दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर हनी बाबू के घर पर छापा

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    • Author, तारेंद्र किशोर
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए

दिल्ली विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफ़ेसर हनी बाबू के नोएडा स्थित घर पर राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एएनआई) और नोएडा पुलिस ने छापा मारा है. 54 वर्षीय हनी बाबू मुसालियरवीट्टिल थारियाल को मंगलवार को 'भीमा कोरेगांव एल्गार परिषद मामले' में एएनआई ने गिरफ़्तार किया था.

हनी बाबू की गिरफ़्तारी के बाद उनकी पत्नी जेनी रॉवेना और उनकी बेटी नोएडा के अपने फ़्लैट में अकेले रह रहे हैं.

उनकी पत्नी जेनी दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज में अंग्रेज़ी की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.

बीबीसी से बातचीत में जेनी रॉवेना ने कहा, "मैं यहाँ अपनी बेटी के साथ रहती हूँ. पुलिस के लोगों ने कहाँ कि यह आधिकारिक कार्रवाई है लेकिन मुझे यह प्रताड़ित करने जैसा महसूस होता है."

उन्होंने बताया कि "एएनआई और नोएडा पुलिस के लोगों ने घर की तलाशी ली है, वो कुछ रसीदें, एक हार्ड ड्राइव, एक पैन ड्राइव और प्रोफ़ेसर जीएन साईं बाबा से जुड़ा हुआ एक पर्चा ले गये हैं. साईं बाबा को लेकर ये पर्चे हनी बाबू लोगों के बीच बाँटते थे. वो पहले भी ये पर्चा लेकर जा चुके हैं."

हनी बाबू

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जेनी ने बताया कि 'एएनआई की टीम ने उनसे कहा कि इन सब की जाँच में ज़रूरत है इसलिए लेकर जा रहे हैं.'

दिल्ली विश्वविद्यालय के निलंबित प्रोफ़ेसर जीएन साईंबाबा के ऊपर माओवादियों से संपर्क रखने का आरोप है और वो फ़िलहाल जेल में बंद हैं. प्रोफ़ेसर साईंबाबा को दिल्ली में उनके घर से महाराष्ट्र पुलिस ने 2014 में गिरफ़्तार किया था.

हनी बाबू के घर से साईं बाबा से जुड़े पर्चे ज़ब्त करने पर साईं बाबा की पत्नी वसंथा बीबीसी से बातचीत में कहती हैं, "पुलिस ने हनी बाबू को भी फ़र्जी मामले में गिरफ़्तार किया है. उन्होंने कभी भी भीमा कोरेगाँव को लेकर बात नहीं की और ना ही कभी वहाँ गये. ग़लत बयान देने के लिए उन पर दबाव बनाया जा रहा है. वो चूंकि ग़लत बयान नहीं दे रहे, इसलिए उनके परिवार को डराने के लिए यह छापेमारी की गई. चूंकि उनकी बेटी और बीवी घर पर अकेले हैं इसलिए डराने के लिए यह कार्रवाई कर रहे हैं. यह प्रताड़ित करने का एक तरीक़ा है. वो बुकलेट जो पुलिस ने ज़ब्त किया है, वो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है. वो कोई गोपनीय दस्तावेज़ तो है नहीं."

उस 'बुकलेट' के बारे में वो बताती हैं, "उसमें साईं बाबा के ख़िलाफ़ दिया गया फ़ैसला कैसे ग़लत है, ये बताया गया है और उनका प्रोफ़ाइल है. पहली बार जब पुलिस ने छापा मारा था तभी पुलिस ने हनी बाबू के ईमेल का पासवर्ड ले लिया था. सब कुछ तो पहली बार में ही लेकर चले गए थे. ये छापेमारी वास्तव में परिवार को डराने और उन्हें परेशान करने के लिए की गई है."

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उधर दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ के अध्यक्ष राजीव रे ने इस पर बयान जारी किया है. उन्होंने कहा है, "यह काफ़ी चौंकाने वाला है कि डॉक्टर जेनी रॉवेना जो मिरांडा हाउस में पढ़ाती हैं और हाल ही में गिरफ़्तार हुए हनी बाबू की पत्नी हैं, उनके घर पर छापा पड़ा है. दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष होने के नाते मैं इसका कड़ा प्रतिरोध करता हूँ और सरकार से अपील करता हूँ कि वो इस ग़ैर-क़ानूनी और ज़ोर आज़माइश वाली रणनीति से परहेज़ करते हुए स्कॉलर्स के ख़िलाफ़ इस 'विच हंटिन्ग' को तत्काल रोके."

दिल्ली विश्वविद्याल में हनी बाबू के साथी असिस्टेंट प्रोफ़ेसर सचिन एन ने इस मामले पर बीबीसी से बातचीत की. उन्होंने कहा, "ये सरकार हमारे मूल संवैधानिक अधिकारों पर हमला कर रही है और उन्हें समाप्त करने पर तुली है. अगर आप सरकार की आलोचना करेंगे, सामाजिक न्याय और समानता की बात करेंगे तो आपको फ़र्जी मामले में फंसा दिया जायेगा. मौजूदा मामला भी इसी तरह का है."

वे सवाल उठाते हैं कि "चार अगस्त को कोर्ट में हनी बाबू के मामले की सुनवाई है. उससे पहले क्या ये छापेमारी सबूत जुटाने के लिए है या फिर सबूत प्लांट करने के लिए? हनी बाबू की पत्नी और उनकी बेटी अकेले घर पर रह रहे हैं, ऐसी स्थिति में वहाँ इस तरह से दल-बल के साथ छापा मारना वाक़ई परेशान करने वाला है. एक बुद्धिजीवि की सोच पर आप पहरा लगा दोगे तो ये एक आपराधिक गतिविधि होगी. हमें लगता है कि पूरी संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था धवस्त हो रही है."

भीमा कोरेगाँव मामले में सरकार के ऊपर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वो पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं को जानबूझकर निशाना बना रही है.

इस साल 24 जनवरी को यह मामला पुणे पुलिस से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी को सौंप दिया गया था.

ग़ौरतलब है कि भीमा कोरेगाँव मामले में कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को गिरफ़्तार किया गया है. इसमें गौतम नवलखा और आनंद तेलतुंबडे जैसे बुद्धिजीवी भी शामिल हैं.

आरोप है कि इन बुद्धिजीवियों का माओवादियों से संपर्क है और भीमा कोरेगाँव का आयोजन माओवादियों के समर्थन से हुआ था.

1 जनवरी 2018 के दिन महाराष्ट्र में पुणे के पास भीमा-कोरेगाँव इलाक़े में हिंसा भड़की थी.

इस दिन भीमा कोरेगाँव में पेशवा बाजीराव पर ब्रिटिश सैनिकों की जीत जश्न मनाया जा रहा था. इस कार्यक्रम के दौरान वहाँ हिंसा भड़क उठी थी जिसमें एक शख़्स की जान गई और कई वाहनों को फूंक दिया गया था.

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इस हिंसा पर राज्य ही नहीं, बल्कि पूरे देश में प्रतिक्रिया दिखाई दी थी.

हिंसा के बाद दलित समुदाय नाराज़ हो गया था. उसने ना सिर्फ़ सोशल मीडिया के ज़रिए अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की थी बल्कि सड़क पर उतर कर आंदोलन भी किया था.

हर साल पहली जनवरी को भीमा कोरेगाँव में दलित समुदाय बड़ी संख्या में जुटकर उन दलितों को श्रद्धांजलि देता है जिन्होंने 1818 में पेशवा की सेना के ख़िलाफ़ लड़ते हुए अपने प्राण गंवाये थे.

माना जाता है कि ब्रिटिश सेना में शामिल दलितों (महार) ने मराठों को नहीं बल्कि ब्राह्मणों (पेशवा) को हराया था. महार समुदाय को उस वक्त महाराष्ट्र में अछूत समझा जाता था.

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