नवजोत सिंह सिद्धू का कमेंट्री में धमाल, लेकिन उनकी राजनीति का क्या होगा?

    • Author, सुरिंदर मान
    • पदनाम, बीबीसी पंजाबी के लिए

इंडियन प्रीमियर लीग के पहले ही मैच में नवजोत सिंह सिद्धू ने अपनी कमेंट्री से लोगों को ख़ासा प्रभावित किया. क़रीब एक दशक बाद कमेंट्री बॉक्स में आए सिद्धू को देखकर एक बार भी ऐसा नहीं लगा कि उन्हें अपनी बात कहने में कोई मुश्किल हो रही हो.

कभी शांत क्रिकेटर के तौर पर जाने गए सिद्धू अपनी कमेंट्री के लिए खासे मशहूर रहे हैं. लेकिन एक दशक के बाद और कहीं ज़्यादा तेज़ तर्रार क्रिकेट प्रतियोगिता के दौर में भी बतौर कमेंटेटर सिद्धू ने कहीं कोई कमी नहीं खलने दी है.

एक जुमला बोलते हुए उन्होंने कहा, “पहले मैच के दौरान चाहे एक पत्थर चोट खाकर कंकड़-कंकड़ हो गया और पत्थर चोट सहकर शंकर-शंकर हो गया.”

चोट सह कर वापसी की तुलना सिद्धू ने कार दुर्घटना से वापसी करने वाले ऋषभ पंत से की.

धोनी की कप्तानी छोड़ने पर उन्होंने कहा, "ये बंदा तब गया है जब लोग कहेंगे क्यों जा रहे हो. इतने साल खेलने के बाद हिमालय के शिखर से जा रहे हैं तो लोग सवाल करेंगे क्यों जा रहे हैं." एक ज़ोरदार छक्के पर उन्होंने कहा, "बाप रे बाप, गेंद तारामंडल में."

आईपीएल मुक़ाबलों के रोमांच पर सिद्धू ने कहा, "आईपीएल की अजब चाल है प्यारे, पल में प्यादों को वज़ीर बना दे. कभी ज़रा सी गलती पर शहजादों को फ़कीर बना दे."

ऐसे में ज़ाहिर है कि आईपीएल के आने वाले मैचों में इसी तरह सिद्धू नायाब अंदाज़ में क्रिकेट फैंस का मनोरंजन करते दिखेंगे. बतौर कमेंटेटर सिद्धू की सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि वे अंग्रेजी और हिंदी, दोनों में मज़ेदार अंदाज़ में कमेंट्री करते हैं.

लेकिन इससे पंजाब की राजनीति और ख़ासकर कांग्रेस पार्टी के अंदर चर्चाओं का दौर देखने को मिल रहा है. लोगों के बीच चर्चा ये हो रही है कि सिद्धू लोकसभा चुनाव में पार्टी के लिए प्रचार करेंगे या नहीं.

जेल में सिद्धू

आईपीएल में कमेंट्री से पहले सिद्धू ने राजनीति से कोई दूरी बरतने के संकेत नहीं दिए हैं. अप्रैल, 2023 में जब वे रोडरेज मामले में 10 महीने की सजा काटने के बाद बाहर आए तो पंजाब के मालवा क्षेत्र में उन्होंने अपने समर्थकों के बीच दो बड़ी रैलियां की थीं.

इन रैलियों में उन्होंने अपनी ही पार्टी के नेताओं पर कई तरह के सवाल भी उठाए और उस वक्त यह माना जा रहा था कि नवजोत सिंह सिद्धू पंजाब की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले हैं.

नवजोत सिंह सिद्धू ने पटियाला जेल से बाहर आने के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार और मुख्यमंत्री भगवंत मान पर भी राजनीतिक हमले किए.

27 दिसंबर 1988 को पटियाला में कार पार्किंग को लेकर हुए विवाद में 65 वर्षीय गुरनाम सिंह की मौत के मामले में नवजोत सिंह सिद्धू को सुप्रीम कोर्ट ने एक साल की सजा सुनाई थी.

नवजोत सिंह सिद्धू का राजनीतिक सफ़र

नवजोत सिंह सिद्धू का राजनीतिक सफ़र भी काफी दिलचस्प रहा है. 1999 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद वह 2004 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए थे.

2004 के लोकसभा चुनाव में वह भाजपा के टिकट पर अमृतसर से लोकसभा सांसद बने और वे 2014 तक बीजेपी के सांसद चुने जाते रहे.

साल 2016 में उन्हें बीजेपी ने राज्यसभा के लिए मनोनीत किया था, लेकिन उन्होंने पंजाब की राजनीति में ज़्यादा दिलचस्पी की बात कहते हुए राज्यसभा से इस्तीफ़ा दे दिया.

साल 2017 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को छोड़ दिया और कांग्रेस में शामिल हो गए. उसी साल हुए पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान नवजोत सिंह सिद्धू कांग्रेस पार्टी से अमृतसर पूर्व से विधायक बने. तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार में नवजोत सिंह सिद्धू पर्यटन एवं सांस्कृतिक मामलों के कैबिनेट मंत्री बने.

अप्रैल, 2018 में गुरनाम सिंह की मौत का 1988 वाला मामला एक बार फिर अदालत में पहुंचा. पंजाब सरकार की ओर से सिद्धू के ख़िलाफ़ हलफनामा दाख़िल किया गया.

2018 में पाकिस्तान में हुए चुनाव में इमरान ख़ान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने. सिद्धू के दोस्त इमरान ख़ान ने उन्हें शपथ ग्रहण समारोह में आने का निमंत्रण दिया.

कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सिद्धू से इस समारोह में नहीं जाने की अपील की. लेकिन सिद्धू वाघा बॉर्डर के रास्ते पाकिस्तान गए. वहां करतारपुर कॉरिडोर खोलने की पेशकश पर वो पाकिस्तान सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से गले भी मिले.

2019 में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कैबिनेट में बदलाव करते हुए सिद्धू का मंत्रालय बदल दिया, इसके विरोध में सिद्धू ने पद ग्रहण किए बिना इस्तीफ़ा दे दिया.

साल 2021 में जब चरणजीत सिंह चन्नी राज्य के मुख्यमंत्री बने तब कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री के पद से हटाने में नवजोत सिंह सिद्धू की सक्रिय भूमिका रही थी. लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में सिद्धू खुद अपनी सीट गंवा बैठे.

इसके बाद उन्हें 1988 में कार पार्किंग को लेकर हुए विवाद में एक शख़्स की हत्या के मामले में दस महीने तक जेल में बिताने पड़े. 19 मई 2022 को सिद्धू के ख़िलाफ़ रोडरेज के मामले एक साल की सजा सुनाई गई थी, लेकिन जेल में उनके अच्छे व्यवहार को देखते हुए उन्हें 10 महीने बाद ही रिहा कर दिया गया.

अपनी ही पार्टी के नेताओं पर गुस्सा

जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने कांग्रेस पार्टी के नेताओं की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए थे. वैसे यह कोई पहला मौका नहीं था, जब नवजोत सिंह सिद्धू ने बिना किसी का नाम लिए अपनी ही पार्टी के नेताओं पर तीखी आलोचना की थी.

साल 2017 में जब पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी थी, तब भी नवजोत सिंह सिद्धू अपनी ही सरकार के प्रदर्शन पर सवाल उठाते नजर आए थे.

नवजोत सिंह सिद्धू ने पहले बठिंडा ज़िले और फिर मोगा में जनसभाएं कीं. इन रैलियों में उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की ख़ूब आलोचनाएं की.

इसके बाद भी, पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वारिंग ने नवजोत सिंह सिद्धू के ख़िलाफ़ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की, लेकिन सिद्धू के समर्थकों को 'कारण बताओ' नोटिस दिया.

पटियाला जेल से बाहर आने के बाद पंजाब विधानसभा में विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वारिंग और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच लगातार 'वाक युद्ध' होता रहा.

नवजोत सिंह सिद्धू टेलीविजन स्क्रीन की तरह ही राजनीति में अपने बेबाक भाषणों के लिए भी जाने जाते हैं.

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना ​​है कि नवजोत सिंह सिद्धू राजनीति में खुद को बहुत ज़्यादा महत्व देते हैं, जिसके कारण कई बार पार्टी में अंदरूनी कलह भी पैदा हो जाती है.

'ईमानदार छवि'

गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के इतिहास और राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. जगरूप सिंह सेखों कहते हैं, "पंजाब की राजनीति में नवजोत सिंह सिद्धू की छवि ईमानदार नेता की है. लेकिन राजनीति में लोगों के मुद्दों को ईमानदारी से उठाने की ज़रूरत है."

"यदि किसी भी राजनीतिक दल में कोई भी नेता अपनी नीतियों को पार्टी की नीतियों के बराबर खड़ा करने की कोशिश करता है, तो उस नेता के लिए पार्टी में राजनीतिक स्थितियाँ हमेशा के लिए स्पष्ट नहीं रहेंगी."

डॉ. सेखों का यह भी मानना है कि, "अगर कोई राजनीतिक नेता एक बार हार जाता है तो इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता. नवजोत सिंह सिद्धू को किसी भी स्थिति में चुनाव लड़ना चाहिए था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. कांग्रेस पार्टी इस समय पूरे देश में राजनीतिक सत्ता के लिए संघर्ष कर रही है. ऐसे दौर में नवजोत सिंह सिद्धू के लिए यह अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने का एक बड़ा मौका था."

यह भी साफ़ है कि नवजोत सिंह सिद्धू अक्सर अपने भाषणों में कहते रहे हैं कि केंद्रीय राजनीति में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है. उन्होंने पार्टी आलाकमान से यह भी कहा है कि वह अपनी राजनीति सिर्फ पंजाब पर केंद्रित करना चाहते हैं.

आगामी चुनाव में सिद्धू की भूमिका

अब सवाल यह उठता है कि दो महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में नवजोत सिंह सिद्धू किस तरह की भूमिका निभाएंगे.

नवजोत सिंह सिद्धू जब भारतीय जनता पार्टी में थे तब वह बीजेपी के स्टार प्रचारक भी थे.

इसके बाद जब वह कांग्रेस में शामिल हुए तो पार्टी ने उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में चुनाव प्रचार करने वाले महत्वपूर्ण नेताओं की सूची में शामिल किया गया.

राजनीतिक विश्लेषक डॉ. जगरूप सिंह सेखों कहते हैं, "इसमें कोई शक नहीं कि नवजोत सिंह सिद्धू राजनीति में एक अलग शख्सियत बनकर उभरे हैं. वह अपने बेबाक बयानों और तेज़-तर्रार भाषणों के कारण भी लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बनते हैं."

"आईपीएल में कमेंट्री करना उनके काम का हिस्सा हो सकता है. लेकिन जब कांग्रेस पार्टी अपनी स्थिति के लिए पल-पल लड़ रही है, ऐसे समय में कमेंट्री के लिए जाने पर सवाल उठना स्वाभाविक है."

दो बड़ी राजनीतिक रैलियां करने के बाद जब पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने नवजोत सिंह सिद्धू के समर्थकों को पार्टी लाइन से बाहर काम करने के लिए नोटिस जारी किया तो नवजोत सिंह सिद्धू ने दिल्ली में प्रियंका गांधी से मुलाकात की.

पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी द्वारा जिन सिद्धू समर्थकों को नोटिस दिया गया उनमें महेशिंदर सिंह, निहाल सिंह वाला और धर्मपाल सिंह डीपी शामिल थे.

महेशिंदर सिंह, निहाल सिंह वाला जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रह चुके हैं जबकि धर्मपाल सिंह डीपी का कहना है कि काम करना हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है.

धर्मपाल सिंह डीपी कहते हैं, "आयकर के मामलों में क़ानूनी अड़चनों के कारण नवजोत सिंह सिद्धू के बैंक खाते तक सील कर दिए गए. आईपीएल में कमेंट्री उनके लिए आमदनी का ज़रिया है."

वे कहते हैं, ''नवजोत सिंह सिद्धू ने अपने समर्थकों की बैठक में साफ़ कर दिया है कि वह आईपीएल में कमेंट्री करने के बाद पंजाब की राजनीति में सक्रिय रहेंगे.''

वहीं नवजोत सिंह सिद्धू ने 'द ट्रिब्यून' अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा है, ''मेरे पास लग्जरी होटल नहीं हैं और न ही मेरे पास पंजाब के कई नेताओं की तरह शराब या खनन कारोबार से आय का कोई वैकल्पिक स्रोत है.''

“एक ज़िम्मेदार पिता और पति के रूप में मुझे जीविकोपार्जन करना है और इसीलिए मैंने आईपीएल को चुना. मुझे कमाने की ज़रूरत है क्योंकि मेरी पत्नी कैंसर का सामना कर रही है. मुझे अपनी बेटी की शादी के लिए भी पैसों की ज़रूरत है.”

नवजोत सिंह सिद्धू ने साफ़ कहा कि इसका मतलब यह नहीं है कि वह राजनीति या पंजाब की जनता से दूर रहेंगे.

उन्होंने इस इंटरव्यू में यह भी कहा, “मैं एक वफ़ादार कांग्रेसी हूं और मैं अपने नेता राहुल गांधी के साथ खड़ा हूं. जहां भी पार्टी मुझे चाहेगी, वहां मैं प्रचार करूंगा.”

एक नजर सिद्धू के क्रिकेट करियर पर

1983 से 1999 तक भारतीय क्रिकेट टीम का हिस्सा रहे नवजोत सिंह सिद्धू ने अपने क्रिकेट करियर में 51 टेस्ट मैच और 136 वनडे इंटरनेशनल मैच खेले हैं. उन्होंने 1987 में वर्ल्ड कप के दौरान कई अर्धशतकीय पारियां जमाकर लोगों का ध्यान खींचा था.

उन्होंने साल 1999 में ही बतौर क्रिकेटर क्रिकेट को अलविदा कह दिया था. हालाँकि, वह एक कमेंटेटर के रूप में खेल से जुड़े रहे.

नवजोत सिंह सिद्धू लंबे समय से टीवी शोज में सक्रिय हुए और उन्होंने अपने अनोखे अंदाज़ से अलग पहचान बनाई.

उनके पिता भगवंत सिंह भी पंजाब कांग्रेस से जुड़े थे. नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर सिद्धू विधायक और पंजाब सरकार में मुख्य संसदीय सचिव रह चुकी हैं.

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