ईरान: इब्राहिम रईसी के बारे में जानिए सारी अहम बातें

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ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी और विदेश मंत्री हुसैन अमीर-अब्दुल्लाहियन की हेलिकॉप्टर क्रैश में मौत हो गई है.
इब्राहिम रईसी रविवार को पूर्वी अज़रबैजान प्रांत में बांध का उद्घाटन करके लौट रहे थे तभी उनका हेलिकॉप्टर क्रैश हो गया था. मौत की पुष्टि सोमवार को घटनास्थल पर पहुँचने के बाद की गई. इस हादसे में राष्ट्रपति और विदेश मंत्री समेत नौ लोगों की मौत हुई है.
एक धार्मिक स्कॉलर से, वकील और फिर ईरान की क़ानून व्यवस्था के शीर्ष तक पहुंचने वाले रईसी देश के नंबर दो के धार्मिक नेता भी थे.
शिया धर्म गुरुओं के पदानुक्रम में वे धर्मगुरु अयातोल्लाह से एक क्रम नीचे माने जाते थे.
इब्राहिम रईसी ने जब जून 2021 में ईरान की सत्ता संभाली तब उनके सामने घरेलू स्तर पर कई चुनौतियां थीं.
एक तरफ़ देश के सामाजिक हालात मुश्किल थे तो दूसरी तरफ़ अपने परमाणु कार्यक्रम की वजह से अमेरिकी प्रतिबंध झेल रहा ईरान गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा था.
अपने चुनाव प्रचार के दौरान इब्राहिम रईसी ने कहा था कि वो देश में व्याप्त भ्रष्टाचार और आर्थिक संकट से निपटने के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार हैं.
रईसी इस दिशा में कुछ ख़ास कर पाते, इससे पहले ही हिजाब को लेकर हुए प्रदर्शनों ने उनके सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दीं.
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इसराइल पर हमास के हमले और उसके बाद इसराइल की सख़्त सैन्य प्रतिक्रिया ने ईरान के लिए और मुश्किल हालात पैदा कर दिए.
इस दौरान ईरान ने इसराइल के प्रति सख़्त रवैया अपनाकर ये स्पष्ट करने की कोशिश भी कि ये शिया बहुल देश अब मुस्लिम दुनिया का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं.
इब्राहिम रईसी का शुरुआती जीवन

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इब्राहिम रईसी का जन्म साल 1960 में उत्तर पूर्वी ईरान के पवित्र शहर मशहद में हुआ था. इसी शहर में शिया मुसलमानों के लिए सबसे पवित्र मानी जाने वाली मस्जिद भी है. वे कम उम्र में ही ऊंचे ओहदे पर पहुंच गए थे.
रईसी के पिता एक मौलवी थे. रईसी जब सिर्फ़ पाँच साल के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया था.
उन्होंने अपने पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए 15 साल की उम्र से ही क़ोम शहर में स्थित एक शिया संस्थान में पढ़ाई शुरू कर दी थी.
अपने छात्र जीवन में उन्होंने पश्चिमी देशों से समर्थित मोहम्मद रेज़ा शाह के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था.
बाद में अयातोल्ला रुहोल्ला ख़ामेनई ने इस्लामिक क्रांति के ज़रिए साल 1979 में शाह को सत्ता से बेदख़ल कर दिया था.
आयातुल्लाह अली ख़ामेनेई के क़रीबी थे रईसी

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सिर्फ़ 20 साल की उम्र में ही उन्हें तेहरान के क़रीब स्थित कराज का महा-अभियोजक नियुक्त कर दिया गया था.
साल 1989 से 1994 के बीच रईसी, तेहरान के महा-अभियोजक रहे और इसके बाद 2004 से अगले एक दशक तक न्यायिक प्राधिकरण के डिप्टी चीफ़ रहे थे.
साल 2014 में वो ईरान के महाभियोजक बन गए थे. ईरानी न्यायपालिका के प्रमुख रहे रईसी के राजनीतिक विचार 'अति कट्टरपंथी' माने जाते थे.
उन्हें ईरान के कट्टरपंथी नेता और देश के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयातुल्लाह अली ख़ामेनेई का क़रीबी माना जाता था.
वे जून 2021 में उदारवादी हसन रूहानी की जगह इस्लामिक रिपब्लिक ईरान के राष्ट्रपति चुने गए थे.
चुनाव अभियान के दौरान रईसी ने ख़ुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रचारित किया था कि वे रूहानी शासन के दौरान पैदा हुए भ्रष्टाचार और आर्थिक संकट से निपटने के लिए सबसे अच्छे विकल्प हैं.
'डेथ कमिटी' के सदस्य

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इस्लामिक क्रांति के बाद उन्होंने न्यायपालिका में काम करना शुरू किया और कई शहरों में वकील के तौर पर काम किया.
इस दौरान उन्हें ईरानी गणतंत्र के संस्थापक और साल 1981 में ईरान के राष्ट्रपति बने अयातोल्ला रुहोल्ला ख़ुमैनी से प्रशिक्षण भी मिल रहा था.
रईसी जब सिर्फ़ 25 साल के थे तब वो ईरान के डिप्टी प्रॉसिक्युटर (सरकार के दूसरे नंबर के वकील) बन गए.
बाद में वो जज बने और साल 1988 में बने उन ख़ुफ़िया ट्राइब्यूनल में शामिल हो गए, जिन्हें 'डेथ कमिटी' के नाम से जाना जाता है.
इन ट्राइब्यूनल्स ने उन हज़ारों राजनीतिक क़ैदियों पर 'दोबारा मुक़दमा' चलाया जो अपनी राजनीतिक गतिविधियों के कारण पहले ही जेल की सज़ा काट रहे थे.
इन राजनीतिक क़ैदियों में से ज़्यादातर लोग ईरान में वामपंथी और विपक्षी समूह मुजाहिदीन-ए-ख़ल्क़ा (MEK) या पीपल्स मुजाहिदीन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ ईरान (PMOI) के सदस्य थे.
इन ट्राइब्यूनल्स ने कुल कितने राजनीतिक क़ैदियों को मौत की सज़ा दी, इस संख्या के बारे में ठीक-ठीक मालूम नहीं है लेकिन मानवाधिकार समूहों का कहना है कि इनमें लगभग 5,000 पुरुष और महिलाएं शामिल थीं.
फाँसी के बाद इन सभी को अज्ञात सामूहिक क़ब्रों में दफ़ना दिया गया था. मानवाधिकार कार्यकर्ता इस घटना को मानवता के विरुद्ध अपराध बताते हैं.
इब्राहिम रईसी ने इस मामले में अपनी भूमिका से लगातार इनकार किया है लेकिन साथ ही उन्होंने एक बार यह भी कहा था कि ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातोल्ला ख़ुमैनी के फ़तवे के मुताबिक यह सज़ा 'उचित' थी.
इसराइल पर सीधा हमला

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इसराइल और ईरान, दोनों 1979 तक एक दूसरे के सहयोगी हुआ करते थे. इसी साल ईरान में इस्लामी क्रांति हुई और देश में एक ऐसी सरकार आई जो विचारधारा के स्तर पर इसराइल की घोर विरोधी थी.
अब ईरान इसराइल के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता और उसके पूरी तरह से ख़ात्मे की वक़ालत करता है.
ईरान के सुप्रीम लीडर रहे आयातुल्लाह अली ख़ामेनेई कहते रहे हैं कि इसराइल ‘कैंसर का ट्यूमर’ है और उसे बेशक़ ‘जड़ों से उखाड़ फ़ेका जाएगा और बर्बाद कर दिया जाएगा.’
इसराइल भी कहता है कि ईरान उसके अस्तित्व के लिए ख़तरा है. इसराइल कहता है कि ईरान फ़लस्तीनी हथियारबंद समूहों और लेबनान में शिया गुट हिज़बुल्लाह को फंड करता है.
दोनों देशों के बीच यह दुश्मनी ग़ज़ा युद्ध के बाद और ज्यादा बढ़ गई. अप्रैल में कथित तौर पर इसराइल ने सीरिया की राजधानी दमिश्क में ईरान के वाणिज्य दूतावास पर हमला किया.
इसके जवाब में कुछ ही दिन बाद ईरान ने इसराइल पर अभूतपूर्व और अप्रत्याशित मिसाइल हमला किया.
यह पहली बार था जब ईरान ने इसराइल पर सीधा हमला किया था.
अतीत में ईरान और इसराइल एक दूसरे के विरुद्ध अप्रत्यक्ष रूप से हमले करते रहे हैं. इन हमलों में एक दूसरे के ठिकानें को निशाना बनाना शामिल है. दोनों कभी ऐसे हमलों की ज़िम्मेदारी स्वीकार नहीं करते थे.
इस साल अप्रैल में ईरान ने दमिश्क में अपने दूतावास पर हमले का बदला लेने के लिए इसरइल पर अभूतपूर्व और अप्रत्याशित मिसाइल हमला किया था.
फलस्तीनी लोगों को समर्थन

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ईरान में 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद से फ़लस्तीनी लोगों के लिए समर्थन ईरान की विदेश नीति के केंद्र में रहता है.
इसराइल-ग़ज़ा संघर्ष में खुलकर ईरान फलस्तीनियों का साथ दे रहा है.
रविवार, 19 मई को बांध के उद्घाटन के बाद दिए भाषण में भी रईसी ने फ़लस्तीनी लोगों के लिए ईरान के समर्थन को बनाए रखने पर ज़ोर दिया.
अपने भाषण में रईसी ने कहा, “हम ये मानते हैं कि फलस्तीन मुस्लिम दुनिया का सबसे अहम मुद्दा है और हम इस बात को लेकर निश्चिंत हैं कि ईरान और अज़रबैजान के लोग हमेशा फ़लस्तीन और ग़ज़ा के लोगों का समर्थन करते हैं और इसराइल के यहूदीवादी शासन से नफ़रत करते हैं.”
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