ड्राई आइस क्या है जिसे खाकर गुरुग्राम के रेस्टोरेंट में लोगों के मुंह से आने लगा ख़ून

ड्राई आइस

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

राजधानी दिल्ली से सटे गुरुग्राम से पांच लोगों के माउथ फ़्रेशनर खाकर बीमार होने का मामला सामने आया है.

इस मामले में दर्ज की गई एफ़आईआर में कहा गया है कि 2 मार्च को छह लोग शाम में गुरुग्राम के निजी रेस्टोरेंट में खाना खाने गए.

खाना खाने के बाद रेस्टोरेंट के वेटर ने उन्हें माउथ फ़्रेशनर ऑफर किया, जिसे केवल पांच लोगों ने खाया.

माउथ फ़्रेशनर खाने के बाद पांच लोगों का मुंह जलने लगा और ख़ून निकलने लगा.

एफ़आईआर में लिखा गया है कि छठवें व्यक्ति ने माउथ फ़्रेशनर नहीं खाया क्योंकि उनके गोद में बच्चा था और इस व्यक्ति ने ज़ोर देकर जब वेटर से पूछा कि क्या खिलाया है तो उसने एक पॉलिथिन दिखाया.

इन लोगों ने उस पॉलिथिन के पैकेट को अपने क़ब्ज़े में ले लिया और 100 नंबर पर पुलिस मदद के लिए फ़ोन किया.

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माउथ फ़्रेशनर खाकर पांच लोगों की तबीयत बिगड़ते देख उन्हें गुरुग्राम स्थित निजी आरवे अस्पताल में भर्ती कराया गया और डॉक्टर को पॉलिथिन दिखाया गया जिसमें माउथ फ़्रेशनर दिया गया था.

एफ़आईआर के अनुसार अस्पताल के डॉक्टर ने पॉलिथिन में मौजूद चीज़ को ड्राई आइस बताया और इन लोगों ने उस पॉलिथिन को अस्पताल को दे दिया.

इस मामले में एक पीड़ित, अंकित से बीबीसी ने बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने ये कहकर बात करने से मना कर दिया कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है और मीडिया में सभी जानकारी मौजूद होने की बात कही.

इस मामले में पूछताछ जारी है, मालिक और स्टाफ़ के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया है और मैनेजर को गिरफ़्तार कर लिया गया है.

इस मामले में पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 328, 120बी लगाई है.

वकील सोनाली कड़वासरा इन धाराओं के बारे में बताते हुए कहती हैं, ''आईपीसी की धारा 328, अपराध करने के इरादे से ज़हर आदि के द्वारा चोट पहुंचाने से संबंधित है. वहीं धारा 120बी किसी अपराध की आपराधिक साज़िश से संबंधित है.''

वो कहती हैं, ''गुरुग्राम के इस मामले में लापरवाही नज़र आती है लेकिन 'इरादा' स्थापित कर पाना मुश्किल हो सकता है. पुलिस को इस मामले में संबंधित व्यक्तियों से जांच करनी होगी.''

क्या होती है ड्राई आइस?

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दिल्ली स्थित सीके बिरला हॉस्पिटल में इंटरनल मेडिसिन में निदेशक डॉक्टर राजीव गुप्ता बताते हैं कि ड्राई आइस या जिसे सूखी बर्फ़ भी कहते हैं वो कॉर्बन डाइऑक्साइड का ठोस रूप होता है. इसे न्यूनतम तापमान क़रीब -78 डिग्री सेल्सियस में रखा जाता है.

इसका इस्तेमाल चीज़ों को फ्रीज़ या ठंडा करने के लिए किया जाता है और ये सामान्य बर्फ़ की तरह गीली नहीं होती है.

डॉक्टर राजीव गुप्ता कहते हैं, ''आमतौर पर ड्राई आइस सुरक्षित होती है लेकिन उसका तापमान कम होने की वजह से अगर ये त्वचा के संपर्क में आती है तो फ्रोस्टबाइट या कोल्ड बर्न (ठंड की वजह से त्वचा जल जाना) जैसी समस्या हो सकती है.

एनेस्थीसियोलॉजिस्ट, डॉक्टर सचिन मित्तल बताते हैं कि ड्राई आइस, सामान्य बर्फ़ की तरह ही सफ़ेद दिखती है लेकिन आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली बर्फ़ पानी (एचटूओ) को एक तापमान पर जमा कर बनाई जाती है लेकिन ड्राई आइस कार्बन डाइऑक्साइड का ठोस प्रकार होता है और हवा से रिएक्शन की वजह से इससे धुआँ निकलता रहता है.

गुरुग्राम के मैक्स अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन में निदेशक, डॉक्टर आशुतोष शुक्ला कहते हैं, ''जब सामान्य बर्फ पिघलती है तो वो पानी बन जाती है और पानी को जलाने पर वाष्प निकलती है लेकिन ड्राई आइस जब पिघलती है तो वो पानी बनने की बजाए सीधा गैस बनती है. अगर किसी बंद जगह पर ये ज़्यादा मात्रा में रह जाए तो नुक़सानदेह हो सकती है.''

रेस्टोरेंट में ड्राई आइस लेने के बाद क्या हुआ?

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डॉक्टर आशुतोष शुक्ला का कहना है कि जब इन पांच लोगों ने ड्राई आइस के टुकड़े खाए तो ठंड के कारण उनके मुंह में अल्सर हो गए और उससे ख़ून आना शुरू हो गया.

डॉक्टर बताते हैं कि ड्राई आइस को बिना दस्ताने पहने इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे त्वचा जल सकती है.

डॉक्टर सचिन मित्तल समझाते हुए बताते हैं, ''ड्राई आइस बहुत ठंडी होती है ऐसे में पेट में जाते ही वो वहां छेद बना देती है. जो काफ़ी जानलेवा हो सकता है. वहीं इसकी गैस अगर फेफड़ों में जाती है तो इससे बेहोशी हो सकती है.''

डॉक्टर सचिन मित्तल कहते हैं कि ड्राई आइस की कितनी मात्रा नुक़सान देह हो सकती है ये कहना मुश्किल है लेकिन उदाहरण से समझें तो अगर बच्चा 30 ग्राम का टुकड़ा खा लेता है तो वो नुक़सान देह हो सकता है क्योंकि जहां वो जाता है वहां की त्वचा को चीर देता है.

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ड्राई आइस का इस्तेमाल किसलिए होता है?

डॉक्टर सचिन मित्तल बताते हैं कि आजकल ड्राई आइस का चलन चल पड़ा है.

रेस्टोरेंट में जहां खाने की चीज़ों को आकर्षित दिखाने के लिए धुंआ दिखाकर इसका इस्तेमाल होता है वहीं शादियों या समारोह में दुल्हन या दूल्हे की एंट्री के समय फॉग के ज़रिए एक इफ़ेक्ट बनाने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा है.

लेकिन अगर बंद कमरे में ड्राई आइस के धुएं का इस्तेमाल होता है तो इससे शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो सकती है, कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ़ सकता है और बेहोशी जैसी हालत हो सकती है.

ड्राई आइस का उपयोग लंबे समय तक चीज़ों को सरंक्षित करने के लिए भी होता है.

डॉक्टरों का कहना है कि ड्राई आइस का इस्तेमाल औद्योगिक ज़रूरतों के लिए होता था क्योंकि ये बेहतरीन कूलिंग एजेंट होता है.

इसका इस्तेमाल खाद्य पदार्थों को सरंक्षित करने के लिए भी होने लगा क्योंकि इससे तापमान -30 डिग्री सेंटीग्रेट तक ले जाया जा सकता है.

लिक्विड नाइट्रोजन और ड्राई आइस

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इमेज कैप्शन, लिक्विड नाइट्रोजन का इस्तेमाल भी होता है.

साल 2017 में ये ख़बर आई थी कि दिल्ली में एक व्यक्ति ने बार में ग़लती से ऐसा ड्रिंक पी लिया जिसमें लिक्विड नाइट्रोजन था.

दरअसल इस व्यक्ति को उनके ड्रिंक से निकल रहे धुएं को हटने के बाद लेना था लेकिन वह उसे ऐसे ही पी गए जिसकी वजह से उन्हें दर्द, पेट में सूजन और सांस लेने में तकलीफ़ होने लगी.

इस व्यक्ति को अस्पताल ले जाया गया. वहां उनकी सर्जरी हुई जिसमें ये पाया गया कि उनके पेट में एक बड़ा छेद हो चुका है.

डॉक्टर कहते हैं कि ऐसे ड्रिंक्स या खाने में ऐसे इफेक्ट देखकर उसे आकर्षक बनाया जाता है और उसे भी कूलिंग के लिए किया जाता है.

डॉक्टर सचिन मित्तल कहते हैं कि हालांकि नाइट्रोजन इतनी ख़तरनाक नहीं होती जितनी ड्राई आइस होती है क्योंकि वो शरीर में जल्दी अब्सॉर्ब करती है लेकिन ढंग से न इस्तेमाल किया जाए तो हानिकारक हो सकता है.

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इमेज कैप्शन, शादियों में इफेक्ट डालने के लिए ड्राई आइस का चलन बढ़ रहा है.

सोनाली कड़वासरा कहती हैं कि ये घटना संभावित ख़तरनाक उत्पादों के बारे में उपभोक्ताओं को जागरूक करने के महत्व को बताती है जिसका संज्ञान उपभोक्ता न्यायालय ले सकते हैं.

वहीं डॉक्टरों का कहना है कि ड्राई आइस या लिक्विड नाइट्रोजन का इस्तेमाल खाद्य पदार्थों को आकर्षक और लुभाने के लिए हो रहा है लेकिन पेय या व्यंजनों में इसका इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.

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