तुर्की क्या महिलाओं के लिए ज़्यादा ख़तरनाक बनता जा रहा है?- दुनिया जहान

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मार्च 2024 में तुर्की के दक्षिणी शहर मर्सिन में 31 वर्षीय मर्वे बेहेर की हत्या उनके पूर्व पति ने कर दी. इसके बाद बड़ी संख्या में महिलाएं विरोध प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतर आईं.

महिलाओं की हत्या के ख़िलाफ़ इस विरोध प्रदर्शन के दौरान मर्वे की मां ने उसके शादी के जोड़े को आग लगा दी. उन्होंने महिलाओं से अपील की कि वो शादी करने से पहले तीस बार सोचें.

इस साल के पहले तीन महीनों के दौरान तुर्की में मर्वे सहित कम से कम 92 महिलाओं की हत्या कर दी गई है.

फ़रवरी में एक ही दिन सात महिलाओं की हत्या की खबर सामने आई. तुर्की में एक दिन में इतनी सारी महिलाओं की हत्या पहले कभी नहीं हुई थी. यह सभी हत्याएं उन महिलाओं के पूर्व पति या साथियों ने की थी.

तीन साल पहले तुर्की इस्तांबुल कन्वेंशन से बाहर हो गया था. इस्तांबुल संधि पूरे यूरोप में महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा रोकने के उद्देश्य से कायम की गई थी.

इस संधि से अपने आपको बाहर करने के बाद तुर्की लिंग आधारित हिंसा को ख़त्म करने के लिए जूझ रहा है.

इसलिए इस सप्ताह दुनिया जहान में हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि क्या तुर्की महिलाओं के लिए ज़्यादा ख़तरनाक बनता जा रहा है?

ओटोमन साम्राज्य और महिलाओं के अधिकार

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यह कहानी शुरू होती है आधुनिक तुर्की की स्थापना के 100 साल से भी अधिक पहले से. तब तुर्की ओटोमन साम्राज्य था. यह यूरोप से मध्य पूर्व तक फैला हुआ था.

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आगा ख़ान यूनिवर्सिटी में जेंडर स्टडीज़ की एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर सेवगी एडक बताती हैं, "मुस्लिम साम्राज्य होने के बावजूद ओटोमन साम्राज्य में कई धर्म और जाति के लोग थे."

वे कहती हैं, "इसलिए जब 1920 के दशक में तुर्की एक आधुनिक देश के रूप में उभरने लगा तो ओटोमन साम्राज्य की धार्मिक और सामाजिक विविधता उसमें बरकरार रही. इतना ही नहीं, सरकार के ढांचे और संस्थाओं के कामकाज के तरीकों की निरंतरता भी बनी रही. यह अपने आप में एक अनूठी बात थी."

लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि तुर्की में महिला सशक्तिकरण का श्रेय मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क को जाता है जिनके नेतृत्व में 1923 में तुर्की गणराज्य की स्थापना हुई थी.

लेकिन डॉक्टर सेवगी एडक कहती हैं कि मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क के आने से पहले तुर्की में ओटोमन साम्राज्य के दौरान नारीवादी महिलाओं के संघर्ष के कारण महिलाओं के अधिकारों के लिए अभियान शुरू हो चुका था.

डॉक्टर एडक कहती हैं कि ओटोमन साम्राज्य की कई मुस्लिम महिलाओं ने महिला अधिकार के लिए अभियान शुरू किया था और कई महिला संगठनों की स्थापना हुई जो लोकतांत्रिक तुर्की को विरासत में मिली.

लेकिन तुर्की में बड़ा बदलाव प्रथम विश्व युद्ध के दौरान आया. इस समय पुरुष लड़ने के लिए चले गए और महिलाओं को यूनिवर्सिटी और कॉलेज जाने की अनुमति मिल गई. इतना ही नहीं वे कई नए व्यवसाय भी चुन सकती थीं.

डॉक्टर सेवगी एडक कहती हैं कि इसी के चलते तुर्की ने 1926 में नागरिक संहिता अपनाई.

कमाल अतातुर्क और महिला अधिकार

वीडियो कैप्शन, ओटोमन साम्राज्य से बने तुर्की की पूरी कहानी

डॉक्टर एडक कहती हैं, “वो एक क्रांतिकारी और अनूठा कदम था क्योंकि पहली बार किसी मुस्लिम देश में परिवार संबंधी धर्मनिरपेक्ष क़ानून बने थे जिसके तहत शादी, तलाक और उत्तराधिकार के मामलों में महिलाओं को समान अधिकार मिले थे, लेकिन नागरिक संहिता में पितृसत्तात्मक बातें भी थीं. मिसाल के तौर पर पुरुष को ही परिवार का मुखिया माना जाता था और परिवार के खर्च चलाने की ज़िम्मेदारी पुरूषों के पास ही थी.”

यह क़ानून तुर्की के पहले राष्ट्रपति मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क द्वारा देश को धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक बनाने के लिए चलाए गए कई क्रांतिकारी सुधार कार्यक्रमों का हिस्सा था.

डॉक्टर सेवगी एडक के अनुसार एक ग़लत धारणा यह है कि महिलाओं को समान अधिकार सौंप दिए गए. सच्चाई यह है कि इसके लिए महिलाओं को संघर्ष करना पड़ा था.

हालांकि यह भी सच है कि महिलाओं को शिक्षा का अधिकार देकर उन्हें देश के सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनाना मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क की विचारधारा के केंद्र में था.

यही वजह है कि महिला अधिकार के मुद्दे को देश में धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक विचारधारा के साथ जोड़ कर देखा जाता है.

1980 के दशक में स्थिति बदली और देश में महिलाओं की भूमिका को लेकर रूढ़िवादी सोच बल पाने लगी जिसके जवाब में नई नारीवादी महिलाएं सामने आईं. इन महिलाओं को लगता था कि नागरिक संहिता बदले हुए समय में काफ़ी पिछड़ी है.

डॉक्टर सेवगी एडक कहती हैं, "इन्हीं नारीवादियों ने महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के मुद्दे को ज़ोरशोर से उठाया. 2001 में नागरिक संहिता में बदलाव किए गए और शादी के लिए न्यूनतम आयु को बढ़ा कर 18 वर्ष कर दिया गया और तलाक होने पर महिलाओं को पति के नाम पर रजिस्टर्ड संपत्ति में आधा हिस्सा दिया गया."

महिला सशक्तिकरण के इस परिदृश्य में ही एक ऐसे नेता तुर्की की राजनीति में आए, जिन्होंने उन धार्मिक महिलाओं को आकर्षित करने की कोशिश की जो अतातुर्क की विचारधारा वाली राजनीति के दौर में अलग थलग पड़ गई थीं. ये वो समय था जब सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं के हिजाब पहनने पर भी रोक लगा दी गई थी.

हिजाब के हीरो

वीडियो कैप्शन, रेचेप तैय्यप अर्दोआन 20 साल से तुर्की की सत्ता पर क़ाबिज़ हैं.

रेचेप तैय्यप अर्दोआन के राजनीति में आने के साथ तुर्की में एक बार फिर सामाजिक बदलाव का दौर शुरू हुआ.

वो तुर्की के सबसे बड़े शहर इस्तांबुल के मेयर रह चुके थे. 2001 में उन्होंने इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित नई जस्टिस और डेवलपमेंट पार्टी यानी एकेपी की स्थापना की. इस पार्टी ने एक साल बाद संसदीय चुनावों में बहुमत प्राप्त किया. इसके एक साल बाद अर्दोआन तुर्की के प्रधानमंत्री बने.

तुर्की की इसीक यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र की प्रोफ़ेसर सेडा डेमिराल्प कहती हैं कि अर्दोआन को रूढ़िवादी महिलाओं का समर्थन प्राप्त था और उन्होंने हिजाब की समस्या का समाधान करने का आश्वासन दिया था.

वो कहती हैं, "जब एकेपी की स्थापना हुई तब आर्थिक संकट के कारण अन्य सभी राजनीतिक दलों की ताक़त लगभग ख़त्म हो गई थी. यह एक नई पार्टी के सत्ता में आने के लिए काफ़ी अनुकूल माहौल था. यह पार्टी शुरूआत में रूढ़िवादी मूल्यों और उदारवादी सिद्धांतों के मेल का प्रतिनिधित्व करती थी."

अर्दोआन को तुर्की के सभी तबकों का समर्थन प्राप्त था लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा महिलाएं थीं. ख़ास तौर पर हिजाब पहने वाली महिलाएं, जो उन्हें अपने हिमायती के रूप में देखती थीं.

सेडा डेमिराल्प की राय है कि अर्दोआन को महिला मतदाताओं से बड़ा समर्थन मिलता रहा है. धर्मनिरपेक्ष तुर्की में सार्वजनिक जगहों पर हिजाब पहनने पर प्रतिबंध के चलते कई महिलाएं ना उच्च शिक्षा पा सकती थीं ना दफ़्तरों में काम कर सकती थीं.

इसलिए ये महिलाएं अर्दोआन का समर्थन करती रहीं हैं. मगर कई उदारवादी और नारीवादी महिलाएं भी अर्दोआन का समर्थन करती थीं क्योंकि उन्हें लगता था कि हिजाब पर प्रतिबंध रूढ़िवादी महिलाओं के अधिकारों का हनन है.

एकेपी ने कैसे महिलाओं को जोड़ा

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अर्दोआन की एकेपी पार्टी ने महिलाओं के सशक्तिकरण, राजनीति और समाज में उनकी भूमिका की बात की. एकेपी ने महिलाओं को पार्टी के कामकाज से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया और देश में कई महिला संगठन उभरने लगे.

सेडा डेमिराल्प मानती हैं कि इससे रूढ़िवादी महिलाओं के सशक्तिकरण में मदद मिली. महिला मतदाताओं के लिए दूसरा बड़ा मुद्दा था घरेलू हिंसा का.

2011 में इस्तांबुल कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने वाला पहला देश तुर्की था. यह यूरोपीय संघ की संधि थी जिसका उद्देश्य लिंग आधारित हिंसा को रोकने के लिए क़ानून बनाना और कार्रवाइयां करना था.

एक समय तुर्की की बड़ी महत्वाकांक्षा यूरोपीय संघ में शामिल होने की थी जिसके लिए आवश्यक शर्तें पूरी करने के लिए अर्दोआन कदम उठा रहे थे.

अंतरराष्ट्रीय समुदाय में उन्हें एक सुधारक के रूप में देखा जा रहा था, लेकिन उनके कुछ वक्तव्यों से धर्मनिरपेक्ष महिलाएं नाराज़ भी हो गईं.

एक भाषण में उन्होंने कहा था कि महिलाएं मर्दों के बराबर नहीं हैं और एक अन्य भाषण में कहा कि मां बनना एक महिला की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है.

2013 में इस्तांबुल के मध्य में एक पार्क बनाने के सरकारी प्रोजेक्ट के विरोध में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ क्रूरता से कार्रवाई की, जिसके बाद स्थिति और बदल गई.

सेडा डेमिराल्प ने कहा, "अर्दोआन तानाशाही तरीके अपनाने लगे और विरोध प्रदर्शनों का समर्थन करने वाली महिलाओं को निशाना बनाया. दूसरी तरफ़ उन्होंने रूढ़िवादी महिलाओं को आर्थिक सहायता और सार्वजनिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका देना शुरू कर दिया जिसके चलते धर्मनिरपेक्ष महिलाएं उनका और विरोध करने लगीं."

महिला अधिकारों पर हमला

इस्तांबुल कन्वेंशन से निकलने के ख़िलाफ़ तुर्की में महिलाओं ने प्रदर्शन किया था.

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एज़ेल बूसे सोनमैज़ोसेक एक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार वकील हैं जो तुर्की के मानवाधिकार गुटों से भी जुड़ी हुई हैं.

उनके अनुसार, गेज़ी विरोध प्रदर्शनों के बाद लैंगिक समानता को नुकसान पहुंचाने वाले एक नए अध्याय की शुरुआत हुई.

वो कहती हैं कि 2013 के बाद तुर्की में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर नियंत्रण लग गए हैं. गेज़ी विरोध प्रदर्शनों के बाद लैंगिक समानता के लिए आयोजित प्राइड मार्च में महिलाओं के भाग लेने का भी विरोध होने लगा. उसके बाद 2015 में एक और बदलाव आया.

सोनमैज़ोसेक कहती हैं, "उस साल सभी अधिकारिक दस्तावेज़ों से लैंगिक जानकारी हटा दी गई. इसके बाद कई लैंगिक विरोधी नीतियां अपनाई गईं और सरकार समर्थक एनजीओ बनाए गए जो महिलाओं को पहले से मिले अधिकारों पर हमला करने लगे.”

2020 में तुर्की ने इस्तांबुल कन्वेंशन को निशाना बनाने के लिए ग़लत प्रचार शुरू कर दिया. तब तक उसकी यूरोपीय संघ की सदस्यता पाने की संभावना ठंडे बस्ते में चली गई थी.

तुर्की ने कहा कि यह संधि पारिवारिक मूल्यों के ख़िलाफ़ है और समलैंगिकता को बढ़ावा देती है. इस्तांबुल कन्वेंशन में शामिल होने के 10 साल बाद तुर्की ने अपने आपको इस संधि से बाहर कर दिया.

डॉक्टर एज़ेल सोनमैज़ोसे ने बताया कि आधिकारिक तौर पर यह कहा गया कि इस्तांबुल कन्वेंशन का इस्तेमाल समलैंगिक लोग समलैंगिकता को सामान्य बनाने के लिए कर रहे हैं.

उन्हें उम्मीद नहीं थी कि एक देश मानवाधिकार संबंधी संधि से अपने आपको बाहर कर लेगा. तुर्की की सरकार का कहना है कि देश में घरेलू हिंसा से निपटने के लिए क़ानून मौजूद है.

पिछले साल 315 महिलाओं की हत्या

वीडियो कैप्शन, इसराइल पर अर्दोआन ने अपना तेवर अचानक क्यों बदला?

डॉक्टर एज़ेल सोनमैज़ोसेक की दलील है कि यह क़ानून इस्तांबुल कन्वेंशन के साथ काम करता था और उसे इस संधि के साथ जोड़ कर देखा जाता था.

वे कहती हैं कि तुर्की के इस्तांबुल कन्वेंशन से बाहर होने के बाद घरेलू हिंसा संबंधी क़ानून खोखला हो गया है और कई प्रकार की ग़लतफ़हमियां फैल रही हैं.

कई पुलिस अधिकारी भी असमंजस में हैं कि यह क़ानून अस्तित्व में है या नहीं.

उन्होंने बताया कि कई रिपोर्टों से पता चलता है कि महिलाओं पर हमला करने वालों में क़ानून का डर ख़त्म हो गया है क्योंकि वो सोचते हैं कि अब तुर्की इस्तांबुल कन्वेंशन का हिस्सा नहीं है तो अब उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता.

डॉक्टर एज़ेल बूसे सोनमैज़ोसेक कहती हैं कि तुर्की के इस्तांबुल कन्वेंशन से बाहर होने के बाद महिलाओं की हत्या के मामले कितने बढ़ें है यह कहना मुश्किल है क्योंकि सरकार इस संबंध में आंकड़े सार्वजनिक नहीं कर रही है.

उनके अनुसार, इसकी वजह यह है कि सरकार नहीं चाहती की इस मामले में उस पर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उंगलियां उठें.

दूसरी बात यह है कि कई नारीवादी संगठन इन संख्याओं को आधार बना कर नीति बनाने पर ज़ोर दे सकते हैं. लेकिन ‘वी विल स्टॉप फ़ेमीसाइड’ नाम की एक संस्था इन मामलों पर नज़र रख रही है.

सरकार इस संस्था को बंद करने की असफल कोशिश भी कर चुकी है.

इस संस्था के अनुसार, 2023 में पुरुषों द्वारा 315 महिलाओं की हत्या हुई और इनमें से 65 प्रतिशत मामलों में महिलाओं की हत्या उनके घर के भीतर हुईं.

मगर डॉक्टर एज़ेल सोनमैज़ोसेक का कहना है कि सही संख्या का पता लगाना असंभव है क्योंकि उसी साल 248 औरतों की मौत संदेहास्पद स्थिति में हुई थी.

डॉक्टर एज़ेल सोनमैज़ोसेक ने कहा, “संदेहास्पद इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि इन मामलों को हत्या के मामले के तहत दर्ज नहीं किया गया बल्कि दुर्घटना बताया गया. यह चौंकाने वाली बात है कि पूरे देश में औरतें अपनी बालकनी और खिड़की से गिर कर मर रहीं हैं और उनकी संख्या बेहद गंभीर है. मगर अब इस समस्या के प्रति जागरूकता भी बढ़ रही है और रूढ़िवादी महिलाएं भी इसके लिए आवाज़ उठा रही हैं.”

रेड कार्ड

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इस साल मार्च में मुख्य विपक्षी दल सीएचपी ने इस्तांबुल और अंकारा सहित कई बड़े शहरों के नगर निगम चुनावों में बड़ी जीत हासिल की.

अर्दोआन तीसरी बार राष्ट्रपति चुनाव तो जीत गए लेकिन उनकी पार्टी एकेपी को 20 साल में पहली बार इतना भारी नुकसान उठाना पड़ा.

हूर्सन असलाय एक्सोय, बर्लिन स्थित जर्मन इंस्टीट्यूट फ़ॉर इंटरनेशनल एंड सिक्यूरिटी अफ़ेयर्स में तुर्की अध्ययन विभाग की प्रमुख हैं.

वो कहती हैं, "एक साल पहले संसदीय चुनावों में जनता ने एकेपी को वोट दिया क्योंकि लोग स्थिरता चाहते थे, लेकिन स्थानीय चुनावों में उन्होंने विपक्ष को जीत दिला कर सरकार को चेतावनी दे दी है कि वो सही रास्ते पर नहीं चल रही है. सरकार के लिए यह रेड कार्ड है."

तुर्की में महंगाई दर 70 प्रतिशत तक पहुंच गई है जो कि मतदाताओं के लिए एक बड़ा मुद्दा है.

हूर्सन असलाय एक्सोय का मानना है कि महंगाई का सबसे ज़्यादा असर महिलाओं पर पड़ता है.

वे कहती हैं, "विपक्षी दल सीएचपी ने कई शहरों में महिलाओं को उम्मीदवार बनाया जिससे पता चलता है कि लोग युवा और महिला राजनेताओं का समर्थन कर रहे हैं.”

कट्टरपंथी दलों का दबाव

एक यूनिवर्सिटी छात्रा की हत्या करने वाले अपराधी की सज़ा कम करने को लेकर 2022 में तीखा विरोध प्रदर्शन हुआ.

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इमेज कैप्शन, एक यूनिवर्सिटी छात्रा की हत्या करने वाले अपराधी की सज़ा कम करने को लेकर 2022 में तीखा विरोध प्रदर्शन हुआ.

राष्ट्रपति अर्दोआन की निर्भरता उनके गठबंधन के कट्टरपंथी घटक दलों पर बढ़ गई है. रूढ़िवादी महिलाओं के लिए भी इन कट्टरपंथी दलों की सोच चिंताजनक है.

हूर्सन असलाय एक्सोय ने कहा, “उनके गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी स्पष्ट रूप से तलाक के बाद पति की संपत्ति में पत्नी को आधा हिस्सा देने के ख़िलाफ़ है. अगर पति की कमाई पत्नी की आय से ज्यादा है तो उसे पत्नी को खर्च के लिए पैसे देने होते हैं. वो इसके भी ख़िलाफ़ है."

"वहीं गठबंधन के अतिरुढ़िवादी इस्लामी दल महिलाओं को पुरुषों के बराबर नहीं मानते और उन्हें समान अधिकार देने के ख़िलाफ़ हैं. यह लोग तुर्की को ऑटोमन युग में ले जा रहे हैं. अर्दोआन की एकेपी भी अपने मूल सिद्धांतों से बहुत दूर जा चुकी है.”

तो अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर- क्या तुर्की महिलाओं के लिए ज़्यादा ख़तरनाक बनता जा रहा है?

इस बारे में आधिकारिक आंकड़े ना होने की वजह से इसकी सीधा जवाब देना मुश्किल है. लेकिन फ़रवरी में केवल एक दिन में सात महिलाओं की उनके पति या साथी के हाथों हत्या हो गई.

यह चिंता भी व्यक्त की जा रही है कि घरेलू हिंसा संबंधी तुर्की का अपना क़ानून महिलाओं को वैसी सुरक्षा नहीं दे पा रहा जैसी इस्तांबुल कन्वेंशन से मिलती थी.

लेकिन एक बात पर हमारे सभी एक्सपर्ट सहमत हैं कि तुर्की ने ऐसे कई कदम उठाए हैं जो महिलाओं के समान अधिकारों के ख़िलाफ़ हैं.

वहीं समान अधिकार विरोधी सोच और वक्तव्य अब मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा बनते जा रहे हैं.

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