मक्का कैसे इस्लाम विरोधी आंदोलन के गढ़ से इस्लाम का केंद्र बना?

मक्का

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, डॉक्टर अक़ील अब्बास जाफ़री
    • पदनाम, शोधकर्ता और इतिहासकार, कराची

इस्लाम के इतिहास में ऐसी बहुत सी महत्वपूर्ण घटनाएं हैं जो रमज़ान के महीने में हुईं.

इनमें सबसे महत्वपूर्ण घटना फ़तह-ए-मक्का (मक्का विजय) है जिसके बाद अरब प्रायद्वीप को एकजुट होने का मौक़ा मिला और फिर इस्लाम अरब प्रायद्वीप से बाहर फैला.

मक्का विजय ने इस्लाम को फैलाने में कैसी भूमिका निभाई, यह जानने से पहले मक्का के उस महत्व को जानना ज़रूरी है जो उसे इस्लाम से पहले मिला हुआ था.

इस्लाम से पहले का अरब और मक्का की हैसियत

मक्का अरब का केंद्रीय शहर और इस्लामी जगत का धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र है.

हॉलैंड के मशहूर ओरिएंटलिस्ट (प्राच्यविद) डोज़ी ने लिखा है कि मक्का के इतिहास की शुरुआत हज़रत दाऊद के ज़माने से होती है.

इसका उल्लेख तौरात (तोराह, यहूदियों की पवित्र किताब) और इंजील (बाइबिल) में भी आया है.

इसके बाद हज़रत इब्राहीम (अब्राहम) मिस्र से फ़लस्तीन आए तो उन्हें मक्का की तरफ़ जाने का आदेश हुआ और वह अपनी पत्नी हज़रत हाजरा और बेटे हज़रत इस्माईल को लेकर मक्का चले आए.

कहा जाता है कि उन्होंने ही मक्का में ख़ाना-ए-काबा की बुनियाद रखी.

ख़ाना-ए-काबा का निर्माण उस प्राचीन इमारत की बुनियाद पर की गई थी जिसके बारे में माना जाता है कि वह ज़मीन पर बनने वाली सबसे पहली इमारतों में से एक थी.

यहां सदियों से ज़रूरतमंद लोग आते थे और मुंह मांगी मुरादें पाते थे.

हज़रत इब्राहीम ने उसी इमारत की नींव पर ख़ाना-ए-काबा का पुनर्निर्माण किया.

मक्का

इमेज स्रोत, SEERAT ALBUM, PSO

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

अरब घाटी के लोग हमेशा से ख़ुद को अल-अरब या अरब प्रायद्वीप के निवासी कहते थे. यह मालूम नहीं हो सका है कि अपने आप को वह अरब क्यों कहते थे. हालांकि उनमें से अधिकतर लोग रेगिस्तान के ख़ानाबदोश थे जिन्हें बद्दू कहा जाता है.

इस्लाम से पहले के समाज में बद्दू बिरादरी के लोग कई गिरोहों या जातियों में बंटे हुए थे. उन सब की अलग शासन व्यवस्था और रस्म-रिवाज थे.

कैंब्रिज की ‘इस्लामी इतिहास’ पुस्तक के अनुसार इस्लाम से पहले यहां छोटी-छोटी शहरी रियासतें मौजूद थीं और यह राजनीतिक दृष्टि से संगठित या संयुक्त क्षेत्र नहीं था.

लेकिन इस्लाम के पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद की पैदाईश से पहले ही मक्का व्यापार का एक बड़ा केंद्र बन चुका था और उसे एक केंद्रीय मार्गदर्शक की हैसियत हासिल हो चुकी थी. कैंब्रिज की ‘इस्लामी इतिहास’ के अनुसार फ़ारस और रोम की सल्तनतें लंबे युद्धों के कारण कमज़ोर हो रही थीं तो मक्का ताक़तवर हो रहा था.

मक्का का एक और महत्व बैतुल्लाह (अल्लाह का घर, काबा) के कारण भी था. क़ुरैश क़बीले के व्यापारिक क़ाफ़िले यमन से सीरिया तक जाया करते थे और विभिन्न देशों की मशहूर चीज़ें लाकर मक्का में बेचा करते थे. यहां हर साल एक बड़ा मेला लगता था जिसमें ज़रूरत के सामान के अलावा ग़ुलामों का भी व्यापार होता था.

कैंब्रिज की ‘इस्लामी इतिहास’ के अनुसार मक्का का महत्व हर साल उस समय उभर कर सामने आता था जब पवित्र समझे जाने वाले महीनों में लोग यहां उमड़ पड़ते थे.

मक्का के लोगों की मेहमाननवाज़ी मशहूर थी. वह अपने मेहमानों को ‘बैतुल्लाह’ का मेहमान समझकर उनकी हर संभव सेवा किया करते थे. मेहमान भी मक्का वालों का आदर करते थे.

मक्का विजय से पहले की घटनाएं और हुदैबिया

मक्का

इमेज स्रोत, SEERAT ALBUM, PSO

मदीना हिजरत (शरण लेने) के बाद मक्का वालों ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ तीन युद्ध लड़े. इतिहासकारों के अनुसार इस्लाम विरोधी आंदोलन का केंद्र भी मक्का और क़ुरैश बिरादरी के लोग थे.

ऐसे में एक ज़ुलक़ादा (इस्लामी कैलेंडर का ग्यारहवां महीना) छह हिजरी (628 ईस्वी) को इस्लाम के पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद सहाबा (अपने साथियों) के साथ ख़ाना-ए-काबा की ज़ियारत (दर्शन) और उमरा (हज का छोटा रूप) के लिए अहराम (विशेष कपड़ा) बांध कर रवाना हुए. अरबों की परंपरा थी कि जब कोई शख़्स अहराम बांधकर मक्का आता तो उसे रोका नहीं जाता और यह रिवाज सदियों से चला आ रहा था.

मक्का से नौ मील पहले हुदैबिया का वह स्थान है जहां पहुंचकर हज़रत मोहम्मद ने मक्का की क़ुरैश बिरादरी को संदेश भिजवाया कि हमारे आने का मक़सद अल्लाह के घर की ज़ियारत है, हम किसी से लड़ने नहीं आए.

यह बात सुनकर क़ुरैश बिरादरी के लोगों ने उरवा बिन मसूद को मुसलमानों की तरफ़ भेजा ताकि उन्हें उमरा करने से रोकने की कोशिश की जाए लेकिन उरवा बिन मसूद को कामयाबी नहीं मिली.

बाद में हज़रत उस्मान बिन अफ़्फ़ान को (इस्लाम के तीसरे ख़लीफ़ा) मक्का के रईसों से वार्ता के लिए रवाना किया गया लेकिन पहले उनको क़ैद करने और फिर मार डालने की अफ़वाह फैली तो हज़रत मोहम्मद ने अपने साथियों से बदला लेने की ‘बैत’ (शपथ) ली. यह बैत बैत-ए-रिज़वान के नाम से मशहूर है.

इस बैत की जानकारी क़ुरैश बिरादरी को मिली तो उन्होंने यह ख़बर भिजवाई कि हज़रत उस्मान सही सलामत हैं और वह मुसलमानों से वादा करते हैं कि वह इस साल वापस चले जाएं और अगले साल वापस आकर ख़ाना-ए-काबा की ज़ियारत और उमरा करें.

क़ुरैश बिरादरी के लोगों ने वादा किया कि मक्का को तीन दिन के लिए ख़ाली कर दिया जाएगा ताकि किसी संघर्ष की आशंका न रहे. इन प्रस्तावों को लिखित रूप दिया गया जिनमें कुछ और शर्तें भी शामिल थीं. उसे सुलह-हुदैबिया या हुदैबिया समझौता के नाम से याद किया जाता है. इस समझौते की कुछ शर्तें ज़ाहिरी तौर पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ थीं लेकिन क़ुरान में इस समझौते को फ़तह-ए-मुबीन (स्पष्ट विजय) कहा गया.

मक्का विजय

मक्का

इमेज स्रोत, Getty Images

हुदैबिया समझौते को मुश्किल से एक ही साल गुज़रा था कि कुछ ऐसी घटनाएं हो गईं जिसके कारण क़ुरैश बिरादरी ने इस समझौते को तोड़ने का ऐलान कर दिया.

दस रमज़ान सन आठ हिजरी (630 ईस्वी) को हज़रत मोहम्मद अपने सहाबा (साथियों) के साथ मक्का के लिए रवाना हुए तो मदीना से निकलते समय उनकी संख्या सात हज़ार के लगभग थी. इस जत्थे में सफ़र के दौरान कुछ और क़बीलों के लोग भी शामिल हो गए. इस तरह उनकी संख्या दस हज़ार तक पहुंच गई.

मुसलमानों का जत्था मक्का के पास पहुंचा तो उसने मक्का से दस मील पहले एक जगह पड़ाव डाला. मक्का की क़ुरैश बिरादरी को जब इस बड़े जत्थे के आने की सूचना मिली तो उनका सरदार अबू सुफ़ियान हज़रत मोहम्मद के पास पहुंचा और इस्लाम क़बूल करने का ऐलान किया.

मुसलमान चारों ओर से मक्का में दाख़िल हुए और इस तरह मक्का के लोगों के लिए बाहर भागने का रास्ता बंद कर दिया गया.

कुछ लोगों ने प्रतिरोध करना चाहा तो लगभग 33 या 34 लोग मारे गए. बीस रमज़ान (11 जनवरी 630 ईस्वी) को हज़रत मोहम्मद ख़ाना-ए-काबा पहुंच गए. यहां उन्होंने मक्का के लोगों को संबोधित करते हुए कहा, “तुम सब के सब आज़ाद हो. आज तुमसे कोई पूछताछ नहीं. अल्लाह भी तुमको माफ़ करे. वह सबसे बढ़कर रहम करने वाला है.”

क़ुरान की सूरा (अध्याय) फ़तह में जिस हुदैबिया के समझौते को स्पष्ट जीत बताया गया था, वह अब मिल चुकी थी.

मक्का विजय ने इस्लाम के फैलाव को कैसे संभव बनाया?

मक्का

इमेज स्रोत, Reuters

दायरा मआरिफ़-ए-इस्लामिया (इस्लामी एनसाइक्लोपीडिया) ने लिखा है कि मक्का विजय के बाद लोगों के दिलों से क़ुरैश का भय निकल गया. जब ख़ुद क़ुरैश ने इस्लाम के सामने समर्पण कर दिया तो अरबों के बड़े बड़े दल और क़बीलों के क़बीले मुसलमान होने लगे.

कैंब्रिज के ‘इस्लामी इतिहास’ के अनुसार मक्का विजय और उसके बाद हुनैन युद्ध में जीत का मतलब यह था कि अब कोई ऐसा मज़बूत क़बीला नहीं बचा था जो मुसलमानों का विरोध कर सकता और इस तरह हज़रत मोहम्मद को इलाक़े के सबसे शक्तिशाली मार्गदर्शक होने का सम्मान मिला.

कैंब्रिज के ‘इस्लामी इतिहास’ के अनुसार अरब लोग शक्ति को सराहते थे और इसलिए वो झुंड के झुंड इस्लाम क़बूल करने लगे.

इस तरह मक्का विजय ने अरब क्षेत्र को एक ऐसा मार्गदर्शक दिया जिसके नेतृत्व का आधार क़बायली वफ़ादारी या सामाजिक हैसियत नहीं बल्कि केवल धार्मिक था. आपसी लड़ाइयों में लगे रहने वाले अरब लड़ाके अब एक मार्गदर्शक और एक धर्म के नीचे एकजुट हो गए जो एक दूसरे के विरोधी थे.

‘इस्लामी इतिहास’ के अनुसार इस तरह एक ऐसा समुदाय बन गया जिसके सदस्यों को बहुत समय के बाद शांति मयस्सर हुई जबकि दूसरी ओर फ़ारस और रोम की मज़बूत सल्तननें कमज़ोर हो चुकी थीं.

किताब में लिखा है कि अरब लड़ाकों की ऊर्जा को अरब प्रायद्वीप की शांति भंग करने से रोकने के लिए जीत का सिलसिला शुरू हुआ. इसने एक संगठित अरब जत्थे को इस्लाम को फैलाने में मदद की.

कैंब्रिज के ‘इस्लामी इतिहास’ में लिखा गया है कि बहुत संभव है कि मक्का विजय से बहुत पहले ही हज़रत मोहम्मद ने यह अंदाज़ा लगा लिया होगा कि एक समय ऐसा आएगा जब अरब प्रायद्वीप में बहुत कम ग़ैर मुसलमान रह जाएंगे और ऐसे में इस्लाम को अरब प्रायद्वीप से निकलकर इराक़ और सीरिया का रुख़ करना होगा. यह भी कि इसके लिए व्यापक पैमाने की व्यवस्था करनी होगी और प्रशासनिक क्षमता रखने वाले लोगों की ज़रूरत होगी.

‘इस्लामी इतिहास’ के अनुसार ऐसे लोग मक्का ही में मौजूद थे जिन्हें बड़े पैमाने पर लंबी यात्रा करने वाले व्यापारिक क़ाफ़िलों की व्यवस्था करने का हुनर और अनुभव प्राप्त था.

कैंब्रिज की इस किताब के अनुसार नवस्थापित इस्लामी राष्ट्र के फैलाव को संभव बनाने वाले अधिकतर जनरल और व्यवस्थापकों का संबंध हिजाज़ क्षेत्र के तीन ही शहरों से था जिनमें मक्का, मदीना और ताएफ़ शामिल थे.

इस तरह मक्का विजय के बाद उन नवमुस्लिमों और उनकी संतानों में बहुत से विचारक, मुजाहिद, सिपहसालार और उलेमा हुए जिन्होंने इस्लाम की शिक्षाओं को चारों ओर फैलाया और इस्लाम का झंडा ईरान, इराक़, सीरिया और अफ़्रीका पर लहराने लगा.

हज़रत मोहम्मद के देहांत के बाद मदीना की राजधानी की हैसियत बनी रही लेकिन हज की वजह से मक्का धार्मिक, आध्यात्मिक और शैक्षणिक केंद्र बिंदु बना रहा.

बनू उमैया के दौर में इस्लामी दुनिया का केंद्र मदीना से सीरिया की राजधानी दमिश्क़ स्थानांतरित हो गया लेकिन इसके बावजूद मक्का और मदीना की केंद्रीय हैसियत अपनी जगह बनी रही जहां दूर दराज़ इलाक़ों से लोग अपनी आध्यात्मिक और शैक्षणिक प्यास बुझाने आते थे.

मक्का की केंद्रीय और आध्यात्मिक हैसियत आज भी बरक़रार है और आज भी दुनिया का हर मुसलमान ख़ाना-ए-काबा का रुख़ करके नमाज़ पढ़ता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)