'जादू' से जावेद अख़्तर बनने की कहानी

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जावेद अख़्तर की माँ को ख़त लिखने का बहुत शौक था. वो तकरीबन रोज़ ख़त लिखा करती थीं.
अपने पति जाँनिसार अख़्तर को लिखे पत्र में उन्होंने जावेद के बारे में लिखा था- "'जादू' के हालात सुनाने के नहीं, बस देख सकते हो. वो बातें तो बेतहाशा बनाते हैं. पूछा जाता है, तुम्हारा दादा कौन है जवाब मिलता है 'स्टालिन' और तुम्हारे चचा का नाम 'चचा दालिब' (ग़ालिब)."
जावेद अख़्तर लिखते हैं, "मेरे माता पिता की शादी-शुदा ज़िंदगी नौ साल की थी और उनमें से ज़्यादातर वक़्त वो जुदा-जुदा ही रहे थे."

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जावेद अख़्तर का जन्म 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर के कमला अस्पताल में हुआ था. जावेद अख़्तर बताते हैं, "जब मेरे वालिद के दोस्त मुझे देखने आए तो उनमें से किसी ने पूछा इसका नाम क्या रखोगे. उन्होंने ही मेरे वालिद को याद दिलाया कि जब उन्होंने मेरी माँ से शादी की थी तो उन्होंने एक नज़्म कही थी जिसका एक मिसरा था 'लम्हा लम्हा किसी जादू का फ़साना होगा,' तो क्यों न इस लड़के का नाम जादू रख दिया जाए."
"चार सालों तक मुझे इसी नाम से पुकारा गया. जब मेरे स्कूल जाने की बात आई तो सबने कहा कि 'जादू' कोई संजीदा नाम नहीं है, हर कोई इसका मज़ाक उड़ाएगा. इसलिए कोई ऐसा नाम ढूँढने की कोशिश शुरू हुई जो जादू से मिलता जुलता हो. तो इस तरह मेरा नया नाम जावेद अख़्तर रखा गया. आमतौर पर घर का नाम असली नाम से बनाया जाता है लेकिन मेरे साथ ठीक उलटा हुआ. लेकिन अभी भी मेरा परिवार और मेरे पुराने दोस्त मुझे जादू कहकर ही पुकारते हैं."


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कान में कम्यूनिस्ट मैनिफ़ेस्टो पढ़ा गया
जब किसी मुस्लिम घर में बच्चा पैदा होता है तो उसके कान में अज़ान पढ़ी जाती है.
जावेद अख़्तर बताते हैं, "मेरे पैदा होने के बाद मेरे वालिद के दोस्तों ने कहा कि तुम्हारा तो अल्लाह में विश्वास नहीं है. तुम तो नास्तिक हो. तुम क्या करोगे? उनके किसी दोस्त के हाथ में मार्क्स का कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो था. मेरे वालिद ने कहा ज़रा देना मुझे. इसके कान में वही पढ़ देते हैं और वाकई उन्होंने मेरे कान में पढ़ा, 'वर्कर्स ऑफ़ द वर्ल्ड यूनाइट, यू हैव नथिंग टू लूज़ बट यॉर चेन्स.'"
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जावेद की उनके पिता जाँनिसार अख़्तर से कभी नहीं बनी
जावेद बताते हैं, "कभी कभी बच्चों की शिकायत होती है कि हमारा बाप जैसा होना चाहिए वैसा नहीं है. लेकिन हर आदमी हर चीज़ नहीं बन सकता है. वो बुनियादी तौर से शायर आदमी थे. आमतौर से ऐसा फ़नकार दूसरे मामलों में ग़ैर-ज़िम्मेदार हो जाता है. तो वो भी थे."
जावेद अख़्तर ने अपने शुरुआती दिन लखनऊ, अलीगढ़ और भोपाल में बिताए.
हाल ही में जावेद अख़्तर की जीवनी 'जादूनामा' लिखने वाले अरविंद मंडलोई बताते हैं, "जावेद अख़्तर की ज़िंदगी में बहुत तकलीफ़ें रहीं, इतनी कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते. जैसे कि जब वो भोपाल में थे तो वो सैफ़िया कॉलेज के एक रूम में रहते थे जिसमें बहुत खटमल थे. जावेद साहब की खाने की स्पीड इतनी तेज़ है कि वो तीन मिनट में खाना खा लेते हैं. इसकी भी एक वजह है."
"वो जिस होटल में खाना खाया करते थे वहाँ उधार में खाना होता था. उसका मालिक आए उससे पहले खाकर निकल जाना होता था. जावेद साहब की एक और ख़ास बात है कि अगर उनसे कोई ग़लती हुई है, उसे वो खुलकर स्वीकार करते हैं. कितने ही लोगों को उन्होंने मौक़े दिए. शंकर महादेवन, सतीश कौशिक, अमिताभ बच्चन लेकिन किसी के बारे में उनके मुँह से मैंने कभी नहीं सुना कि फ़लाँ आदमी के लिए मैंने ये किया है."
तमाम जद्दोजहद के बाद आँखों में डायरेक्टर बनने का सपना लिए 4 अक्तूबर, 1964 को जावेद अख़्तर बंबई सेंट्रल स्टेशन पर उतरे.
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मीना कुमारी की फ़िल्मफ़ेयर ट्रॉफ़ी हाथ में ली
बंबई आने के छह दिन बाद उन्हें अपने पिता का घर छोड़ना पड़ा. उस समय उनकी जेब में 27 पैसे थे. अपने संघर्ष के शुरुआती दिन उन्होंने कमाल स्टूडियो में कभी कम्पाउंड में तो कभी बरामदे में, कभी किसी पेड़ के नीचे या किसी बेंच पर सोकर बिताए.
उन दिनों को याद करते हुए जावेद अख़्तर कहते हैं, "उन दिनों मीना कुमारी कमाल साहब से अलग हो गई थीं और उनकी फ़िल्म पाकीज़ा की शूटिंग बंद हो गई थी. वहाँ एक कॉस्ट्यूम रूम था. वहाँ पाकीज़ा के कॉस्ट्यूम रखे हुए थे. एक दिन मैंने वहाँ रहने के दौरान एक आलमारी खोली. उसमें फ़िल्म में इस्तेमाल होने वाले पुरानी तरह के जूते और सैंडिल भरे हुए थे. उन्हीं में धूल से भरे मीना कुमारी के तीन फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स भी पड़े हुए थे."
"वहाँ एक आदमक़द शीशा भी होता था. जब कोई नहीं होता था मैं रोज़ रात को कमरा अंदर से बंद कर वो ट्रॉफ़ी अपने हाथ में लेकर शीशे के सामने खड़ा होता था और सोचता था कि जब ये ट्रॉफ़ी मुझे मिलेगी तो मैं तालियों से गूँजते हॉल में बैठे हुए लोगों की तरफ़ देखकर किस तरह मुस्कुराऊँगा और कैसे हाथ हिलाऊँगा. ज़िंदगी में पहली बार मैंने किसी अवार्ड को छुआ वो मीना कुमारी की फ़िल्मफ़ेयर ट्रॉफ़ी थी."
वर्ष 1967 में जावेद अपने पिता जाँनिसार अख़्तर की फ़िल्म 'बहू बेगम' के प्रीमियर पर पहुँचे.
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'हिप्पी' जैसी शक्ल के जावेद अख़्तर
जानीं-मानीं उर्दू साहित्यकार क़ुर्रतुल ऐन हैदर लिखती हैं, "उसी प्रीमियर में वाजिदा तबस्सुम ने एक तरफ़ इशारा करके कहा था, 'ये अख़्तर भाई का बेटा जादू है.' उस वक़्त कोई वजह नहीं थी कि मैं भविष्यवाणी करूँ कि आगे चल कर यह लड़का बहुत शोहरत हासिल करेगा. मुझे तो वो हिप्पी जैसा मालूम हुआ. उसने कलाई में हिप्पियों वाला कड़ा पहन रखा था और सिरफ़िरा सा नज़र आता था."
"बाद में मालूम हुआ कि वो कड़ा कड़े वक़्त में काम आने वाले एक सिख दोस्त मुश्ताक सिंह की निशानी था. जावेद महज़ अपनी प्रतिभा और ह्यूमर के बलबूते पर दुनिया से लड़े. ह्यूमर और लतीफ़ेबाज़ी और महफ़िल जमाने की कला उन्हें अपने मामू मजाज़ से मिली थी."
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सलीम ख़ान के साथ टीम बनाई
जावेद अख़्तर ने सबसे पहले डायरेक्टर कमाल अमरोही के लिए 50 रुपए महीने की तनख़्वाह पर एक क्लैपर ब्वॉय की हैसियत से काम किया.
उसके बाद उन्हें एसएम सागर के यहाँ नौकरी मिल गई. उनकी फ़िल्म में सलीम ख़ान एक रोमांटिक रोल कर रहे थे.
सागर को अपनी फ़िल्म के लिए कोई डायलॉग राइटर नहीं मिल रहा था. उन्होंने जावेद से पूछा कि क्या वो सीन लिख सकते हैं?
उन्होंने दो-तीन सीन लिख कर दिखाए, जो सागर साहब को पसंद भी आए. सागर ने उन्हें एक कहानी को स्क्रीनप्ले में बदलने का काम दिया.
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सलीम और जावेद ने पहली बार एक साथ इस फ़िल्म पर साथ काम किया. इस तरह इन दोनों ने मिलकर 'अधिकार' फ़िल्म का स्क्रीनप्ले लिखा, लेकिन इन दोनों के नाम फ़िल्म के क्रेडिट में नहीं दिए गए.
इसके बाद इन दोनों ने रमेश सिप्पी का स्टोरी डिपार्टमेंट ज्वाइन कर लिया.
जावेद याद करते हैं, "रमेश सिप्पी 'अंदाज़' बना रहे थे. हमने 'अंदाज़' में काम किया और हमें बिलिंग भी मिली थी. लेकिन इस बिलिंग में हम दोनों के नाम अलग-अलग लिए गए थे, सलीम ख़ान और जावेद अख़्तर. उसके बाद 'हाथी मेरे साथी' में पहली बार हमारी बिलिंग सलीम-जावेद के तौर पर हुई थी."
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पहली बार पोस्टर पर लेखक का नाम
इस जोड़ी ने लगातार नौ सुपरहिट फ़िल्में दीं. जब उनकी चौथी फ़िल्म 'ज़ंजीर' हिट हुई, तो सलीम जावेद ने कहा कि हमारा नाम भी पोस्टर पर होना चाहिए.
जावेद याद करते हैं, "जब हमने अपनी ये इच्छा प्रकट की तो हमें बताया गया कि ऐसा होता नहीं है. जब बंबई में 'ज़ंजीर' रिलीज़ हुई तो हमने दो जीपें किराए पर लीं, उनमें 3-4 लोग बिठाए, उन्हें सीढ़ियाँ और पेंट दिया और उनसे कह दिया कि बंबई में जहाँ भी 'ज़ंजीर' के पोस्टर दिखाई दें, वहाँ लिख दें- रिटेन बाई सलीम जावेद."
"पूरी रात वो जीपें घूमती रहीं और हर पोस्टर पर सलीम जावेद का नाम लिख दिया गया. उसके बाद से ही पोस्टरों पर लेखक का नाम लिखने की शुरुआत हुई."
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जब 'त्रिशूल' फ़िल्म रिलीज़ हुई, तो जुहू पर एक फ़िल्म का एक बड़ा पोस्टर लगाया गया, जिस पर न तो निर्देशक का नाम था और न ही हीरो या हीरोइन का. पोस्टर पर सिर्फ़ लिखा हुआ था 'अ फ़िल्म बाई सलीम जावेद.'
सलीम जावेद की लिखी फ़िल्मों में स्क्रिप्ट दोनों साथ लिखते थे, लेकिन डायलॉग की ज़िम्मेदारी जावेद अख़्तर की होती थी.
फ़िल्म निर्देशक विनय शुक्ला कहते हैं, "जावेद अपने डायलॉग में 'रेटरिक' का इस्तेमाल करते हैं, उनकी बयानबाज़ी आम लेखकों की तरह शब्दों का आडंबर नहीं होती. अगर वो शब्दों से खेलना जानते हैं, तो उनकी स्क्रिप्ट में 'साइलेंस' का इस्तेमाल भी उसी ख़ूबी से होता है. शोले में अमिताभ और जया का अनकहा प्रेम, शक्ति में विजय का अपनी माँ की मौत पर घर आना और बिना कुछ बोले अपने ग़म का इज़हार कर देना, शोले ही में अहमद की लाश के साथ घोड़े की टाप और इमाम साहब का पूछना 'इतना सन्नाटा क्यों है भाई."
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'ज़ंजीर' के लिए की अमिताभ बच्चन की सिफ़ारिश
अमिताभ बच्चन से जावेद अख़्तर की पहली मुलाक़ात आनंद के सेट पर हुई थी और वहीं से वो उनके मुरीद हो गए थे.
वो उनके अभिनय के कायल तो थे ही उनके व्यवहार से भी वो बहुत प्रभावित थे.
जावेद अख़्तर कहते हैं कि उन्होंने अमिताभ बच्चन के मुँह से किसी के बारे में कोई ग़लत बात नहीं सुनी. सुपरस्टार होने के बावजूद कई बार उन्होंने बच्चन को सुबह 7 बजे शूटिंग के लिए स्टूडियो पहुँचते देखा है.
कई बार बाक़ी के लोग पहुँच नहीं पाते थे और वो बाहर गाड़ी में बैठ कर इंतज़ार कर रहे होते थे कि कि फ़्लोर का दरवाज़ा खुले और वो अंदर जाएँ.
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जावेद अख़्तर याद करते हैं, "जब प्रकाश मेहरा 'ज़ंजीर' बना रहे थे, तो उनके ज़हन में हीरो के रोल के लिए धर्मेंद्र थे लेकिन किन्हीं कारणों से धर्मेंद्र ने इस फ़िल्म में काम करने से मना कर दिया था. फिर ये फ़िल्म दो दूसरे अभिनेताओं को ऑफ़र हुई लेकिन वे भी ये कहकर इस फ़िल्म में काम करने को राज़ी नहीं हुए कि इसमें कोई रोमांटिक सीन नहीं है."
"तब तक अमिताभ बच्चन कई फ़िल्मों में काम करने के बाव़जूद कोई हिट फ़िल्म नहीं दे पाए थे. मैंने उनको एक दो फ़िल्मों जैसे 'परवाना' और 'रास्ते का पत्थर' में देखा था. ये फ़िल्में चली भले ही न हो लेकिन अमिताभ बच्चन उनमें अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे थे."
"मैंने प्रकाश मेहरा से कहा कि वो इस रोल के लिए अमिताभ को लें. बड़ी मुश्किल से वो इसके लिए राज़ी हुए और उसके बाद क्या हुआ ये पूरी दुनिया को पता है. अमिताभ की हर फ़िल्म फ़्लॉलेस रही है, कोई ग़लती नहीं बल्कि कई बार तो उन्होंने इस तरह डायलॉग बोला कि जो मैंने लिखा उसका असर बढ़ गया. ये फ़ोकस, ये पैशन और ये एनर्जी मैंने किसी दूसरे अभिनेता में नहीं देखी."
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महफ़िलों की जान जावेद अख़्तर
70 के दशक के मध्य तक जावेद अख़्तर न सिर्फ़ फ़िल्म लेखन में अपना लोहा मनवा चुके थे, बल्कि बंबई की महफ़िलों में उनकी पूछ बढ़ गई थी.
मशहूर पत्रिका धर्मयुग के संपादक रहे धर्मवीर भारती की पत्नी और लेखिका पुष्पा भारती अपनी किताब 'यादें, यादें और यादें' में लिखती हैं, "कृश्न चंदर के बेटे बीलू की शादी के सिलसिले में उनके घर पर महफ़िल जमी हुई थी. थोड़ी देर बाद बीलू के तीन दोस्त आए और वहीं बैठ गए. हमारा ध्यान बार बार उन तीनों में से एक लड़के की तरफ़ खिंचा चला जा रहा था. बड़ी बड़ी लापरवाह ज़ुल्फ़ें, बेफ़िक्र ढंग से पहने कपड़े, बड़ी दुबली पतली शख़्सियत थी उसकी."
"बहुत तेज़ ज़हीन आँखों वाला वो युवक बीच-बीच में कुछ ऐसा बोल देता था कि सब मुस्करा उठते थे. जब उस लड़के ने कालीन पर बैठ कर गाना शुरू किया, 'सरौता कहाँ भूलि आए, प्यारे नंदोइया' तो सारे नामी-गिरामी लोग वहीं ज़मीन पर आ जुटे और उसके सुर में सुर मिला कर ठेठ गवइयों के अंदाज़ में गाने बजाने लगे. ये तो बाद में पता चला कि ये महाशय तो जावेद अख़्तर साहब हैं, दर्जनों हिट फ़िल्मों के लेखक."
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सलीम से अलग होने का फ़ैसला
एक साथ कई हिट फ़िल्में देने वाले सलीम जावेद ने कुछ समय बाद एक दूसरे से अलग हो जाने का फ़ैसला किया.
मैंने जावेद अख़्तर से इसकी वजह पूछी तो उनका जवाब था, "सलीम साहब बहुत दिनों तक मेरी ज़िंदगी में फ़ादर फ़िगर की तरह रहे. किसी स्टील, सीमेंट या टेक्स्टाइल फ़ैक्ट्री में अगर मेल न हो तब भी आप पार्टनर रह सकते हैं. लेकिन जब आप स्क्रिप्ट साथ में लिखते हैं तो न कोई ऐसा तराज़ू है और न कोई ऐसा गज़ फ़ुट है जिससे आप सीन को नापतौल सकें. लेखन में इस तरह से काम करना आसान नहीं था."
"फिर हुआ क्या कि ज़िंदगी ने हमारे फ़्रेंड सर्कल अलग करा दिए. कुछ मेरे दोस्त अलग हो गए, कुछ उनके दोस्त अलग हो गए. फिर हम दोनों की शामें अलग-अलग गुज़रने लगीं और हम लोगों के बीच दूरियाँ आ गईं. एक दिन मुझे महसूस हुआ कि वो जो हमारा आपस में रिश्ता था जिसकी वजह से हम एक दूसरे की अनकही बातें भी समझ सकते थे, वो रिश्ता अब रहा नहीं तो फिर हम लोगों ने साथ काम न करने का फ़ैसला किया. वो पुल कहीं टूट गया था जिससे हम एक दूसरे को सोच और एक दूसरे के दिल तक पहुँच पाते थे."
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शबाना आज़मी से मुलाक़ात
शबाना आज़मी बताती हैं कि जावेद अख़्तर से उनकी मुलाक़ात फ़िल्म निर्देशिका सई परांजपे के घर पर हुई थी.
जावेद ने उनकी फ़िल्म स्पर्श देखी और वो उन्हें इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने सई से इसरार किया कि वो उन्हें अपने यूनिट से मिलवाएँ.
शबाना याद करती हैं कि जावेद ने वो फ़िल्म बहुत बारीकी से देखी थी और उन्हें उसके डायलॉग तक़रीबन याद हो गए थे.
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जावेद का कहना है कि उन्हें याद भी नहीं है कि वो शबाना आज़मी से पहली बार कब मिले थे. दोनों का जन्म एक ही माहौल में हुआ है.
बंबई के उस ज़माने के प्रगतिशील लेखक अली सरदार जाफ़री, कैफ़ी आज़मी, इस्मत चुग़ताई, कृश्न चंदर और राजेंदर सिंह बेदी हुआ करते थे.
सभी एक एक्सटेंडेड फ़ेमिली की तरह थे. ये सब एक दूसरे के घरों में आते-जाते थे. एक दूसरे के बच्चों को जानते थे और उनके बच्चे भी एक दूसरे को जानते थे.
इसकी बदौलत ही मेरी और शबाना की पहली मुलाक़ात हुई होगी.
शबाना आज़मी कहती हैं कि कभी-कभी लोग मज़ाक में बोलते हैं कि हमारी अरेंज मैरेज होनी चाहिए थी क्योंकि हमारे बैकग्राउंड एक जैसे हैं. मेरे पिता और उनके पिता दोस्त हुआ करते थे. जावेद कहते हैं- मैं समझता हूँ कि जो अधूरापन मुझमें था, वो शबाना से मिल कर ख़त्म हुआ.
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जावेद अख़्तर की नरमदिली
शबाना आज़मी कहती हैं, "ऊपरी तौर से ऐसा लग सकता है कि जावेद बहुत लापरवाह हैं, लेकिन वो एक ज़िम्मेदार इंसान हैं. किसी ने अगर उनके बुरे दिनों में उनका साथ दिया है उसे वो कभी नहीं भूलते. वो हमेशा कहते हैं, अगर तुमने किसी का भला किया हो तो उसे कभी याद नहीं रखना, न ही कोई उम्मीद रखना कि बदले में वो तुम्हारे लिए कुछ करेगा."
"एक दिन जानकी कुटीर की छत पर एक बिल्ली चढ़ी हुई थी, जो प्लेट से रोटी झपट कर ले जा रही थी. जब स्टाफ़ के एक आदमी ने उसे भगाने की कोशिश की तो जादू चीख़ कर बोले, ले जाने दो उसे, वो अपने बच्चों के लिए ले जा रही है. वो ऊपर से जितने सख़्त दिखाई देते हैं, अंदर से उतने ही नर्म हैं."
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शेर काफ़ी देर से कहना शुरू किया
नाज़ुक- ख़्याली जावेद अख़्तर को विरासत में मिली है.
तभी तो वो कहते हैं -
मैं और मेरी तन्हाई
अक्सर ये बातें करते हैं
तुम होती तो कैसा होता
तुम ये कहतीं तुम वो कहतीं
तुम इस बात पे हैराँ होतीं
तुम उस बात पे कितनी हँसतीं
तुम होती तो ऐसा होता
तुम होतीं तो वैसा होता
दिलचस्प बात है कि इतने बड़े गीतकार होने के बावजूद जावेद अख़्तर ने अपनी ज़िंदगी का पहला शेर 1979 में कहा.
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जावेद कहते हैं, "लड़कपन से जानता हूँ कि चाहूँ तो शायरी कर सकता हूँ लेकिन तब तक नहीं की. ये भी शायद मेरी नाराज़गी और विरासत का प्रतीक है. शेर कह कर मैंने अपनी विरासत और अपने बाप से सुलह कर ली है."
अपने पिता के बारे में पूछे जाने पर जावेद अख़्तर कहते हैं, "मेरे पिता ने एक बार मुझसे कहा था, मुश्किल ज़बान में लिखना बहुत आसान है, लेकिन आसान ज़बान में लिखना बहुत मुश्किल. उनकी शायरी में बहुत कम मुश्किल अलफ़ाज़ आते थे. उस आदमी का शब्दकोष बहुत बड़ा था."
"जाँनिसार अख़्तर की शायरी धीमी आँच की शायरी है. 18 अगस्त, 1976 को जाँनिसार अख़्तर ने इस दुनिया को अलविदा कहा. मरने से नौ दिन पहले उन्होंने अपनी आख़िरी किताब ऑटोग्राफ़ करके दी थी, जिस पर लिखा था, जब हम न रहेंगे तो बहुत याद करोगे."
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