ईरान के राष्ट्रपति चुनाव में कट्टरपंथी के बदले सुधारवादी को कैसे मिली जीत

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- Author, केवान हुसैनी
- पदनाम, बीबीसी पर्सियन
पिछले 50 साल से कम वक़्त में ईरान की बागडोर कट्टरपंथी और पश्चिम विरोधी राष्ट्रपति से एक सुधारवादी राष्ट्रपति के हाथ में आ गई है.
शनिवार को मसूद पेज़ेश्कियान ईरान के राष्ट्रपति चुन लिए गए. मसूद 19 साल पहले के सुधारवादी राष्ट्रपति के शासन में स्वास्थ्य मंत्री थे.
इसके बाद के राष्ट्रपति चुनावों की दौड़ में सुधारवादियों को लगा तार प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है.
सुधारवादियों के लिए पेजे़श्कियान भी आदर्श उम्मीदवार नहीं थे, लेकिन जब उन्हें लगा कि इस बार उनके जीतने की थोड़ी गुंजाइश है तो उन्होंने इस मौक़े को भुनाने में पूरी ताक़त झोंक दी.

ईरान के लिए नया दौर

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ईरान के संविधान के मुताबिक़ राष्ट्रपति चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवारों को ताक़तवर गार्डियन काउंसिल की मंज़ूरी ज़रूरी है.
लेकिन काउंसिल पर सुधारवादियों के प्रति पूर्वाग्रह रखने के आरोप लगते रहे हैं. सुधारवादियों ने देश में 1997 से 2005 तक शासन किया था.
पिछले तीन चुनावों से सुधारवादी ये शिकायत करते रहे थे कि उनके सभी हाई प्रोफाइल उम्मीदवारों को गार्डियन काउंसिल ख़ारिज कर देती है.
उनका आरोप था कि सिर्फ़ उन उम्मीदवारों को मंज़ूरी दी जाती थी, जिन्हें कम लोग जानते थे. इसलिए अपने रूढ़िवादी प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में वे पिछड़ गए.
इस बार जब 19 मई को पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत हो गई और चुनाव का एलान हुआ तो कइयों को लगा कि पुराना क़िस्सा ही दोहराया जाएगा.
नौ जून को जब गार्डियन काउंसिल ने उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप दिया तब भी सुधारवादियों के अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद कम ही थी.
काउंसिल ने छह उम्मीदवारों के नाम पर मुहर लगाई, जिसमें एक नाम मसूद पेज़ेश्कियान का भी था. वे एकमात्र ऐसे शख़्स थे, जिनका राजनीतिक नज़रिया सिद्धांतवादियों से मेल नहीं खा रहा था.
सिद्धांतवादी, सुधारवादियों से ज़्यादा रूढ़िवादी हैं. वे कट्टर इस्लामी विचारधारा का समर्थन करते हैं.
ईरान के सर्वोच्च नेता आयातुल्लाह अली ख़ामेनेई भी इसी खेमे से आते हैं. यही वजह है कि इस्लामी रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कोर (आईआरजीसी) सुधारवादियों की तुलना में सिद्धांतवादियों के ज़्यादा क़रीब हैं.
होमोजेनाइजेशन’ की प्रक्रिया

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ईरान के लोगों ने देखा है कि पिछले कुछ सालों में सिद्धांतवादियों ने सुधारवादियों को सत्ता से बेदखल कर दिया है.
इसे एक व्यवस्थित प्रक्रिया के ज़रिये अंजाम दिया गया है, जिसे मीडिया में ‘होमोजेनाइजेशन’ कहा गया. इस संदर्भ में इस बात की तरफ़ इशारा किया गया कि कैसे ख़ामनेई का समर्थन ना करने वालों की जगह रूढ़िवादियों को ले आया गया.
इस हालात ने लोगों के भीतर नाराज़गी पैदा की और उन्होंने प्रतिरोध करना शुरू किया.
ये प्रतिरोध 2009 में साफ़ तौर पर तब दिखा, जब सुधारवादियों ने दावा किया कि चुनाव में धांधली हुई है.
इन आरोपों के बाद लाखों लोग विरोध प्रदर्शन के लिए उतर आए. आईआरसीजी और इसकी मिलिशिया इकाई ‘बासीज’ ने उन प्रदर्शनों को बड़ी बेरहमी से कुचल दिया.
2021 में जब इब्राहिम रईसी राष्ट्रपति बने तो कुछ विश्लेषकों ने कहा कि ‘होमोनाइजेशन’ की प्रक्रिया पूरी हो गई है.
ईरान के ‘इस्लामी गणराज्य’ का हर पहलू सर्वोच्च नेता की जैसी सोच रखने वाले रूढ़िवादियों के हाथों में आ गया. ये रूढ़िवादी अब ख़ुद को क्रांति मोर्चा कहते हैं.
रईसी का शासन और विरोध प्रदर्शन

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रईसी न सिर्फ ख़ामनेई की तरह दिखने की कोशिश करने लगे बल्कि उनकी बाहरी और अंदरुनी दोनों तरह की नीतियां भी उन्हीं के नक्शेक़दम पर चलने लगी थीं.
इन नीतियों में आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था, पूरब की ओर देखने वाली विदेश नीति शामिल है. पूरब की ओर देखने वाली विदेश नीति का मतलब है कि रूस और चीन से ज़्यादा नज़दीकी रिश्ते बनाना.
नि:संदेह उनके कार्यकाल में समाज पर ज्यादा ‘इस्लामी’ प्रतिबंध नीतियों के प्रमुख आधार स्तंभों में शामिल रहे.
ऐसे प्रतिबंधों का मतलब है कि महिलाओं से ज़्यादा कड़ाई से पेश आना. इन नीतियों की वजह से 2022 में हिरासत में एक युवा महिला महसा अमीनी की मौत हो गई.
इस मौत ने लोगों को ग़ुस्से से भर दिया और फिर ईरान में इस्लामी शासन के ख़िलाफ़ अब तक का सबसे बड़ा सार्वजनिक विरोध देखने को मिला.
लेकिन सत्ता में बैठे धार्मिक नेताओं ने 2009 की तुलना में इस विद्रोह को ज़्यादा बेरहमी से कुचलना शुरू कर दिया.
मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक़ लोगों के सार्वजनिक प्रदर्शन के छह महीने के दौरान 500 लोग मारे गए. इनमें 60 ऐसे थे, जिनकी उम्र 18 साल से कम थी.
इस दौरान इंटरनेट पर सेंसरशिप बढ़ा दी गई, सामूहिक गिरफ़्तारियां हुईं. युवा प्रदर्शनकारियों पर मुक़दमे चले और यहां तक कि चार लोगों को मौत की सज़ा भी दी गई.
ईरान में प्रदर्शन को बेरहमी से कुचलने के कारण लोगों में भरे ग़ुस्से और आर्थिक परेशानियों ने लोगों को और असंतुष्ट किया.
पेज़ेश्कियान के समर्थन में आए सुधारवादी

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इसलिए जब पूर्व राष्ट्रपति रईसी की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत हुई तो सत्ता को राष्ट्रपति का चुनाव किसी दु:स्वप्न की तरह लगने लगा.
उधर जेल में बंद नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नरगिस मोहम्मदी और असहमति की आवाज़ न उठा पाने वाले लोगों और विपक्षियों को लगा कि चुनाव बहिष्कार की अपील कर वह अपना विरोध शांतिपूर्ण तरीके से दर्ज करा सकते हैं.
फिर भी सुधारवादियों, ख़ासकर पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी ने हाल ही में चुनावी रणनीतियों को बदलने पर विचार किया. उन्होंने निष्क्रियता छोड़ी और उत्साह के साथ मसूद पेज़ेश्कियान का समर्थन किया.
पहले तो चुनाव चाहने वाले और इसका बहिष्कार करने वालों के बीच ही टकराव दिखा. यही वजह है कि पहले दौर में बहुत कम यानी 40 फीसदी ही मतदान हुआ. इसमें किसी को उम्मीदवार को बहुमत नहीं मिला.
इसके बाद मसूद पेज़ेश्कियान और सईद जलीली के बीच दूसरे दौर का मतदान हुआ. जलीली कट्टरपंथी धड़े का नेतृत्व कर रहे थे. वे 2013 में महमूद अहमदीनेजाद के राष्ट्रपति शासन के समय प्रमुख परमाणु वार्ताकार थे.
बहरहाल, शनिवार को दुनिया ने जाना कि मसूद पेज़ेश्कियान ईरान के नए राष्ट्रपति चुन लिए गए.
पेज़ेश्कियान के वादे

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पेजे़श्कियान के चुनावी रणनीति के केंद्र में था- रूढ़िवादियों पर हमला. ख़ासकर उनकी पश्चिम विरोधी नीतियों पर.
इसके साथ ही उन्होंने जवाद ज़रीफ जैसे सुधारवादी राजनीतिक नेताओं का एक नेटवर्क बनाया
2015 में परमाणु समझौते को अंतिम रूप देने में उसकी बड़ी भूमिका थी. हालांकि ज़रीफ उस मायने में सुधारवादी भी नहीं है. लेकिन वो अकादमिक जगत से आते हैं और उनका एक ख़ास नजरिया है.
उन्होंने पेज़ेश्कियान के लिए जम कर कैंपेनिंग की. ज़रीफ के साथ मिलकर जारी किए गए अपने घोषणापत्र में पेज़ेश्कियान ने एलान किया कि उनकी विदेश नीति न तो पश्चिम विरोधी है और न ही पूरब विरोधी.
दोनों ने रईसी की रूस और चीन से नजदीकी बनाने की नीति की आलोचना की. उन्होंने कहा कि उन्हीं का संगठन देश की आर्थिक संकट को ख़त्म कर सकता है.
उन्होंने कहा कि वो पश्चिमी देशों से बात कर परमाणु मसले पर एक समझौते तक पहुंचेगे. इससे देश पर लगे प्रतिबंध हल्के हो सकेंगे.
हालांकि राष्ट्रपति पद के चुनाव लड़ने वाले दूसरे उम्मीदवारों और सर्वोच्च नेता ख़ामनेई ने उनकी नीतियों का विरोध किया.
पेज़ेश्कियान और उनके अभियान को चुनाव बहिष्कार कैंपेनिंग से काफ़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा.
इस कैंपेनिंग के ज़रिये इस बात पर ज़ोर दिया जा रहा था कि ईरान के राजनीतिक ढांचे के पास वो अधिकार नहीं है कि वह देश की विदेश नीतियों को नई दिशा दे सके.
ईरान की नीतियों पर कुद्स का भी असर है. कुद्स फोर्स आईआरजीसी की बाहरी इकाई है. राष्ट्रपति के पास इस पर सीधे नियंत्रण का अधिकार नहीं है. सिर्फ़ ईरान के सर्वोच्च नेता ही यह फ़ैसला करते हैं कि कुद्स को क्या करना चाहिए और क्या नहीं.
ख़ामनेई बार-बार और यहां तक कि पहले दौर के चुनाव के तीन दिन पहले तक कहते रहे कि कुद्स फोर्स जो कर रही है वो देश की सुरक्षा नीतियों के लिहाज से अनिवार्य है.
इसराइल में सात अक्टूबर के हमले के बाद लेबनान, सीरिया और इराक़ में ईरान की परोक्ष इकाइयों के नेटवर्कों और उनकी गतिविधियों में बदलाव अब नए शासन के लिए काफ़ी चुनौतीपूर्ण होगा.
पिछले आठ महीनों के दौरान मध्य-पूर्व में ईरान ही हमास का प्रमुख समर्थक रहा है. इसकी ओर से लड़ने वाले यमन के हूती विद्रोही ने इसराइल और पश्चिमी देशों के हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए लाल सागर के व्यापार मार्गों पर हमले करने शुरू किए थे.
ईरानी रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स ने तो सीधे इसराइल पर हमले कर अभूतपूर्व स्थिति पैदा कर दी थी. इससे दोनों देश आमने-सामने आ गए थे.
विदेश नीति का जटिल मसला

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हालांकि ईरान में राष्ट्रपति सबसे बड़े राजनयिक माने जाते हैं. न सिर्फ राष्ट्रपति दफ़्तर बल्कि विदेश मंत्री भी नीति निर्धारण और उन्हें लागू करने के मामले में अहम भूमिका निभाते हैं.
उनके पास अपने विजन को पिछले दरवाजे की राजनीतिक पैरवी के ज़रिये भी आगे बढ़ाने का मौक़ा होता है.
2015 में ऐसा ही हुआ था. उस समय मध्य-मार्गी राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कट्टरपंथियों को परमाणु समझौता स्वीकार के लिए मना लिया था. इन कट्टरपंथियों में ख़ुद ख़ामनेई भी शामिल थे.
इसके अलावा प्रशासन चाहे तो सार्वजनिक विमर्श को भी प्रभावित कर सकता है और उन नीतियों को भी आगे बढ़ा सकता है जो ख़ामनेई के नज़रिये से बिल्कुल मेल न खाते हों
सुधारवादियों के पास इस तरह के सुधारों के मौक़े हैं और पेज़ेश्कियान ने ऐसे वादे किए भी हैं. उन्होंने कट्टरपंथियों की ओर से ईरान के चारों और खड़ी दीवारों को गिराने का वादा किया है.
सुधारवादियों भारी राजनीतिक दमन झेला है. कट्टरपंथियों ने कई सुधारवादी राजनीतिक विचारकों की हत्या की है. अख़बार बंद कर दिए गए हैं और राजनीतिक विरोधियों के ख़िलाफ़ बड़ी तादाद में मुक़दमे चलाए गए हैं.
सुधारवादियों के पास सत्ता के अहम केंद्रों को प्रभावित करने की भी ताक़त नहीं है. ईरान के सर्वोच्च नेता के दफ्तर, गार्डियन काउंसिल और सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी गार्ड को प्रभावित करने के लिए उनके पास ताक़त नहीं है.
वे स्वतंत्र चुनाव भी आयोजित नहीं करा सकते औैर न सेंसरशिप क़ानून बदल सकते हैं. मोरलिटी पुलिस को नियंत्रित करने का भी अधिकार उनके पास नहीं है.
पेज़ेश्कियान को इस बार एक करोड़ साठ लाख वोटरों ने वोट दिया है. अब भी एक करोड़ 30 लाख वोट उनके कट्टरपंथी प्रतिद्वंद्वी सईद जलीली के पास गए हैं. वो सईद जलीली जो कहते हैं कि ईरान को अपने हित सुरक्षित रखने के लिए ज्यादा पश्चिम विरोधी होने की जरूरत है.
जब पेज़ेश्कियान को राष्ट्रपति बनाने के लिए हुए जनादेश का विश्लेषण करें तो इस पहलू को ध्यान में रखना जरूरी है.












