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'ग़रीब देशों पर मंदी की मार शुरु' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने चेतावनी दी है कि वैश्विक आर्थिक मंदी की मार दुनिया के सबसे ग़रीब देशों पर पड़ने की शुरुआत हो चुकी है. मुद्राकोष ने कहा है कि इस वित्तीय वर्ष में इन देशों को 25 अरब डॉलर (क़रीब 13 सौ अरब रुपए) की अतिरिक्त सहायता की ज़रुरत पड़ सकती है. मुद्राकोष ने इसे मंदी की 'तीसरी लहर' बताते हुए कहा है कि पहली लहर ने उन्नत अर्थव्यवस्थाओं पर असर डाला था और दूसरी लहर ने उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं पर. संस्था ने दानदाताओं देशों से कहा है कि वे अपनी सहायता में कटौती न करें. अपनी एक रिपोर्ट में मुद्राकोष ने कहा है कि ग़रीब देशों पर आर्थिक मंदी का ज़्यादा व्यापक असर पड़ रहा है क्योंकि अब वे विश्व अर्थव्यवस्था से पहले की तुलना में कहीं ज़्यादा गुँथे हुए हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि व्यापार घट रहा है और विदेशी निवेश में कमी आ रही है और इसका असर यह हो रहा है कि विदेशों में काम कर रहे लोग अपने घरों में पैसे नहीं भेज पा रहे हैं.
मुद्राकोष का कहना है कि 20 देशों पर मंदी की मार का ख़तरा मंडरा रहा है जिसमें आधे से अधिक देश अफ़्रीकी हैं. रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि मंदी और गहराती है तो इससे प्रभावित होने वाले ग़रीब देशों की संख्या दोगुनी भी हो सकती है. अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के प्रमुख स्ट्रॉस काहन का कहना है, "इससे कम आय वाले देशों में आर्थिक विकास की ऊँची दर हासिल करना कठिन हो सकता है और राजनीतिक अस्थिरता आ सकती है." उनका कहना था कि किसी मानवीय त्रासदी से बचने के लिए दानदाता देशों को सहायता जारी रखनी होगी. कुल 185 देशों के प्रतिनिधित्व वाले मुद्राकोष ने कहा है कि उसने पिछले साल से ही कम आय वाले देशों के लिए सहायता बढ़ा दी है और आगे भी सहायता देने के लिए तैयार है. बीबीसी के आर्थिक मामलों के संवाददाता एंड्र्यू वॉकर का कहना है कि मुद्राकोष जो सहायता दे रहा है वह तुलनात्मक रुप से बहुत कम है. उनका कहना है कि मुद्राकोष ने मध्यम आय वाले देशों को ज़्यादा सहायता दी है क्योंकि मंदी का सबसे ज़्यादा असर उन पर पड़ा है. |
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