भारत में उछलता शेयर बाज़ार और सिकुड़ती अर्थव्यवस्था, क्या है वजह?

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

21 जनवरी का दिन बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के इतिहास में सुनहरे शब्दों में लिखा जाएगा. अपने 145 साल के इतिहास में पहली बार इसके सूचकांक ने 50,000 अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर लिया और दिन के अंत में ये थोड़ा नीचे जा कर 49,624.76 अंकों पर बंद हुआ.

ये एक बड़ी उपलब्धि की तरह से देखा जा रहा है. ये कामयाबी कितनी अहम है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि मार्च के अंत में देश भर में लगाए गए लॉकडाउन के बाद सेंसेक्स 25,638 अंक तक गिर चुका था. अब उछाल आसमान को छू रहा है.

यानी 10 महीने में सूचकांक में दोगुनी वृद्धि हुई है. एक आकलन के मुताबिक़, साल 2020 में शेयर बाज़ार में निवेश करने वालों को 15 प्रतिशत का फ़ायदा हुआ. इतने कम समय में, इतना उम्दा मुनाफ़ा कमाना किसी भी दूसरे क्षेत्र में निवेश करके असंभव था.

पिछले 10 महीनों में शेयर बाज़ार में इस ज़बरदस्त उछाल के क्या कारण हैं? और ये 'फ़ीलगुड' समय कब तक जारी रहेगा?

इन दोनों सवालों पर प्रकाश डालने से पहले इस प्रश्न पर ग़ौर करना ज़रूरी है कि अगर भारत की अर्थव्यवस्था महामारी के नतीजे में चौपट हुई है, तो पिछले 10 महीने में शेयर बाज़ार में इतना उछाल क्यों आया है?

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अर्थव्यवस्था और बाज़ार में अंतर क्यों?

मुंबई के दलाल स्ट्रीट में अगर जश्न का माहौल है, तो देश में कई लोग ये सवाल कर रहे हैं कि अर्थव्यवस्था और शेयर बाज़ार के बीच इतना डिस्कनेक्ट क्यों है? इसका जवाब सीधा नहीं है. लेकिन भारत के अलावा अमेरिका, दक्षिण कोरिया और कुछ अन्य अर्थव्यवस्थाओं में भी ऐसे ही रुझान देखने को मिले हैं.

इसे एक वैश्विक रुझान कहा जा सकता है. मुंबई स्थित अर्थशास्त्री विवेक कौल कहते हैं कि इस वित्तीय वर्ष में भारत की अर्थव्यवस्था सिकुड़ने वाली है, लेकिन शेयर बाज़ारों में उछाल है.

इसका मुख्य कारण बाज़ार में ज़रूरत से ज़्यादा उपलब्ध लिक्विडिटी (नगदी) है.

अमेरिका में व्हार्टन बिज़नेस स्कूल दुनिया भर में प्रसिद्ध है. इसके एक डेली रेडियो शो में स्कूल के वित्त मामलों के प्रोफ़ेसर इते गोल्डस्टीन (Itay Goldstein) ने शेयर बाज़ार और अर्थव्यवस्था के बीच डिस्कनेक्ट के वैश्विक रुझान के तीन कारण बताये.

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वे कहते हैं कि पहला, जो हर समय के लिए सच है, वो ये कि शेयर बाज़ार के निवेशक आने वाले समय पर निगाह रखने वाले होते हैं. सामान्य तौर पर अर्थव्यवस्था में अभी जो आप देख रहे हैं, वो अभी चल रहा है. यानी मौजूदा समय में क्या हो रहा है अर्थव्यवस्था ये देखती है, जैसे कि उत्पादन, रोज़गार के क्षेत्र में क्या हो रहा है.

प्रोफ़ेसर गोल्डस्टीन के अनुसार, दूसरा कारण केंद्रीय बैंक द्वारा वित्तीय सिस्टम में बहुत अधिक नक़दी डालना है. उनका कहना है कि सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने महामारी से जूझने के लिए वित्तीय पैकेज दिये हैं जिसके कारण मार्केट में नक़दी आई है.

प्रोफ़ेसर गोल्डस्टीन कहते हैं कि इस रुझान का तीसरा कारण ये तथ्य है कि शेयर बाज़ार से जो कंपनियाँ जुड़ी हैं, ये ज़रूरी नहीं कि वो पूरी अर्थव्यवस्था की प्रतिनिधि हैं. अपने तर्क के पक्ष में वो फ़ेसबुक, गूगल, अमेज़न और नेटफ़्लिक्स जैसी कंपनियों का उदाहरण देते हैं जिन पर महामारी का कोई नकारात्मक असर नहीं हुआ, लेकिन इनके स्टॉक शेयर के भाव तेज़ी से बढे हैं और ये कंपनियाँ पूरी अर्थव्यवस्था का नेतृत्व नहीं करतीं.

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बाज़ार में उछाल के क्या कारण हैं?

पिछले कुछ महीनों से वैश्विक और घरेलू दोनों कारणों से शेयर बाज़ार में 'बुल रन' यानी उछाल देखने को मिल रहा है.

स्टैंडर्ड चार्टर्ड सिक्योरिटीज़ के प्रतीक कपूर के अनुसार, अमेरिका में महामारी से जूझने के कई पैकेज आ चुके हैं जिसके कारण मार्केट में काफ़ी लिक्विडिटी है.

वे बताते हैं, "भारत इमर्जिंग मार्किट में सबसे सुरक्षित और मुनाफ़े वाला बाज़ार है, इसलिए विदेशी संस्थागत निवेशक (एफ़आईआई) भारत में निवेश कर रहे हैं और तेज़ी से कर रहे हैं. जनवरी के पहले हफ़्ते में कुछ दिनों के लिए वो हमारे मार्केट से पैसे निकालने लगे थे जिसकी वजह से मार्केट में गिरावट आई थी लेकिन पिछले दो-तीन दिनों से वो फिर से काफ़ी निवेश कर रहे हैं."

प्रतीक कपूर के अनुसार, दूसरा कारण है ब्याज दर में कमी. उनके विचार में अमेरिका में चुनाव के ख़त्म होने के बाद से सियासी स्थिरता और बुधवार को जो बाइडन के शपथ ग्रहण और उनके द्वारा उठाए गए कुछ अहम क़दमों का अमेरिकी मार्केट पर सकारात्मक असर देखने को मिला जिसका सीधा असर भारत के शेयर बाज़ार पर भी पड़ा.

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साल 2020 में विदेशी निवेशकों ने भारत के शेयर बाज़ारों में 32 अरब डॉलर का सौदा किया जो किसी एक साल के लिए अब तक का रिकॉर्ड है.

साल 2019 भी विदेशी निवेशकों के निवेश का साल था और साल 2021 में भी विदेशी निवेशकों की रुचि भारतीय स्टॉक मार्केट में बनी रहेगी.

एक अनुमान है कि 25 से 30 अरब डॉलर तक का विदेशी निवेश भारत में आ सकता है.

विवेक कौल कहते हैं कि इन दिनों शेयर बाज़ार आसानी से उपलब्ध कैश के कारण उछाल पर है.

वे कहते हैं, "विदेशी निवेशकों ने पिछले साल (2020) भारतीय शेयरों को ख़रीदने में 32 अरब डॉलर ख़र्च किया है. कई स्थानीय निवेशकों ने भी ब्याज दरों में भारी गिरावट के बाद शेयरों पर दांव लगाया है. आरबीआई ने वित्तीय प्रणाली में बड़े पैमाने पर पैसा लगाया है. इन सबके चलते शेयर बाज़ार ऊपर जा रहा है, जबकि इस वित्तीय साल में अर्थव्यवस्था में गिरावट की उम्मीद है."

मार्केट में निवेश करने का देश के अंदर रुझान बढ़ रहा है. ये भी एक कारण है. एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2020 में खुदरा निवेशकों की श्रेणी में युवा निवेशकों की संख्या में एक करोड़ की वृद्धि हुई. लॉग टर्म की दृष्टिकोण रखने वाले निवेशक अब बैंकों में पैसे रखने या रियल स्टेट में पैसे निवेश करने की बजाय स्टॉक्स एंड शेयर्स में निवेश करना पसंद करते हैं.

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क्या ये उछाल जारी रहेगा?

फ़िलहाल कुछ अनिश्चितता है. विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है. प्रतीक कपूर कहते हैं कि मार्केट अभी और भी ऊपर जाएगा.

वे बताते हैं, "अभी विदेशी निवेशक आते रहेंगे. जो बाइडन का नया आर्थिक पैकेज भी मार्केट में रंग लाएगा. लेकिन शॉर्ट टर्म में करेक्शन आ सकता है यानी आगे कुछ दिनों या हफ़्तों में मार्केट में उतार-चढाव होगा और कुछ कंपनियों के स्टॉक्स के भाव नीचे जाएँगे. करेक्शन होना या मार्केट का थोड़ा बहुत गिरना नकारात्मक नहीं है. थोड़ा करेक्शन चाहिए क्योंकि मार्केट ज़रूरत से अधिक गर्म है.

रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के गवर्नर शक्तिकांत दास, वित्तीय स्थिरता पर ज़ोर देते हुए कहते हैं कि वो इस बात से चिंतित हैं कि हाल के समय में अर्थव्यवस्था और मार्केट में डिसकनेक्ट बढ़ा है. इस रुझान पर नज़र रखना ज़रूरी है.

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