बीबीसी इमर्जिंग प्लेयर ऑफ़ द ईयर अवॉर्ड विजेता शीतल देवी की कहानी, 'गांव वाले मेरे मम्मी-पापा को ताने मारते थे'

शीतल देवी
इमेज कैप्शन, शीतल देवी को बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर 2024 में बीबीसी इमर्जिंग प्लेयर ऑफ़ द ईयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है

जब शीतल देवी एक कुर्सी पर बैठकर अपने दाहिने पैर से धनुष उठाती हैं, फिर दाहिने कंधे का इस्तेमाल कर स्ट्रिंग को पीछे खींचती हैं, और जबड़े की ताकत से तीर छोड़ती हैं, तो पूरा देश उन पर गर्व महसूस करता है. पेरिस ओलंपिक में उनकी यह तस्वीर हौसले की मिसाल बनी थी.

शीतल देवी को बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर 2024 में बीबीसी इमर्जिंग प्लेयर ऑफ़ द ईयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है.

ये अवॉर्ड उन्हें भारत की सबसे कम उम्र की पैरालंपिक पदक विजेता के रूप में ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने के लिए दिया गया.

जम्मू की रहने वाली 18 साल की शीतल एक दुर्लभ बीमारी फोकोमेलिया के साथ पैदा हुई थीं, इस बीमारी की वजह से बांह विकसित नहीं हो पाती.

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ऐसे में वो बिना बांह वाली प्रतिस्पर्धा करने वाली दुनिया की पहली और एकमात्र सक्रिय महिला तीरंदाज़ बन गईं.

वीडियो कैप्शन, जिस लड़की की वजह से मां-पिता को मिलते थे ताने, वो आज पूरे देश की पहचान हैं
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इमेज कैप्शन, शीतल देवी ने 15 साल की उम्र तक तीर-धनुष नहीं देखा था

'तीरंदाज़ी मेरे लिए सब कुछ है'

बीबीसी इमर्जिंग प्लेयर ऑफ़ द ईयर अवॉर्ड जीतने के बाद अपनी मुश्किलों का ज़िक्र करते हुए शीतल देवी कहती हैं, "गांव वाले मेरे मम्मी-पापा को बोलते थे ऐसी बेटी पैदा हुई. ताने मारते थे. मेरी मम्मी ये सुनकर रोती रहती थीं. पहले तो मुझे कोई जानता नहीं था. जब से मैं तीरंदाज़ी में आई, तब से लोग मुझे जानने लगे. तीरंदाज़ी मेरे लिए सब कुछ है."

एशियाई पैरा खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली शीतल जब पैरालंपिक की तैयारी कर रही थीं, तब उन्होंने कहा था, "सोना जीतने के लिए मैं पूरी मेहनत कर रही हूँ. अपने जीते हुए मेडल देखकर मुझे और ज़्यादा मेडल जीतने की हिम्मत मिलती है. अभी तो मैंने बस शुरुआत की है."

2023 की पैरा आर्चरी वर्ल्ड चैंपियनशिप में उन्होंने रजत पदक जीता था, जिसकी बदौलत उन्होंने पेरिस के लिए क्वॉलिफ़ाई किया. शीतल ने पेरिस 2024 पैरालंपिक में कांस्य पदक जीतकर देश का परचम लहराया.

सिर्फ़ तीन वर्षों में उन्होंने कई बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं. 2024 पेरिस पैरालंपिक में कांस्य पदक जीता, 2022 के एशियाई पैरा खेलों में दो स्वर्ण और एक रजत पदक अपने नाम किया. वहीं, वर्ल्ड पैरा आर्चरी चैंपियनशिप में उन्होंने रजत पदक जीता था.

शीतल देवी के दो राष्ट्रीय कोचों में से एक अभिलाषा चौधरी कहती हैं, "शीतल ने तीरंदाज़ी को नहीं चुना है बल्कि तीरंदाज़ी ने शीतल को चुना है."

संघर्ष से शिखर तक

एक छोटे से गांव में किसान परिवार में जन्मीं शीतल ने 15 साल की उम्र तक तीर और धनुष नहीं देखा था.

उनकी ज़िंदगी में बड़ा बदलाव 2022 में आया, जब उनकी मुलाक़ात कोच कुलदीप वेदवान से हुई. उन्होंने शीतल को तीरंदाज़ी की दुनिया से परिचित कराया.

यह मुलाक़ात जम्मू के कटरा में श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड खेल परिसर के दौरे के दौरान हुई थी. शीतल वहां एक परिचित की सिफ़ारिश पर गई थीं. इसके बाद, वह जल्द ही कटरा में एक प्रशिक्षण शिविर में शिफ्ट हो गईं. कोच उनके धैर्य और क्षमता से काफ़ी प्रभावित थे.

चुनौती बड़ी थी, लेकिन कोच वेदवान का लक्ष्य था कि शीतल के पैरों और ऊपरी शरीर की ताक़त का अधिकतम उपयोग किया जाए, जिसमें वे आख़िरकार सफल रहे.

शीतल कहती हैं कि वह बचपन से ही अपने पैरों का इस्तेमाल लिखने और पेड़ों पर चढ़ने जैसी कई चीज़ों के लिए करती थीं. यही वजह है कि उनके पैरों में इतनी ताक़त आई.

शीतल देवी

इमेज स्रोत, Abhilasha Chaudhary

इमेज कैप्शन, शीतल के कोच को प्लान करना था कि शीतल के पैरों में स्ट्रेंथ को कैसे संतुलित करते हुए तकनीकी रूप से इसका उपयोग किया जाए

हालांकि, तीरंदाज़ी को करियर बनाना आसान फ़ैसला नहीं था. वह कहती हैं, "पैरों में बहुत दर्द होने के कारण मुझे भी लगता था कि यह असंभव है, लेकिन मैंने किसी तरह इसे भी कर लिया."

जब भी शीतल हिम्मत हारने लगती थीं, तो वह अमेरिकी तीरंदाज़ मैट स्टुट्ज़मैन से प्रेरणा लेती थीं, जो अपने पैरों से तीर चलाने के लिए एक अनुकूलित डिवाइस का इस्तेमाल करते हैं.

लेकिन शीतल का परिवार इस तरह की मशीन का ख़र्च नहीं उठा सकता था. ऐसे में उनके कोच वेदवान ने ख़ुद उनके लिए धनुष बनाने का फ़ैसला किया.

उन्होंने स्थानीय स्तर पर मिलने वाली चीज़ों का इस्तेमाल किया और दुकानों से उसे ज़रूरत के हिसाब से मॉडिफ़ाई करवाया. इस किट में बैग बेल्ट से बना एक ऊपरी शरीर का पट्टा और एक छोटा उपकरण शामिल है, जिसे शीतल तीर छोड़ने के लिए अपने मुंह में रखती हैं.

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इमेज कैप्शन, संघर्ष से शिखर तक के इस सफ़र में जो एक चीज़ कभी नहीं बदलती है, वो है तीरंदाज़ शीतल देवी का शांत आचरण
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कोच अभिलाषा चौधरी बताती हैं, "हमें यह प्लान करना था कि शीतल के पैरों की ताक़त को संतुलित रखते हुए तकनीकी रूप से सही तरीके़ से इस्तेमाल किया जाए. उनके पैर मज़बूत हैं, लेकिन हमें यह समझना था कि वह शूटिंग के दौरान अपनी पीठ का इस्तेमाल कैसे कर सकती हैं."

इसके लिए तीनों ने मिलकर एक विशेष ट्रेनिंग रूटीन तैयार किया, जिसमें शीतल को धनुष के बजाय रबर बैंड या थेराबैंड से अभ्यास कराया गया. पहले उन्हें सिर्फ़ पांच मीटर की दूरी पर रखे लक्ष्यों पर निशाना लगाने की ट्रेनिंग दी गई.

जैसे-जैसे उनका आत्मविश्वास बढ़ा, केवल चार महीनों में उन्होंने 50 मीटर की दूरी तक लक्ष्य भेदने के लिए एक प्रॉपर धनुष का इस्तेमाल शुरू कर दिया. यह कंपाउंड ओपन कैटेगरी की प्रतियोगिता के मानकों के लिए ज़रूरी था.

सिर्फ दो साल के भीतर, 2023 के एशियाई पैरा खेलों में शीतल ने महिलाओं की व्यक्तिगत कंपाउंड प्रतियोगिता के फाइनल में लगातार छह और 10 पॉइंट के स्कोर हासिल किए. उन्होंने छोटी दूरी से तीर चलाने की तकनीक सीखी और स्वर्ण पदक अपने नाम किया.

यहाँ यह जानना ज़रूरी है कि 10 पॉइंट अधिकतम स्कोर होता है, जो किसी खिलाड़ी को तब मिलता है जब वह सीधे बुल्स आई (लक्ष्य के केंद्र) पर तीर मारता है.

शीतल कहती हैं, "यहां तक कि जब मैं नौवां शूट कर रही होती हूँ, तब भी मेरा ध्यान बस इस बात पर होता है कि अगले शॉट को 10 में कैसे बदलूं."

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