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इन देशों में आज ख़ालिस्तान समर्थकों की रैली, भारतीय मिशन भी तैयार
सचिन गोगोई
बीबीसी मॉनिटरिंग
ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया समेत कई दूसरे देशों में मौजूद भारत के राजनयिक मिशन ख़ालिस्तान समर्थकों की रैली का सामना करने के लिए तैयारी कर रहे हैं, जो कि आठ जुलाई को आयोजित की जाने वाली है.
माना जा रहा है कि समन्वय के साथ रैलियां आयोजित की जाएंगी. इनकी मांग भारत में सिखों के लिए एक अलग राज्य बनाने की है.
सोशल मीडिया पर सर्कुलेट किए जा रहे एक पोस्टर में लिखा गया है कि ख़ालिस्तान समर्थक "ख़ालिस्तान फ्रीडम रैली" का आयोजन करेंगे.
पोस्टर पर "किल इंडिया" लिखा हुआ है और इसके आयोजक का नाम "सिख्स फ़ॉर जस्टिस (एसएफ़जे)" बताया गया है जो कि एक अलगाववादी संगठन है.
साथ ही पोस्टरों में भारत के ब्रिटेन में हाई कमिश्नर विक्रम दुरैस्वामी और बर्मिंघम में काउंसल-जनरल शशांक विक्रम की भी तस्वीरें हैं.
ट्विटर के मैसेज में अमेरिका के रहने वाले प्रमुख ख़ालिस्तानी नेता गुरपतवंत सिंह पन्नु का भी ज़िक्र है, जो कि एसएफ़जे के जनरल काउंसल हैं. पन्नु ने भारत सरकार पर हरदीप सिंह निज्जर जैसे कुछ प्रमुख लोगों की हत्या का आरोप लगाया है.
हालांकि उन्होंने दावा किया कि "ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया" में होने वाली रैलियां 'शांतिपूर्ण' होंगी और इसमें हिस्सा लेने वाले लोग अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करेंगे.
अलगाववादी नेता पन्नु ने भारतीय राजनयिकों को निशाना बनाते हुए वीडियो रिलीज़ किया है.
भारतीय मिशनों को निशाना क्यों बनाया जा रहा है?
पश्चिमी देशों में ख़ालिस्तान समर्थकों की रैली कोई नई बात नहीं है. 8 जुलाई को रैलियों का आयोजन 19 जून की घटना के विरोध में हो रहा है जब कनाडा में ख़ालिस्तान टाइगर फ़ोर्स के प्रमुख हरदीप सिंह निज्जर की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, हमलावरों की पहचान नहीं हो पाई है.
निज्जर हाई प्रोफ़ाइल ख़ालिस्तानी अलगाववादी नेता थे और उनकी मौत को भारतीय मीडिया में "संदिग्ध अवस्था" में बताया गया है.
वहीं, केएलएफ़ के नेता अवतार सिंह खांडा की ब्रिटेन में 15 जून को बर्मिंघम के एक अस्पताल में मौत हो गई थी, संदेह है कि उन्हें ज़हर दिया गया था.
पाकिस्तान में दो हथियारबंद लोगों ने ख़ालिस्तान कमांडो फ़ोर्स के प्रमुख परमजीत सिंह पंजवड़ की लाहौर में 6 मई को हत्या कर दी गई थी. 23 जनवरी को केएलएफ़ के मुख्य चेहरों में से एक हरमीत सिंह उर्फ़ हैप्पी पीएचडी को भी लाहौर में एक लोकल गैंग ने मार दिया था.
ख़ालिस्तान समर्थकों का आरोप है कि इन मौतों के पीछे भारतीय एजेंसियां हैं.
ख़ासतौर पर निज्जर, खांडा और पंजवड़ की मौतों के बाद कई देशों में भारत सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हुए.
भारत सरकार द्वारा अलगाववादी अमृतपाल सिंह के ख़िलाफ़ उठाए गए कदमों का भी विरोध हुआ है, जो फ़िलहाल असम की डिब्रूगढ़ जेल में हैं.
हालांकि भारतीय मीडिया ने अलगाववादी नेताओं की हत्या के लिए किसी सरकारी एजेंसी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया है, लेकिन कुछ टिप्पणीकारों का कहना है कि भारत विदेशों में ख़ालिस्तानियों के ख़िलाफ कार्रवाई कर रहा है क्योंकि उन्होंने भारतीय मिशनों पर हमला किया है.
प्रख्यात हिंदी न्यूज़ चैनल ज़ी न्यूज़ का कहना है कि कई सोशल मीडिया यूज़र्स ये मानते हैं कि ये मौतें भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के सीक्रेट मिशन का नतीजा है.
भारत सरकार की क्या प्रतिक्रिया है?
भारत सरकार ख़ालिस्तानी अलगाववादियों की मौतों से जुड़ाव के आरोपों पर चुप रही है. लेकिन सरकार ने ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की सरकारों के ख़िलाफ़ बोला है क्योंकि उनके यहां सिख अलगाववादियों ने प्रदर्शन किए हैं.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने 6 जुलाई को मीडिया ब्रीफिंग में साफ़तौर से कहा था कि भारतीय राजनयिकों के ख़िलाफ़ पोस्टर "स्वीकार नहीं किए जा सकते हैं."
उन्होंने कहा कि भारत ने ब्रिटेन के विदेश मंत्री जेम्स क्लेवरली की प्रतिबद्धता पर ध्यान दिया है लेकिन "आकलन ज़मीनी हकीकत पर होगा."
भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दिल्ली में तीन जुलाई को मीडिया से बात करते हुए कहा, "हमने कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे मित्र देशों से गुज़ारिश की है कि वो ख़ालिस्तानी समर्थकों को जगह न दें. ये कट्टरपंथी चरमपंथी विचारधाराएं हमारे, उनके या हमारे संबंधों के लिए अच्छे नहीं हैं. (हम) इन पोस्टरों का मुद्दा उठाएंगे."
सरकार ने अपनी चिंताएं व्यक्त करने के लिए कनाडाई उच्चायुक्त कैमरन मैककायोव को भी तलब किया था.
लंदन और ओटावा में उच्चायोगों और सैन फ्रांसिस्को में वाणिज्य दूतावास में खालिस्तान समर्थकों द्वारा की गई बर्बरता के मामलों की जांच एनआईए कर रही है. फ़रवरी में, ऑस्ट्रेलिया के ब्रिस्बेन में भारतीय वाणिज्य दूतावास में तोड़-फोड़ की सूचना मिली थी.
सैन फ्रांसिस्को में वाणिज्य दूतावास को 2 जुलाई को दूसरे हमले का सामना करना पड़ा था, जब ख़ालिस्तान कट्टरपंथियों के एक समूह ने आगजनी का प्रयास किया था. दमकलकर्मियों ने तुरंत आग बुझा दी थी.
भारतीय मीडिया क्या कह रहा है?
भारतीय मीडिया कनाडा को लेकर आलोचनात्मक रहा है, उन्होंने राजनयिकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया है. कई मुख्याधारा की संस्थाओं और आलोचकों ने कुछ देशों की आलोचना की है, ख़ासतौर पर कनाडा की अलगाववादियों पर लगाम लगाने की अनिच्छा की.
लोकप्रिय अंग्रेज़ी समाचार चैनल इंडिया टुडे ने कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की आलोचना करते हुए कहा कि वह ख़ालिस्तानी तत्वों के ख़िलाफ़ "कड़ा रुख़ अपनाने में विफल" रहे.
इसके बजाय उन्होंने भारत को "ग़लत" करार दिया. एक प्रेज़ेंटर ने कहा कि ट्रूडो ने कड़ा रुख अपनाने से परहेज़ किया क्योंकि "उन्हें केवल अपने वोट बैंक की परवाह है."
रणनीतिक मामलों के टिप्पणीकार ब्रह्मा चेलानी ने ट्वीट किया: “अंग्रेज़ी भाषी पश्चिमी देशों में भारतीय राजनयिक मिशनों और राजनयिकों पर सिख चरमपंथियों द्वारा हमलों की वृद्धि चिंताजनक है. और जैसे कि यह काफी नहीं था, कनाडा सिख चरमपंथियों को 8 जुलाई को 'किल इंडिया' रैली आयोजित करने की इजाज़त दे रहा है."
प्रमुख अंग्रेज़ी दैनिक द टाइम्स ऑफ इंडिया के 5 जुलाई के संपादकीय में कहा गया है कि कनाडाई अधिकारी "कोई भी तत्परता दिखाने में विफल" रहे हैं.
उसमें लिखा गया, "जागो ओटावा."
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