सिंथेटिक ड्रग्स क्या होती है और दुनियाभर के लिए ये कितनी बड़ी समस्या बन रही है? – दुनिया जहान

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मार्च 2024 में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने विएना में संयुक्त राष्ट्र के नशीले पदार्थों या ड्रग्स से संबंधित आयोग को संबोधित किया था.
इस दौरान उन्होंने कहा था कि अमेरिका में 18 से 45 वर्ष के आयुवर्ग में लोगों की मृत्यु का एक सबसे बड़ा कारण सिंथेटिक ड्रग्स या ओपियोइड्स हैं.
हाल ही में प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट के अनुसार 2022 में एक लाख आठ हज़ार लोगों की सिंथेटिक ड्रग्स के ओवरडोज़ के कारण मौत हुई. अमेरिका ही नहीं बल्कि कनाडा भी शक्तिशाली सिंथेटिक ड्रग्स की समस्या से जूझ रहा है.
लैब में बनाए जाने वाले सिंथेटिक ओपियोइड्स की लत से छुटकारा पाना मुश्किल होता है और सिंथेटिक ओपियोइड्स के ग़लत इस्तेमाल की समस्या अब दुनिया के कई देशों में है.
अमेरिकी विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि दुनिया का कोई देश अकेले इस समस्या से नहीं निपट सकता.
इस सप्ताह दुनिया जहान में हम यही समझने की कोशिश करेंगे कि क्या सिंथेटिक ओपियोइड्स दुनियाभर के लिए समस्या हैं?
ओपियोइड्स क्या हैं?

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रिक ट्रेबल एक फॉरेंसिक केमिस्ट हैं जो यूके सरकार की ड्रग्स के ग़लत इस्तेमाल संबंधी समिति के सलाहकार हैं. बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने बताया कि सिंथेटिक ओपियोइड एक ऐसा पदार्थ है जिससे वही असर होता है जो ओपियम यानी अफ़ीम से निकाले गए पदार्थ से होता है.
“जो पदार्थ ओपियम पॉपी या अफ़ीम से निकालकर बनाए जाते हैं उन्हें ओपियोइड्स कहा जाता है. मिसाल के तौर पर मॉर्फ़िन और हेरोइन. यह अफ़ीम पॉपी जैसे प्राकृतिक पदार्थों से बनते हैं. वहीं सिंथेटिक ओपियोइड्स को प्रयोगशालाओं या लैबोरेटरी में बनाया जाता है. मॉर्फ़िन के मुकाबले सिंथेटिक ओपियोइड सैकड़ों गुना अधिक शक्तिशाली होते हैं.”
सिंथेटिक ड्रग्स या सिंथेटिक ओपियोइड्स हमारे ब्रेन के उसी हिस्से पर असर करते हैं जिस पर पौधों के इस्तेमाल से बनाए गए ओपियोइड्स असर करते हैं. ओपियोइड्स का इस्तेमाल दर्द निवारक दवाई की तरह किया जाता है.
रिक ट्रेबल कहते हैं, “सिंथेटिक ओपियोइड्स में एक रिसेप्टर होता है जिसका इस्तेमाल दर्द कम करने या मरीज़ को बेहोश करने के लिए किया जाता है. मगर इस रिसेप्टर का एक बुरा असर यह है कि किसी व्यक्ति की श्वसन प्रणाली या रेसपिरेटरी सिस्टम को दबा देता है. अगर इस ओपियोइड का अधिक मात्रा में इस्तेमाल किया जाए तो उस व्यक्ति की दम घुटने से मृत्यु हो जाती है.”

सिंथेटिक ओपियोइड के ग़लत इस्तेमाल के मामले सामने आए
1950 के दशक में दवा बनाने वाली कंपनियों ने ओपियोइड्स के फ़ायदेमंद गुणों की नकल पर आधारित सिंथेटिक ओपियोइड्स बनाना शुरू किया था. अब बाज़ार में सैकड़ों किस्म के सिंथेटिक ओपियोइड उपलब्ध हैं.
फैंटानिल ऐसी ही एक जानी-मानी सिंथेटिक ओपियोइड है.
रिक ट्रेबल ने कहा कि 'कई बार किसी मरीज़ को सर्जरी से पहले बेहोश करने के लिए सिंथेटिक ओपियोइड दी जाती है. उस समय मरीज़ की सांस बरकरार रखने के लिए उसे ऑक्सीजन की सप्लाई की जाती है. मॉर्फिन के इस्तेमाल से काफ़ी देर तक मरीज़ का सिर चकराता रहता है मगर सिंथेटिक ओपियोइड के इस्तेमाल से ऐसा नहीं होता. प्रसव के समय दर्द कम करने के लिए भी सिंथेटिक ओपियोइड का इस्तेमाल किया जाता है.'
कैंसर के मरीज़ों का दर्द कम करने के लिए सिंथेटिक ओपियोइड के पैच का इस्तेमाल किया जाता है. कई देशों में सिंथेटिक ओपियोइड का इस्तेमाल पेनकिलर या दर्द निवारक दवा के तौर पर किया जाता है. मगर 1990 के दशक में इसके दुरुपयोग के मामले सामने आने लगे.
रिक ट्रेबल कहते हैं कि अमेरिका में कुछ डॉक्टरों द्वारा सिंथेटिक ओपियोइड के ओवर प्रिस्क्रिप्शन की वजह से एक समुदाय में बड़ी संख्या में लोगों की इसकी लत लग गयी. जब अमेरिकी सरकार ने आवश्यकता से अधिक प्रिस्क्रिप्शन को रोकने के लिए कदम उठाए तो जिन लोगों को इस दवा की लत लग गयी थी उन्होंने इसके दूसरे विकल्प ढूंढने शुरू कर दिए. इस ओपियोइड ने अमेरिकी ड्रग मार्केट में हेरोइन की जगह ले ली. लोगों ने हेरोइन की जगह फ़ैंटानिल का सेवन शुरू कर दिया.

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दुनिया के कई देशों में फैल चुकी है समस्या
कई देशों की सरकारों ने अवैध ओपियोइड में इस्तेमाल होने वाले नशीले पदार्थों पर प्रतिबंध लगा दिया है.
मगर अवैध उत्पादकों ने इन पदार्थों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री का कॉम्बिनेशन बदल कर नए ओपियोइड बनाना शुरू कर दिया है.
रिक ट्रेबल कहते है कि कई जगहों पर अब नेटाज़िन ओपियोइड की बिक्री होती दिखाई दे रही है. नेटाज़िन, फ़ैंटानिल से भी अधिक तेज़ ड्रग है.
यूके में भी नेटाज़िन के ओवरडोज़ से हुई मौतों के मामले सामने आये हैं. यूके सरकार ने फ़ैंटानिल और नेटाज़िन पर प्रतिबंध लगा दिया है मगर कई लोग इंटरनेट के ज़रिए इन ड्रग्स को हासिल करके अपने आसपास के इलाकों में बेच देते हैं. दरअसल, अब सिंथेटिक ओपियोइड के दुरुपयोग की समस्या दुनिया के कई देशों में फैल रही है.
सिंथेटिक ड्रग की समस्या
संयुक्त राष्ट्र की ड्रग्स और अपराध के अध्ययन संबंधी संस्था में रिसर्च विभाग की प्रमुख डॉक्टर एंजेला मे कहती हैं कि दुनिया में ड्रग्स और ओपियोइड के दुरुपयोग के बारे में काफ़ी कम जानकारी उपलब्ध है.
“हम अनुमान लगा सकते हैं कि दुनियाभर में ड्रग्स से होने वाली 70 प्रतिशत मौतें ओपियोइड के दुरुपयोग से होती हैं. इससे पता चलता है कि दूसरे ड्रग्स के मुकाबले ओपियोइड की समस्या कितनी भयानक है.”
अमेरिका में इस समस्या का मुख्य कारण फ़ैंटानिल का इस्तेमाल है लेकिन दुनिया के दूसरे देशों में दूसरे सिंथेटिक ओपियोइड की वजह से यह समस्या फैल रही है.
डॉक्टर एंजेला मे के अनुसार नशे के लिए सिंथेटिक ओपियोइड का इस्तेमाल दुनियाभर में हो रहा है. मिसाल के तौर पर मध्य पूर्व और पश्चिम अफ़्रीका के इलाकों में नशे के लिए ट्रैमाडोल का इस्तेमाल हो रहा है.
उन्होंने कहा कि, “हमारे पास ठोस संख्याएं सिर्फ़ नाइजीरिया के बारे में है जहां कम से कम पचास लाख लोग नशे के लिए ट्रैमाडोल का सेवन करते हैं. यह समस्या घाना, सेनेगल और बेनिन में भी है.”
अफ़ीम की खेती पर रोक लगने से क्या हुआ?

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बीस साल पहले अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान ने अफ़ीम की खेती पर प्रतिबंध लगा दिया था जिसके बाद कई यूरोपीय देशों में नशे के लिए सिंथेटिक ओपियोइड का इस्तेमाल बढ़ गया था.
डॉक्टर एंजेला मे का कहना है कि 2000 में तालिबान द्वारा अफ़ीम की खेती पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद हेरोइन की कमी हो गयी थी. उत्तरी यूरोप के कुछ देश- मिसाल के तौर पर एस्टोनिया में नशे के लिए सिंथेटिक ओपियोइड का इस्तेमाल बढ़ गया था.
मगर 2001 के अंत में अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर के तालिबान को हटा दिया और अफ़ीम की खेती पर से प्रतिबंध हट गया. लेकिन 2022 में अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान दोबारा सत्ता में आया और अफ़ीम की खेती पर रोक लग गयी.
डॉक्टर एंजेला मे ने कहा, “चिंता यह है कई देशों के बाज़ार में शक्तिशाली सिंथेटिक ओपियोइड हेरोइन की जगह ले रहे हैं. अगर दुनियाभर में देखा जाए तो हेरोइन का इस्तेमाल करने वालों में महिलाओं की संख्या 25 प्रतिशत है यानी हेरोइन का ज़्यादा इस्तेमाल पुरुष कर रहे हैं. मगर नशे के लिए सिंथेटिक ओपियोइड के इस्तेमाल करने वालों में महिलाओं की संख्या अधिक है."
"इसका एक कारण यह है कि कई जगहों पर इसे दवाई की दुकानों से ख़रीदा जा सकता है. दूसरी वजह यह है कि महिलाएं अवैध जगहों से हेरोइन ख़रीदने से कतराती हैं.”
मगर सिंथेटिक ओपियोइड के बढ़ते प्रसार का क्या कारण है? एंजेला मे बताती हैं कि इसका एक कारण यह है कि पौधों से बनने वाले हेरोइन जैसे ड्रग्स का उत्पादन अफ़ग़ानिस्तान, म्यांमार और मेक्सिको जैसे गिने चुने देशों में होता है क्योंकि यह वहां के मौसम और ज़मीन पर भी निर्भर करता है जबकि सिंथेटिक ओपियोइड को किसी भी देश में लैबोरेटरी में कम कीमत पर बनाया जा सकता है और उसकी तस्करी भी आसान होती है.
फ़ैंटानिल का उत्पादन कहां होता है?
सिंथेटिक ओपियोइड के उत्पादन और तस्करी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए बीबीसी ने बात की बेन वेस्टहॉफ़ से, जो एक खोजी पत्रकार और लेखक हैं. उनकी किताब फ़ैंटानिल इंक की काफ़ी चर्चा हुई है.
उनके अनुसार अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली अधिकांश अवैध फ़ैंटानिल का उत्पादन चीन में होता है. वो अंडरकवर यानी अपनी असलियत छिपा कर चीन में ऐसी फ़ैंटानिल फ़ैक्ट्रियों में गए जहां फ़ैंटानिल में इस्तेमाल होने वाले रसायनों का उत्पादन किया जाता है.
इन लैबोरेटरी में पहुंचने के लिए उन्होंने अपने आपको एक तस्कर की तरह पेश किया और उन लोगों से कहा कि वो बड़ी मात्रा में फ़ैंटानिल ख़रीदना चाहते हैं.
उन्होंने कहा कि, “मैं शंघाई शहर के पास एक ऐसी लैबोरेटरी में गया जो बहुत ही छोटी थी और वहां 5-6 लोग काम करते थे लेकिन वहां बहुत बड़ी मात्रा में फ़ैंटानिल उत्पाद बनाए जा रहे थे. मैंने उनसे माल ख़रीदने की बात की लेकिन हमारे बीच पैसे का लेनदेन नहीं हुआ."
"उसके बाद मैंने वुहान में एक ऐसी लैब देखी जो शायद फ़ैंटानिल में इस्तेमाल होने वाले रसायनों की दुनिया की सबसे बड़ी फ़ैक्ट्री थी. उस कंपनी में लगभग 700 लोग काम करते थे. उनमें से कई लोग एक होटल से काम करते थे. वहां सैकड़ों लोगों की सेल्स टीम थी.”

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चीन कैसे बन गया केंद्र?
मगर क्या कारण है कि चीन इस सिंथेटिक ओपियोइड के उत्पादन का केंद्र बन गया है.
बेन वेस्टहॉफ़ कहते हैं, “इसकी वजह यह है कि वहां इसका उत्पादन करना सबसे सस्ता है. चीन में बड़ी संख्या में प्रशिक्षित केमिस्ट और वैज्ञानिक मिल जाते हैं. चीन में बहुत सारी दवा बनाने वाली कंपनियां हैं जो वैध दवाइयां बनाती हैं. मगर उनके साथ ऐसी कंपनियां भी हैं जो वो रसायन और दवाइयां बनाती हैं जो चीन में तो वैध हैं लेकिन अमेरिका जैसे दूसरे देशों में अवैध हैं.”
यह रसायन सीधे अमेरिका नहीं पहुंचते. उन्हें पहले मेक्सिको भेजा जाता है.
बेन वेस्टहॉफ़ कहते हैं कि यह रसायन इतने तेज़ और असरदार होते हैं कि एक किलो रसायन से लाखों गोलियां बनायी जा सकती हैं. इसलिए दस-बीस किलो रसायन को कंटेनरों में छिपा कर भेजना बहुत आसान होता है. मेक्सिको में ड्रग कार्टेल या तस्करी करने वाले गिरोह अपनी फ़ैक्ट्रियों में इस रसायन का इस्तेमाल कर के फ़ैंटानिल की गोलियां बनाते हैं.

बेन वेस्टहॉफ़ ने कहा कि, “मेक्सिको में कार्टेल जंगलों में छोटी मोटी फ़ैक्ट्रियां लगा कर अवैध सिंथेटिक ड्रग बनाते हैं. इसे बनाने वाले ना प्रशिक्षित होते हैं और ना ही जानते हैं कि वो क्या बना रहे हैं. मैंने सुना है कि अब कार्टेल इन लैबोरेटरियों को शहरों में भी बना रहे हैं.”
इसके बाद वहां बने अवैध सिंथेटिक ड्रग्स को अमेरिका भेजा जाता है. बेन वेस्टहॉफ़ कहते हैं कि अमेरिका के सीमा सुरक्षाबल ने इस तस्करी को रोकने के लिए कोशिश तेज़ कर दी है लेकिन इसे रोकना बहुत मुश्किल है. क्योंकि फ़ैंटानिल हेरोइन कि तुलना में पचास गुना ज्यादा असरदार या शक्तिशाली होती है. ऐसे में एक किलो फ़ैंटानिल को पकड़ पाना मुश्किल होता है क्योंकि इसे आसानी से छिपाया जा सकता है.
बेन वेस्टहॉफ़ कहते हैं, "इसे बनाना बहुत सस्ता है इसलिए केवल तस्करों को पकड़ने से ये कड़ी नहीं टूटेगी. इसके बजाय हमें इसका इस्तेमाल करने वाले लोगों को जागरूक करना चाहिए कि यह कितनी ख़तरनाक है. किसी पार्टी में खाई गई अवैध फ़ैंटानिल की एक गोली भी जानलेवा साबित हो सकती है."
आरोप-प्रत्यारोप
ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन में रणनीति और सुरक्षा मामलों की वरिष्ठ शोधकर्ता डॉक्टर वेंडा फ़ेलबेब ब्राउन कहती हैं कि अवैध फ़ैंटानिल और अन्य सिंथेटिक ओपियोइड की समस्या के लिए कई देश एक दूसरे को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं.
पिछले तीन सालों में अमेरिका ने सिंथेटिक ड्रग्स की समस्या से निपटने के लिए 179 अरब डॉलर खर्च किए हैं लेकिन अकेले वह इस पर काबू नहीं कर सकता.
वो कहती हैं, “देश में अवैध सिंथेटिक ओपियोइड की समस्या के लिए अमेरिका जो कदम उठा रहा है वो ज़रूरी है और उस पर प्रभावी तरीके से अमल करना भी ज़रूरी है. लेकिन इस दिशा में चीन और मेक्सिको द्वारा पर्याप्त कदम नहीं उठाए जा रहे जो चिंता का विषय है.”

इन दोनों देशों के अमेरिका के साथ संबंध राजनीतिक कारणों से तनावपूर्ण रहे हैं. लेकिन पिछले कुछ सालों के दौरान इस दिशा में कुछ तरक्की ज़रूर हुई थी.
डॉक्टर वेंडा फ़ेलबेब ब्राउन ने आगे कहा कि, “2017 से 2019 के दौरान चीन ने इस दिशा में सहयोग बढ़ा दिया था. उस दौरान चीन ने वहां से फ़ैंटानिल भेजने वालों के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई की. 2019 में चीन ने फ़ैंटानिल क्लास की दवाइयों पर नियंत्रण लगा दिया. बदले में चीन चाहता था कि तत्कालीन राष्ट्रपति ट्रंप की सरकार चीन पर लगाए प्रतिबंधों में ढील दे और चीन के निर्यात पर लगाए जाने वाले टैक्स की दर कम करे.”
इस दिशा में चीन अब क्या कर रहा है?

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मगर अमेरिका ने चीन की यह मांग पूरी नहीं की. दो साल बाद राष्ट्रपति बाइडन के सत्ता में आने के बाद भी अमेरिका की नीति में बदलाव नहीं आया और चीन ने सहयोग बंद कर दिया.
वेंडा फ़ेलबेब ब्राउन का कहना है कि अमेरिका ही नहीं बल्कि चीन का यह रुख़ उन सभी देशों के साथ है जिसके साथ उसके संबंध अच्छे नहीं है. वहीं चीन फ़ैंटानिल की लत को अमेरिका की घरेलू समस्या बताते हुए कहता है कि वह इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं है. लेकिन फिर पिछले साल नवंबर में कैलिफ़ोर्निया में राष्ट्रपति जो बाइडन और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाक़ात के बाद आपसी सहयोग पर सहमति हो गयी. चीन ने ऐसी कंपनियों को बंद कर दिया जो मेक्सिको के कार्टेल को फ़ैंटानिल में इस्तेमाल होने वाली सामग्री बेचती थीं.
डॉक्टर वेंडा फ़ेलबेब ब्राउन के अनुसार अगर वाक़ई चीन ने फ़ैंटानिल में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की सप्लाई बंद कर दी है फिर भी ज़मीन पर इस कार्रवाई का असर दिखाई देने में काफ़ी समय लगेगा.
इस दिशा में मेक्सिको क्या कर रहा है?

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मगर मेक्सिको के राष्ट्रपति एंड्रेस मैन्यूएल लोपेज़ ओबराडोर ने कार्टेल के ख़िलाफ़ कार्रवाई के संदर्भ में कहा कि मेक्सिको किसी विदेशी सरकार के लिए पुलिस का काम नहीं करेगा.
पिछले साल मेक्सिको के विदेश मंत्रालय ने इस आरोप को खारिज कर दिया कि वहां फ़ैंटानिल का उत्पादन होता है.
डॉक्टर वेंडा फ़ेलबेब ब्राउन का मानना है कि मेक्सिको ने कुछ बड़े कार्टेल के प्रमुखों को गिरफ़्तार करके अमेरिका को सौंपा ज़रूर है मगर वहां से फ़ैंटानिल की तस्करी के ख़िलाफ़ बहुत कम कार्रवाई की है.
वो कहती हैं कि तस्करी ही नहीं बल्कि लोगों में सिंथेटिक ओपियोइड की लत रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है.
तो अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर- क्या सिंथेटिक ओपियोइड्स दुनियाभर के लिए समस्या हैं? अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कई देशों में सिंथेटिक ओपियोइड की लत और दुरुपयोग की समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है.
जैसे ही एक देश में इनकी तस्करी और उत्पादन पर रोक लगाई जाती हैं, तस्कर फ़ौरन ही दूसरे रास्तों से इसका उत्पदान और तस्करी शरू कर देते और नए बाज़ार खोजना शुरू कर देते हैं.
हमारी एक्सपर्ट डॉक्टर वेंडा फ़ेलबेब ब्राउन कहती हैं कि जिन देशों में आज यह बड़ी समस्या नहीं है वहां भी भविष्य में यह समस्या फैल सकती है.
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