मुसलमान शासक अबू अब्दुल्लाह और ‘जन्नत की चाबी’ सौंपने की कहानी

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    • Author, वक़ार मुस्तफ़ा
    • पदनाम, पत्रकार और शोधकर्ता

अबू अब्दुल्लाह मोहम्मद सन 1459 में स्पेन के अल-हमरा महल में पैदा हुए तो ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि वह बड़े होकर मुस्लिम ग़रनाता (ग्रेनाडा) के शासक तो बनेंगे लेकिन आख़िरी शासक.

आठवीं सदी की शुरुआत से अगले 300 साल तक स्पेन में शिक्षा और आविष्कार को बढ़ावा देने वाली उमवी (उमय्यद) ख़िलाफ़त (शासन) रही, फिर 40 साल तक स्पेन छोटी-छोटी रियासतों में बंटा रहा.

मोरक्को से आने वाले मुराबितून (मुराबिता क़बीले के राजा) ने साल 1086 से 1147 तक शासन चलाया. उनके बाद मुवाहिदून (अल मुवाहिद या कठोर एकेश्वरवादी राजा) ने उत्तर अफ़्रीका और स्पेन के बड़े हिस्से पर शासन स्थापित किया.

तेरहवीं सदी में अरब के बनू ख़ज़रज क़बीले के नस्र परिवार के मोहम्मद प्रथम ने जब ग्रेनाडा संभाला तब तक मुस्लिम स्पेन का क्षेत्र बहुत सिमट चुका था.

नस्रियों (नस्र वंश वालों) ने मोरक्को के मरीनों (अल मरीयून या मूर वंश) के साथ गठबंधन भी किया.

उनके शासन के दौर में ग़रनाता इस्लामी संस्कृति का केंद्र रहा जिसमें शिक्षा, दस्तकारी (हस्तकला) और सेरेमिक्स को बढ़ावा मिला.

चौदहवीं सदी में नस्री अपने स्थापत्य कला के लिए मशहूर थे. अल-हमरा इस्माइल प्रथम और मोहम्मद पंचम की कोशिशों से बना था.

सवा दो सौ साल से शासन करते इसी परिवार के सुल्तान अबुल हसन अली के यहां अबू अब्दुल्लाह का जन्म हुआ था. इन्हें बू अब्दुल के नाम से भी जाना जाता है.

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पारिवारिक झगड़े और सौतन की डाह

गृह युद्ध का भरपूर फ़ायदा उठाते हुए कस्तीला के शासक मज़बूत नस्री क़िलों पर क़ब्ज़ा करते रहे

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मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

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एलिज़ाबेथ ड्रेसन अपनीकिताब ‘दी मूर्स लास्ट स्टैंड’ में बताती हैं कि अबुल हसन अली (जिन्हें मौला-ए-हसन भी कहा जाता था) के दौर में ग्रेनाडा को अंदरूनी और बाहरी दबाव और राजनीतिक उथल-पुथल का सामना करना पड़ रहा था.

रीकोंक्विस्टा (स्पेन को दोबारा जीतने वाला अभियान) के नाम से मशहूर आठ सदियों तक चले सैन्य आक्रमणों की शृंखला में पंद्रहवीं सदी के अंत में तेज़ी आई.

उन आक्रमणों से ईसाई सल्तनतों का मक़सद मुसलमानों के प्रभाव वाले आईबेरियाई इलाक़ों पर दोबारा शासन करना था जिन्हें सामूहिक तौर पर ‘अल उन्दलस (अन्दुलस)’ कहा जाता था.

1469 में आराग़ोन (अरेगॉन) के बादशाह फ़र्डिनेंड द्वितीय की क़शताला (कस्तीला) की रानी इसाबेला से शादी ऐसे गठबंधन की बुनियाद बनी जिसका मक़सद उस मुस्लिम सल्तनत को जीतना था जहां नस्री, ग्रेनाडा के ताज के लिए आपस में लड़ रहे थे.

इस गृह युद्ध का भरपूर फ़ायदा उठाते हुए कस्तीला के शासक मज़बूत नस्री क़िलों पर क़ब्ज़ा करते रहे.

ड्रेसन लिखती हैं, "नस्री सम्राट का यह क्षेत्र एक महान मुस्लिम साम्राज्य का आख़िरी स्पेनी गढ़ था जो कभी पैरीनी और इससे भी आगे तक फैला हुआ था और इसमें बार्सिलोना और पांपोलूना जैसे उत्तरी स्पेनी शहर भी शामिल थे. पैरीनी फ़्रांस और स्पेन की सीमा पर फैली और आईबेरिया प्रायद्वीप को अलग करती पर्वत शृंखला है."

स्टेनले लेनपूल ‘दी मूर्स इन स्पेन’ में लिखते हैं कि मौला-ए-हसन का दौर पारिवारिक झगड़ों में उलझा था और साम्राज्य के पतन की ओर इशारा कर रहा था.

'अंदरूनी विवाद और विरोधियों की बढ़ती ताक़त'

हार्वे ने लिखा है कि आयशा को अपने बेटे की सत्ता में मौला-ए-हसन और सुरैया के ख़िलाफ़ अपने प्रतिशोध की आशंका थी.

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सन 1482 में बू अब्दुल ने अपनी मां आयशा अलहुर्रा के उकसाने पर अपने पिता अबुल हसन अली के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी. उस वक़्त वह लोशा के मैदान में फ़र्डिनेंड की फ़ौज़ से लड़ रहे थे.

इतिहासकार एलपी हार्वे अपनी किताब ‘इस्लामी स्पेन: 1250 से 1500 तक’ में लिखते हैं कि अपने बेटे को सत्ता में लाने की चाहत के पीछे वजह आयशा की मौला-ए-हसन की दूसरी बीवी ज़वारिया (सुरैया) के साथ दुश्मनी थी.

लेनपूल के अनुसार सुरैया इस्लाम क़बूल करने से पहले ईसाई ग़ुलाम आज़ाबील डा सोलिस थीं जिन्होंने उनके पति का दिल जीत लिया था.

वो लिखते हैं, "सुरैया से उनकी जलन की कोई हद नहीं थी. वह उन्हें न केवल अपनी हैसियत बल्कि अपने बेटे के ‘गद्दी पर अधिकार’ के लिए भी ख़तरा समझती थीं."

हार्वे ने लिखा है कि आयशा को अपने बेटे की सत्ता में मौला-ए-हसन और सुरैया के ख़िलाफ़ अपने प्रतिशोध की आशंका थी.

ड्रेसन लिखती हैं, "आयशा की डाह ने पारिवारिक झगड़ों में एक अहम भूमिका निभाई जो अंततः नस्रियों के पतन का कारण बने. बेटे की विरासत की रक्षा की चाहत में उठाए गए उनके क़दमों ने पहले से ही कमज़ोर साम्राज्य को और अस्थिर कर दिया."

बेटे की बाप से बग़ावत

इतिहासकार रिचर्ड फ़्लेचर लिखते हैं कि नस्री बादशाहत एक बंटे हुए घर जैसी थी

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एक प्रभावी परिवार के समर्थन से बू अब्दुल ने अल-हमरा महल पर क़ब्ज़ा कर लिया और ख़ुद को ग़रनाता का सुल्तान घोषित कर दिया.

ड्रेसन लिखती हैं, "बू अब्दुल जब नस्री परिवार के देश में सुल्तान के तौर पर गद्दी पर बैठे तो वह 20 साल के एक अपरिपक्व युवा थे जो मुश्किल से अल हमरा महल से निकले होंगे और उन्हें अपने निष्क्रिय परिवार से बाहर की दुनिया का कोई अनुभव भी नहीं था."

लेकिन मौला-ए-हसन ने जल्द ही राजधानी पर दोबारा क़ब्ज़ा कर लिया. दो साल बाद उनके भाई अलज़ग़ल ने उन्हें तख़्त से हटा दिया. एक ही साल में बू अब्दुल फिर से ग़रनाता के शासक बन गए.

अपनी किताब ‘मूरिश (मुस्लिम) स्पेन’ में इतिहासकार रिचर्ड फ़्लेचर लिखते हैं, "नस्री बादशाहत एक बंटे हुए घर जैसी थी. जिसमें प्रतिद्वंद्वी धड़े क़ब्ज़े के लिए कोशिश कर रहे थे जिसकी वजह से बढ़ती ईसाई शक्ति के ख़िलाफ़ प्रतिरोध की उसकी क्षमता कमज़ोर हो गई थी."

क़ैद और क़रतबा का समझौता

बू अब्दुल केवल ग़रनाता शहर के सुल्तान रह गए

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बू अब्दुल का सन 1483 में कस्तीला के ख़िलाफ़ पहला हमला नाकाम हो गया और वह पकड़े गए. कैथोलिक शासकों-महारानी इसाबेला और सम्राट फ़र्डिनेंड ने उन्हें क़रतबा (कोरडोबा) समझौते के तहत उन्हें रिहा कर दिया.

इस समझौते के तहत बू अब्दुल को अपने चाचा अलज़ग़ल के ख़िलाफ़ उनके समर्थन के बदले में अपने कुछ क्षेत्र कस्तीला को देने थे. इतिहासकार ह्यू कैनेडी कहते हैं कि बू अब्दुल ने रिहाई के लिए अपने ख़ून और अपनी ज़मीन से बेवफ़ाई की जिससे नस्री प्रतिरोध को और नुक़सान पहुंचा.

रिहाई के बाद बू अब्दुल को नस्री साम्राज्य के पश्चिमी हिस्से पर शासन का अधिकार दे दिया गया जबकि उनके चाचा अलज़ग़ल ने पूर्वी हिस्से पर अपना नियंत्रण बनाए रखा. क़रतबा के समझौते के अनुसार बू अब्दुल ने प्रभावी ढंग से अपने क्षेत्र की संप्रभुता फ़र्डिनेंड और इसाबेला को सौंप दी.

अलज़ग़ल के मज़बूत प्रतिरोध के बावजूद ईसाई सेना धीरे-धीरे आगे बढ़ी और अंततः पूर्वी ग़रनाता और अलमीरिया में उनके क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया. इस तरह बू अब्दुल केवल ग़रनाता शहर के सुल्तान रह गए. अब रीकोंक्विस्टा का पूरा होना ‘अगर नहीं, कब’ का सवाल बन गया था.

जब आख़िरी बार हथियार डाले गए

समझौते के अनुसार बू अब्दुल हाथ चूमने की बेइज़्ज़ती से बच सकते थे

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सन 1491 के वसंत में मुसलमानों के लिए ग़रनाता सरकार के अंत की शुरुआत हुई.

कस्तीला की सेना की कई महीनों की घेराबंदी के बाद बू अब्दुल ने महसूस किया कि अब और प्रतिरोध बेकार है. नवंबर में वार्ता की शुरुआत के बाद इस महीने की 25 तारीख़ को ग्रेनाडा समझौते पर दस्तख़त हुए. इस समझौते के तहत बू अब्दुल का पद बरक़रार रहना था और मुसलमानों की धार्मिक आज़ादी को सुनिश्चित किया जाना था.

दो जनवरी 1492 को बू अब्दुल ने ग्रेनाडा को कैथोलिक बादशाहों के हवाले कर दिया जो ड्रेसन के अनुसार स्पेन के कार्डिनल फ़्रांसिस्को सिसनीरोस और रेशमी लिबास पहने दरबारी और रईसों, जिसमें पर्यटक क्रिस्टोफ़र कोलंबस भी थे, के साथ ग्रेनाडा पहुंचे थे.

शानदार लिबास पहने कई घुड़सवारों के साथ शहर की कुंजियां देते हुए बू अब्दुल ने नए शासकों के हाथ चूमे और कहा कि यह ‘जन्नत की कुंजियां’ हैं.

समझौते के अनुसार बू अब्दुल हाथ चूमने की बेइज़्ज़ती से बच सकते थे.

वॉशिंगटन इर्विंग ने ‘दी अल-हमरा’ में लिखा है बू अब्दुल अल-हमरा पर आख़िरी नज़र डालने के लिए एक चट्टान पर रुके.

अल-हमरा को देखकर उनकी आंखें आंसुओं से भर गईं. तब उनकी मां ने डांटा कि तुम औरतों की तरह उसके लिए रोते हो जिसकी मर्दानगी से रक्षा न कर सके.

यह कहानी चाहे काल्पनिक हो या सच, नुक़सान और हार के गहरे एहसास की कहानी है और बू अब्दुल के एक पहाड़ी चट्टान से अल-हमरा पर आख़िरी नज़र डालने का यह दृश्य बहुत सी पेंटिंग्स का विषय बना.

बू अब्दुल निर्वासन में

हथियार डालने के बाद बू अब्दुल ने मोरक्को में निर्वासन ले लिया

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हथियार डालने के बाद बू अब्दुल को एक छोटी-सी जागीर दी गई थी लेकिन उन्होंने मोरक्को में निर्वासन अपना लिया.

वह अपने शाही अतीत से बहुत दूर फ़ैज़ में मरीनी शासकों के दरबार का हिस्सा बन गए.

इतिहासकार एलिज़ाबेथ ड्रेसन बू अब्दुल के अंजाम को इस तरह बयान करती हैं, "निर्वासित और अधिकारविहीन बू अब्दुल ने अपने दिन गुमनामी में गुज़ारे. खोई हुई महानता के प्रतीक के तौर पर."

एक दौर का ख़ात्मा और असहिष्णुता की शुरुआत

आईबेरिया प्रायद्वीप में लगभग आठ सदियों तक फैले मुस्लिम शासन का ख़ात्मा बू अब्दुल के विदा होने के साथ ही हो गया

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बू अब्दुल के विदा होने का मतलब आईबेरिया प्रायद्वीप में लगभग आठ सदियों तक फैले मुस्लिम शासन का ख़ात्मा था जिसमें सांस्कृतिक और धार्मिक बहुलता थी.

इतिहासकार मारिया रोज़ामेनोकल ‘दी ऑर्नामेंट ऑफ़ द वर्ल्ड’ में लिखती हैं कि मुस्लिम स्पेन एक ऐसी सरज़मीन थी जहां ईसाई, यहूदी और मुस्लिम संस्कृतियों के आपसी मेलजोल ने एक अलग और स्थायी विरासत पैदा की. ग्रेनाडा ऐसी सामूहिकता का आख़िरी गढ़ था.

ग्रेनाडा के पतन से धार्मिक असहिष्णुता के एक नए दौर की शुरुआत हुई.

ग्रेनाडा समझौते का उल्लंघन करते हुए कैथोलिक बादशाहों ने ऐसी नीतियां शुरू कीं जिनका मक़सद धार्मिक विविधता को ख़त्म करना था. मुसलमान और यहूदियों का ज़बर्दस्ती धर्मांतरण आम हो गया था.

हेनरी कॉमन अपनी किताब ‘दी स्पेनिश इनक्विज़ीशन: अ हिस्टॉरिकल रिवीज़न’ में लिखते हैं कि ग्रेनाडा का पतन दोबारा ईसाई क़ब्ज़े का अंतिम अध्याय था लेकिन यह संगठित अत्याचार और बलपूर्वक विलय का आग़ाज़ भी था.

ड्रेसन का कहना है कि सन 711 के बाद से लगभग 800 सालों तक स्पेनी प्रायद्वीप ऐसे लोगों का ठिकाना रहा जो आए तो हमलावर के तौर पर थे लेकिन उन्होंने एक ऐसी अलग और साफ़-सुथरी संस्कृति बनाई जिसने स्पेन को एक स्थायी सांस्कृतिक विरासत प्रदान की.

वो लिखती हैं, "ईसाइयों, मुसलमानों और यहूदियों का सह अस्तित्व मध्यकाल के स्पेनी जीवन का एक अहम हिस्सा रहा था. इसकी जगह गंभीर संघर्ष और विवादों ने ले ली जिसके कारण 1609 में मोरिसको को भी निकाल दिया गया. मोरिसको उन ईसाइयों को कहा जाता था जो मुसलमान से बलपूर्वक ईसाई बनाए गए थे."

"1492 के बाद स्पेन एक ऐसे समाज की बजाय जहां तीन विभिन्न धर्मों के लोग एक साथ रहते थे, एक धर्म और एक भाषाई समाज बन गया, एक ऐसी जगह जहां विविधता को दबाया और ख़त्म किया गया."

"बू अब्दुल और ग्रेनाडा धार्मिक असहिष्णुता, निरंकुश शक्ति और सांस्कृतिक अज्ञानता के ख़िलाफ़ अंतिम रुकावट थे."

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