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कनाडा और भारत के बीच रिश्तों में तनाव चरम पर, क्या है आगे की राह
- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले सप्ताह जी-20 सम्मेलन में द्विपक्षीय बातचीत के दौरान कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिस ट्रूडो के सामने इस बात पर नाराजगी जाहिर की थी कि उनके देश में खालिस्तानी समर्थक तत्वों की गतिविधियों पर नकेल नहीं कसी जा रही है.
मीडिया में इस ख़बर के आते ही इस बात के संकेत मिलने लगे थे कि दोनों देशों के रिश्तों पर तनाव किस कदर हावी है.
ट्रूडो निजी विमान खराब होने की वजह से जी-20 सम्मेलन खत्म होने के दो दिन बाद तक भारत में रहे.
लेकिन कनाडा लौटते ही जस्टिन ट्रूडो ने संसद में सिख नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत सरकार की संलिप्तता की आशंका ज़ाहिर की.
इसके बाद विदेश मंत्री मेलेनी जोली ने शीर्ष भारतीय राजनयिक पवन कुमार राय को निकालने का एलान कर दिया. जवाब में भारत ने भी कनाडा के एक शीर्ष राजयनिक को निकाल दिया.
भारत और कनाडा के रिश्तों में नई गिरावट है. भारत के आजाद होने के साथ ही कनाडा से राजनयिक संबंध स्थापित हो गए थे.
अब दोनों के देशों के बीच रिश्तों का भविष्य एक मुश्किल दौर से गुजरने की संभावना है. अगले वर्ष भारत में आम चुनाव हैं और 2025 में कनाडा में भी चुनाव होंगे.
यही वजह है कि कुछ जानकारों को लगता है कि भारत-कनाडा के बीच रिश्तों को बेहतर करने की राह अब मुश्किल होती जाएगी.
लेकिन पिछले 75 वर्षों के दौरान दोनों के रिश्ते उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं.
आइए जानते हैं कि भारत और कनाडा के रिश्ते किन पड़ावों से गुजरते हुए यहां तक पहुंचे हैं.
भारत और कनाडा के बीच राजनयिक रिश्तों की शुरुआत
भारत की आजादी के साथ ही कनाडा ने इसे एशिया में शक्ति संतुलन के लिहाज से एक अहम खिलाड़ी मानना शुरू कर दिया था.
शीत युद्ध के दौरान भारत कनाडा की आर्थिक मदद पाने वाला सबसे बड़े देशों में शामिल था. कनाडा ने कोलंबो प्लान के तहत भारत के सिविल न्यूक्लियर कार्यक्रम को अनुदान दिया था.
हालांकि नेटो के संस्थापकों सदस्यों में शामिल रहे कनाडा और भारत के बीच संतुलन बनाने में थोड़ी दिक्कतें आईं क्योंकि भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का अगुआ था.
दोनों देशों के रिश्तों में तनाव तब भी दिखा जब कनाडा ने 1948 ने कश्मीर में जनमत सर्वेक्षण की मांग का समर्थन किया.
1974 में जब भारत ने परमाणु परीक्षण किया तो कनाडा ने बेहद नाराजगी दिखाई.
भारत की ओर से 1998 में किए गए परमाणु परीक्षण के दौरान भी दोनों देशों के रिश्तों में तनाव दिखा.
रिश्तों के पटरी पर आने की शुरुआत
साल 2000 के दौरान कनाडा की सरकार ने भारत के साथ रिश्तों को सुधारने का फैसला किया.
2001 में उसने भारत पर लगे अपने सभी आर्थिक प्रतिबंध हटा लिए. ये प्रतिबंध परमाणु परीक्षणों की वजह से लगाए गए थे.
2010 में कनाडा ने भारत के साथ मुक्त व्यापार (एफटीए) पर बातचीत शुरू की.
2010 में ही भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी-20 देशों के सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए कनाडा गए थे.
इस दौरान भारत और कनाडा के बीच सिविल न्यूक्लियर समझौता किया गया.
ये दोनों देशों के रिश्तों में एक बड़ा मुकाम था क्योंकि परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) और समग्र परीक्षण प्रतिबंध संधि यानी सीटीबीटी पर दस्तखत करने के लिए तैयार नहीं था.
इस वजह से दोनों देशों के रिश्तों में एक खिंचाव दिख रहा था.
2015 में भारत के प्रधानमंंत्री नरेंद्र मोदी ने कनाडा का दौरा किया.
दोनों देशों के बीच अंतरिक्ष, रेलवे, नागरिक उड्डयन और साइंस-टेक्नोलॉजी के साथ एक कनाडाई कंपनी से भारत को 3000 टन यूरेनियम सप्लाई करने का समझौता हुआ.
ट्रूडो की भारत नीति
2015 में जस्टिन ट्रूडो के नेतृत्व में कनाडा की लिबरल पार्टी सरकार में आई. हालांकि उसी समय कई विश्लेषकों ने ये मानना शुरू किया था कि ट्रूडो का आना भारत और कनाडा के रिश्तों के भविष्य ठीक नहीं होगा.
हालांकि ट्रूडो ने ग्लोबल साउथ और एशिया में भारत के बढ़ते कद को देखते हुए इससे संबंधों में मजबूती की नीति को तवज्जो देना शुरू किया.
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में कनाडा चीन को लेकर सतर्क रहा रहा है.
इसने 2022 नवंबर अपनी इंडो-पैसिफिक रणनीति का ऐलान किया, जिसमें चीन को लेकर काफी सतर्क रुख का जिक्र था.
चीन के साथ अपने बिगड़े रिश्तों की भरपाई के लिए ट्रूडो ने भारत पर ध्यान देना शुरू किया.
बहरहाल, ट्रूडो और उनके सहयोगियों की भारत से जुड़ी नीतियों को लेकर आशंका के बावजूद 2015 के बाद भारत और कनाडा के रिश्तों की तस्वीर थोड़ी निखरी हुई दिखी थी.
कनाडा का सिख कनेक्शन
कनाडा से भारत के मौजूदा तनाव के लिए काफी हद तक वहां सिख अलगाववादियों की ओर से चलाए गए कथित भारत विरोधी अभियान को माना जा रहा है. कनाडा में बड़ी तादाद में सिख रहते हैं.
क्षेत्रफल के मामले में दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश कनाडा में भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं.
यहां ख़ास कर सिखों की आबादी काफ़ी है. सिखों की अहमियत इस बात से भी लगा सकते हैं कि जस्टिन ट्रूडो ने जब अपने पहले कार्यकाल में कैबिनेट का गठन किया तो उसमें चार सिख मंत्रियों को शामिल किया.
सिखों के प्रति उदारता के कारण कनाडाई पीएम को मज़ाक में जस्टिन 'सिंह' ट्रूडो भी कहा जाता है.
2015 में जस्टिन ट्रूडो ने कहा था कि उन्होंने जितने सिखों को अपनी कैबिनेट में जगह दी है उतनी जगह भारत की कैबिनेट में भी नहीं है.
कनाडा में भारतवंशियों के प्रभाव का अंदाज़ा इस बात से भी लगा सकते हैं कि वहां के हाउस ऑफ कॉमन्स के लिए 2015 में भारतीय मूल के 19 लोगों को चुना गया था. इनमें से 17 ट्रूडो की लिबरल पार्टी से थे.
कनाडा उन पश्चिमी देशों में शामिल है जिसकी आप्रवास नीति इस वक्त संभवत: सबसे उदार है.
पिछले साल कनाडा की संघीय सरकार ने एलान किया था कि 2025 तक हर साल पांच लाख आप्रवासियों को कनाडा बुलाया जाएगा.यानी अगले तीन साल में क़रीब 15 लाख आप्रवासी कनाडा में जाएंगे.
बहुत सारे पश्चिमी देशों की तरह कनाडा भी बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी और निम्न जन्म दर का सामना कर रहा है. इसका मतलब ये हुआ कि अगर देश विकास करना चाहता है तो उसे अप्रवासी लाने होंगे.
हर चौथा कनाडाई देश में आप्रवासी के रूप में आया है, जोकि जी-7 देशों में सर्वाधिक है.
पहली बार सिख कनाडा कब और कैसे पहुंचे?
1897 में महारानी विक्टोरिया ने ब्रिटिश भारतीय सैनिकों की एक टुकड़ी को डायमंड जुबली सेलिब्रेशन में शामिल होने के लिए लंदन आमंत्रित किया था.
तब घुड़सवार सैनिकों का एक दल भारत की महारानी के साथ ब्रिटिश कोलंबिया के रास्ते में था. इन्हीं सैनिकों में से एक थे रिसालदार मेजर केसर सिंह. रिसालदार कनाडा में शिफ़्ट होने वाले पहले सिख थे.
सिंह के साथ कुछ और सैनिकों ने कनाडा में रहने का फ़ैसला किया था. इन्होंने ब्रिटिश कोलंबिया को अपना घर बनाया. बाक़ी के सैनिक भारत लौटे तो उनके पास एक कहानी थी.
उन्होंने भारत लौटने के बाद बताया कि ब्रिटिश सरकार उन्हें बसाना चाहती है. अब मामला पसंद का था.
भारत से सिखों के कनाडा जाने का सिलसिला यहीं से शुरू हुआ था. तब कुछ ही सालों में ब्रिटिश कोलंबिया 5000 भारतीय पहुंच गए, जिनमें से 90 फ़ीसदी सिख थे.
हालांकि सिखों का कनाडा में बसना और बढ़ना इतना आसान नहीं रहा है. इनका आना और नौकरियों में जाना कनाडा के गोरों को रास नहीं आया. भारतीयों को लेकर विरोध शुरू हो गया था.
2021 की जनगणना के मुताबिक कनाडा में सिख 770,000 हैं. ये यहां की आबादी का लगभग दो फीसदी है.
‘खालिस्तान’ और भारत-कनाडा रिश्तों में तनाव
भारत में सिख अलगाववादियों की ओर से अलग देश की मांग के आंदोलन ने अस्सी के दशक में जोर पकड़ना शुरू हुआ था.
1984 में सिख अलगाववादियों ने भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी थी. इसके बाद सिख अलगाववादियों के खिलाफ भारत की सख्ती काफी बढ़ गई थी.
1984 में इंदिरा गांधी ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में सैनिकों को भेजा था. स्वर्ण मंदिर सिखों के लिए पवित्र स्थल है. स्वर्ण मंदिर में हथियारबंद सिख चरमपंथी जमा थे.
ऑपरेशन ब्लू स्टार के नाम से चर्चित इस पूरे ऑपरेशन में भारतीय सेना के 83 सैनिक मारे गए और 248 अन्य सैनिक घायल हुए. इसके अलावा 492 अन्य लोगों की मौत की पुष्टि हुई और 1,592 लोगों को हिरासत में लिया गया था.
इसके एक साल बाद 1985 में कनाडा में रहने वाले कुछ ‘खालिस्तानी’ अलगाववादी समूह ने 1985 में एयर इंडिया विमान में बम विस्फोट किया गया.
टोरंटो से लंदन जा रही एयर इंडिया की फ्लाइट में एक धमाका हुआ था और इसमें सवार सभी 329 लोगों की मौत हो गई थी. यह कनाडा में सबसे ख़तरनाक और जानलेवा आतंकवादी हमला और जनसंहार के रूप में देखा जाता है.
लंबी जाँच के बाद 2005 में ब्रिटिश कोलंबिया के दो सिख अलगाववादियों को रिहा कर दिया गया था. इस मामले के कई गवाहों की मौत हो गई या उनकी हत्या कर दी गई थी या उन्हें गवाही देने से डराया गया.
इस साल (‘खालिस्तानी’ अलगाववादियों को लेकर भारत और कनाडा के रिश्ते हाल में तब और खराब हुए जब कुछ महीनों पहले ब्रैम्पटन में एक परेड में एक झांकी दिखाई गई, जिसमें पूर्व भारतीय प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को खून से सनी साड़ी में दिखाया गया, पगड़ी पहने लोग उन पर बंदूकें ताने हुए थे. झांकी में एक तख्ती पर लिखा था: “श्री दरबार साहिब पर हमले का बदला.’’
पिछले कुछ महीनों के दौरान कनाडा और लंदन में भारत विरोधी प्रदर्शन देखने को मिले थे. कनाडा में भारतीय राजनयिकों के पोस्टर लगा कर उन्हें निशाना बनाने की अपील की गई थी. तब भारत ने कनाडा से इस तरह की घटना को रोकने की मांग की थी. उसने कनाडा सरकार के सामने इस तरह की घटनाओं पर आपत्ति जताई थी.
भारत सरकार का मानना था कि ट्रूडो सरकार सिख अलगाववादियों के प्रति नरम है.
आगे की राह
सवाल ये उठता है कि अब भारत कनाडा संबंधों का भविष्य क्या है?
पूर्व राजनयिक केसी सिंह ने सोशल मीडिया के ज़रिए इस पर प्रकाश डाला है.
केसी सिंह ने लिखा- भारतीय राजनयिक को निष्कासित किया जाना और कनाडा की विदेश मंत्री के बयान से दोनों देशों के संबंध और बिगड़े हैं क्योंकि ये मुद्दा दोनों देशों की घरेलू राजनीति में भी काफ़ी अहम है.
वो कहते हैं, ''किसी वरिष्ठ राजनयिक पर इस तरह के आरोप लगाना दुर्लभ घटना है. किसी जी-7 या नेटो सदस्य देश की ओर से ऐसा कभी नहीं किया गया. भारत को इसका अंदाज़ा होना चाहिए था और भारत दौरे के दौरान ट्रूडो की अनदेखी करने की बजाय इस बारे में बात करनी चाहिए थी.''
केसी सिंह बोले- हालात अब ऐसे मुकाम पर पहुंच गए हैं, जहाँ से लौटना मुश्किल रहेगा.
वॉशिंगटन डीसी स्थित थिंक टैंक द विलसन सेंटर के साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर माइकल कुगलमैन ने समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहा, ''कनाडा भारत का बहुत अहम पश्चिमी साझेदार है. जस्टिन ट्रूडो की ओर से भारत पर लगाए गए बड़े आरोपों के बाद भारत के राजनयिक का निष्कासन एक हैरान करने वाला क़दम है. ऐसा आमतौर पर होता नहीं है.''
माइकल कुगलमैन ने कहा, ''कनाडा के प्रधानमंत्री का इस तरह सार्वजनिक तौर पर ये आरोप लगाना ज़ाहिर तौर पर ये बताता है कि उनके पास इसके पुख़्ता सबूत हैं, वरना वो क्यों भारत के साथ अपने अच्छे रिश्ते को नुकसान पहुंचाएंगे. मेरा मानना है कि वो जो कह रहे हैं उन्हें उस बात की गंभीरता का अंदाज़ा है.''
खालिस्तानी नेताओं की हत्या और प्रदर्शनों का सिलसिला
दरअसल पिछले कुछ समय से कनाडा में 'ख़ालिस्तान' समर्थक संगठनों की गतिविधियों की वजह से भारत के साथ उसके रिश्तों में तनाव दिख रहा है.
इस साल जुलाई में कनाडा में ‘ख़ालिस्तान’ समर्थक संगठनों ने कुछ भारतीय राजनयिकों के पोस्टर लगा कर उन्हें निशाना बनाए जाने की अपील की थी.
जून 2023 में 'ख़ालिस्तानी' नेता हरदीप सिंह निज्जर की कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में सरेबाज़ार हत्या कर दी गई थी.
इसके बाद सिख अलगाववादियों और भारत सरकार के बीच बढ़े तनाव के मंज़र कई देशों में दिखे.
ख़ालिस्तान समर्थकों ने निज्जर की हत्या के ख़िलाफ़ कनाडा के टोरंटो के अलावा लंदन, मेलबर्न और सैन फ्रांसिस्को समेत कई शहरों में प्रदर्शन किए.
निज्जर से पहले भारत सरकार की ओर से चरमपंथी घोषित किए गए परमजीत सिंह पंजवाड़ की भी मई में लाहौर में हत्या कर दी गई थी.
जून में ब्रिटेन में अवतार सिंह खांडा की रहस्यमयी हालात में मौत हो गई थी. वो 'ख़ालिस्तान लिबरेशन फोर्स’ के चीफ़ बताए जाते थे.
सिख अलगाववादियों का आरोप था कि उन्हें ज़हर देकर मारा गया.
अलगाववादी सिख संगठनों ने इसे टारगेट किलिंग कहा था. उनका आरोप था कि भारत सरकार सिख अलगाववादी नेताओं को मरवा रही है.
हालांकि भारत सरकार ने आरोपों पर अब तक कुछ नहीं कहा है.
भारत में सिखों की आबादी दो फीसदी है. कुछ सिख अलगाववादी सिखों के लिए अलग देश 'ख़ालिस्तान' बनाने की मांग करते रहे हैं.
भारत का आरोप है कि कनाडा में सक्रिय सिख अलगाववादियों पर ट्रूडो सरकार नकेल कसने में नाकाम रही है.
भारत सरकार का कहना कि ये अलगाववादी कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका में भारत विरोधी गतिविधियां चला रहे हैं.
फिलहाल भारत और कनाडा के रिश्तों में जो तनाव दिख रहा है उसकी एक बड़ी वजह है कनाडा में सिख अलगाववादियों की सक्रियता.
कनाडा में 'ख़ालिस्तान' समर्थक आंदोलन इतना मुखर है कि सिखों के लिए अलग ख़ालिस्तान देश को लेकर जनमत संग्रह तक हो चुके हैं.
इस बार भी जब जी-20 सम्मेलन के दौरान नई दिल्ली में जिस दिन ट्रूडो और मोदी के बीच संक्षिप्त मुलाकात हुई उस दिन भी कनाडा के बैंकुवर में सिख अलगाववादियों ने भारत से पंजाब को अलग करने के लिए एक जनमत संग्रह कराया.
2018 की शुरुआत में जस्टिन ट्रूडो जब परिवार संग भारत आए तो उनका ये दौरा विवादों से घिर गया था. कहा जाता है कि सिख अलगाववादियों से सहानुभूति के कारण ही भारत ने ट्रूडो की यात्रा को लेकर उदासीनता दिखाई थी.
हालांकि भारत ने इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया था. बीजेपी नेता शेषाद्री चारी ने बीबीसी से कहा था कि कनाडा की सरकार ने साफ़ कर दिया है कि उनकी सरकार ख़ालिस्तानियों के ख़िलाफ़ है.
भारत और कनाडा के बीच कारोबार
साल 2022 में भारत कनाडा का दसवां बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर था. 2022-23 में भारत ने कनाडा को 4.10 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया था. 2021-22 में यह आंकड़ा 3.76 अरब डॉलर का था.
वहीं कनाडा ने भारत को 2022-23 में 4.05 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया. 2021-22 में ये आंकड़ा 3.13 अरब डॉलर का था.
जहां तक सर्विस ट्रेड की बात है तो कनाडाई पेंशन फंडों ने भारत में 55 अरब डॉलर का निवेश किया है. कनाडा ने 2000 से लेकर अब तक भारत में 4.07 अरब डॉलर का सीधे निवेश किया है. कनाडा भारत में 17वां सबसे बड़ा निवेशक है.
भारत में कम से कम 600 कनाडाई कंपनियां काम कर रही हैं. जबकि 1000 और कंपनियां यहां अपना कारोबारी अवसर तलाश रही हैं.
भारत और कनाडा के बीच सीईपी एग्रीमेंट की वजह से द्विपक्षीय कारोबार में 6.5 अरब डॉलर की बढ़ोतर हो सकती है. इससे कनाडा को 2035 तक 5.9 अरब डॉलर का फायदा हो सकता है.
भारतीय कंपनियां कनाडा में आईटी, सॉफ्टवेयर, नेचुरल रिसोर्सेज और बैंकिंग सेक्टर में सक्रिय हैं.
भारत की ओर से कनाडा को निर्यात किए जाने वाले प्रमुख आइटमों में आभूषण, बेशकीमती पत्थर, फार्मा प्रोडक्ट, रेडिमेड गारमेंट, ऑर्गेनिक केमिकल्स, लाइट इंजीनियरिंग सामान, आयरन एंड स्टील प्रोडक्ट शामिल हैं.
जबकि भारत कनाडा से दालें, न्यूज़प्रिंट, वुड पल्प, एस्बेस्टस, पोटाश, आयरन स्क्रैप, खनिज, इंडस्ट्रियल केमिकल मंगाता है.
भारतीय छात्रों से कनाडा को कितना फायदा
साल 2018 से कनाडा विदेशी छात्रों को अपने यहां बुलाने के लिए बड़ा अभियान चला रहा है. यहां भारतीय छात्रों की तादाद काफी अधिक है.
2022 तक यहां भारतीय छात्रों की संख्या बढ़ कर 3,20,000 हो गई थी. ये संख्या वहां पढ़ रहे विदेशी छात्रों का 40 फीसदी है.
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