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सोफ़िया दलीप सिंह: एक भारतीय राजकुमारी जो ब्रिटेन में महिलाओं के अधिकार के लिए लड़ीं
- Author, मैरिल सबेस्टियन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सोफ़िया दलीप सिंह, एक राजकुमारी जिसने ब्रिटेन में महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिलाने के लिए लड़ाई लड़ी लेकिन अपने पूर्वजों के देश भारत में लोग उनके बारे में कम ही जानते हैं.
साल 1910 में, सोफ़िया महिलाओं के लिए मताधिकार की मांग करने वाले 300 लोगों के एक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थीं, जिसने तत्कालीन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एचएच एस्क्विथ से मिलने के लिए लंदन में संसद की ओर मार्च किया था.
लेकिन एस्क्विथ ने महिलाओं से मिलने से इनकार कर दिया और फिर प्रदर्शन हिंसक हो गया क्योंकि संसद की इमारत के बाहर भीड़ में मौजूद पुरुषों और पुलिसकर्मियों ने उन्हें पीटा था.
इस हिंसा में कई प्रदर्शनकारी गंभीर रूप से घायल हुए और उस दिन को ब्रिटेन में ब्लैक फ्राइडे कहा जाने लगा.
सोफ़िया उन 119 महिलाओं में शामिल थी जिन्हें गिरफ़्तार किया गया था.
वह पंजाब के अंतिम सिख सम्राट महाराजा सर दलीप सिंह की बेटी और ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया की उनकी गॉडमदर थीं.
ईसाई परंपरा के मुताबिक़, गॉडमदर ऐसी महिला होती है जो बच्चे के नामकरण के समय मौजूद रहती है और बच्चे के पालन-पोषण के लिए प्रतिबद्ध होती है.
सोफ़िया की बायोग्राफ़ी लिखने वाली अनीता आनंद ने एक साक्षात्कार में कहा था, ''जब सोफ़िया दलीप सिंह ने नवंबर 1910 में 'ब्लैक फ्राइडे' में हिस्सा लिया था तो वो किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं थी.''
उनके बारे में अब जो भी जानकारी उपलब्ध है उसका एक बड़ा हिस्सा अनीता आनंद की साल 2015 में आई किताब सोफ़िया: प्रिंसेस, सफ़्राजेट, रिवोल्यूशनरी के कारण ही पता चला है.
अनीता ने ये किताब विस्तृत शोध, पुलिस-खु़फ़िया रिकॉर्ड और उन्हें जानने वाले लोगों से बात करके लिखी है.
कौन थीं सोफ़िया?
साल 1876 में जन्मी सोफ़िया, दलीप सिंह की पहली पत्नी बंबा मुलर से हुई छह संतानों में से पांचवीं संतान थीं.
दलीप सिंह को कम उम्र में 1849 में अंग्रेजों द्वारा उनके राज्य पर कब्ज़ा करने के बाद भारत से इंग्लैंड निर्वासित कर दिया गया और एक दंडात्मक संधि की शर्तों के तहत उन्हें कोहिनूर हीरा भी अंग्रेज़ों को देना पड़ा था.
आनंद लिखती हैं कि सोफ़िया इंग्लैंड की सफ़ल्क काउंटी में पली-बढ़ी लेकिन उनका बचपन उतार चढ़ाव भरा रहा.
अपने सिंहासन को फिर से पाने के असफल प्रयासों के बाद 1886 में दलीप सिंह को फ्रांस में निर्वासित कर दिया गया था और उनका परिवार कर्ज़ में डूब गया था.
लेकिन महारानी विक्टोरिया के साथ परिवार के घनिष्ठ संबंधों के कारण उन्हें ब्रिटिश सरकार से एक घर और सलाना भत्ता मिलता रहा.
जब सोफ़िया बड़ी हुईं, तो उन्हें महारानी की ओर से हैम्पटन कोर्ट पैलेस के ग्रेस-एंड-फ़ेवर अपार्टमेंट में जगह दी गई. बाद में सोफ़िया ने इसके बाहर ही महिलाओं को वोट देने के अधिकार के लिए विरोध प्रदर्शन किया.
इतिहासकार एलिज़ाबेथ बेकर 'द ब्रिटिश विमेन्स सफ़्रेज कैंपेन' किताब के एक अध्याय में लिखती हैं, “कम उम्र से ही सोफ़िया ने ब्रिटेन के अभिजात वर्ग के सदस्य के रूप में उन्हें मिले आसान जीवन और ब्रिटेन में रहने वाली एक भारतीय महिला के रूप में उनकी स्थिति के बीच के अंतर को समझ लिया था.”
अपने जीवनकाल में सोफ़िया तीन बार भारत भारत आई थीं, उनके तीनों ही दौरे पर ब्रिटिश सरकार ने करीब से नज़र बनाए रखी थीं. उन्हें डर था कि दलीप सिंह के परिवार की बेटी के भारत जाने से विद्रोह भड़क सकता है.
साल 1906-07 में, सोफ़िया लाहौर (अब पाकिस्तान का हिस्सा) में स्वतंत्रता सेनानियों गोपाल कृष्ण गोखले और लाला लाजपत राय से मिलीं और उनके भाषण, राजनीतिक दृढ़ विश्वास से काफ़ी प्रभावित हुईं.
आनंद अपनी किताब में लिखती हैं, “अप्रैल 1907 तक, सोफ़िया ने भारत में छह महीने बिताए थे और भारत में बढ़ती राजनीतिक अशांति को प्रत्यक्ष रूप से देखा था. ”
1908 में ब्रिटेन लौटने के कुछ महीनों बाद, सोफ़िया महिला सामाजिक और राजनीतिक संघ (डब्ल्यूएसपीयू) नामक संगठन में शामिल हो गई थीं. ये ब्रिटिश राजनीतिक कार्यकर्ता एम्मेलिन पैंकहर्स्ट के नेतृत्व वाला एक समूह था जो महिलाओं के मताधिकार के लिए आवाज़ उठा रहा था.
बाद में वह महिलाएओं के टैक्स विरोधी लीग में भी शामिल हो गईं, जिसका नारा था- "नो वोट, नो टैक्स."
सोफ़िया ने इन आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. 1911 में जब प्रधानमंत्री की कार डाउनिंग स्ट्रीट से निकल रही थी, तब वो बैनर के साथ कार के आगे खड़ी हो गई थीं.
बैनर पर लिखा था-"महिलाओं को वोट का अधिकार दो!"
इसी साल उन्होंने जनगणना का फॉर्म नहीं भरा और टैक्स भरने से भी इनकार कर दिया था.
1913 की एक तस्वीर में राजकुमारी हैम्पटन कोर्ट पैलेस के बाहर खड़ी हैं जहां वह रहती थीं. वह यहां एक बोर्ड के बगल में खड़े होकर द सफ़रजेट अख़बार की कॉपी बेच रही हैं, इस बोर्ड पर 'क्रांति' लिखा है.
बेकर लिखती हैं कि "इस तस्वीर को 'सफ़रजेट वीक' का चेहरा बनाया गया. यह एक मुहिम थी जिसे डब्ल्यूएसपीयू ने चलाया था ताकि अधिक लोगों को इस आंदोलन से जोड़ा जा सके."
सोफ़िया पर ब्रिटिश हकूमत की कड़ी नज़र
कई समाचार पत्रों ने रिपोर्ट छापी कि कैसे अधिकारियों ने कुछ करों का भुगतान करने में विफल होने के कारण सोफ़िया के गहने ज़ब्त कर लिए और गहनों की नीलामी की.
सोफ़िया को कई बार गिरफ़्तार किया गया लेकिन अन्य प्रदर्शनकारियों के विपरीत उनके ख़िलाफ़ आरोप हमेशा हटा लिए गए.
अपनी किताब साउथ 'एशियन रेज़िसटेंस इन ब्रिटेन (1858-1947)' में इतिहासकार सुमिता मुखर्जी लिखती हैं - महिलाओं को वोटिंग दिलाने के अधिकार के संघर्ष में सोफ़िया को शामिल कर, आंदोलनकारियों ने उनके रुतबे का अपने हित के लिए इस्तेमाल किया था.
बेकर लिखती हैं, “ब्रिटेन में प्रवासी भारतीय राजनीतिक शख़्सियत के रूप में दलीप सिंह के एक्शन को नियंत्रित करने के लिए अंग्रेज़ों के भारतीय कार्यालय के नौकरशाह सोफ़िया से जुड़ी खबरों की प्रेस क्लिपिंग जुटाते और उनके वित्तीय मामलों के ज्ञापन भी अपने पास रखते थे.”
बेकर सोफ़िया को "महिला मताधिकार के लिए भारतीय कार्यकर्ताओं और श्वेत ब्रिटिश कार्यकर्ताओं के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी" मानती हैं.
साल 1918 में ब्रिटिश संसद ने एक रिफ़ॉर्म पारित किया जिसके तहत 30 साल से अधिक उम्र की महिलाओं को संपत्ति से जुड़ी कुछ योग्यताएं पूरी करने पर वोट देने का अधिकार मिला.
एक साल बाद 1919 में सोफ़िया भारतीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं सरोजिनी नायडू और एनी बेसेंट के साथ लंदन में भारत के दफ़्तर भी गई थीं.
नायडू और बेसेंट समान वोटिंग अधिकार के सिलसिले में ब्रिटेन के विदंश मंत्री से मिलने पहुंची थीं. विदेश मंत्री ने उनकी बात सुनी लेकिन उनकी बात पर अमल होगा इसे लेकर कोई वादा नहीं किया.
अनीता आनंद लिखती हैं कि सोफ़िया ने ख़ास कर किंग जॉर्ज पंचम को काफ़ी नाराज़ किया था क्योंकि वो महिलाओं के "मताधिकार के विरोधी" थे. लेकिन वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते थे क्योंकि सोफ़िया को मिलने वाली वित्तीय मदद पर संसद का नियंत्रण था.
सोफ़िया अन्य मानवाधिकार की गतिविधियों में भी शामिल थीं - प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, उन्होंने ब्रिटेन में घायल भारतीय सैनिकों की देखभाल की और उनके लिए धन जुटाया का भी काम किया था.
आनंद की किताब के मुताबिक़, राजकुमारी 1924 में एक और बार भारत आईं और उन्होंने तय किया कि वह इस बार पूरे पंजाब की यात्रा करेंगी.
जब उन्होंने अपनी बहन बंबा के साथ अपने पुराने सिख साम्राज्य का दौरा किया तो उन्हें देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ पड़ी, कुछ लोग रोते हुए नारे लगाने लगे-"हमारी राजकुमारियाँ आईं हैं!"
पंजाब में वो जिन जगहों पर गईं उनमें से एक था जलियांवाला बाग, जहां 1919 में ब्रिटिश सैनिकों ने सैकड़ों भारतीयों को गोली मार दी थी.
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, वह अपनी बहन कैथरीन और तीन विस्थापितों के साथ लंदन से बकिंघमशायर चली गई थी.
अपना अंतिम समय उन्होंने अपने साथी और हाउसकीपर जेनेट आइवी बोडेन के साथ बिताए, बोडेन की बेटी ड्रोवना सोफ़िया की गॉडडॉटर थी.
ड्रोवना ने अनीता आनंद को बताया कि राजकुमारी अक्सर उससे मतदान के महत्व के बारे में बात करती थीं.
ड्रोवना याद करते हुए बताती हैं- "वह कहती थीं...जब आपको मतदान की इज़ाजत मिली है तो इस अधिकार का हर हाल में इस्तेमाल करो, तुम्हें नहीं पता ये लड़ाई हमने कहां से शुरू की थी, हमने एक लंबा सफ़र तय किया है.”
22 अगस्त 1948 को 71 साल की उम्र में सोफ़िया की नींद में ही मौत हो गई.
राजकुमारी की इच्छा के अनुसार, उनकी अस्थियाँ उनकी बहन बंबा लाहौर ले आईं लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें कहाँ विसर्जित किया गया था.
कई लोग उन्हें आज भी प्यार से याद करते हैं, ख़ासकर ब्रिटेन में.
इस साल की शुरुआत में उनके पुराने घर पर उनके सम्मान में एक पट्टिका का अनावरण किया गया था और अगले साल उन पर एक फ़िल्म रिलीज़ होने की उम्मीद है.
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