इसराइली हमलों के बीच बीबीसी के ग़ज़ा संवाददाता ने अपने परिवार को कैसे सुरक्षित रखा

- Author, अदनान अल-बुर्श
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लगभग तीन महीनों से अदनान अल-बुर्श टेंट में रहते, एक वक़्त का खाना खाते, अपनी पत्नी और पांच बच्चों को सुरक्षित रखने की कोशिश करते हुए ग़ज़ा में युद्ध की रिपोर्टिंग कर रहे हैं.
युद्ध को कवर करते हुए जिन ख़ौफ़नाक लम्हों का बीबीसी अरबी के रिपोर्टर ने सामना किया है, उसको उन्होंने साझा किया है.
चेतावनी - इस रिपोर्ट की तस्वीरें और विवरण कुछ पाठकों को विचलित कर सकते हैं.
अदनान अल-बुर्श ने वो सब बयां किया जिसका उन्होंने रिपोर्टिंग के दौरान सामना किया.
बीते छह महीनों के सबसे ख़राब लम्हों में से एक वो लम्हा था जब हम सब सड़क पर सोए.
दक्षिणी ग़ज़ा के ख़ान यूनिस की सड़क पर कड़ाके की ठंड में मैं अपने बीवी-बच्चों के चेहरे देख रहा था और ख़ुद को बेबस महसूस कर रहा था.
मेरे 19 साल के जुड़वां बच्चे ज़किया और बतूल अपनी 14 साल की बहन युमना के साथ फुटपाथ पर सोए.
मेरा आठ साल का बेटा मोहम्मद और पांच साल की सबसे छोटी बेटी रज़ान अपनी मां ज़ैनब के साथ थे.
जब हम फ़लस्तीनी रेड क्रिसेंट सोसाइटी के मुख्यालय के बाहर रुकने की कोशिश कर रहे थे तो पूरी रात गोलाबारी की आवाज़ें आ रही थीं और सिर के ऊपर ड्रोन मंडरा रहे थे.
हमने एक अपार्टमेंट किराए पर लेने की व्यवस्था की थी लेकिन मकान मालिक ने उसी दिन ही कह दिया कि इसराइली सेना ने इमारत पर बम गिराने की चेतावनी दी है.
मैं उस समय काम कर रहा था लेकिन मेरा परिवार अपना सामान लेकर वहां से निकल गया.
परिवार के साथ दर-बदर

हम सब रेड क्रिसेंट मुख्यालय पर मिले जहां पर पहले से विस्थापित लोगों की भारी भीड़ जमा थी.
मेरा भाई और मैं रातभर कार्ड बोर्ड के बक्सों पर बैठकर यही चर्चा करते रहे कि हमें क्या करना चाहिए.
13 अक्तूबर को जबालिया शहर से मेरा परिवार अपना घर-बार और अपना अधिकतर सामान छोड़कर निकल आया.
इसराइली सेना ने उत्तरी ग़ज़ा से सभी लोगों को निकलकर दक्षिण में जाने को कहा था लेकिन उससे कुछ दिनों पहले मेरा परिवार वहां से निकल गया.
और अभी हम उस इलाक़े में बमबारी से बाल-बाल बचे हैं जहां पर हमें जाने के लिए कहा गया था.
इस समय कुछ भी सही तरीक़े से सोच पाना बेहद मुश्किल है. मुझे ग़ुस्सा और अपमान महसूस होता है.
मैं अपने परिवार को सुरक्षा क्यों नहीं मुहैया करा सकता हूं. ये सोच कर मैं बहुत ग्लानि महसूस करता हूं. यह एक त्रासद अनुभव था.
आख़िरकार मेरा परिवार सेंट्रल ग़ज़ा के नुसैरत के अपार्टमेंट में रहने चला गया, जबकि मैं ख़ान यूनिस में नासिर अस्पताल के एक टेंट में बीबीसी की टीम के साथ रह रहा था. मैं कुछ दिनों में परिवार से मिलने जाता था.
बातचीत करना बेहद मुश्किल था क्योंकि इंटरनेट और फ़ोन सिग्नल्स कई बार कट जाते थे. एक बार मुझे मेरे परिवार के बारे में चार या पांच दिनों से कुछ भी पता नहीं चल पाया था.
'जब मैं लाइव रिपोर्टिंग के दौरान रो पड़ा'

खान यूनिस में बीबीसी की टीम में हम सात लोग थे. हमें एक वक्त का खाना मिलता था. अगर कभी हमारे पास दो वक्त का खाना होता तो भी हम नहीं खाते तो क्योंकि टॉयलेट की कोई जगह ही नहीं थी.
इसी दौरान मेरे दोस्त और अलजज़ीरा के ब्यूरो चीफ़ वाएल दाहदूह ने इस युद्ध की दिल तोड़ देने वाली कीमत चुकाई.
इसराइली मिसाइल ने उस घर को निशाना बनाया जहां उनका परिवार रहता था. इस हमले में उनकी पत्नी, एक जवान बेटा, सात साल की बेटी और एक साल का पोता मारा गया.
इसराइली सेना का कहना है कि वह आम लोगों के हताहत होने की संख्या को कम से कम करने के लिए "यथासंभव सावधानी" बरतती है. इस मामले में 'हमास के चरमपंथियों के बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया था.'
मैंने अपने दोस्त का फुटेज देखा जिसे मैं 20 सालों से जानता हूं. वह सेंट्रल ग़ज़ा में अपने बच्चों के क़फन में लिपटे शवों को गले लगा रहा था. मैं चाहता थे कि काश उस वक़्त मैं वहां उसके साथ होता.
यह खबर तब आई जब मुझे लगातार अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों की मौत की खबरें मिल रही थीं.
उस दिन मैं रिपोर्टिंग कर रहा था और लाइव ऑन एयर में रो पड़ा. मैं रात में उठ बैठता था और मेरे गाल आंसुओं से गिले होते थे. वाएल की तस्वीरों ने कभी मुझे छोड़ा ही नहीं.
मैंने ग़ज़ा में 15 सालों में कई संघर्षों को कवर किया है लेकिन ये युद्ध अलग है. जिस अप्रत्याशित स्तर पर हमले किए गए उसमें बड़े स्तर पर लोगों ने इतना कुछ खो दिया.

इमेज स्रोत, Getty Images
7 अक्टूबर को मैं सुबह 6.15 बजे उठा और मेरे बच्चे चिल्ला रहे थे. मैं छत पर गया और देखा कि इसराइल की ओर से ग़ज़ा पर रॉकेट दागे जा रहे थे.
जब हमें पता चला कि हमास इसराइल में घुसा है और इस हमले में 1200 लोगों की मौत हुई है. 250 इसराइली बंधक बनाए गए हैं तो हमें अंदाज़ा लग गया था कि इसका जवाब कुछ ऐसा होगा जो हमने पहले कभी नहीं देखा है.
हमास संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक ग़ज़ा में अब तक 34 हजार लोगों की मौत हो चुकी है और युद्ध जारी है. लोगों की जान का ख़तरा अब भी बना हुआ है.
युद्ध शुरू हुए दो दिन हो चुके थे और मैं जबालिया के एक बाज़ार में गया था ताकि सामान खरीद कर स्टॉक किया जा सके. वहां कई लोगों की भीड़ थी जो ऐसी ही खरीदारी कर रहे थे.
लेकिन मेरे वहां से निकलने के दस मिनट बाद ही उस इलाके में भारी बमबारी की गई. पूरी जगह ही बर्बाद हो गई थी उसमें जो बड़ी राशन की दुकानें थीं वो भी खत्म हो गईं.
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि 69 लोग इस बमबारी में मारे गए और इस हमले की युद्ध अपराध की तरह जांच होनी चाहिए.
इसराइली सेना ने इस घटना को लेकर बीबीसी के सवालों के अब तक कोई जवाब नहीं दिए हैं.
'मेरा घर पूरी तरह बर्बाद हो गया'

पूरे युद्ध में इसराइल यही कहता आ रहा है कि वह हमास के ठिकानों को निशाना बना रहा है और उसका कहना है कि हमास के अड्डे वहां हैं, जहां आम लोग रह रहे हैं.
इसमें यह भी कहा गया है कि "सैन्य ठिकानों पर हमले अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रासंगिक प्रावधानों के अनुरूप हैं."
युद्ध से पहले, जबालिया एक सुंदर, शांत शहर था. मैं वहीं पैदा हुआ था और अपने परिवार के साथ एक सरल, संतुष्ट जीवन जी रहा था, प्यार और भविष्य की योजनाओं से भरा हुआ.
इस शहर के पूर्व में मेरे खेत थे जहां मैंने अपने हाथों से ऑलिव, नींबू और संतरे के पेड़ लगाए थे. वो बहुत शांत जगह थी, शाम में काम के बाद मैं वहां चाय पीना बहुत पसंद करता था.
जिस दिन हमने खान यूनिस के लिए उत्तरी ग़ज़ा छोड़ने का फैसला किया- मैंने अपना घर और बीबीसी का ऑफिस ग़ज़ा सिटी में पीछे छोड़ दिया और मुझे पता था कि ये मेरे जीवन का बहुत महत्वपूर्ण पल होने वाला है.
एक कार में 10 से अधिक लोगों को ठूंस कर, मैं और मेरा परिवार, सामान से लदे हुए, हजारों अन्य लोगों के साथ, पैदल और कुछ गाड़ियों में एक सड़क पकड़े दक्षिणी हिस्से के लिए निकल पड़े.
जब हम दक्षिण ग़ज़ा में जा रहे थे तो रास्ते में सड़क के दोनों तरफ बमबारी हुई. हमें यात्रा रोकनी पड़ी.
रास्ते में मेरे बच्चे मुझसे पूछते रहे- “हम कहां जा रहे हैं? हम कल वापस आ जाएंगे?”
काश घर छोड़ते वक्त मैं अपना फोटो एल्बम साथ ले पाता. उसमें मेरे बचपन, माता-पिता, पत्नी के साथ साथ वो फोटो भी शामिल थी जब मेरी सगाई हुई थी. काश मैं अपने साथ वो किताबें भी ला पाता जो मेरे पिता की थी.
मेरे पिता अरबी के शिक्षक थे. उनके मरने के बाद मैंने उनकी किताबें रखी थीं.
बाद में मुझे अपने एक पड़ोसी से पता चला कि मेरा घर पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया है. मेरे खेतों को जला दिया गया है.
अब तक 100 पत्रकारों की मौत, ज्यादातर फ़लस्तीनी

इमेज स्रोत, Getty Images
दक्षिण की उस भयानक यात्रा और रेड क्रिसेंट मुख्यालय के बाहर हमारी रात के बाद, मैंने कई हफ्तों तक खान यूनिस में काम करना जारी रखा. मेरा परिवार अभी भी नुसीरात में था और उनसे अलग होने का मुझ पर भावनात्मक रूप से काफ़ी असर हुआ.
कई दिनों तक मैं कई सारी भावनाओं से जूझता रहा. फिर ख़बर आई कि इसराइली सेना आगे बढ़ रही है और उद्देश्य स्पष्ट रूप से दक्षिण को सेंट्रल और उत्तरी ग़ज़ा से विभाजित करना था.
मैं डर गया था कि मैं या मेरा परिवार मारा जाएगा और हम फिर कभी एक-दूसरे को नहीं देख पाएंगे.
पहली बार मुझे लगा कि मैं हार गया हूं. मुझे याद भी नहीं वो कौन सा दिन था. मैंने काम रोका और अपने परिवार के पास आने के बारे में सोचा. अगर हम मरे तो हम साथ मरेंगे.
अंत में 11 दिसंबर को, मैं एक सहकर्मी के साथ नुसीरत चल पड़ा. जब मैं वहां पहुंचा, तो मेरे बच्चे मुझे गले लगाने के लिए दौड़े, मेरे बेटे रज़ान ने मेरी गर्दन कस कर पकड़ ली.
हम किसी तरह परिवार के साथ रफ़ाह पहुंचे. बीबीसी की टीम भी रफ़ाह पहुंच गई थी और हमने वहां से काम करना जारी रखा.
दिसंबर के अंत में, मैंने रिपोर्ट किया था कि इसराइली रक्षा बलों (आईडीएफ) ने ग़ज़ा में अधिकारियों को लगभग 80 शव सौंपे थे.
आईडीएफ ने कहा कि उन्हें ग़ज़ा से इसराइल ले जाया गया ताकि उनकी जांच की जा सके कि उनमें से कोई इसराइली बंधक तो नहीं है.
रफ़ाह में एक बड़ी लॉरी कब्रिस्तान में घुसी. जब कंटेनर खोला गया तो चारो तरफ़ दुर्गंध फैल गई.
एप्रन और मास्क पहने लोगों ने नीले प्लास्टिक में लिपटे शवों के अवशेषों को रेतीली जमीन में एक सामूहिक कब्र खोदकर दफना दिया.
मैंने ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा था, मैं बयां नहीं कर सकता कि वो कितना भयानक था.

इमेज स्रोत, Adnan EL-Bursh
फिर जनवरी में, मैं रफ़ाह के एक अस्पताल से रिपोर्टिंग कर रहा था, जब कई शव लाए गए. जिनमें वाएल के सबसे बड़े बेटे हमज़ा का शव भी था, जो बतौर पत्रकार अल जज़ीरा के लिए काम करते थे.
लेकिन वाएल को इसकी जानकारी कौन देता? उनके साथ इतना बुरा पहले ही हो चुका था कि उन्हें ये बता पाना असंभव लग रहा था.
मेरे एक सहकर्मी ने वाएल के क़रीबी को फ़ोन करके बताया ताकि ये ख़बर उन तक पहुंच सके.
हमज़ा और उनके वीडियोग्राफ़र मुस्तफ़ा तुराया एक इसराइली एयर स्ट्राइक में मारे गए. ये स्ट्राइक उनकी कार पर की गई थी, जब वो उस इलाके में हुए हमले पर रिपोर्ट कर रहे थे.
इज़राइली सेना का आरोप है कि वे "ग़ज़ा स्थित आतंकवादी संगठनों के सदस्य" थे. परिवार और अल जज़ीरा इन दावों को झूठा बताते हुए खारिज करते हैं.
आईडीएफ का कहना है कि दोनों "आईडीएफ सैनिकों के लिए एक बड़ा ख़तरा पैदा करने वाले" ड्रोन ऑपरेट कर रहे थे, लेकिन वाशिंगटन पोस्ट की जांच में "इस बात के कोई संकेत नहीं मिले हैं कि दोनों में से कोई भी उस दिन पत्रकार के अलावा किसी भी और तरीके से काम कर रहा था."
'मुझे ये खाना जहर जैसा लग रहा है'

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के अनुसार 7 अक्टूबर से ग़ज़ा में 100 से अधिक पत्रकार मारे गए हैं, जिनमें से अधिकांश फ़लस्तीनी हैं.
आईडीएफ़ का कहना है, ''हमने कभी भी जानबूझ कर किसी पत्रकार को निशाना नहीं बनाया है. किसी भी आम लोगों- जिसमें पत्रकार भी शामिल हैं- को कम से कम ख़तरा हो इसकी हरसंभव कोशिश करते हैं.''
आख़िरकार ख़बर आई कि बीबीसी की टीम के परिवारों को गाज़ा छोड़ने की इजाज़त मिल गई है. चार सप्ताह बाद, हम भी मिस्र के अधिकारियों की सहायता से रफाह क्रॉसिंग से निकल पाए.
जब मैं ये लिख रहा हूं तो मैं क़तर में बैठा हुआ हूं, लेकिन मुझे पता है कि जबालिया में लोग घास नोच रहे होंगे और अपने जानवरों के लिए किसी तरह चारा पीस रहे होंगे.
वहीं मैं यहां एक साफ़ होटल में खाना खा रहा हूं. मैं ये खाना खा नहीं पा रहा हूं- ऐसा लग रहा है जैसे ये खाना ज़हर है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












