्टर में लाया गया, जिसमें बड़ी तादाद में लोगों को रोज़गार मिलता है.
अचानक किए गए इन बदलावों ने संगठित और असंगठित दोनों सेक्टरों पर बेहद बुरी चोट की. इससे ये फिर दोबारा लय में नहीं आ पाए.
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इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के प्रिंसिपल इकोनॉमिस्ट सुनील कुमार सिन्हा ने बीबीसी से कहा, "सरकार की ओर से एक के बाद एक कई ऐसे नीतिगत फ़ैसले किए गए, जिन्होंने ना सिर्फ़ अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमताओं को चोट पहुंचाई बल्कि इनसे लोगों की आजीविका भी प्रभावित हुई. शहरी क्षेत्रों में मांग तभी पैदा होती है जब उत्पादन से जुड़ी गतिविधियों में रफ़्तार हो. लेकिन नोटबंदी और जीएसटी ने असंगठित सेक्टर पर बेहद नकारात्मक असर डाला. उपभोक्ता मांग पैदा करने में इस सेक्टर की अच्छी-खासी भूमिका है. लेकिन एक बार जब उत्पादन पटरी से उतरा तो यह पहले के स्तर पर फिर कभी नहीं पहुंच पाया. इससे रोज़गार में भारी गिरावट आई.''
सिन्हा कहते हैं, "शहरी उपभोक्ता अपनी आय में इज़ाफ़े का इंतज़ार कर रहा है लेकिन यह नहीं बढ़ रही है. अलबत्ता उसकी देनदारियां बढ़ती जा रही हैं. इस वजह से उसने जोखिम लेकर ख़र्च करना बंद कर दिया है."
सिन्हा कहते हैं, "ग्रामीण क्षेत्र में होने वाले ख़र्च से शहरी क्षेत्र में किए जाने वाले ख़र्च की भरपाई नहीं हो सकती है. क्योंकि अर्थव्यवस्था में कृषि सेक्टर की हिस्सेदारी सिर्फ 15 से 16 फ़ीसद है. शहरी अर्थव्यवस्था को पटरी पर आने में ज़्यादा समय लगेगा क्योंकि उत्पादन अभी अपनी पूरी क्षमता के साथ शुरू नहीं हुआ है."

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सिन्हा ने कहा, "जो लोग मांग बढ़ा सकते हैं, वे ग्रामीण और शहरी क्षेत्र, दोनों जगह पिरामिड के निचले तले में हैं. पिछले जितने बजट आए हैं उनमें उन लोगों पर ध्यान दिया जाना चाहिए जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोज़गार हासिल करने के मामले में सबसे पिछड़े हुए हैं. अगर डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर जैसी योजनाओं के ज़रिये लोगों तक कैश पहुंचाना चाहते हैं तो सबसे कमज़ोर आर्थिक हालात वाले लोगों तक पहुंचाएं. लेकिन सरकार ने किया क्या? उसने कॉरपोरेट सेक्टर को भारी छूट दी, इस उम्मीद में कि यह अर्थव्यवस्था में निवेश के ज़रिये रोज़गार पैदा करेगा. लेकिन कॉरपोरेट कंपनियों ने इसका इस्तेमाल अपनी बैलेंस शीट दुरुस्त करने में किया. सरकारी खज़ाने पर पहले से ही भारी बोझ है. लिहाज़ा सरकार ख़र्च करने में लाचार है. कोरोना संक्रमण के इस दौर में मांग पैदा करने के लिए उसने ख़र्च बढ़ाने जैसे क़दम उठाने से परहेज़ किया".
डन एंड ब्रैडस्ट्रीट (Dun & Bradstreet) के ग्लोबल चीफ इकोनॉमिस्ट अरुण सिंह कहते हैं, "टेलीकॉम, बैंकिंग और इससे जुड़े कुछ सेक्टर 2019 से ही दिक्कतों में फंसे थे. लेकिन कोविड-19 की वजह से उनकी समस्या और बढ़ गई है. इसने अर्थव्यवस्था को लेकर बड़ी चिंता पैदा कर दी है."
लोग पहले से अर्थव्यवस्था में सुस्ती की मार झेल रहे थे और अब नौकरी ख़त्म होने और वेतन कटौती की मार झेल रहे हैं. उनके सामने अनिश्चित भविष्य है. भविष्य की चिंता ने उन्हें ख़र्च करने से रोक दिया है. वे ख़र्चा करने से पहले दस बार सोच रहे हैं.
सिंह कहते हैं. "लोगों ने अब सावधानी बरतना शुरू कर दिया है. वे पैसे बचा रहे हैं. लोगों को लगता है कि बुरे दिन अभी बीते नहीं हैं. जब तक 80-90 फ़ीसद लोगों का टीकाकरण नहीं हो जाएगा तब तक हालात ऐसे ही रहेंगे. दूसरी बड़ी चिंता रोज़गार को लेकर है. लोगों का रोज़गार ख़त्म हुआ है. यहां तक कि दफ़्तरों में काम करने वाले व्हाइट कॉलर कर्मचारियों को बोनस नहीं मिला है. उनके वेतन काटे गए हैं. नए साल में पैसा नहीं बढ़ा है. सही मायने में देखा जाए तो वेतन कम हुआ है.
सरकार ने अब तक क्या किया है?

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केंद्र सरकार ने इकोनॉमी में उपभोक्ता मांग पैदा करने के लिए अक्तूबर 2020 में दो स्तर पर क़दम उठाए. पहले फ़ैसले के तहत सरकार ने त्योहारी सीज़न में अपने कर्मचारियों को कुछ एडवांस पेमेंट किया ताकि वे यह पैसा ख़र्च करें. सरकार का मानना था कि जो पैसा ये ख़र्च करेंगे उससे बाज़ार में मांग पैदा होगी. कर्मचारियों को एलटीसी कैश वाउचर और फेस्टिवल एडवांस स्कीम के तहत पैसा दिया गया. प्री-पेड रूपे कार्ड के तौर पर दस हज़ार रुपये एडवांस दिए गए. इन्हें 31 मार्च, 2021 तक हासिल और ख़र्च किया जा सकता है.
राज्यों को मदद करने के लिए 50 साल के लिए ब्याज मुक्त कर्ज़ दिया गया. इसमें केंद्र सरकार को 73 हज़ार करोड़ रुपये खर्च करने होंगे. सरकार मांग पैदा करने के लिए और 8000 करोड़ रुपये सिस्टम में डाल सकती है.
सर्विस सेक्टर को मदद करे सरकार

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विशेषज्ञों का मानना है कि मैन्यूफैक्चरिंग में थोड़ी रफ़्तार लौटी है. लेकिन सर्विस सेक्टर को तुरंत सरकार की मदद की ज़रूरत है.
क्रिसिल के चीफ इकोनॉमिस्ट डीके जोशी का कहना है, "मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर पटरी पर लौटा है और अब आगे बढ़ रहा है. लेकिन सर्विस सेक्टर में मांग अभी नहीं बढ़ी है. इसी सेक्टर को सबसे ज़्यादा नुक़सान हो रहा है. सर्विस सेक्टर की रिकवरी में लंबा वक़्त लगेगा. सर्विस सेक्टर को मदद की ज़रूरत है क्योंकि वह अपनी ग़लतियों से इस मुश्किल में नहीं फंसा है.
जोशी कहते हैं, "सरकार को निम्न आय और मध्य आय वर्ग के लोगों की भी मदद करनी चाहिए. ख़ासकर शहरी इलाक़ों में रहने वाले इस वर्ग को मदद की ज़रूरत है. सरकार को इन लोगों की आय में इज़ाफ़े का इंतज़ाम करना चाहिए. इन्हें कैश भी दिया जा सकता है. हालांकि ज़्यादा कमाई वाले लोगों की आय अच्छी रही है."

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अर्थशास्त्रियों का इस बात पर पूरा ज़ोर है कि सरकार को ज़्यादा ख़र्च करना चाहिए. इससे राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है लेकिन इसकी फ़िलहाल चिंता नहीं होनी चाहिए.
डन एंड ब्रैडस्ट्रीट (Dun & Bradstreet) के ग्लोबल चीफ़ इकोनॉमिस्ट अरुण सिंह कहते हैं, "सरकार निवेश शुरू करे. उसे इस समय राजकोषीय घाटा बढ़ने की चिंता नहीं करनी चाहिए. उसे लोगों को हाथ में पैसा देना चाहिए ताकि वे इसे सीधे ख़र्च करें. इससे खपत बढ़ेगी. सरकार को निवेश और खपत आधारित मांग को बढ़ाने के लिए ऐसे क़दम उठाने चाहिए जिनका पूरी अर्थव्यवस्था पर असर हो. नीतिगत फ़ैसलों के ज़रिये अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में वक़्त लगता है. इकोनॉमी को तुरंत नक़दी की ज़रूरत है."
सरकार अभी तक ऐसा माहौल तय करने में लगी है, जिसमें दूसरे लोग ख़र्च करें और मांग बढ़ाएं. लेकिन इस बार उन्हें अपने तरीक़े से ऐसा करना होगा.
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