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मोरबी पुल हादसाः भीड़ की वजह से टूटा पुल या कारण कुछ और हैं?
- Author, पारस झा & जय शुक्ला
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
गुजरात के मोरबी में सस्पेंशन ब्रिज टूटने से 135 लोगों की मौत हुई है. इस घटना के कारणों की जांच के लिए आयोग गठित कर दिया गया है.
मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मोरबी के उस ब्रिज का जायज़ा लिया जो टूट कर गिर गया था. उन्होंने काफ़ी देर तक घटनास्थल पर खड़े रहकर बेहद बारीकी से हादसे के बारे में पूरी जानकारी ली.
पुल का जायज़ा लेने के बाद वो घायलों से मिलने अस्पताल भी गए.
आइए अब समझते हैं कि मोरबी के हादसे की वजह क्या रही होगी.
1879 में बनकर तैयार हुआ ये पुल उस दौर में इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण था. लेकिन अब 143 साल बाद ये 135 लोगों की मौत का कारण बन गया है.
केबल की तारों से लटके इस तरह के पुलों को झूला पुल भी कहा जाता है. इंजीनियरिंग की भाषा में इन्हें सस्पेंशन ब्रिज कहा जाता है.
इस तरह के पुल किसी आधार पर टिके होने के बजाए केबल के सहारे तोनों तरफ़ मज़बूत आधार से लटके होते हैं.
ऋषिकेश के लक्ष्मणझूला और रामझूला पुल सस्पेंशन ब्रिज के चर्चित उदाहरण हैं. रोज़ाना हज़ारों पर्यटक यहां से गुज़रते हैं.
क्या होता है केबल पुल?
क्या सरकारी एजेंसियों से चूक हुई?
राजकोट के स्ट्रक्चरल इंजीनियर जयंतभाई लखलानी बताते हैं, "इस तरह के केबल ब्रिज में दोनों तरफ़ दो मज़बूत सहारे खड़े किए जाते हैं. ये सीमेंट, लोहे या लकड़ी के ऊंचे खंभे होते हैं. केबल इसी मज़बूत आधार से बंधे होते हैं."
राजकोट के आर्किटेक्ट सुरेश सांघवी के मुताबिक़, सस्पेंशन के लिए इस्तेमाल केबल या रस्सी की भार उठाने की क्षमता को भी जांचा-परखा जाता है.
इस तरह के निर्माण की गुणवत्ता को हर स्तर पर जांचा जाता है. जयंतभाई लखलानी के मुताबिक़, समूचे निर्माण को ब्यरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड के हिसाब से पूरा किया जाता है.
ऐसी जगहों के निर्माण पर ख़ास ध्यान दिया जाता है जहां से बड़ी तादाद में लोग गुज़र सकते हैं और जहां किसी हादसे की आशंका हो सकती है.
इस तरह के निर्माण की गुणवत्ता को परखने की एक विस्तृत प्रक्रिया होती है जिसका पालन अनिवार्य होता है.
जयंतभाई लखलानी कहते हैं, ''भले ही कोई एनजीओ इस तरह के निर्माण में मदद कर रही हो, लेकिन उसके तकनीकी पक्ष का ध्यान रखना सरकारी एजेंसी की ज़िम्मेदारी होती है.''
पुल की गुणवत्ता ख़राब या लोग ज़्यादा थे
लखलानी कहते हैं, "इस तरह के किसी भी निर्माण को जनता के लिए खोलने से पहले उसकी क्षमता और मज़बूती की पुष्टि करना सरकार की ज़िम्मेदारी होती है, भले ही उसका निर्माण किसी ने भी क्यों ना किया हो. ऐसा निर्माण सरकारी शर्तों के तहत ही पूरा किया जाना चाहिए."
मोरबी में पुल टूटने की वजह की जांच आयोग करेगा. इस बीच एक सवाल ये भी उठ रहा है कि पुल पर उसकी क्षमता से अधिक लोग मौजूद थे जिसकी वजह से वह टूट गया.
गुजरात इंस्टीट्यूट ऑफ़ सिविल इंजीनियर्स एंड आर्किटेक्ट्स की प्रबंधन समिति के अध्यक्ष वत्सल पटेल कहते हैं, "इस पुल को बनाने वाली कंपनी ने अपनी कॉरपोरेट और सोशल ज़िम्मेदारी के तहत इस काम को किया है."
वो कहते हैं, "इसकी मरम्मत के काम में उच्च गुणवत्ता की सामग्री का इस्तेमाल हुआ है जिसे जिंदल जैसी कंपनियों ने बनाया है. ऐसे में प्रथम दृष्टया ये लग रहा है कि निर्माण ख़राब नहीं था, बल्कि हो सकता है पुल ओवरलोड की वजह से गिरा हो."
वत्सल पटेल कहते हैं, "हादसे के सही कारणों का पता लगाने के लिए जांच टीम का गठन किया गया है."
इस पुल के कई वीडियो भी वायरल हुए हैं जिनमें कुछ युवा पुल की केबल को हिलाते दिख रहे हैं. हालांकि इन वीडियो की अभी पुष्टि नहीं हुई है.
वत्सल पटेल कहते हैं, "अगर कोई इस तरह से, पुल को हिलायेगा तो उससे पुल टूटेगा नहीं. लेकिन एक साथ बहुत बड़ी तादाद में अगर लोग ऐसा करें, और पुल कमज़ोर हो, तो हो सकता है पुल टूट जाए."
वत्सल पटेल कहते हैं, "यहां सवाल सुरक्षा का नहीं है बल्कि प्रशासनिक है कि इतनी बड़ी तादाद में लोगों को पुल पर जाने क्यों दिया गया?"
नवसारी के स्ट्रक्चरल इंजीनियर बीरेन कनसारा पुल के गिरने के बारे में कहते हैं, "या तो केबल को सही से डिज़ाइन नहीं किया गया या उनमें भार को सहने की क्षमता नहीं थी. आमतौर पर केबल ब्रिज को इस तरह से डिज़ाइन किया जाता है कि वो लोगों की भीड़ के बोझ को संभाल ले."
क्या क्षमता से अधिक भार के अलावा और भी कारण हो सकते हैं?
इस तरह के केबल ब्रिज डिज़ाइन के ढांचे की मज़बूती दशकों से साबित होती रही है. इस डिज़ाइन पर देश भर में सैकड़ों और दुनियाभर में हज़ारों पुल बनाए गए हैं.
अहमदाबाद के कंसल्टिंग स्ट्रक्चरल इंजीनियर अनस शाह कहते हैं, "केबल ब्रिज स्ट्रक्चर पुल बनाने की बुनियादी तकनीक है. इस तरह के पुल बहुत मज़बूत होते हैं. लेकिन ये बात भी ध्यान में रखनी चाहिए की हर मानव-निर्मित चीज़ को मरम्मत की ज़रूरत होती ही है.
जगह, क्षेत्र, वातावरण, इस सबका निर्माण पर असर पड़ता है. मज़बूती इस्तेमाल की गई सामग्री पर निर्भर करती है."
अनस शाह कहते हैं कि मोरबी का झूला पुल 2001 के विनाशकारी भूकंप के बाद भी खड़ा रहा था.
अनस शाह कहते हैं, "किसी पुल या निर्माण के गिरने के कई कारण हो सकते हैं. जैसे सामग्री की गुणवत्ता, या निर्माण की समयसीमा का समाप्त होना, क्षमता से अधिक भार, या केबल आदि को नुक़सान पहुंचना. ऐसा भी हो सकता है कि इन कारणों के बावजूद, ये निर्माण प्राकृतिक कारणों से गिर गया हो."
अमेरिका का चर्चित टाकोमा नैरोज़ ब्रिज तेज़ हवा की वजह से हुए एयरो-इलास्टिक स्पंदन की वजह से ही गिर गया था.
इस तरह के पुल की फ़िटनेस को जांचने के लिए क्या किया जाना चाहिए इस बारे में अनस शाह कहते हैं, "किसी भी निर्माण की मज़बूती और फ़िटनेस को जांचने के लिए कई तरह के परीक्षण किए जाते हैं.
उपयोग की गई सामग्री की गुणवत्ता को भी जांचा जाता है. इसके अलावा मौके पर मुआयना भी किया जाता है. किसी भी सौ मीटर लंबे निर्माण में कम से कम दो-तीन जगह से सैंपल लेकर टेस्ट किया जाता है."
वहीं राजकोट के आर्किटेक्ट सुरेश सांघवी कहते हैं कि पुल की केबल की भार उठाने की क्षमता पुल पर मौजूद लोगों के कुल भार से कम रही होगी.
हालांकि इंजीनियर जयंतभाई लखलानी इस संभावना को ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड के मानदंड के मुताबिक़ एक वर्ग मीटर जगह पर 500 किलो वज़न उठाने की क्षमता रखनी चाहिए.
लखलानी कहते हैं, "ये पुल 225 मीटर लंबा था और 1.4 मीटर चौड़ा था. यानी औसतन 80 किलो वज़न के 1900 लोगों का वज़न उठाने की क्षमता इस पुल की थी. अगर पुल ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड के मानदंडों पर बना होता तो ये 500 लोगों के वज़न से नहीं गिरा होता."
क्या करेगा जांच आयोग?
जांय आयोग पुल के गिरने के कारणों की जांच करेगा. सबसे पहले क्षमता से अधिक भार की थ्योरी को परखा जाएगा.
ये भी पता लगाया जाएगा कि मरम्मत के दौरान पुराने केबल ही इस्तेमाल किए गए थे या नए केबल लगाए गए थे.
अगर केबल पुराने थे तो उनकी भार उठाने की क्षमता कितनी थी? साथ ही पुल के डिज़ाइन की जांच भी की जाएगी.
ये भी पता लगाया जाएगा कि पुल का मुआयना हुआ था या नहीं.
पुल के निर्माण में इस्तेमाल सामग्री की गुणवत्ता को भी परखा जाएगा.
ये भी पता लगाया जाना है कि क्या तीसरे पक्ष के स्ट्रक्चरल इंजीनियरों ने पुल का मुआयना किया था या नहीं.
जयंतभाई लखलानी कहते हैं, "आयोग का सही से जांच करना, समय पर रिपोर्ट देना और ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होना बेहद ज़रूरी है."
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