ग़ज़ा की लड़ाई रोकने के लिए हो रही वार्ताओं में क्या हैं रुकावटें?

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- Author, मुहन्नद टुटनजी
- पदनाम, बीबीसी अरबी सेवा
ग़ज़ा में इसराइल और हमास के बीच युद्धविराम में देरी हो रही है. हालांकि दोनों ही पक्ष मतभेदों को दूर करने के लिए प्रयास कर रहे हैं.
इसराइल और हमास के अधिकारियों की ओर से हाल ही में दिए गए कुछ बयानों के अलावा मध्यस्थों ने जो टिप्पणियां की हैं उनसे तो यही संकेत मिलता है कि समझौता ज़्यादा दूर नहीं है.
मतलब, दुनिया जल्द ही अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर होते हुए देखेगी. मगर फ़िलहाल बात आगे नहीं बढ़ पा रही है.
इसराइली रेडियो की ख़बरों से पता चलता है कि इसराइल की नई शर्तों की वजह से हमास के साथ समझौता होने में देरी हो सकती है. और अब हमास भी कुछ मांगें रख रहा है.

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इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने कहा कि इस मामले में वो सावधानी के साथ आगे बढ़ रहे हैं.
हालांकि उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि उनको नहीं पता कि किसी समझौते को अमल में लाने में कितना समय लगेगा.
इस बीच, अमेरिका, मिस्र, क़तर और हाल ही में तुर्की ने ग़ज़ा पट्टी में इसराइल और हमास के बीच 14 महीने से जारी जंग को रोकने के लिए मध्यस्थता के प्रयास शुरू किए हैं.
एक अनुमान के मुताबिक़ इस युद्ध में अब तक लगभग 45 हज़ार लोग मारे जा चुके हैं.
नए हालात और जटिलताएं

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इसराइली रेडियो के मुताबिक, नेतन्याहू की कैबिनेट अब चाहती है कि हमास उन इसराइली बंधकों की पूरी सूची दे, जो अब तक उनकी कैद में हैं.
इससे पहले इसराइल फ़लस्तीनी कैदियों की सूची देने के लिए तैयार हो गया था. इन कैदियों को समझौते के पहले चरण में रिहा किया जाना था.
हालांकि कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि इसराइल ने हाल ही में जो नई शर्त रखी है, उसने समझौते की राह में रुकावट पैदा की है. और हमास ने भी मांगी गई सूची अब तक नहीं सौंपी है.
ऐसी भी ख़बरें हैं कि अमेरिकी मध्यस्थ क़तर की राजधानी दोहा को छोड़कर चले गए हैं. क़तर में ही युद्धविराम की कोशिश में वार्ताएं हो रही थीं. इससे यह संकेत मिला है कि कुछ मुद्दों को लेकर बात नहीं बन पा रही थी.
कुछ अमेरिकी सूत्रों के मुताबिक पहले चरण में रिहा किए जाने वाले इसराइली बंधकों की संख्या और फ़लस्तीनी बंधकों की पहचान पर सहमति नहीं बन पा रही है.
इसके अलावा युद्धविराम के बाद ग़ज़ा पर शासन कौन करेगा, इसपर पर सहमति नहीं है. इसमें इसराइल के ग़ज़ा से हटने, विस्थापितों को वापस लौटने की अनुमति देने और सीमा पार प्रशासन पर सहमति बनाने जैसी बातें शामिल हैं.
सकारात्मक, मगर तनावपूर्ण हालात

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इन चुनौतियों के बावजूद, कुछ इसराइली सूत्रों ने बताया कि कुछ शुरुआती संकेतों को देखकर लगता है कि कुछ दिनों में प्रारंभिक समझौते पर पहुंचा जा सकता है.
इसराइली टेलीविजन स्टेशन चैनल 12 के मुताबिक, फ़लस्तीनी बंधकों की एक सूची को लेकर सहमति बन चुकी है, जिन्हें इसराइली बंधकों की अदला-बदली के दौरान पहले पड़ाव में रिहा किया जाना है.
हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स और इसराइली विपक्ष के सूत्रों के मुताबिक, 'नेतन्याहू की नई शर्तों का मकसद युद्धविराम समझौते तक पहुंचने की प्रक्रिया में देरी करना' हो सकता है.
इसके अलावा एक और मामले ने इस मुद्दे को और भी जटिल बना दिया है.
इसराइल की नई शर्तों के बाद हमास ने कहा है कि वो ग़ज़ा पट्टी से इसराइल के पूरी तरह से हटने और बंधकों को एक बार में रिहा करने के बदले जंग को ख़त्म करने को तैयार है.
इसराइल की चुनौतियाँ

समझौते के बारे में इसराइल के राजनीतिक दल दो समूहों में बंट चुके हैं.
इसराइल के विपक्षी नेता यायर लैपिड ने नेतन्याहू पर मध्यस्थता के प्रयासों में बाधा डालने के मकसद से बयानबाज़ी करने का आरोप लगाया है.
उन्होंने कहा कि समझौते को लेकर जारी बातचीत के बीच नेतन्याहू ने विदेशी मीडिया को नई शर्तों की जानकारी लीक की है.
इस तरह की आलोचनाएं बताती हैं कि ग़ज़ा के समाधान को लेकर इसराइल के भीतर भी कई मतभेद हैं.
साथ ही ये आलोचनाएं बतातीं हैं कि नेतन्याहू बंधकों के मुद्दे पर किस तरह के घरेलू दवाब का सामना कर रहे हैं.
सरकार के भीतर मौजूद इटेमार बेन-ग्विर और बेज़ालिल स्मोट्रिच जैसे मंत्री भी समझौते के ख़िलाफ़ हैं.
इसबीच इसराइली मंत्री अमिचाई चिकली ने प्रस्तावित समझौते की बातों का ज़िक्र किया है. उन्होंने कहा कि समझौते के पहले चरण में 42 दिनों के युद्धविराम हो सकता है.
सैन्य अभियानों में इस अस्थाई रोक का मकसद समझौते से जुड़े अन्य चरणों को पूरा करने के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध करवाना है, ताकि दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिम्मेदारी पूरी कर सके.
मिस्र और क़तर की भूमिका

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दोनों पक्षों में बातचीत फिर से शुरू करवाने की कोशिश में मिस्र का एक प्रतिनिधिमंडल दोहा पहुंचा था.
कुछ सूत्रों ने इस बात की पुष्टि की है कि बातचीत अपने अंतिम चरण में हो सकती है और कुछ दिनों में समझौते की घोषणा होने की संभावना है.
ऐसा लग रहा है कि समय दोनों पक्षों पर दबाव बना रहा है कि हिंसा की बढ़ोतरी को रोकें और एक समझौते की राह बनाने की दिशा में काम करें.
वार्ताओं में बड़ी सावधानी के साथ हो रही प्रगति के बीच हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं. इसकी वजह कैदियों और बंधकों की रिहाई से जुड़ा पेचीदा मसला है.
दुनिया को एक ऐसे समझौते की घोषणा का इंतजार है, जो इस संघर्ष को समाप्त करने में मदद करेगा.
बातचीत में उतार-चढ़ाव
योसी कुपरवासेर इसराइल के ख़ुफ़िया और सुरक्षा विशेषज्ञ हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत के सटीक परिणाम को लेकर भविष्यवाणी करना कठिन है.
पूर्व में इसराइली रक्षा मंत्रालय में काम कर चुके कुपरवासेर ने कहा, "इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि जल्द ही कुछ होगा. हालांकि, एक मौका है लेकिन इसके लिए दोनों पक्षों से ज़्यादा रियायत की दरकार है."
इसके पीछे उनका तर्क है कि इस इलाक़े में ईरान और उसके सहयोगियों के समर्थन में आई कमी के बाद हमास कमजोर हो गया है.
हालांकि, कुपरवासेर ने कहा कि इसका मतलब यह नहीं है कि समझौते की राह आसान होगी.
उन्होंने कहा, "समझौता बहुत जटिल है. और इसके लिए दोनों पक्षों की ओर से महत्वपूर्ण रियायतों की ज़रूरत है. "
उन्होंने बातचीत को 'रोलरकोस्टर' बताते हुए कहा, "एक दिन लगता है कि वार्ताओं में प्रगति हो रही है. पर अगले ही दिन कोई बाधा दिख जाती है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















