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मोरबी हादसे के पीड़ितों की आपबीती: 'भाई बचा पर बहन का हाथ छूटा'
- Author, तेजस वैद्य & रॉक्सी गागडेकर छारा
- पदनाम, बीबीसी गुजराती संवाददाता, मोरबी से
गुजरात के मोरबी नदी पर हर दिन जैसी सुहानी सुबह होती थी, सोमवार को वैसा कुछ नहीं हुआ. सोमवार की सुबह यहाँ लोगों के चेहरे अजीब सी मायूसी से भरे हैं. दूसरी तरफ़, एनडीआरएफ़-एसडीआरएफ़ की टीमें नदी में डूबे शवों को निकालने में जुटी हुई हैं.
रविवार को मोरबी में माच्छू नदी पर बने पुल के गिरने से अब तक 141 लोगों की जान जा चुकी है. गुजरात के गृह मंत्री मंत्री हर्ष सिंह सांघवी ने इसकी जानकारी दी है.
माच्छू नदी पर बना एक सदी पुराना ये सस्पेंशन ब्रिज रविवार को टूटा था. माना जा रहा है कि अभी भी नदी में कई शव हो सकते हैं.
बीबीसी संवाददाता रॉक्सी गागड़ेकर छारा और तेजस वैद्य ने मौके का हाल जानने के लिए पीड़ितों, उनके परिवार और बचाव कार्य में लगे अधिकारियों से भी बात की.
बातचीत के दौरान एनडीआरएफ़ टीम की अगुवाई कर रहे अधिकारी प्रसन्ना कुमार ने बताया कि यहाँ बचाव कार्य में सबसे बड़ी बाधा यह है कि नदी में सीवर का पानी है. अलग-अलग महकमों के करीब 300 लोग यहाँ बचाव कार्य में लगे हैं.
बचाव दल ने क्या कहा?
प्रसन्ना कुमार ने बीबीसी संवाददाता तेजस वैद्य को बताया कि घटना की जानकारी मिलते ही उन्होंने टीमें मौके के लिए रवाना कर दी गई थीं. हमारी टीमें गांधी नगर और वडोदरा में थी. हमारी पहली टीम ढाई बजे यहाँ पहुँची और उसके दो-ढाई घंटे के अंदर बाकी टीमें भी यहाँ आ गई थीं.
बचाव कार्य में आने वाली चुनौतियों के सवाल पर प्रसन्ना कुमार ने बताया कि पहला तो यहाँ पानी ठहरा हुआ है और दूसरा ये की यहाँ सीवर का पानी है, जिसके कारण पानी के अंदर विज़िबिलिटी बहुत कम है.
उन्होंने कहा, "गोताखोरों को पानी के अंदर लाइट लेकर जाना पड़ रहा है. रात में यही हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी. हालांकि, अब धूप निकल गई है और स्थिति बेहतर हुई है. नदी में ठहरे पानी को निकालना संभव नहीं है, इसलिए गोताख़ोर पानी के अंदर जाकर ही बाकी शवों को निकालेंगे."
ये रेस्क्यू ऑपरेशन कब तक चलेगा, इसपर प्रसन्ना कुमार ने कहा कि जब तक हमें ये न लगे कि एक-एक शव निकाल लिया गया है तब तक काम जारी रहेगा. उन्होंने बताया कि फिलहाल एनडीआरएफ़ के करीब 125 कर्मी यहां बचाव कार्य में लगे हुए हैं. बचाव कार्य के लिए नाव, डीप डाइवर्स और बाकी सभी ज़रूरी सामान मौके पर मौजूद है.
राहत कार्य में रातभर जुटे रहे गांव वाले
हादसे के बाद से पास के गाँव में एकदम कर्फ़्यू सा माहौल है. बैकग्राउंड में लाउडस्पीकर से घोषणा हो रही है कि कोई भी नाव अब बीच में नहीं जाएगी.
करीब 200 से अधिक स्वयंसेवक पूरी रात घटनास्थल पर मौजूद थे. अभी तक गांव वाले घाट पर मौजूद हैं और बचाव कार्य में हर संभव मदद दे रहे हैं. कल शाम से स्थानीय लोग भी बिना खाए-पीए इस रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटे हुए हैं.
हादसे में कई बच्चों की भी जान गई है. राहत कार्य में सहयोग कर रहे गांव के ही एक निवासी ने बताया कि उन्होंने करीब 20-25 बच्चों के शव नदी से अब तक निकाले हैं. इनमें अलग-अलग उम्र के बच्चे थे.
उन्होंने बताया कि कई लोग ऐसे भी थे, जिनकी हड्डी टूटी थी. ऐसे लोगों को बाइक पर भी अस्पताल पहुँचाया गया. बाद में एंबुलेंस की सुविधा भी मिली.
विरल भाई दोषी नाम के एक अन्य गांववासी ने बताया कि जो अब तक उन्होंने देखा, वैसा जीवन में कभी नहीं देखा था. वो रातभर नदी से निकले शवों को अस्पताल पहुँचाने में मदद कर रहे हैं.
एक बैंक में मैनेजर और आरएसएस जुड़े एक कार्यकर्ता दीपेश भानुशाली ने बीबीसी से बातचीत में बताया कि अभी तक करीब 135 शव निकाले जा चुके हैं. बहुत से लोग लापता हैं. कई लोग कह रहे हैं कि उनके परिवार के सदस्यों के शव नहीं मिल रहे हैं. इसलिए अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि 15-20 शव अभी भी नदी में ही है.
पास के ही सिविल अस्पताल का नज़ारा बताते हुए एक फ़ोटोजर्नलिस्ट विपिन ने कहा कि अस्पताल में शव ही शव थे. लोग रो रहे थे. डॉक्टर आ रहे थे, मरीज़ को देखकर जा रहे थे. अस्पताल में रोज़ से कहीं गुना ज़्यादा भीड़ थी. रातभर शव निकाले जा रहे थे.
हादसे के बाद लोगों में आक्रोश भी है.
हादसे में किसी ने अपनी संतान, किसी ने अपने जीवनसाथी तो किसी ने अपने करीबी रिश्तेदार को हमेशा के लिए खो दिया है.
बीबीसी संवाददाता तेजस वैद्य ने एक पीड़ित युवक की दर्दनाक कहानी बताई. ये शख्स कल शाम अपनी बहन के साथ यहाँ पहुँचे थे.
वो अपनी बहन की तस्वीर खींच रहे थे लेकिन उन्हें नहीं पता था कि ये शायद उनकी बहन की आख़िरी तस्वीर होगी.
तस्वीर खींचते समय ही अचानक पुल गिर गया. हादसे में भाई तो बच गया लेकिन बहन का हाथ छूठ गया. ये शख्स कल शाम से हर तरफ़ अपनी बहन को खोज रहा है लेकिन उसके हाथ अब भी खाली ही हैं.
"मैं बच गया लेकिन बहन नहीं मिली"
मोरबी में युवक ने रोते हुए बीबीसी को बताया, "मेरी बहन नहीं मिल रही. कल मेरे साथ ही थी. हम पुल पर मोबाइल से तस्वीर खींच रहे थे. वहां कई और लोग भी थे. तभी पुल हिलने लगा और गिर गया."
"हम बिलकुल बीचों बीच थे. बहन का मैंने हाथ पकड़ा हुआ था, बहन से मेरा हाथ छूट गया. मैं बच गया पर बहन नहीं मिल रही. तब से अब तक हर जगह गया, वो कहीं नहीं मिली. सरकारी अस्पताल गया, वहां भी नहीं दिखी. मेरी बहन छोटी सी थी, छह साल की. इस पुल पर मैं पहली बार कल आया था."
युवक ने बीबीसी संवाददाता से कहा, "मेरी बहन लापता है, मुझे वो अभी तक नहीं मिली है."
ये युवक मजदूरी करता है और घटनास्थल से कुछ ही दूरी पर रहता है. वो भी दूसरे पर्यटकों की तरह ही यहाँ अपनी बहन के साथ घूमने आया था.
उन्होंने रोते-रोते कहा, "मेरी बहन छोटी है, छह साल की है और अभी भी नहीं मिली है. मैं कल शाम से उसकी तलाश कर रहा था. सरकारी अस्पताल गया. हर जगह खोजा लेकिन मेरी बहन नहीं मिली."
दरअसल, ये पुल 100 साल पुराना है और 6-7 महीने तक इसका मरम्मत का काम चला. इसमें करीब 2 करोड़ रुपये खर्च हुए. मरम्मत के बाद पुल खुला और एक सप्ताह भी नहीं बीता था कि इस भीषण हादसे ने करीब 135 जान ले ली.
मोरबी के माछू नदी पर बनाया गया यह झूलता हुआ पुल मोरबी को एक ख़ास पहचान देने के उद्देश्य से आधुनिक यूरोपीय तकनीक का उपयोग करते हुए बनाया गया था.
मोरबी शहर की सरकारी वेबसाइट पर दी गई जानकारी में इस पुल को इंजीनियरिंग का चमत्कार बताया गया है.
यह पुल 1.25 मीटर चौड़ा और 233 मीटर लंबा था और माच्छू नदी पर दरबारगढ़ महल और लखधीरजी इंजीनियरिंग कॉलेज को जोड़ता था.
इस घटना के पीछे ज़िम्मेदार कौन है, इसका अभी तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला है. सरकार अभी राहत और बचाव कार्य के बारे में ही बता रही है. अभी तक किसी भी संबंधित अधिकारी ने इसको लेकर स्पष्टीकरण नहीं दिया है.
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