ट्रंप की धमाकेदार जीत से शुरुआत क्या उन्हें फिर अमेरिकी राष्ट्रपति बनाएगी?

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- Author, एंथनी ज़र्चर
- पदनाम, उत्तर अमेरिका संवाददाता, डे मोइन, आयोवा
आयोवा कॉकस के इतिहास में शायद पहली बार ये सबसे कम चौंकाने वाली जीत रही है.
रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए हुए पहले चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने एकतरफ़ा जीत दर्ज की है. महीनों से इस मतदान के परिणामों का अंदाज़ा लगाया जा रहा था और आख़िर में ऐसा ही हुआ.
मतगणना के दौरान पूर्व राष्ट्रपति ने एकतरफ़ा बढ़त बनाए रखी और मंगलवार की रात को उनकी जीत के बाद कड़ाके की ठंड में उनके समर्थक इस जीत का जश्न मना रहे थे.
ट्रंप के मुख्य प्रतिद्वंद्वी निक्की हेली, रॉन डेसैंटिस और उनकी विचारधारा से मिलते-जुलते विवेक रामास्वामी कहीं भी उन्हें चुनौती देते नहीं दिखाई दिए. उनके वोट विभाजित भी नहीं दिखाई दिए.
दूसरी ओर उनके प्रतिद्वंद्वी विवेक रामास्वामी ने घोषणा कर दी है कि वो चुनाव से पीछे हट रहे हैं और न्यू हैम्पशर में मंगलवार को ट्रंप का समर्थन करेंगे.
यहां आयोवा के परिणामों को क़रीब से देखे जाने की ज़रूरत है क्योंकि व्हाइट हाउस की दौड़ में ये बेहद महत्वपूर्ण है.
यह अभी भी डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी

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आयोवा में ट्रंप को मिली जीत ऐतिहासिक रूप से बहुत विशाल है. उन्होंने आयोवा की 99 काउंटी में सबसे अधिक वोट हासिल किए जबकि सिर्फ़ एक काउंटी में एक वोट से हारे.
आयोवा में कोई भी 12 पाइंट से ज़्यादा बढ़त नहीं बना पाया था जबकि ट्रंप ने 30 फ़ीसदी के अंतर से बढ़त बनाई और पूर्ण बहुमत से जीत दर्ज की.
सभी वोटों की गिनती की गई और ट्रंप को 51 फ़ीसदी, डेसैंटिस को 21 फ़ीसदी और हेली को 19 फ़ीसदी वोट मिले.
आयोवा में जिस तरह से मतदान हुआ वो इस बात का उदाहरण है कि ट्रंप क्यों अब तक पार्टी की चुनावी राजनीति में बाज़ी मार रहे हैं.
बीबीसी के अमेरिका में साझेदार सीबीएस न्यूज़ के मुताबिक़, पार्टी के अधिकतर लोगों का विश्वास अभी भी ट्रंप के ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ वाले जुमले पर बना हुआ है.
ट्रंप की जीत में समाज के सभी वर्गों का योगदान लगभग बराबर ही रहा है. उन्हें युवाओं, बुज़ुर्गों, पुरुषों और महिलाओं…सभी का पुरज़ोर समर्थन मिला है. वे धुर दक्षिणपंथी मतदाताओं का वोट लेने में भी सफल रहे हैं जो 2016 में उनसे दूर रहे थे.
अमेरिका में आमतौर पर राष्ट्रपति चुनाव में हारने वाले उम्मीदवारों को लोग भूल जाते हैं. हारे हुए उम्मीदवार कभी भी दोबारा कमबैक नहीं कर पाते हैं.
लेकिन आयोवा की जीत ने दिखा दिया है कि रिपब्लिकन पार्टी में अब भी ट्रंप की ख़ासी धाक है.
ट्रंप की जीत क्यों है ख़ास

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रिपब्लिकन पार्टी के भीतर ट्रंप की ताक़तवर मौजूदगी पर कभी किसी को कोई संदेह नहीं रहा है. लेकिन आयोवा में मिली जीत अमेरिकी राजनीति के हिसाब से असाधारण है.
तीन वर्ष पहले ट्रंप ने राष्ट्रपति का पहला कार्यकाल विवादों के बीच ख़त्म किया था. 6 जनवरी को कैपिटॉल हिल पर उनके समर्थकों का हुड़दंग अमेरिकी इतिहास का सबसे दुखद हिस्सा बन चुका है.
उस दंगे के लिए ट्रंप पर दो आपराधिक मामले चल रहे हैं.
अब आयोवा में मिली जीत के बाद उन्होंने नंवबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में दोबारा रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार बनने की दिशा में क़दम बढ़ाया है.
लेकिन अब भी ट्रंप को पार्टी का उम्मीदवार बनने के लिए कड़ा संघर्ष करना है. अगले हफ़्ते उन्हें न्यू हैंपशर प्रांत में निकी हेली जैसी ताक़तवर प्रतिद्वंद्वी से दो हाथ करने हैं.
न्यू हैंपशर से आ रहे ताज़ा सर्वेक्षणों में ट्रंप की लीड अब 10 प्रतिशत से भी कम रह गई है. लेकिन रिपब्लिकन पार्टी की ओर से ट्रंप अब भी सबसे प्रबल दावेदार हैं.
आयोवा में कोई चुनौती देने वाला नहीं?

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आयोवा में ट्रंप को कोई ख़ास मशक्कत नहीं करनी पड़ी. दरअसल वहां चर्चा इस बात की थी कि दूसरे नंबर पर कौन आएगा. और आख़िर में डेसैंटिस ने दूसरा स्थान हासिल किया.
लेकिन डेसैंटिस के लिए ये कोई बड़ी उपलब्धि भी नहीं है क्योंकि इतनी मेहनत के बाद भी वे दूसरे स्थान पर ही रह पाए. भले ही उन्होंने निकी हेली को पीछे छोड़ दिया हो.
आयोवा का नतीजा और डेसैंटिस के उस बयान से कि वो अपनी कोशिश जारी रखेंगे, ये तय नहीं होगा कि वाकई वही ट्रंप को सीधी टक्कर देने वाले बनेंगे.
दरअसल इन नतीजों ने ट्रंप की जीत के चांस को और पुख़्ता ही किया है. ट्रंप की ‘फूट डालो और जीत हासिल करो’ वाली रणनीति कारगर साबित होती दिख रही है.
रिपब्लिकन पार्टी की दावेदारी के एक उम्मीदवार विवेक रामास्वामी दौड़ से पीछे हट गए हैं. उन्होंने कहा है कि वे अब ट्रंप का समर्थन करेंगे.
भारतीय मूल के रामास्वामी को आयोवा राज्य में महज़ 8% वोट ही मिले. लेकिन ट्रंप को उनका समर्थन, पूर्व राष्ट्रपति की न्यू हैंपशर में ख़ासी मदद कर सकता है.
आयोवा के नतीजों के बाद पूर्व राष्ट्रपति अब राष्ट्रपति बाइडन पर अपने हमले जारी रख सकते हैं. सोमवार को जीत के बाद दिए भाषण में भी ट्रंप ने बाइडन के ख़िलाफ़ मोर्चा खोले रखा.
उधर बाइडन की डेमोक्रेट पार्टी ट्रंप के आक्रामक अंदाज़ को अच्छी बात मान रही है. उन्हें लगता है कि ट्रंप में कई ख़ामियां हैं जिनकी वजह से उनकी पार्टी का ही पक्ष मज़बूत होगा.
आयोवा में मिली जीत के बाद डोनाल्ड ट्रंप के अभियान को निश्चित तौर पर एक गति मिलेगी. जब तक मतदान डालने की बारी आएगी तब तक ट्रंप को उम्मीद है कि वो एक ताक़तवर उम्मीदवार के तौर पर उभर चुके होंगे.
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