श्रीलंका के मीडिया में पीएम मोदी के बयान पर ग़ुस्सा और नाराज़गी क्यों

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कच्छतीवु द्वीप पर पीएम मोदी, बीजेपी और कांग्रेस के आरोप-प्रत्यारोप के बाद इस पर श्रीलंका में भी बहस शुरू हो गई है.
इस मसले पर अब तक श्रीलंका के विदेश मंत्रालय का कोई बयान नहीं आया है लेकिन वहाँ के मीडिया ने इस पर कड़ा रुख़ दिखाया है.
हालांकि, अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस से श्रीलंका सरकार में मंत्री जीवन थोंडामन ने कहा था कि इस मुद्दे पर भारत सरकार से उनकी कोई बात नहीं हुई है, अगर इस तरह की बात होती है तो इसका जवाब विदेश मंत्रालय देगा.
वहीं, श्रीलंका के मीडिया ने इस मुद्दे को बेहद गंभीरता से उठाया है.
साथ ही श्रीलंका के मछुआरों के संगठनों ने श्रीलंका सरकार से मांग की है कि वो भारत सरकार के साथ इस मुद्दे को ज़ोर-शोर से उठाए.
क्या कह रहा है श्रीलंका का मीडिया
श्रीलंका के डेली मिरर श्रीलंका, डेली फ़ाइनैंशियल टाइम्स, डेली न्यूज़ जैसे अंग्रेज़ी अख़बारों ने इस मुद्दे पर ख़बर प्रकाशित करने के साथ-साथ संपादकीय भी छापे हैं.
इस मुद्दे पर विवाद शुरू होने के बाद डेली मिरर श्रीलंका ने पहला संपादकीय मंगलवार को छापा और उसका शीर्षक दिया ‘मोदी कच्छतीवु चाहते हैं, तमिलनाडु में ये चुनाव का समय है.’
डेली मिरर ने लिखा है कि ‘मेरठ उत्तर प्रदेश में (चेन्नई से 2232 किलोमीटर दूर) बीजेपी की रैली में भारतीय प्रधानमंत्री को अचानक इंदिरा गांधी के साइन किए गए समझौते में गड़बड़ियां दिखने लगीं, जिसमें श्रीलंका के साथ उन्होंने कच्छतीवु द्वीप पर भारत के दावे को त्याग दिया था.’
“जी हां, आपने सही समझा यह भारत में चुनाव का समय है और बीजेपी भारत के सुदूर दक्षिण राज्य तमिलनाडु में कभी भी सत्ता में नहीं आ सकती है.”
इसके साथ ही इस आलेख में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर की भी निंदा की गई है.
इसमें लिखा गया है, “विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कांग्रेस पार्टी और सत्तारूढ़ डीएमके की कच्छतीवु द्वीप मुद्दे को लेकर निंदा की. आमतौर पर बेहद शांत रहने वाले विदेश मंत्री ने एक क़दम आगे बढ़ते हुए ये तक कह दिया कि कच्छतीवु द्वीप श्रीलंका को सौंपने के समय भारतीय मछुआरों और उनकी नावों को ज़ब्त कर लिया गया और उन्हें हिरासत में ले लिया गया. ऐसा लगता है कि पीएम मोदी और विदेश मंत्री भारतीय तमिल मछुआरों के कथित उत्पीड़न को आधार बनाकर तमिलनाडु में श्रीलंका विरोधी भावना को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं.”
अख़बार ने लिखा है, “श्रीलंका के लोग भारतीय नेताओं से अधिक उम्मीद करते हैं और अक्सर अपने शीर्ष नेताओं को भी एक राजनीतिज्ञ के तौर पर देखते हैं न कि अवसरवादी राजनेता के तौर पर. महान भारतीय शख़्सियत जैसे कि महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, इंदिरा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री जैसे नाम ज़हन में आते हैं लेकिन दुख होता है कि भारतीय विदेश मंत्री ने भी राजनीतिक कौशल का अपना सारा दिखावा छोड़ दिया और तमिलनाडु में कुछ वोटों के लिए सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने के लिए अपने प्रधानमंत्री से हाथ मिला लिया.”
हालांकि भारत ने श्रीलंका को हर मुश्किल वक़्त में साथ दिया है. श्रीलंका जब-जब आर्थिक संकट में फँसा है, भारत ने मदद की है.
‘श्रीलंका को उसके हाल पर छोड़ दिया जाए’

श्रीलंकाई अख़बार डेली मिरर ने संपादकीय में लिखा है, श्रीलंका के मामलों में भारत तक़रीबन तीन दशकों से दख़ल देता रहा है, जिस दौरान एक लंबा गृह युद्ध छिड़ा हुआ था और देश की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई थी.
डेली मिरर ने लिखा है, “हमें उम्मीद है कि भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक समस्या के लिए श्रीलंका को नहीं घसीटा जाएगा और श्रीलंका चाहता है कि उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाए.”
डेली मिरर श्रीलंका अख़बार में बुधवार को एक दूसरा लेख छपा है जिसका शीर्षक है- ‘कच्छतीवु पर श्रीलंका की संप्रभुता पर कभी शक नहीं रहा.’
इस लेख में बताया गया है कि “कई सालों तक बंजर और निर्जन रहा यह द्वीप सौ वर्षों से भी अधिक समय से विवादास्पद मुद्दा बना रहा है. कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों में सचिव रहे और समुद्री सीमा समझौते को अंतिम रूप देने वाली टीम में ख़ास भूमिका निभाने वाले डब्ल्यू.टी. जयसिंघे ने इस ग़लतफ़हमी को दूर किया है कि भारत ने सद्भावना दिखाते हुए श्रीलंका को कच्छतीवु द्वीप ‘तोहफ़े’ में दिया था या ‘सौंप’ दिया था.”
इसमें आगे बताया गया है कि जयसिंघे ने ‘कच्छतीवु: एंड द मैरीटाइम बाउंड्री ऑफ़ श्रीलंका’ नामक किताब लिखी है, जिसमें कच्छतीवु मुद्दे और दोनों देशों के बीच समुद्री सीमांकन के बारे में बताया गया है.
अख़बार ने अपने लेख में लिखा है, “कच्छतीवु पर श्रीलंका की संप्रभुता पर कभी शक नहीं रहा है और वास्तव में कच्छतीवु मुद्दे ने श्रीलंका और भारत के बीच समुद्री सीमा को तय किया है. यह किताब बताती है कि कैसे भारतीय मछुआरे श्रीलंका के समुद्री क्षेत्र में अवैध तरीक़े से मछली पकड़ा करते थे लेकिन क़ानून बन जाने से दोनों देशों की सीमा के अंदर मछली पकड़ने का इलाक़ा तय हो पाया.”
‘राजनीतिक लाभ के लिए मुद्दे को ज़िंदा किया जा रहा’

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श्रीलंका के एक दूसरे बड़े बिज़नेस अख़बार डेली फ़ाइनैंशियल टाइम्स ने भी इस मुद्दे पर संपादकीय प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक है- कच्छतीवु कभी भारत का नहीं था जो ‘दे दिया’.
इसमें लिखा है, “एक मुद्दा जो दशकों पहले राजनयिक बातचीत से सुलझा लिया गया है, उसे हाल में राजनीतिक लाभ के लिए दोबारा ज़िंदा किया जा रहा है. तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करना और पड़ोसी दोस्त को बिना बात के उकसाने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं.”
“भारतीय नेताओं के बीच यह चर्चित कहानी है कि भारत सरकार ने श्रीलंका को यह तोहफ़े में दे दिया था. लेकिन सच बेहद बारीक है. दोनों देशों के बीच बातचीत काफ़ी लंबी और दो कार्यकालों तक चली. बाद में 1970 के दशक में मुद्दे को सुलझाते हुए श्रीलंका की संप्रभुता को स्वीकार किया गया.”
“इस समझौते के तहत भारतीय मछुआरों को वहाँ अपने जाल सुखाने और बिना किसी वीज़ा की औपचारिकताओं के भारत के श्रद्धालुओं को वहाँ मौजूद चर्च के सालाना त्योहार में आने की अनुमति दी गई. ये प्रथा आज भी जारी है.”
अख़बार ने संपादकीय में लिखा है, “बाद की भारतीय सरकारें भी मानती रही हैं कि कच्छतीवु मुद्दा सुलझ चुका है. साल 2008 में एक केस की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया था कि कच्छतीवु को श्रीलंका से वापस लेने का सवाल कभी उठा नहीं क्योंकि भारत के किसी भी क्षेत्र को श्रीलंका को नहीं सौंपा गया है.”
“ख़ासतौर पर भारत में सत्ता के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों की ओर से श्रीलंकाई क्षेत्र पर लगातार भड़काऊ दावे हमारे देश को अपनी सुरक्षा की गारंटी लेने के लिए कहीं और जाने पर ज़ोर देंगे. अशोक से कूटनीति और कौटिल्य से रणनीति की कला सीखने के बाद ये सभी के लिए दुखद होगा कि अगर श्रीलंका राजमंडल की विदेश नीति सिद्धांत पर ‘शत्रु को निकट’ भांपते हुए कहीं और ‘दोस्तों’ को ढूंढे.”
मछुआरा समुदाय का वोट बैंट

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डेली न्यूज़ अख़बार ने इस मुद्दे पर एक लेख छापा है जिसका शीर्षक है- कच्छतीवु की राजनीति.
इसमें बताया गया है कि कच्छतीवु द्वीप भारत और श्रीलंका के बीच पाक स्ट्रेट में आधी-आधी दूरी पर है और इस मुद्दे को तमिलनाडु में डीएमके और एआईएडीएमके जैसे द्रविड़ राजनीतिक दल मछुआरे समुदाय के बड़े वोट बैंक के लिए उठाते रहे हैं.
लेख में लिखा है, “कच्छतीवु 285.2 एकड़ का एक छोटा सा द्वीप है जो रामेश्वरम से 10 मील की दूरी पर है. तमिलनाडु के मछुआरे यहाँ सदियों से मछलियां पकड़ रहे हैं, वो इससे आगे बढ़कर उत्तरी श्रीलंका के समुद्र तट पर मछलियां पकड़ने चले जाते हैं. उन्हें श्रीलंका की नौसेना गिरफ़्तार करती है, जिसके बाद तमिलनाडु के राजनीतिक दल इस पर हाय-तौबा मचाते हैं. इसके बाद भारत सरकार इसमें कूटनीतिक तरीक़े से दख़ल देती है और मछुआरे रिहा होते हैं. यह चक्र साल दर साल चला आ रहा है और इसका अंत नहीं है.”
“इसी के मद्देनज़र तमिलनाडु के राजनेता लगातार कच्छतीवु को श्रीलंका से ‘वापस’ लेने की मांग करते रहते हैं. एआईएडीएमके (2008 में) और डीएमके (2013 में) इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का रुख़ कर चुके हैं लेकिन उनको कहा जा चुका है कि इस द्वीप की वर्तमान स्थिति को लेकर समझौता हो चुका है, जिसे पलटा नहीं जा सकता है.”
वहीं द आइलैंड ऑनलाइन नामक श्रीलंका के न्यूज़ पोर्टल में आठ महीने पहले एक ख़बर प्रकाशित हुई थी, जिसमें म्यांमार में श्रीलंका के पूर्व राजूदत ने कहा था कि पीएम मोदी कच्छतीवु को लेकर राजनीतिक खेल खेल रहे हैं.
पूर्व राजदूत प्रोफ़ेसर नलिन डिसिल्वा ने पीएम मोदी की निंदा करते हुए कहा था कि उनका बयान संसदीय चुनावों में दक्षिण भारतीय समर्थन को जुटाना है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 अगस्त 2023 को लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान अपने भाषण के दौरान कच्छतीवु को श्रीलंका को देने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ज़िम्मेदार ठहराया था.
डिसिल्वा ने कहा था कि कच्छतीवु पर सेंट एंथनी चर्च के सालाना कार्यक्रम में भारतीय बिना वीज़ा के आ-जा सकते हैं. साथ ही उन्होंने कहा था कि भारतीय मछुआरों का श्रीलंका के तमिल विरोध करते हैं.
हालिया विवाद कैसे शुरू हुआ

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बीते रविवार को टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक आरटीआई के हवाले से रिपोर्ट छापी थी जिसमें ये दावा किया गया कि 1974 में भारत सरकार के 'ढुलमुल रवैये' के कारण कच्छतीवु द्वीप श्रीलंका के पास चला गया था.
ये आरटीआई तमिलनाडु के बीजेपी चीफ़ के. अन्नामलाई ने दायर की थी जिसके जवाब में ये जानकारी सामने आयी.
इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक तमिल टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में और उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुई चुनावी रैली में ये मुद्दा उठाया.
बीते सोमवार को भी ये मामला तूल पकड़ता गया और विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी कच्छतीवु द्वीप पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की.
कच्छतीवु पर कांग्रेस को घेरे जाने के बाद उसका भी जवाब आया.
कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस मुद्दे और पीएम मोदी के आरोपों की टाइमिंग पर सवाल उठाया.
उन्होंने कहा कि क्या पीएम मोदी ने चीन को क्लीन चिट दे दी है जिसकी वजह से भारत के 20 जवानों ने गलवान में 'बलिदान' दिया.
खड़गे ने इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि साल 1974 में एक 'दोस्ताना समझौते' के तहत ये द्वीप दिया गया था ठीक उसी तरह जिस तरह मोदी सरकार ने बांग्लादेश के साथ ‘बॉर्डर एनक्लेव को लेकर’ एक समझौता किया.
खड़गे ने एक्स पर साल 2015 में पीएम मोदी के बयान का ज़िक्र किया जिसमें उन्होंने कहा था कि “भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा समझौता सिर्फ ज़मीन के रिअलाइनमेंट के बारे में नहीं है, यह दिलों के मिलन के बारे में है.”
खड़गे ने कहा, “आपकी सरकार में दोस्ताना भाव में 111 एनक्लेव बांग्लादेश को दे दिए गए और 55 एनक्लेव भारत के पास आए."
एक अगस्त 2015 को भारत और बांग्लादेश के बीच 162 एनक्लेव (सीमा पर पड़ने वाले छोटे इलाक़े) की अदला-बदली हुई थी.
इस समझौते के तहत 51 एनक्लेव जो बांग्लादेश के पास थे उसने भारत को दे दिए और 111 एनक्लेव जो भारत के पास थे वो भारत ने बांग्लादेश को दे दिए. दोनों देशों के बीच 119 वर्ग किलोमीटर के एनक्लेव हैं.
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