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मोरबी हादसाः 135 लोगों की मौत के लिए एसआईटी में किसे ज़िम्मेदार ठहराया गया?
- Author, लक्ष्मी पटेल
- पदनाम, बीबीसी गुजराती के लिए
तीस अक्टूबर 2022 की शाम को मोरबी के ऐतिहासिक सस्पेंशन ब्रिज के टूटने से बच्चों समेत 135 लोगों की मौत हुई थी.
इस हादसे के एक साल होने के हैं और गुजरात सरकार ने इस मामले के लिए जिस विशेष जांच टीम (एसआईटी) का गठन किया था उसने बीते 10 अक्टूबर को गुजरात हाईकोर्ट में अपनी अंतिम रिपोर्ट जमा करा दी है.
एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से ओरेवा ग्रुप, इसके डायरेक्टर जयसुख पटेल और मैनेजरों दीपक दवे और दीपक पारेख को इस ब्रिज हादसे के लिए ज़िम्मेदार ठहराया है.
एसआईटी ने ये भी कहा कि ओरेवा ग्रुप के अध्यक्ष जयशुख पटेल और उनके मैनेजर दीपक दवे और दीपक पारेख की आपराधिक लापरवाही का ही नतीजा था कि 135 लोगों की मौत हुई.
रिपोर्ट में मोरबी ब्रिज हादसे को गुजरात का सबसे बड़ा और सबसे भीषण मानव निर्मित आपदा कहा गया है.
गुजरात हाईकोर्ट में पेश 2,000 से अधिक पन्नों की अंतिम रिपोर्ट में दुखद हादसे के पीछे के कारणों का विस्तृत विवरण दिया गया है.
रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 'मोरबी पुल का प्रबंधन करने वाली ओरेवा कंपनी के कुप्रबंधन, तकनीकी विफलताओं, घोर लापरवाही, निरंकुश रवैये और आपराधिक लापरवाही के कारण मोरबी का यह सस्पेंशन पुल ढह गया जिसमें 135 लोगों की जान चली गई. इसलिए, इस पूरे गंभीर हादसे के लिए ओरेवा ग्रुप, ओरेवा ग्रुप के जयसुख पटेल और उनके दो मैनेजर दोषी हैं.'
गुजरात हाईकोर्ट ने क्या पूछा?
गुजरात हाईकोर्ट की चीफ़ जस्टिस सुनीता अग्रवाल और जस्टिस अनिरुद्ध पी मायी ने सरकार से पूछा, “अगर ओरेवा ग्रुप, इसके डायरेक्टर और मैनेजरों पर आपराधिक लापरवाही का आरोप था तो अभी तक इस कंपनी को ब्लैकलिस्ट क्यों नहीं किया गया.”
गुजरात सरकार की ओर से पेश एडवोकेट जनरल कमल त्रिवेदी ने कहा, “इस रिपोर्ट ने मोरबी ब्रिज के संचालन, रखरखाव और प्रबंधन में ओरेवा ग्रुप की कई गंभीर प्रशासनिक और तकनीकी खामियों को उजागर किया है.”
“ओरेवा ग्रुप और मोरबी नगरपालिका के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और चेयरमैन के बीच साइन हुए एमओयू के अनुसार, ओरेवा ग्रुप को ब्रिज की स्थाई रिपेयरिंग करनी थी. कंपनी ने संबंधित विभाग को ब्रिज की जर्जर स्थिति के बारे में बताया और यूज़र चार्ज बढ़ाने का प्रस्ताव दिया जिसे ख़ारिज कर दिया गया.”
कमल त्रिवेदी ने कहा, “प्रशासन ने कंपनी से कहा कि या तो वह मौजूदा यूजर चार्ज पर काम करे या इसका प्रबंधन वापस सौंप दे. हालांकि ओरेवा ग्रुप ब्रिज के प्रबंधन को संबंधित विभाग को सौंपने में नाकाम रहा.”
"लेकिन साथ ही उसने ब्रिज की मरम्मत भी नहीं कराई. जब एमओयू को रिन्यू किया गया तो ओरेवा कंपनी ने ब्रिज के मरम्मत के काम का ठेका एक और कंपनी देवप्रकाश सॉल्यूशन्स को दे दिया."
"ओरेवा कंपनी ने किसी भी एजेंसी के विशेषज्ञों की तकनीकी राय नहीं ली और ना ही मोरबी नगर पालिका सदस्यों से कोई सलाह मशविरा किया गया."
कोर्ट ने ये पूछा, “देवप्रकाश सॉल्यूशन को ठेका किसने दिया- कंपनी ने या नगरपालिका ने? क्या तकनीकी रिपोर्ट साझा की गई या उसने नगरपालिका से सलाह मशविरा किया, ये ठेका अपने आप कैसे आवंटित हो गया?”
राज्य सरकार ने क्या कहा?
राज्य सरकार ने रिपोर्ट का हवाला देते हुए कोर्ट से कहा, “ओरेवा कंपनी ने मोरबी ब्रिज के संचालन और रखरखाव में घोर लापरवाही दिखाई. अगर उसने विशेषज्ञों की सलाह ली होती तो इसकी मरम्मत की जा सकती थी या बदला जा सकता था.”
"पुल की मरम्मत के बाद भी ओरेवा कंपनी ने नगर पालिका से कोई चर्चा नहीं की. ब्रिज को दोबारा खोलने से पहले फ़िटनेस सर्टिफ़िकेट भी नहीं लिया गया."
"इसके अलावा, पुल पर आने वाले लोगों को टिकटों की बिक्री पर कोई नियंत्रण नहीं था. सैकड़ों लोगों को पुल पार करने की अनुमति देना भी लापरवाही थी."
जब बेंच ने पूछा, सरकार ने कोई कार्रवाई की या नहीं? तो सरकार का जवाब था कि वो रिपोर्ट का इंतज़ार कर रही थी और उसी के मुताबिक कार्रवाई होगी.
ओरेवा कंपनी की ओर से दलील दी गई कि कंपनी ने हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक सभी पीड़ितों को 14 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया है, लेकिन कई पीड़ितों ने उपभोक्ता अदालत में अधिक मुआवजे के लिए आवेदन किया है. अनाथ बच्चों के वयस्क होने तक की जिम्मेदारी ओरेवा कंपनी ने ली है.
गुजरात हाई कोर्ट ने कहा, “कंपनी को विधवाओं या निराश्रित महिलाओं को रोजगार मुहैया कराने का भी निर्देश दिया गया है.”
हाईकोर्ट ने सरकार और ओरेवा कंपनी दोनों को पीड़ित महिलाओं और बच्चों की विस्तृत जानकारी देने को कहा.
पीड़ितों के वकील उत्कर्ष दवे ने पत्रकारों से कहा, “एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में ओरेवा कंपनी और इसके अधिकारियों को जवाबदेह बनाया है. कंपनी को किसी तरह का सर्टिफिकेट भी नहीं दिया गया था. टिकट बिक्री पर कोई दिशा निर्देश नहीं था. ब्रिज पर सुरक्षा कर्मी भी पर्याप्त नहीं थे. नतीजतन लोगों को काबू करना असंभव था.”
उन्होंने कहा, “नवीनीकरण के बाद ओरेवा कंपनी ने अपने काम को एक थर्ड पार्टी कंपनी को सौंप दिया और उसने भी बिना तकनीकी मदद के काम को पूरा कर दिया.”
एसआईटी ने अपने नतीजे में क्या कहा?
- ब्रिज टूटने के सीसीटीवी फुटेज को चेक करने पर पता चला कि इसका मुख्य केबल टूटा. जिसकी वजह से ब्रिज दरबारगढ़ की ओर झुक गया. ये स्पष्ट है कि ब्रिज के टूटने में रखरखाव की कमी सबसे बड़ा कारण थी.
- सुरक्षा उपायों और ब्रिज के डिजाइन को देखते हुए कहा जा सकता है कि अगर ब्रिज के सभी 49 केबल बिल्कुल ठीक दशा में हो तब भी यहां 75 से 80 लोगों को एक समय में जाने की इजाज़त दी जा सकती है.
- लेकिन मौके पर जांच की गई तो पता चला कि इनमें 22 केबिलें जंग की वजह से टूट चुकी थीं. यानी ब्रिज की क्षमता और कम हो गयी थी.
- टिकट बिक्री, आने जाने की संख्या पर नियंत्रण का कोई तंत्र या रजिस्टर न होने की वजह से ब्रिज पर क्षमता से अधिक लोग चढ़ गये थे.
- यह ब्रिज 1879 में बना था और इसके टूटने के पीछे सबसे बड़ा कारण उसपर चढ़े लोगों की अधिक संख्या थी.
- ये जानते हुए भी कि ब्रिज करीब डेढ़ सौ साल पुराना है, इसकी क्षमता से अधिक लोगों को जाने दिया गया और ये हादसा हुआ. रिपोर्ट के मुताबिक, हादसे के समय बड़ी संख्या में लोग पुल पर मौजूद थे.
एसआईटी ने क्या सुझाव दिए हैं?
- दोबारा खोले जाने के बाद ब्रिज का नियमित रूप से ऑडिट होना चाहिए. दर्शकों के आने और जाने का समय निश्चित होना चाहिए और इसका रिकॉर्ड रखना चाहिए. एक मानक दिशा निर्देश तैयार किया जाना चाहिए.
- जनता द्वारा इस्तेमाल की जा रही किसी भी इमारत की नियमित रूप से जांच प्रशासन को करनी चाहिए.
- सुरक्षा, सेफ़्टी, रखरखाव, मरम्मत के दिशा निर्देश तैयार कर उसका कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए.
- किसी विशेष विभाग या निजी एजेंसी को पुलों के रखरखाव और मरम्मत के लिए सुविधाएं प्रदान करने की ज़िम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए.
- दुर्घटना की स्थिति में तुरंत बचाव के सभी उपकरण पास में ही होने चाहिए.
- सार्वजनिक संपत्तियों को किसी निजी कंपनी को सौंपने से पहले उस कंपनी की तकनीकी क्षमता और प्रशिक्षण का सत्यापन किया जाना चाहिए. कम से कम दो बार यह जांचना चाहिए कि कोई अनुभवी अधिकारी है या नहीं.
मोरबी में क्या हुआ?
गुजरात के मोरबी में मच्छु नदी पर बना पुल 30 अक्टूबर 2022 की शाम क़रीब छह बजे ढह गया. इस हादसे में 135 लोगों की मौत हो गई.
इस ब्रिज के ररखाव की जिम्मेदारी मोरबी की ही कंपनी ओरावा को दी गई थी.
क़रीब 144 साल पुराने इस सस्पेंशन ब्रिज की मरम्मत सालों से नहीं हुई थी और जंग लगी केबिल और ढीले नट बोल्ट भारी संख्या में आए लोगों का वजन सह नहीं पाए.
देश और विदेश में इस घटना की चर्चा हुई लेकिन तब और विवाद बढ़ गया जब इस घटना के लिए ज़िम्मेदार एक व्यक्ति को पीड़ितों की मदद करते हुए देखा गया.
पुलिस ने इस मामले में नौ लोगों को गिरफ़्तार किया था, जिनमें तीन सुरक्षा गार्ड, दो टिकट क्लर्क, दो ठेकेदार और ओरेवा ग्रुप के दो मैनेजर.
ये भी पाया गया कि हादसे के पहले छह महीने के लिए मरम्मत के लिए बंद किया गया था और उसे चार दिन पहले ही 26 अक्टूबर को खोला गया था.
हादसे के अभियुक्त ओरेवा ग्रुप के मालिक जयसुख पटेल ने कोर्ट में सरेंडर कर दिया था.
1,262 पृष्ठों की चार्जशीट में जयसुख पटेल को मुख्य आरोपी और फरार बताया गया.
कौन हैं जयसुख पटेल?
जयसुख पटेल के पिता ओधावजी पटेल भारत में दीवार घड़ियों के जनक माने जाते हैं. उन्होंने साल 1971 में तीन हिस्सेदारों के साथ एक लाख रुपये से ओरेवा ग्रुप की शुरुआत की थी.
उस समय इस कंपनी का नाम 'अजंता ट्रांज़िस्टर क्लॉक मैन्युफै़क्चरर' था और कंपनी में जयसुख पटेल के पिता की हिस्सेदारी महज़ 15 हज़ार रुपये की थी.
हालाकि, बाद में अजंता की दीवार घड़ियाँ भारत में लोकप्रिय हो गईं और साल 1981 में तीनों हिस्सेदारों ने कंपनी का बंटवारा कर लिया. इसके बाद ओधावजी के नाम पर 'अजंता कंपनी' का नाम रखा गया.
इस दशक में ओधावजी ने 'क्वार्ट्ज़ क्लॉक' बनानी शुरू की, जिसकी वजह से अजंता दुनिया की सबसे बड़ी घड़ी निर्माता बन गई. इतना ही नहीं भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय ने अजंता ग्रुप को लगातार 12 सालों तक उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स श्रेणी के सर्वोच्च निर्यातक पुरस्कार से सम्मानित किया.
कंपनी का कारोबार 45 देशों में फैला है. अक्टूबर 2012 में ओधावजी पटेल की मौत के बाद, अजंता कंपनी ओधावजी के बेटों के बीच बंट गई. जयसुख पटेल को जो कंपनी इस बंटवारे में मिली उन्होंने उसका नाम ओरेवा में बदल दिया.
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