भीमा कोरेगाँव मामले में गौतम नवलखा के अब कोई रास्ता नहीं बचा?

गौतम नवलखा

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इमेज कैप्शन, गौतम नवलखा को तीन सप्ताह के अंदर सरेंडर करना होगा
    • Author, मयूरेश कोण्णूर
    • पदनाम, संवाददाता, बीबीसी मराठी

पुणे में हुई यलगार कॉन्फ़्रेंस से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता और जाने-माने पत्रकार गौतम नवलखा के साथ प्रोफ़ेसर आनंद तेलतुंबड़े को अग्रिम ज़मानत देने से इनकार कर दिया है.

फ़रवरी में मुंबई हाई कोर्ट से ज़मानत याचिका रद्द होने के बाद दोनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था.

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने अग्रिम ज़मानत याचिका को ख़ारिज करते हुए दोनों को तीन सप्ताह के अंदर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के सामने आत्मसमर्पण करने को कहा है.

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एमआर शाह की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की. बेंच ने ग़ैर-क़ानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) की धारा 43डी(4)लागू करते हुए कहा कि अभियुक्तों को अग्रिम ज़मानत देना संभव नहीं है.

तेलतुंबड़े और नवलखा के लिए कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने पैरवी की. वहीं, एनआईए की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता मौजूद थे.

आनंद तेलतुंबड़े

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सुप्रीम कोर्ट ने पासपोर्ट भी जमा करने को कहा

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने संरक्षण का फ़ायदा लगभग डेढ़ सालों से लिया है. उन्हें तीन सप्ताह के अंदर सरेंडर करना है और साथ ही जांच एजेंसी को पासपोर्ट सौंपना है.

सुनवाई के दौरान तेलतुंबड़े की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि आईपीसी की धारा-120बी को एफ़आईआर में शामिल नहीं किया गया है और उन्होंने तर्क दिया कि महाराष्ट्र पुलिस ने कुछ दस्तावेज़ जो बरामद किए हैं वो किसी और के कंप्यूटर से लिए हैं.

उन्होंने कहा कि ये दस्तावेज़ ईमेल भी नहीं हैं जो इनकी विश्वसनीयता को उचित ठहराया जाए.

वहीं, नवलखा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि जून 2018 में यूएपीए की धाराओं को दूसरी एफ़आईआर में शामिल किया गया था और दूसरी एफ़आईआर में उनके मुवक्किल का नाम या कोई भूमिका शामिल नहीं है.

एनआईए का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ऐसे ईमेल हैं जिसमें सुकमा (छत्तीसगढ़) में 27 सीआरपीएफ़ जवानों के मारे जाने को 'शानदार हिंसा' बताया जा रहा है.

सिंघवी ने कहा कि पुलिस ने नवलखा को माओवादियों से बात करने के लिए इस्तेमाल किया था और उन्होंने मध्यस्थ के तौर पर काम किया.

वहीं, मेहता ने कहा कि दोनों अभियुक्त एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और दोनों की माओवादी गतिविधियां स्पष्ट हैं.

गौतम नवलखा

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गौतम नवलखा ने जारी किया बयान

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद गौतम नवलखा ने एक बयान जारी किया.

उसमें उन्होंने कहा, "अब जब मुझे तीन सप्ताह में आत्मसमर्पण करना है तब मैं ख़ुद से पूछने की हिम्मत करता हूं कि क्या मुझे उम्मीद करनी चाहिए कि मैं अभियुक्त होने के बोझ से आज़ाद हो जाऊंगा या फिर साज़िश का एक और मामला शुरू हो रहा है, या फिर एक लंबा मामला शुरू होने जा रहा है? क्या सह-अभियुक्त और उन जैसे दूसरे लोग आज़ादी हो पाएंगे?"

"ये सब सवाल मेरे ज़हन में चल रहे हैं क्योंकि हम जिस समय में रह रहे हैं वहां अब नागरिक स्वतंत्रता लगातार दबाई जा रही हैं और वहां सिर्फ़ एक ही रवायत हावी है. क्रूर क़ानून यूएपीए एक संगठन को प्रतिबंधित करने और उसकी विचारधारा को ग़ैर-क़ानूनी घोषित करने की अनुमति देता है. यह एक ऐसा क़ानून है जो मामला चलाए बिना सज़ा देने का हथियार है."

वीडियो कैप्शन, कोरेगांव भीमा में हिंसा के पीछे वजह क्या है?

कौन हैं नवलखा और तेलतुंबड़े

गौतम नवलखा एक जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता और लेखक हैं. तेलतुंबड़े भी एक प्रसिद्ध दलित लेखक और विचारक हैं.

भीमा कोरेगांव हिंसा मामले के बाद पुणे पुलिस ने जांच शुरू करने के बाद सितंबर 2018 में नवलखा को हिरासत में लिया था.

आनंद तेलतुंबड़े गोवा के एक मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट में पढ़ाते हैं. तेलतुंबड़े ने अपने ख़िलाफ़ एफ़आईआर रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इनकार के बाद उन्होंने अग्रिम ज़मानत के लिए याचिका दायर की थी.

पुणे की कोर्ट ने उनकी याचिका ख़ारिज कर दी थी जिसके बाद पुणे पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अग्रिम ज़मानत पर सुनवाई पूरी होने तक उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया था.

युद्ध

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भीमा कोरेगांव में क्या हुआ था?

पुणे के नज़दीक भीमा कोरेगांव में एक जनवरी 2018 को हिंसा भड़क गई थी. हर साल इस दिन हज़ारों लोग इकट्ठा होते हैं.

इस हिंसा का असर पूरे देश में देखा गया. पुणे पुलिस ने एक शिकायत के आधार पर जांच शुरू की जिसमें कहा गया था कि हिंसा से एक दिन पहले 31 दिसंबर 2017 को यलगार कॉन्फ़्रेंस में ऐसे भाषण दिए गए जिससे हिंसा भड़की.

इस कॉन्फ़्रेंस के पीछे संदिग्ध माओवादिओं का हाथ बताया गया और पुणे पुलिस ने कई वामपंथी कार्यकर्ताओं को माओवादियों से संबंध के आरोप में देश के कई हिस्सों से गिरफ़्तार किया था.

ये संदिग्ध कार्यकर्ता और लेखक अदालत में इस केस को लड़ रहे हैं. आनंद तेलतुंबड़े और गौतम नवलखा इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गए थे.

अग्रिम ज़मानत देने से इनकार करने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर जब वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता असीम सरोडे से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट के ही पुराने संदिग्ध मामलों के फ़ैसलों के क़ानून की व्याख्याओं के ख़िलाफ़ है.

असीम ने कहा कि 1977 में कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में कहा गया कि इन जैसे मामलों में जब भी 'बेल या जेल' का सवाल आया है तो इसका जवाब हमेशा 'बेल' होना चाहिए.

वो कहते हैं कि उनका मानना है कि यह मामला भी इसी श्रेणी में होना चाहिए और यह फ़ैसला न्यायिक सिद्धांत को कम करके आंकता है. आनंद तेलतुंबड़े ऐसे व्यक्ति नहीं हैं कि वो भाग जाएंगे, वो जांच के लिए तैयार हैं अगर उन्हें ज़मानत मिलती तो जांच नहीं रुक जाती.

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