श्रीलंका सरकार के मंत्री बोले- कच्छतीवु द्वीप भारत को लौटाने का कोई इरादा नहीं

- Author, टीम बीबीसी तमिल और बीबीसी सिंहला
- पदनाम, .
कच्छतीवु द्वीप पर बीते दिनों से चर्चा तेज़ हुई है.
अब कच्छतीवु द्वीप के मामले में श्रीलंका सरकार में मत्स्य पालन विभाग के मंत्री डगलस देवानंद ने प्रतिक्रिया दी है.
डगलस देवानंद ने बीबीसी से कहा, "श्रीलंका का कच्छतीवु द्वीप भारत को लौटाने का कोई इरादा नहीं है."
डगलस देवानंद ने ये बातें गुरुवार शाम को पत्रकारों से जाफना में कहीं.
कच्छतीवु तमिलनाडु के पास स्थित द्वीप है और ये श्रीलंका-भारत के बीच में पड़ता है. हाल ही में एक मीडिया रिपोर्ट में आरटीआई के हवाले से दावा किया गया था कि 1974 में भारत सरकार के 'ढुलमुल रवैये' के कारण ये द्वीप श्रीलंका के पास चला गया. पीएम मोदी ने इस बात को लेकर इंडिया गठबंधन को घेरा था.
श्रीलंका के मंत्री और क्या बोले?

डगलस देवानंद ने कहा कि भारत अपने हितों को ध्यान में रखते हुए कन्याकुमारी के पास वेज बैंक से अदला-बदली कर सकता है.
डगलस देवानंद ने वेज बैंक इलाके में समृद्ध संसाधनों का ज़िक्र करते हुए भारत के इरादों पर सवाल भी उठाए.
सरकार में मंत्री के अलावा श्रीलंका के मछुआरा समुदाय ने भी कच्छतीवु द्वीप को भारत को लौटाने की चर्चा को ख़ारिज किया है.
देवानंद ने कहा, "कच्छतीवु द्वीप भारत का है या श्रीलंका का? इसे लेकर बहस होती रही है. ये मुद्दा चुनावों को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है."
वो बोले, "1974 में भारत और श्रीलंका की सरकार के बीच कच्छतीवु द्वीप को लेकर समझौता हुआ था. इस समझौते के मुताबिक़, भारतीय मछुआरे श्रीलंका के जलक्षेत्र में जा सकते थे और श्रीलंकाई मछुआरे भारतीय जलक्षेत्र में जा सकते थे. फिर 1976 में इस पर रोक लग गई. नतीजतन दोनों देशों के मछुआरों का दूसरे के क्षेत्र में जाना बंद हो गया."
वेज बैंक का ज़िक्र करते हुए देवानंद कहते हैं, "वेज बैंक कन्याकुमारी के नज़दीक है और संपन्न है. ये इलाका कच्छतीवु द्वीप से 80 गुना बड़ा है. इसे 1976 में हुए समझौते के तहत भारत ने हासिल किया था."
देवानंद ने वेज बैंक को भारत को दिए जाने पर भी चिंताएं ज़ाहिर की और कहा- "भारत ने इस इलाके के मत्स्य संसाधनों को ध्यान में रखते हुए और श्रीलंकाई मछुआरों को रोकने के लिए इस इलाके को शामिल किया होगा."
वो बोले, "कच्छतीवु को भारत को लौटाने का कोई आधार ही नहीं बनता."
श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे की कैबिनेट के मंत्री जीवन थॉनडमन ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में कहा, "जहां तक श्रीलंका की बात है, कच्छतीवु श्रीलंका में है. बीजेपी की नरेंद्र मोदी सरकार के श्रीलंका से अच्छे संबंध हैं. अब तक कोई आधिकारिक बातचीत कच्छतीवु को लेकर नहीं हुई है. ऐसे किसी आरोप पर श्रीलंका का विदेश मंत्रालय जवाब देगा."
क्या भारत और श्रीलंका सरकार के बीच कच्छतीवु को लेकर किसी तरह की बातचीत चल ही है? जीवन थॉनडमन इससे इनकार करते हैं.
जानकारों का क्या कहना है?

श्रीलंका में अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार डॉ हसीथ कानडूदहेवा ने बीबीसी सिंहला सेवा से कहा, "नरेंद्र मोदी कच्छतीवु का मुद्दा इसलिए उठा रहे हैं ताकि कांग्रेस को घेर सकें और तमिलनाडु में वोटर्स को भरोसा जीत सकें."
वो कहते हैं कि एक समझौते के तहत कच्छतीवु द्वीप को श्रीलंका को भले ही सौंपा गया हो मगर भारतीय संविधान से इस द्वीप का अधिकार हटाया नहीं गया है.
डॉ हसीथ की मानें तो भारत कई तरह से कच्छतीवु द्वीप को वापस हासिल कर सकता है.
वो कहते हैं, "सबसे पहले तो भारत की सरकार को देश के सुप्रीम कोर्ट में केस दाखिल करना चाहिए और वहां से आदेश मिलने पर वो इसे वापस हासिल कर सकते हैं. या फिर वो राजनयिक बातचीत के ज़रिए इसे हासिल कर सकते हैं. लेकिन ये थोड़ा जटिल है."
हालांकि डॉ हसीथ ये भी कहते हैं कि चुनावों के दौरान पीएम मोदी ये सब बातें करते हैं और ये उम्मीद कम ही है कि वो इस मुद्दे को आगे ले जाएंगे.
जाफना में भारत के डिप्टी अंबेसडर रह चुके नटराजन ने बीबीसी तमिल से कहा, "अगर कोई ये कहता है कि हम श्रीलंका से कच्छतीवु द्वीप को फिर ले सकते हैं तो ये संभव नहीं है. कच्छतीवु द्वीप के मामले में सुप्रीम कोर्ट फैसला सुना चुका है. ये कहानी ख़त्म हो चुकी है."
वो कहते हैं, "कच्छतीवु द्वीप पूर्व भारतीय पीएम इंदिरा गांधी की ओर से दिया गया था. तमिलनाडु सरकार इसमें कुछ नहीं कर सकती थी. ये फैसला पूरी तरह से केंद्र सरकार का था. ये फैसला सही था या गलत, इसकी ज़िम्मेदारी पूरी तरह से केंद्र सरकार को लेनी चाहिए."
श्रीलंका के मछुआरों का क्या कहना है?

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बीबीसी ने इस मसले पर श्रीलंका के मछुआरों से भी बात की है.
इन मछुआरों का कहना है कि वो कच्छतीवु द्वीप भारत को लौटा नहीं सकते.
बीबीसी तमिल से जाफना के फिशिंग फेडरेशन चेल्लाथुरई नाराकुनम ने कहा, "कच्छतीवु एक ख़त्म अध्याय है. ये सिर्फ़ हमारा है. अगर भारत में इसकी बात हो रही है तो इसके सिर्फ राजनीतिक मतलब हैं."
नाराकुनम ने वेज बैंक इलाके पर भी अपनी बात रखी.
वो बोले, "इस इलाके में मछुआरों के लिए काफी कुछ है. कच्छतीवु द्वीप क़ानूनी तौर पर हमारा है. हम ये द्वीप किसी हालत में नहीं छोड़ेंगे. हमारे पास ऐसी नावें हैं जो अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में जा सकती हैं और मछली पकड़ सकते हैं. अगर भारत कच्छतीवु मांगता है तो हम भी वेज बैंक मछली पकड़ने के लिए जाएंगे."
कहां से शुरू हुआ विवाद?

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31 मार्च 2024.
पीएम मोदी ने टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट को सोशल मीडिया पर शेयर किया. इस रिपोर्ट में जो आरटीआई लगाई गई है, वो तमिलनाडु के बीजेपी चीफ़ के. अन्नामलाई ने दायर की थी.
पीएम मोदी ने लिखा, "आंख खोल देने वाली और हैरान करने वाली बात सामने आयी है. नए तथ्य बताते हैं कि कैसे कांग्रेस ने कच्छतीवु द्वीप श्रीलंका को दे दिया. इससे सभी भारतीयों में गुस्सा है और लोगों के दिमाग में फिर से ये बात साफ़ हो गई है कि वह कांग्रेस पर यकीन नहीं कर सकते."
वो बोले, "भारत की एकता को कमज़ोर करना, भारत के हितों को नुकसान पहुंचाना कांग्रेस के 75 साल के कामकाज का तरीका रहा है."
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी कच्छतीवु द्वीप पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की.
जयशंकर ने कहा, "तमिलनाडु कहता है कि ये राजा रामनाथ की रियासत थी. भारत का कहना है कि ऐसा कोई भी दस्तावेज़ नहीं है जिससे ये दावा हो कि कच्छतीवु श्रीलंका का हिस्सा रहा है. 1960 के दौर से ये मुद्दा शुरू हुआ. 1974 में भारत और श्रीलंका के बीच एक समझौता हुआ और मैरीटाइम सीमा दोनों देशों के बीच तय की गई."
कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, "साल 1974 में एक 'दोस्ताना समझौते' के तहत ये द्वीप दिया गया था, ठीक उसी तरह जिस तरह मोदी सरकार ने बांग्लादेश के साथ 'बॉर्डर एनक्लेव' को लेकर एक समझौता किया."
कांग्रेस की सहयोगी दल और तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके की ही सरकार साल 1974-75 में भी थी और उस समय राज्य के मुख्यमंत्री थे एम. करुणानिधि.
कच्छतीवु का इतिहास क्या है?

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कच्छतीवु एक 235 एकड़ का टापू है जो भारत और श्रीलंका के बीच पाक जलडमरूमध्य में पड़ता है.
इस स्ट्रेट का नाम रॉबर्ट पाक के नाम पर रखा गया था जो 1755 से 1763 तक मद्रास प्रांत के गवर्नर थे.
पाक स्ट्रेट को समुद्र नहीं कहा जा सकता. मूंगे की चट्टानों और रेतीली चट्टानों की प्रचूरता के कारण बड़े जहाज़ इस क्षेत्र से नहीं जा सकते.
'द गज़ेटियर' के मुताबिक़, 20वीं सदी की शुरुआत में रामनाथपुरम (रामनाड के राजा) ने यहां एक मंदिर का निर्माण कराया था और थंगाची मठ के एक पुजारी इस मंदिर में पूजा करते थे. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने इस द्वीप पर कब्ज़ा कर लिया.
कच्छतीवु बंगाल की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है.
मालगुज़ारी के रूप में रामनाथपुरम के राजा का जो दस्तावेज़ मिलता है उसके हिसाब-किताब में कच्छतीवु द्वीप भी शामिल था.
रामनाथपुरम के राजा ने द्वीप के चारों ओर मछली पकड़ने का अधिकार, द्वीप पर चराने का अधिकार और अन्य उद्देश्यों के लिए इसका उपयोग करने का अधिकार पट्टे पर दिया था.
दोनों देशों के बीच लंबे समय तक इस द्वीप को लेकर विवाद रहा और साल 1974 में भारत ने श्रीलंका को द्वीप दे दिया.
साल 1974 से 1976 की अवधि के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने श्रीलंका की तत्कालीन राष्ट्रपति सिरीमावो भंडारनायके के साथ चार सामुद्रिक सीमा समझौते पर दस्तखत किए थे.
इन्हीं समझौते के फलस्वरूप कच्छतीवु श्रीलंका के अधीन चला गया.
लेकिन तमिलनाडु की सरकार ने इस समझौते को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था और ये मांग की थी कि कच्छतीवु को श्रीलंका से वापस लिया जाए.
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