मोरबी हादसाः ‘मैंने रस्सी से पंद्रह शवों को पानी से बाहर निकाला’

  • गुजरात के मोरबी शहर में माच्छू नदी पर बना झूला ब्रिज टूटा
  • हादसे में कम से कम 141 लोगों के मौत हुई
  • 6 महीने बंद रहने और मरम्मत के बाद 28 अक्तूबर को फिर से खुला था पुल
  • त्यौहारों की छुट्टियों और रविवार की वजह से थी भारी भीड़
  • सेना भी बचाव कार्य में जुटी, एनडीआरएफ़ और एसडीआरएफ़ की टीमें भी मौजूद
  • प्रबंधन के ख़िलाफ़ दर्ज किया गया मुक़दमा

गुजरात के गृहमंत्री गृह मंत्री हर्ष सिंह सांघवी ने कहा है कि राज्य के मोरबी शहर में एक पुल टूट जाने से कम से कम 141 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई है.

ब्रिटिश काल में बना ये पुल कुछ दिन पहले ही मरम्मत के बाद फिर से जनता के लिए खुला था. त्यौहारों की छुट्टियां और रविवार होने की वजह से बड़ी तादाद में लोग यहां छुट्टी मनाने जुटे थे.

मोरबी के ज़िलाधिकारी के मुताबिक अब तक 170 लोगों को बचाया गया है. मीडिया से बात करते हुए गुजरात के गृह मंत्री हर्ष सिंह सांघवी ने कहा है कि रात एक बजे तक 68 लोगों के शव निकाल लिए गए थे.

सांघवी ने कहा, "हादसा होते ही प्रशासन मौके पर पहुंच गया था और राहत और बचाव कार्य शुरू हो गया था. मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल भी मोरबी में हैं और अस्पताल गए हैं."

गृह मंत्री के मुताबिक पुल का प्रबंधन करने के लिए ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज कर लिया गया है और सरकार पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है.

रविवार शाम क़रीब दस बजे बीबीसी से बात करते हुए स्थानीय भाजपा सांसद मोहन कुंडारिया ने कहा, "अभी डूबे हुए लोगों की तलाश जारी है. सभी घायलों को अस्पताल पहुंचा दिया गया है. कोई भी घायल गंभीर नहीं है. जितने भी लोग पुल से लटक रहे थे उन सभी को बचा लिया गया है."

कुंडारिया के मुताबिक, "कुल कितने लोग पुल पर मौजूद थे ये अभी पता नहीं चल सका है. परिवार के बयान और प्रशासनिक अधिकारियों की गणना के बाद ही ये कहा जा सकेगा कि कुल कितने लोग मौजूद थे."

लेकिन स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों में दावा किया गया है कि पुल पर चार सौ से अधिक लोग मौजूद रहे होंगे.

नदी पर बना बांध तोड़ा गया

देर रात तक भी कई लोग लापता थे और उनके परिजन उन्हें खोज रहे थे. माच्छू नदी पर पानी रोकने के लिए छोटे-छोटे बांध बने हैं. डूबे हुए लोगों की तलाश के लिए पुल के पास बने एक ऐसे ही बांध को देर रात तोड़ दिया गया.

बीबीसी के सहयोगी पत्रकार राकेश अंबालिया के मुताबिक जहां पुल टूटा है वहां आमतौर पर बीस फुट से अधिक पानी रहता है.

सोमवार सुबह एक बजे के बाद भी गोताखोर और यहां डूबे हुए लोगों की तलाश में जुटे थे.

स्थानीय सांसद मोहन कुंडारिया के मुताबिक, "पानी को निकाल लिए जाने के बाद ही पता चल सकेगा कि कितने लोग और डूबे हैं. राजकोट, जामनगर और सौराष्ट्र के दूसरे ज़िलें से भी यहां टीमें पहुंच रही हैं और राहत और बचाव कार्य युद्धस्तर पर चल रहा है."

'चारों तरफ़ मची थी चीख पुकार'

ये हादसा शाम क़रीब छह बजे हुए. बीबीसी के सहयोगी पत्रकार राकेश अंबालिया साढ़े छह बजे मौके पर पहुंच गए थे.

अंबालिया के मुताबिक हादसे के कुछ देर बाद ही एंबुलेंस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर थे और राहत और बचाव कार्य शुरू हो गया था. बड़ी तादाद में स्थानीय लोग भी पानी में डूब रहे लोगों को बचाने में जुटे थे.

अंबालिया के मुताबिक, "जब मैं मौके पर पहुंचा चारों तरफ़ चीख पुकार मची थी. ये बहुत ही भयावह नज़ारा था. कुछ लोग पुल की रेलिंग से लटक रहे थे तो कुछ पुल के डूबे हुए हिस्से पर चढ़कर अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहे थे. बहुत से लोग डूब रहे थे. बचाओं-बचाओं की चीख़ पुकार मची थी."

अंबालिया बताते हैं, "मौके से भाग रहे एक व्यक्ति ने बताया, मैं तो किसी तरह बच गया हूं, बहुत से लोग फंसे हैं. उन्हें बचा लीजिए."

हादसे के तुरंत बाद शहर में जितनी भी एंबुलेंस थी वो मौके की तरफ़ दौड़ पड़ी. आसपास के शहरों से भी एंबुलेंस बुला ली गईं. मोरबी फ़ायर डिपार्टमेंट की टीमें भी मौके पर पहुंच गईं.

छह महीने बाद खुला था पुल

माच्छु नदी मोरबी शहर को दो हिस्सों में बांटती हैं. ब्रितानी काल में बना ये झूला पुल शहर के इन दोनों हिस्सों को जोड़ता है और शहर में पर्यटन का चर्चित केंद्र हैं.

इस पुल को मरम्मत के लिए छह महीने पहले बंद किया गया था. दिवाली के एक दिन बाद गुजराती नववर्ष के मौके पर 28 अक्तूबर को इसे फिर से जनता के लिए खोला गया था.

राकेश अंबालिया के मुताबिक, रविवार और छुट्टियां होने की वजह से यहां आम दिनों के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा भीड़ थी. यही वजह है कि पुल टूटने की वजह से इतनी बड़ी तादाद में लोग पानी में डूब गए.

स्कूल की छुट्टी होने की वजह से भारी तादाद में बच्चे भी पुल पर मौजूद थे. अंबालिया बताते हैं, "ये पुल मोरबी की पहचान हैं, ऐसे में जब महीनों तक बंद रहने के बाद ये फिर से खुला तो बड़ी तादाद में लोग इसे देखने पहुंचे. बहुत से लोग अपने परिवारों के साथ आए थे."

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक मोरबी नगर पालिका ने अभी पुल का फिटनेस सर्टीफ़िकेट भी जारी नहीं किया था.

मोरबी नगर पालिका के मुख्य कार्यपालक अधिकारी संदीप सिंह जाला के मुताबिक, "इस पुल को इस साल मार्च में ओरेवा कंपनी को मरम्मत और प्रबंधन के लिए पंद्रह साल के लिए दिया गया था. मरम्मत के लिए इसे जनता के लिए बंद कर दिया गया था. मरम्मत कार्य के बाद ये फिर से खुला था. लेकिन नगर पालिका ने मरम्मत के बाद इसका फिटनेस सर्टीफ़िकेट जारी नहीं किया था."

इस पुल को नदी के दोनों किनारे स्थित मोरबी राजघराने के दो महलों दरबारगढ़ महल और नज़रबाग़ महल को जोड़ने के लिए 19वीं सदी में बनाया गया था.

1.25 मीटर चौड़ा ये पुल 233 मीटर लंबा था. ज़िला मोरबी की वेबसाइट के मुताबिक ये पुल उन दिनों की यूरोप में मौजूद नवीनतम तकनीक से बनाया गया था और इसका मक़सद "मोरबी के शासकों के वैज्ञानिक और प्रगतिशील दृष्टिकोण को प्रदर्शित करना था."

'मैंने रस्सी से पंद्रह शवों को पानी से बाहर निकाला'

हादसे के तुरंत बाद आसपास के लोग भी मदद करने को दौड़े. रमेश भाई जिलरिया जहां पुल टूटा उससे कुछ दूर ही रहते हैं.

बीबीसी के सहयोगी पत्रकार राकेश अंबालिया से बात करते हुए रमेश भाई कहते हैं, "मैं पास में ही रहता हूं, शाम छह बजे का क़रीब मुझे पता चला कि हादसा हो गया है तो मैं तुरंत रस्सी लेकर पहुंच गया और रस्सी की मदद से मैंने पंद्रह के क़रीब शव बाहर निकाले थे. "

उस घटना के बाद की स्थिति बताते वह कहते हैं, "मैं जब आया तब पचास से साठ लोग टूटे हुए पुल पर लटक रहे थे. हमने समझा कर उन लोगों को ऊपर भेज दिया."

"उसके बाद हमें जैसे-जैसे शव मिलते गए, हम उन्हें बाहर निकालते गए. उन शवों में तीन छोटे बच्चे थे."

इस दुर्घटना के चश्मदीद सुभाष भाई कहते हैं, "काम खत्म करके मैं और मेरा दोस्त पुल के पास ही बैठे थे. पुल टूटने की ज़ोरदार आवाज़ आई और हम इस तरफ़ दौड़े आए और लोगों को बचाने में जुट गए.

"कुछ लोग तैरकर बाहर आ रहे थे. कुछ लोग डूबे जा रहे थे. हमने सबसे पहले बच्चों को निकालना शुरू किया. उसके बाद पाइप लिया और पाइप की मदद से हमने बड़े लोगों को बचाने का प्रयास किया. हमने आठ-नौ लोगों को पानी से बाहर निकाला और दो शवों को बाहर निकाला."

लोगों से जानकारी देने की अपील

अधिकारियों के अनुसार मोरबी में पुल के गिरने से हुए हादसे से जुड़े पीड़ित परिवारों के लिए ज़िला आपदा नियंत्रण कक्ष ने हेल्पलाइन नंबर जारी किया है.

अधिकारियों का कहना है कि जिनके परिवार के सदस्य अब तक लापता हैं उनकी सूचना इस हेल्पलाइन नंबर 02822 243300 पर मालूम की जा सकती है.

गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने इस हादसे में मारे गए लोगों के परिजनों के लिए 4 लाख रुपये और घायलों को 50 हज़ार रुपये की राहत राशि देने का एलान किया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा है कि उन्होंने इस मामले पर गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल और अन्य अधिकारियों से बात की है.

प्रधानमंत्री राहत कोष से मरने वालों के परिजनों को दो लाख रुपये और घायलों के लिए 50 हज़ार रुपये की राहत राशि देने की घोषणा की गई है.

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