क्या जॉर्जिया यूरोप से मुंह फेर रहा है: दुनिया जहान

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यूरोप के सुदूर पूर्व में स्थित जॉर्जिया में 28 मई को एक नया क़ानून लागू हो गया.

चालीस लाख की आबादी वाले इस देश के इस कानून पर कई देशों का विशेष ध्यान नहीं गया होगा लेकिन जॉर्जिया के कई आम लोगों के लिए यह बड़ा झटका था.

इस कानून के साथ ही जॉर्जिया के यूरोपीय संघ में शामिल होने की संभावना धूमिल हो गई और उसके रूस के और क़रीब जाने की संभावना प्रबल हो गई.

तो इस सप्ताह हम दुनिया जहान में यही जानने की कोशिश करेंगे कि क्या जॉर्जिया यूरोप से मुंह फेर रहा है?

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विदेशी प्रभाव संबंधी कानून

28 मई को जॉर्जिया की राजधानी तिबलिसी में बड़ी संख्या में लोग विरोध प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतर आए.

यूके की ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी में पीएचडी कर रही मैगी कार्त्सीवादज़े जॉर्जिया की तिबलिसी यूनिवर्सिटी में लेक्चरर के तौर पर आमंत्रित की गई.

उनका मानना है कि इस कानून के ख़िलाफ़ लगभग दो से तीन लाख लोग सड़कों पर प्रदर्शन के लिए उतर आए.

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यह इसलिए बहुत बड़ी संख्या है क्योंकि पूरे देश की आबादी ही चालीस लाख से कम है. यह कानून 28 मई को जॉर्जिया की संसद में पास हो गया.

इस कानून का निशाना मीडिया और ग़ैर सरकारी संगठन या एनजीओ हैं.

इस कानून के तहत अगर किसी मीडिया ग्रूप या एनजीओ की कुल आय का बीस प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों से आता है तो उन्हें अपने आपको विदेशी हित में काम करने वाली संस्था या फॉरेन एजेंट के रूप में रजिस्टर करना होगा. लगभग दस साल पहले रूस में भी ऐसा ही कानून बनाया गया था.

यूरोपीय संघ साफ कर चुका है कि यह कानून उसके मूल सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है.

मैगी कार्त्सीवादज़े कहती हैं कि वो जॉर्जिया की रहने वाली हैं और उनका परिवार भी वहीं रहता है इसलिए वे वहां चल रही राजनीतिक उठापठक से चिंतित हैं.

वे कहती हैं, "इस कानून के पास होने का अर्थ है कि जॉर्जिया में नागरिक समाज और स्वतंत्र मीडिया नहीं बचेगा. हम देश में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मज़बूत नहीं कर पाएंगे. जॉर्जिया की जनता जानती है कि यूरोपीय संघ और नेटो में शामिल हुए बिना रूस से जॉर्जिया की रक्षा नहीं हो सकती."

कार्त्सीवादज़े कहती हैं, "जॉर्जिया के पास ख़ास प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं. इसलिए न केवल उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा पर बल्कि उसकी आर्थिक व्यवस्था पर भी संकट आ जाएगा."

इन्हीं चिंताओं की वजह से जॉर्जिया की जनता लंबे समय से इस कानून के संसद में पेश किए जाने का ज़ोरदार विरोध कर रही थी और अब इस कानून के पास होने के बाद सड़कों पर इसके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रही है.

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मैगी कार्त्सीवादज़े ने कहा कि युवाओं की रणनीति यह है कि सुरक्षाबलों को कई जगहों पर उलझा दिया जाए. इसलिए कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, सड़कों पर अवरोध खड़े करके नाकाबंदी की जा रही है ताकि पुलिस के लिए कार्रवाई करना असंभव हो जाए.

राजधानी के साथ-साथ कई अन्य शहरों में भी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.

सिर्फ़ युवा ही नहीं बल्कि पुरानी पीढी के लोग भी इन विरोध प्रदर्शनों का समर्थन कर रहे हैं क्योंकि उनमें से कई लोग सोवियत काल में रह चुके हैं और उनके लिए जॉर्जिया सरकार का यह कदम उस समय की अप्रिय यादों को ताज़ा कर रहा है.

मैगी कार्त्सीवादज़े ने कहा, "मेरे परिवार के लोग सोवियत काल में रह चुके हैं और सोवियत संघ से आज़ादी पाने के लिए उन्हें कई कुर्बानियां देनी पड़ी हैं. वो जॉर्जिया पर रूसी हमले को भूले नहीं हैं. वो जॉर्जिया के रूसीकरण के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं."

जॉर्जिया की सरकार का कहना है कि देश की संप्रभुता को पश्चिमी देशों के ख़तरे से बचाने के लिए यह कानून ज़रूरी है.

लेकिन जॉर्जिया के अधिकांश लोग इस धारणा का खंडन करते हुए कहते हैं कि यह वैसा ही रूसी प्रोपेगेंडा या दुष्प्रचार है जैसा शीतयुद्ध के दौरान किया जाता था.

मैगी कार्त्सीवादज़े का मानना है कि पहले सोविएत संघ में सूचना प्रसार पर प्रतिबंध था और पश्चिम को भ्रष्ट दुश्मन की तरह पेश किया जाता था और षड्यंत्र की धारणाएं लोगों के दिमाग में भरी जाती थीं.

वे कहती हैं, "मगर इक्कीसवीं सदी में लोग यह स्वीकार नहीं करेंगे क्योंकि आज के युवा यूरोप को देख चुके हैं. वे वहां रहने का अनुभव प्राप्त कर चुके हैं इसलिए वो आसानी से यूरोप में शामिल होने की आकांक्षा को त्यागने वाले नहीं हैं."

जॉर्जिया के युवा केवल देश की यूरोपीय सदस्यता की संभावना समाप्त होने से चिंतित नहीं हैं बल्कि वो देश पर रूस का प्रभाव भी नहीं चाहते.

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जॉर्जिया- रूस संबंधों का इतिहास

जॉर्जिया सौ से अधिक वर्षों तक रूसी साम्राज्य का हिस्सा था.

पहले विश्व युद्ध के तीन साल बाद वो आज़ाद हो गया लेकिन 1921 में बोल्शेविक रूस ने उस पर हमला करके कब्ज़ा जमा लिया और अगले सत्तर वर्षों तक जॉर्जिया सोवियत संघ का हिस्सा रहा.

हार्वड यूनिवर्सिटी में जॉर्जियन स्टडीज प्रोग्राम के निदेशक प्रोफ़ेसर स्टीफ़न जोन्स कहते हैं, ''उन सत्तर सालों के दौरान जॉर्जिया के समाज और संस्कृति पर सोवियत संघ का प्रभाव बढ़ता गया. पूरे सोवियत काल के दौरान जॉर्जिया में दो भाषाएं बोली जाती थीं."

"जॉर्जियन लोगों की मुख्य भाषा थी लेकिन स्कूल में रूसी भाषा भी पढ़ाई जाती थी. लेकिन किसी के लिए रूसी भाषा जाने बिना करियर में तरक्की करना मुश्किल होता था. 1990 के दशक की शुरुआत में सोवियत संघ का पतन हो गया. 1991 में जॉर्जिया फिर से आज़ाद हो गया.''

प्रोफ़ेसर स्टीफ़न जोन्स का कहना है कि 1991 में आज़ादी के फ़ौरन बाद जॉर्जिया में संघर्ष और गृहयुद्ध छिड़ गया और नब्बे के दशक में वह देश की जनता को सुचारू लोकतांत्रिक प्रशासन देने और अपनी संप्रभुता बरकरार करने के लिए जूझता रहा.

वे कहते हैं, "नब्बे के दशक में जॉर्जिया के पूर्वी राज्य साउथ ओसेटिया और पश्चिमोत्तर में अबख़ाज़िया ने पृथक होकर अपने आप को आज़ाद घोषित कर दिया. इन दोनों राज्यों की अधिकांश आबादी देश के अल्पसंख्यक जातीय समूहों की है."

प्रोफ़ेसर स्टीफ़न जोन्स ने बताया, ''उस समय अबखाज़ियाई अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी दो या तीन लाख थी और उन्होंने जॉर्जिया से अलग होने का फ़ैसला किया. यही फ़ैसला साउथ ओसेटिया के लोगों ने भी किया. इसके चलते आज़ादी के एक दो साल बाद ही जॉर्जिया के सामने अपनी अखंडता बनाए रखने, आर्थिक दृष्टि से सबल बने रहने और देश में लोकतंत्र बनाए रखने के लिए बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई थीं.''

रूस

2008 में रूस ने जॉर्जिया पर हमला कर दिया और राष्ट्रपति पुतिन ने इन दोनों राज्यों को रूस का हिस्सा घोषित कर दिया. इससे यूरोपीय देशों में चिंता पैदा हो गई थी.

प्रोफ़ेसर स्टीफ़न जोन्स बताते हैं, ''यह दोनो राज्य मिल कर जॉर्जिया की कुल भूमि का बीस प्रतिशत हैं, लेकिन जॉर्जिया के पास इन राज्यों में घुसने का सामर्थ्य नहीं है और ना उन पर उसका कोई नियंत्रण है."

"फ़िलहाल वहां कोई संघर्ष नहीं चल रहा लेकिन तनाव मौजूद है और संघर्ष कभी भी भड़क सकता है क्योंकि इन दोनों राज्यों पर रूस का नियंत्रण है. उसकी दक्षिणी सीमा से जुड़ी रूसी महत्वाकांक्षा यहीं तक सीमित नहीं है बल्कि वो जॉर्जिया में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है.''

प्रोफ़ेसर स्टीफ़न जोन्स मानते हैं कि जॉर्जिया जानता है कि रूस काफ़ी ताकतवर है. जॉर्जिया अपनी विदेश नीति ही नहीं बल्कि घरेलू नीति भी रूस की प्रतिक्रिया को ध्यान में रख कर बनाता है.

वे कहते हैं, "अमेरिका और पश्चिमी देशों पर यह आरोप लगता रहता है कि जब 2008 में रूस ने जॉर्जिया पर हमला किया तो वो चुप रहे और 2014 में रूस ने पूर्वी यूक्रेन में स्थित क्राइमिया पर कब्ज़ा कर लिया तब भी उन्होंने रूस के ख़िलाफ़ जवाबी कार्रवाई नहीं की."

"कई लोगों की दलील है कि इसी वजह से पुतिन को 2022 में यूक्रेन पर हमला करने के लिए बल मिला. मगर जॉर्जिया के लिए यह चेतावनी थी."

प्रोफ़ेसर स्टीफ़न जोन्स ने कहा, "जॉर्जिया रूस की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा को देख सकता था और जानता था कि रूस उसे भी निशाना बना सकता है. वहीं देश में बड़ी संख्या में रूस लोग आ रहे थे जिसके चलते मकानों के किराये और खाद्य सामग्री की कीमतें बढ़ रही थीं. इसी बात को ध्यान में रखते हुए जॉर्जिया ने रूस के यूक्रेन पर हमले के विषय में व्यावहारिक रूख अपनाया और रूस के ख़िलाफ़ प्रतिबंध नहीं लगाए."

तो सवाल उठता है कि रूस के साथ तनाव के लंबे इतिहास और ख़तरे के बावजूद जॉर्जिया की सरकार रूस की ओर क्यों झुक रही है और ऐसा कानून क्यों लागू कर रही है जो देश में लोकतंत्र की आवाज़ दबा देगा?

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जॉर्जियाई राजनीति

पिछले लगभग दस सालों से जॉर्जिया के अधिकांश लोग यूरोपीय संघ की सदस्यता पाने के पक्षधर रहे हैं.

2023 में जॉर्जिया को यूरोपीय संघ की सदस्यता की उम्मीदवारी मिल गई थी. यूरोपीय संघ से ही जॉर्जिया को सबसे अधिक आर्थिक सहायता भी मिलती है.

लेकिन फॉरेन इन्फ्लुएंस कानून या विदेशी प्रभाव संबंधित कानून के पारित होने से जॉर्जिया की यूरोपीय संघ की सदस्यता पाने की आकांक्षा और उससे मिलने वाली आर्थिक सहायता- दोनों ही ख़तरे में पड़ गए हैं.

जॉर्जिया ने यह रास्ता क्यों अपनाया यह समझने के लिए हमने लिया सूलाद्ज़े से बात की. वे जो जॉर्जिया की तबलिसी स्टेट यूनिवर्सिटी में सामाजिक विज्ञान की एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं.

वो अतीत की याद दिलाती है जब दस साल से पहले जॉर्जिया में राष्ट्रपति शाकाशवेली के नेतृत्व वाली ‘यूनायटेड मूवमेंट नेशनल पार्टी’ की सरकार थी जिसने देश को यूरोपीय संघ के नज़दीक ले जाने की राह चुनी थी, लेकिन जल्द ही उनके नेतृत्व को चुनौती मिलने लगी.

सूलादज़े कहती हैं, "शाकाशवेली एक युवा डेमोक्रेट थे जिन्होंने देश में लोकतंत्र मज़बूत करने के प्रयास किए. मगर उनके प्रशासन के सामने कई चुनौतियां आ गईं और वो ख़ास लोकप्रिय नहीं रहे और जॉर्जिया लोकतंत्र के रास्ते से हटने लगा."

शाकाशवेली के ख़िलाफ़ मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगे और फ़िलहाल वो छह साल जेल की सज़ा काट रहे हैं.

2012 में वो सत्ता से बाहर हो गए थे और जॉर्जिया मे जॉर्जियन ड्रीम पार्टी की सरकार बनी जिसकी स्थापना उसी साल जॉर्जिया के सबसे धनी व्यक्ति बिडज़ीना इवानीशविली ने की थी. रोचक बात यह भी है कि इस अरबपति ने अपनी संपत्ति जॉर्जिया में नहीं बल्कि रूस में कमाई थी.

लिया सूलाद्ज़े ने कहा, "उनके अधिकांश उद्योग रूस में थे, लेकिन 2003 में वो जॉर्जिया आकर बस गए थे. जॉर्जियन ड्रीम पार्टी की स्थापना करने के कुछ समय बाद वो सार्वजनिक जीवन से दूर तो चले गए मगर पृष्ठभूमि में रहकर पार्टी को नियंत्रित करते रहे हैं. हम जानते हैं कि जॉर्जियन ड्रीम पार्टी उन्हीं के इशारों पर काम करती है."

इवानीशविली के बारे में बहुत कम जानकारी सामने आती है. लिया सूलाद्ज़े ही नहीं बल्कि कई लोग मानते हैं कि उन्हीं के निर्देशों पर पार्टी रूस समर्थक नीतियां अपनाती है.

जॉर्जियन पार्टी का कहना है कि वो देश के आत्मसम्मान और संप्रभुता को ध्यान में रख कर नीतियां बनाती हैं. मगर उसकी नीतियां देश के पश्चिमी सहयोगियों के ख़िलाफ़ होती दिख रही हैं. यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद पार्टी के संस्थापक का रुख खुल कर सामने आ गया है.

सूलाद्ज़े कहती हैं कि मार्च 2022 के बाद से सरकारी वक्तव्य और नीतियां कहीं ज्यादा आक्रामक हो गई हैं और वो पश्चिमी देशों को निशाना बना रही हैं जबकि पिछले कई सालों से देश को यूरोपीय संघ से बड़ी आर्थिक सहायता मिलती रही है.

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जॉर्जियन ड्रीम पार्टी

जॉर्जिया की राजनीति में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव अक्तूबर में आएगा जब वहां संसदीय चुनाव होने वाले हैं.

ज़ाहिर है कि इन चुनावों पर विदेशी प्रभाव संबंधी कानून और उसके ख़िलाफ़ हो रहे विरोध प्रदर्शनों का साया मंडराता दिख रहा है.

वाशिंगटन डीसी स्थित अटलांटिक काउंसिल के जियो इकोनॉमिक सेंटर की उपनिदेशक माया निकोलाद्ज़े कहती हैं कि चुनाव से पहले जॉर्जिया ड्रीम पार्टी की सरकार द्वारा ऐसा कानून लागू करना आत्मघाती कदम है.

वे कहती हैं, "यह बहुत चौंकाने वाला फ़ैसला है. वो आसानी से चुनाव जीत सकते थे क्योंकि फ़िलहाल देश में कोई मज़बूत विपक्ष नहीं है. वो जानते थे कि लोगों को यह फ़ैसला पसंद नहीं आएगा फिर भी जॉर्जियन ड्रीम पार्टी ने चुनाव से पहले यह कानून पास करके अपने पैरों पर ख़ुद कुल्हाड़ी मार दी है."

मगर हो सकता है कि इस कानून की मदद से वो सरकार की आलोचना करने वालों की आवाज़ दबाना चाहती है.

माया निकोलाद्ज़े के अनुसार जॉर्जियन ड्रीम पार्टी का मक़सद है उसके विरोधियों को मिलनी वाली आर्थिक सहायता ख़त्म कर दी जाए और जब चुनाव आएं तो सिर्फ़ उसी के पास चुनाव लड़ने के लिए संसाधन हों और वो आसानी से चुनाव जीत जाए.

रूस में इस कानून का इस्तेमाल करके विरोधियों की धरपकड़ भी की गई थी. वो कहती हैं कि यह कानून स्पष्ट नहीं है इसलिए अभी पता नहीं है कि जॉर्जिया की सरकार इस कानून का इस्तेमाल कैसे करेगी.

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एक बात तो साफ़ है कि इस कानून के साये में चुनावों के स्वतंत्र और निष्पक्ष होने की संभावना पर सवालिया निशान लग गए है.

अमेरिका और यूरोपीय संघ अब सत्तारूढ़ जॉर्जियन ड्रीम पार्टी के बड़े नेताओं के ख़िलाफ़ प्रतिबंध लगाने के बारे में विचार कर रहे हैं.

माया निकोलाद्ज़े का कहना है कि इसका एक परिणाम यह हो सकता है कि जॉर्जिया अमेरिका और यूरोपीय संघ से अलग थलग पड़ जाएगा जिसके बाद जॉर्जियन ड्रीम पार्टी की सरकार रूस और चीन से मदद पर निर्भर हो जाएगी और देश को उस खेमे में ले जाएगी जहां ज्यादातर जॉर्जियाई लोग नहीं जाना चाहते.

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तो अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर कि क्या जॉर्जिया यूरोप से मुंह फेर रहा है?

जॉर्जिया की सत्तारूढ़ जॉर्जियन ड्रीम पार्टी ने देश की संस्थाओं को विदेशों से मिलने वाली आर्थिक सहायता पर नियंत्रण लगाने के लिए कानून लागू कर दिया है.

इस कानून की वजह से जॉर्जिया के यूरोपीय संघ में शामिल होने की संभावना धूमिल हो गई है और देश रूस के नज़दीक जा रहा है.

अनुमान है कि मज़बूत विपक्ष की गैरमौजूदगी में जॉर्जियन ड्रीम पार्टी अक्तूबर में होने वाले संसदीय चुनाव जीत जाएगी.

मगर विदेशी सहायता पाने वाली दो सौ से अधिक संस्थाओं ने नए कानून को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है और लोग सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.

जॉर्जिया रूस की तरफ़ झुक सकता है लेकिन उसकी जनता सरकारी नीतियों के विरोध पर अडिग हैं.

हमारी तीसरी एक्सपर्ट लिया सूलाद्ज़े के अनुसार जनता के पास आशा छोड़ने का विकल्प नहीं है क्योंकि अगर लोगों ने उम्मीद छोड़ दी तो देश लोकतंत्र के रास्ते से हट कर फिर उसी तानाशाही के दौर में धंस जाएगा.

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