ईरान इब्राहिम रईसी की मौत के बाद अब क्या करेगा?

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- Author, लीज़ डुसेट
- पदनाम, अंतरराष्ट्रीय मामलों की मुख्य बीबीसी संवाददाता
इब्राहिम रईसी, ईरान की सत्ता के शीर्ष पर पहुँचने ही वाले थे लेकिन एक घटना ने बहुत कुछ बदल कर रख दिया.
रविवार को एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में रईसी की मौत हो गई.
ईरान के सर्वोच्च नेता 85 साल के अयातुल्लाह ख़ामेनेई की जगह कौन लेगा? इस सवाल को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं. रईसी की मौत के बाद ये अटकलें ख़ारिज़ हो गईं.
ईरान के कट्टरपंथी राष्ट्रपति की दुखद मौत से देश की नीति में किसी बड़े बदलाव का अनुमान नहीं है या इससे इस्लामिक गणराज्य को किसी तरह का बड़ा झटका नहीं लगेगा.
हालांकि, इससे एक ऐसे सरकारी तंत्र का परीक्षण ज़रूर होगा, जिसमें अब निर्वाचित और अनिवार्चित दोनों ही जगहों पर रूढ़िवादी कट्टरपंथी हावी होंगे.
चैटम हाउस थिंक टैंक में मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका प्रोग्राम के निदेशक डॉ सनम वकील कहते हैं, ''सरकारी तंत्र उनकी मौत का बड़े पैमाने पर प्रदर्शन करेगा. साथ ही संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन भी करेगा ताकि कार्यक्षमता को दिखाया जा सके. इस बीच नए चेहरे की तलाश की जाएगी जो रूढ़िवादी एकता और ख़ामेनेई की तरफ़ वफ़ादारी बनाए रखे.''

रईसी के निधन को किस तरह देखा जा रहा है?

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इस्लामिक क्रांति के बाद रईसी ने न्यायपालिका में काम करना शुरू किया था और कई शहरों में वकील के तौर पर काम किया था.
रईसी के विरोधी एक ऐसे शख़्स के जाने की खुशी मनाएंगे जो 1980 के दशक में बड़े पैमाने पर राजनीतिक बंदियों को सामूहिक फांसी देने का अभियुक्त था. वो ये भी आशा करेंगे कि रईसी की मौत से सत्ता कमज़ोर हो.
वहीं, ईरान की सत्ता के लिए राजकीय अंत्येष्टि भावनाओं से भरा एक अवसर होगा. ईरान का शासन ऐसे ही चलता रहेगा, ये बताने का एक मौक़ा भी होगा.
वो लोग जानते हैं कि दुनिया इस घटना को देख रही है.
तेहरान यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मोहम्मद मरांदी बीबीसी से कहते हैं, ''पिछले 40 से अधिक सालों से पश्चिमी देश ये नैरेटिव देते आए हैं कि ईरान बिखर जाएगा, ख़त्म हो जाएगा. लेकिन चमत्कारिक ढंग से ये अब भी यहां है और मेरा अनुमान है कि आने वाले कई सालों तक ये यहीं रहेगा.''
एक और पद जिसे भरा जाना अहम है वो है 'असेम्बली ऑफ़ एक्सपर्ट' में मौलवी का पद. ये वो संस्था है जो सर्वोच्च नेता को चुनती है.
सर्वोच्च नेता के चुनाव को लेकर ईरान में अटकलें लगाई जाती रही हैं. कई नाम रेस में चल रहे हैं, इनमें एक नाम सर्वोच्च नेता के बेटे मोजतबा ख़ामेनेई का है.
इस अपारदर्शी चुनाव पर डॉ वकील कहते हैं, ''रईसी संभावित उत्तराधिकारी थे, जैसा कि ख़ामेनेई उस वक़्त थे, जब वो सर्वोच्च नेता बने थे. वो अपेक्षाकृत युवा थे, बहुत वफादार थे. सिस्टम के लिए प्रतिबद्ध विचारक थे और लोग उन्हें पहचानते थे.''
रईसी की मौत की आधिकारिक पुष्टि से पहले आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने एक्स पर एक पोस्ट लिखकर बताया कि ''ईरान के लोगों को चिंता नहीं करनी चाहिए, देश से जुड़े मामलों में कोई व्यावधान नहीं आएगा,''

नई चुनौती है राष्ट्रपति चुनाव
अब ईरान के लिए मौजूदा राजनीतिक चुनौती राष्ट्रपति का चुनाव कराना है. फ़िलहाल, उपराष्ट्रपति मोहम्मद मोख़बर को राष्ट्रपति पद की ज़िम्मेदारी दी गई है. 50 दिन के भीतर नए राष्ट्रपति चुनाव कराने हैं.
राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान करने की अपील ऐसे समय में की जाएगी, जब मार्च में हुए संसदीय चुनाव में रिकॉर्ड स्तर पर कम मतदान हुआ था.
साल 2021 में हुए राष्ट्रपति चुनाव, जिसके बाद रईसी राष्ट्रपति बने थे, समेत हालिया चुनाव में उदारवादी और सुधार-समर्थक लोगों ने बड़े पैमाने पर चुनावों का बहिष्कार किया था.
लंदन स्थित न्यूज़ वेबसाइट अमवाज डॉट मीडिया के संपादक मोहम्मद अली शाबानी कहते हैं, ''ये राष्ट्रपति चुनाव, ख़ामेनेई और सत्ता में बैठे शीर्ष लोगों को अपनी प्रवृत्ति बदलने का और मतदाताओं को राजनीतिक प्रक्रिया में फिर से शामिल करने का मौक़ा दे सकता है.''
वो आगे कहते हैं, ''लेकिन दुर्भाग्य से अब तक हमें सत्ता की तरफ़ से ऐसे क़दम उठाने के लिए तैयार होने का या इच्छुक होने का कोई संकेत नहीं मिला है,''

रईसी के खेमे से भी अभी तक कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी नहीं दिखता है. बर्लिन स्थित थिंक टैंक एसडब्ल्यूपी के विजिटिंग फेलो हामिद्रेजा अज़ीज़ी कहते हैं, ''इस रूढ़िवादी समूह के अंदर कई खेमे हैं, जिनमें कई ऐसे व्यक्ति शामिल हैं जो अधिक कट्टरपंथी हैं और जिन्हें अधिक व्यावहारिक माना जाता है.''
वो मानते हैं कि इससे नई संसद के भीतर और स्थानीय स्तर पर खींचतान तेज हो जाएगी. जो भी रईसी की जगह लेगा उसे चुनौतीपूर्ण एजेंडा और सीमित अधिकारों के साथ ये जगह मिलेगी.
वैसे, ईरान में अंतिम फ़ैसला लेने का अधिकार सर्वोच्च नेता के पास है. विदेश नीति, ख़ासकर इस क्षेत्र में इस्लामिक रिवॉल्युशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) नियंत्रित करता है, जिसका प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है.
कुछ महीने पहले जब इसराइल-ग़ज़ा संघर्ष के दौरान ईरान और इसराइल के बीच तनाव बढ़ा था, तब राष्ट्रपति के पास महत्वपूर्ण अधिकार नहीं थे.
इस स्थिति ने ख़तरनाक हालात पैदा कर दिए थे. तनाव के संघर्ष में बदलने की आशंका थी.

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ईरान में हुए थे बड़े पैमाने पर प्रदर्शन
रईसी के कार्यकाल के दौरान, ईरान को गंभीर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, कुप्रंधन और भ्रष्टाचार की वजह से वित्तीय कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा है.
इंफ्लेशन 40% से ज़्यादा हो गया है और यहां की मुद्रा रियाल की क़ीमतों में भी गिरावट दिखी है.
इन सबके बीच ईरान में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन भी देखने को मिले. ये प्रदर्शन सितंबर 2022 में एक 22 साल की युवती महसा अमीनी की मौत के बाद भड़के थे.
महसा को ईरान की मोरैलिटी पुलिस ने गिरफ़्तार किया था. उन पर कथित तौर पर हिजाब नियमों के उल्लंघन का आरोप था.
इन प्रदर्शनों के कुछ हफ़्ते पहले राष्ट्रपति रईसी ने हिजाब क़ानून को और सख़्त बनाने का आदेश दिया था. जो महिलाएं इन नियमों का पालन नहीं करना चाहती थीं, उनके लिए सर्विलांस कैमरा लगाए गए. सोशल मीडिया पर हिजाब नियमों का विरोध करने वाले लोगों के लिए सज़ा की शुरुआत भी की गई.

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प्रदर्शनों में बड़े पैमाने पर महिलाएं शामिल हुईं, जो अपनी ज़िंदगी पर लगाए जाए प्रतिबंधों के ख़िलाफ़ अपना गुस्सा सीधा सत्ता के वास्तविक केंद्र पर केंद्रित कर रही थीं. महिलाओं ने खुले तौर पर सर्वोच्च नेता और पूरे सिस्टम के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया.
मानवाधिकार समूहों का कहना है कि इन प्रदर्शनों में सैकड़ों लोगों की जान चली गई और हज़ारों लोग हिरासत में लिए गए.
उदारवादी नेता हसन रूहानी के संदर्भ में बात करते हुए शाबानी कहते हैं, ''ईरान के इतिहास में हुए राष्ट्रपति चुनाव में सबसे कम वोट हासिल करने के बाद राष्ट्रपति बने रईसी के पास रूहानी जैसा लोकप्रिय जनादेश नहीं था.''
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के प्रशासन और रईसी की टीम के बीच हुई अप्रत्यक्ष बातचीत में बहुत कम प्रगति देखी गई.
शाबानी कहते हैं, ''ईरान के विरोधी जितना रूहानी की आलोचना करते थे, उन्होंने उतनी आलोचना रईसी की नहीं की, शायद इसलिए क्योंकि वो रईसी को कम प्रभावशाली मानते थे.''
ईरान के विदेश मंत्री ने कई मोर्चों पर निभाई थी अहम भूमिका

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हेलिकॉप्टर क्रैश में ईरान के विदेश मंत्री हुसैन अमीर-अब्दुल्लाहियन का भी मौत हो गई. अब्दुल्लाहियन ने तेहरान के मामले दुनिया के सामने पेश करने में और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के प्रभाव को कम करने में अहम भूमिका निभाई थी.
इसराइल-ग़ज़ा युद्ध के दौरान कूटनीतिक मामलों को वो संभालते नज़र आए. साथ ही ईरान के सहयोगियों के साथ बैठकों में वो नज़र आए. वो अरब और पश्चिमी देशों के विदेश मंत्रियों के साथ मिलकर तनाव को कम करने की दिशा में काम करते दिखे.
एक वरिष्ठ पश्चिमी राजनयिक सूत्र कहते हैं, ''वो संदेश भेजने के लिए एक अच्छा ज़रिया थे. लेकिन ये एक फॉर्मूला के तहत ही होता था क्योंकि सत्ता, विदेश मंत्रालय के हाथ में नहीं थी.''
बुअस एंड बाज़ार के सीईओ एसफांड्यर बैटमैनगलिज़ी कहते हैं, ''राष्ट्रपति की अचानक मौत आम तौर पर बड़ी घटना होती है. लेकिन सर्वोच्च नेता के संभावित दावेदार होने के बाद उनके पास राजनीतिक समर्थन और स्पष्ट राजनीतिक सोच की कमी थी. लेकिन उनको राष्ट्रपति पद तक पहुंचाने वाले उनके बिना भी आगे बढ़ते रहेंगे.''
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